यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं
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बुधवार, 28 अप्रैल 2010

महंगाई लोकसभा में जीत गई और आम आदमी के लिए लडऩे वाले हार गए

और महंगाई जीत गयी। लोकसभा में महंगाई के पक्ष में वे भी मत देते देखे गए जो महंगाई के विरुद्ध हैं। लोकसभा के बाहर जिन 13 दलों ने महंगाई के विरोध में भारत बंद का आव्हान किया था उममें से कुछ महंगाई के विरुद्ध कटौती प्रस्ताव पर मत देने के लिए सहमत नहीं हुए। यहां तक कि झारखंड में भाजपा के समर्थन से सरकार चलाने वाले शिबू सोरेन तक कांग्रेस गठबंधन के पक्ष में मतदान करते देखे गए। पूछने पर बड़ा भोला सा जवाब दिया कि किसी को तो मत देना था, इसलिए सरकार के पक्ष में मत दे दिया। मुलायम और लालू संसद के बाहर महंगाई का विरोध करते नारे लगाते देखे गए लेकिन मतदान का लोकसभा में बहिष्कार किया। वामपंथियों ने अवश्य अपने कटौती प्रस्ताव के पक्ष में मतदान दिया लेकिन भाजपा को उनके कटौती के पक्ष में मतदान करने में कोई हिचक नहीं हुई। भाजपा के कटौती प्रस्ताव पर मतदान करने में जिन्हें हिचक हुई, उनकी सोच की संकीर्णता ही उजागर होती है। क्योंकि महंगाई भी धर्मनिरपेक्ष हैं। ऐसा नहीं है कि महंगाई किसी धर्म विशेष के मानने वालों को प्रभावित करती है।

कभी गरीबों हटाओ का नारा कांग्रेस का मुख्य आधार था। आज महंगाई उसका नारा दिखायी देता है। देश में गेहूं की बंपर फसल है। गोदामों में रखने की जगह नहीं है। फिर भी विदेशों से मनमाने गेहूं आयात किया जा रहा है। जो कि सस्ता है और गेहूं की पैदावार करने वाले कृषकों के लिए सिवाय नुकसान के और कुछ नहीं है। जिस खाद्यान्न की देश में जरुरत नहीं उसे मंगवाया जाना कौन सा राष्ट्र् हित है? जो सरकार साढ़े बारह रुपए किलो में शक्कर विदेशों में बेचने की अनुमति देती है और 30-35 रु. किलो फिर आयात की स्वीकृति देती है, वह कैसे गरीबों की हितैषी हो सकती है। सरकार ने संख्या बल के आधार पर भले ही महंगाई बढ़ाने वाले प्रस्तावों को स्वीकृत करा लिया है लेकिन गरीबों के हितैषी बनने वाले दल सरकार के पक्ष में संसद में दिखायी देते हैं तो जनता अच्छी तरह से समझती है कि उसे कौन बेवकूफ समझ रहा है?

कल अगर कटौती प्रस्ताव लोकसभा में पारित हो जाता तो सरकार ही गिर जाती। मायावती कांग्रेस को अपना दुश्मन नंबर एक बताते नहीं अघाती। मुलामय सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव को कांग्रेस ने सरकार में न लेकर जैसा झटका दिया है, उसके बावजूद वे कांग्रेस की सरकार को ही बचाते दिखायी देते हैं। वे भाजपा के साथ खड़ा होते नहीं दिखायी देना चाहते। कारण मुसलमान वोट उनसे नाराज न हो जाएं। मुलायम सिंह कल्याण सिंह को साथ लेकर मुसलमान वोटों के नुकसान को झेल चुके हैं। मायावती इसलिए कांग्रेस के साथ कि शायद सरकार सीबीआई से उनकी जान छुड़ाए। फिर मुलायम महंगाई के विरुद्ध आंदोलन में तो मायावती कांग्रेस के साथ। भारतीय राजनीति का यह विरोधाभास सत्ता के अंकगणित को ऐसा प्रभावित करता है कि जनता भले ही दुख भोगे लेकिन होशियार लाभ उठाते रहें।

इस समय देश में वास्तव में विपक्ष के नाम पर भाजपा और वाम दल ही हैं। कभी जिस भाजपा को बनियों की पार्टी कहा जाता था, वही भाजपा आज महंगाई के विरोध में खड़ी है। वह अपना जनता के प्रति दायित्व निभा रही है। दूसरी तरफ वामपंथी हैं जो समझते हैं कि महंगाई का बोझ जनता के बर्दाश्त के बाहर हो रहा है। वे अपनी शक्ति भर लड़ रहे हैं लेकिन असल में जिस कांग्रेस को महंगाई के विरुद्ध जनता को राहत पहुंचाने की सोचना चाहिए, वह नित्य नए आयामों से महंगाई जनता पर लाद रही है। बड़ी ही चालाकी से वह छोटे क्षेत्रीय दलों की कमजोरियों का लाभ उठा रही हैं। क्योंकि ये दल भाजपा के साथ नहीं जा सकते। देश की 120 करोड़ जनता में से 100 करोड़ महंगाई का फल भोग रही है। उत्तरप्रदेश बिहार में बसें जलायी जा रही हैं। मुलायम सिंह और लालू प्रसाद यादव के कार्यकर्ता ही जला रहे हैं। महंगाई भले ही रहे लेकिन सरकार नहीं गिरना चाहिए। इसलिए लोकसभा में महंगाई के विरुद्ध मतदान नहीं करते।

देश की एक महिला राजनयिक पाकिस्तान में देश के गोपनीय दस्तावेज आई एस आई को बेचती है। पैसों के लिए। मतलब देश से बड़ा धन है, उसके लिए। देश भर में अपराध बढ़ रहे हैं। आर्थिक भेदभाव इसी तरह से बढ़ता रहा और महंगाई पर लगाम नहीं कसी गयी तो धन के लिए लोग सब कुछ करेंगे । सिर्फ पुलिस और कानून का डंडा इसे रोक नहीं सकता। ऐसी ही परिस्थितियां तो आतंकवाद और नक्सलवाद को भी सहयोग करती हैं। बुद्धिजीवी कहते भी हैं कि विकास के अभाव के कारण नक्सलवाद को प्रोत्साहन मिला। तथाकथित विकास हो भी गया और पेट की भूख मिटाना आसान न रहा तो क्या यह भी एक कारण नहीं बनेगा, लोगों के क्रोध को हिंसा की तरफ मुडऩे में। फिर अपराध स्वच्छंदता तो देता ही है, आसान कमायी भी देता है। मरता क्या न करता की तर्ज पर कानून का नियंत्रण कमजोर पड़ा तो यह महंगाई देश के लिए विकास के नाम पर घातक ही सिद्ध होगी।

खाद्यान्न की महंगाई के साथ पानी की किल्लत भी भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं दे रही है। अटल बिहारी की सरकार ने नदियों को जोड़कर पानी की स्थायी व्यवस्था करने की जो योजना बनायी थी, उसे तो कांग्रेस गठबंधन सरकार ने छोड़ दिया। खाद्यान्न महंगा ही सही विदेशों से मंगवाएंगे लेकिन पानी भी विदेशों से मंगवाएंगे क्या? विकास दर साढ़े आठ चाहिए। इससे क्या सभी समस्याओं का समाधान हो जाएगा? जनसंख्या नियंत्रण कभी कांग्रेस के मुख्य कार्यक्रमों में से एक था लेकिन अब उस पर भी सरकार ने चुप्पी साध रखी है। जब मनमोहन सिंह जैसे अर्थशास्त्री को देश का प्रधानमंत्री बनाया गया था तब सोच एक आयाम में केंद्रित हो गयी। निश्चित रुप से कुछ लोग बहुत फल-फूल रहे हैं। दुनिया के गिने-चुने अमीरों की सूची में भी चंद भारतीयों का नाम आ गया है। आईपीएल जैसे क्रिकेट के तमाशे भी अरबों के हो गए हैं तो अरबों के घोटाले भी हो रहे हैं। मेडिकल कॉलेजों को मान्यता देने वाले अधिकारी की ही तिजोरी से डेढ़ टन सोना निकल रहा है। 5 करोड़ की रिश्वत लेते पकड़े गए। आईएएस के घर की तलाशी में ही करोड़ों रुपये निकलते है। यही है, आर्थिक विकास या सत्ता कानून का दुरुपयोग।

कमा सकते हो, कमा लो। खाद्यान्न का सट्टा बंद करो। विपक्ष मांग करता है लेकिन सरकार सुनती नहीं। खाद्यान्न ही क्यों हर वस्तु पर सट्टï हो रहा है। आखिर एम सी एक्स में कमा कौन रहा है? न तो कुछ वास्तव में खरीदा जाता और न ही बेचा जाता लेकिन अरबों का वारा-न्यारा प्रतिदिन होता है। नंबर एक में भी और नंबर दो में भी। क्रिकेट में ही सट्टा नहीं होता। हर उसमें सट्टा होता है जिसमें उतार चढ़ाव का खेल है। आयकर अधिकारियों के यहां से भी करोड़ों रुपए पकड़े जातें हैं। सरकार पेट्र्रोल डीजल की कीमतें बढ़ा कर ही मस्त है। क्योंकि अभी चुनाव दूर है। अभी जनता को सहलाने की जरुरत नहीं हैं। सरकार चलती रहना चाहिए। चुनाव मजबूरी है। लडऩा कौन चाहता है? जनता ने सत्ता से उतार दिया तो? महंगाई संसद में खिलखिला कर हंसती है तो सत्ता पक्ष के भी चेहरे खिल जाते हैं। यही आम आदमी का भाग्य है।

- विष्णु सिन्हा
दिनांक : 28.04.2010

बुधवार, 3 मार्च 2010

एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के जाल में फंस गयी है आम जनता

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने स्पष्ट कर दिया है कि तेल की कीमतें कम नहीं होगी। शरद पवार ने पहले ही सरकार का समर्थन कर दिया है। तृणमूल कांग्रेस और डीएमके जो पहले तेल की बढ़ी कीमत पर नाराजगी प्रगट कर रहे थे, वे भी मनमोहन सिंह का रुख देखकर ठंडे पड़ रहे हैं। सरकार में सम्मिलित दल सरकार के विरोध में इतनी दूर तक जाने का इरादा नहीं रखते कि उन्हें सरकार से ही अलग होना पड़े। सत्ता का सुख होता ही ऐसा है। जो निष्ठुर और क्रूर बनाता है। तेल की बढी  कीमत से सरकार का आंकलन है कि महंगाई मात्र दशमलव चार तीन प्रतिशत ही बढ़ेगी। जबकि बाजार में तेल की ही कीमत सरकार के अनुमान से ज्यादा बढ़ गयी है। सीमेंट की कीमतों में भी 7-8 रुपए का इजाफा हो चुका। डीजल की कीमत बढऩे का क्या अर्थ होता है? यह समझने के लिए अर्थशास्त्री होने की जरुरत नहीं बल्कि सामान्यजन भी अनुभव से जानता है कि जब भी कीमतें बढ़ी तब बाजार में महंगाई ने ऊंची छलांग ली लेकिन जो समझ कर भी नहीं समझना चाहते, उनका कोई उपचार हाल फिलहाल तो नहीं है। क्योंकि चुनाव अभी बहुत दूर है। सत्ता के सिंहासन पर बैठे लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि वे जो चाहे करें और 4 वर्ष तक उनकी सत्ता सुरक्षित है।

उन्हें इसकी भी चिंता नहीं कि विपक्ष का राग सुर इस मामले में एक है। तेल की बढ़ी कीमत के विरुद्ध सांप्रदायिकता भी आड़े नहीं आती। भाजपा और राजग के दलों के विरुद्ध सदा से ताल ठोंकने वाले वाम दल, लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, मायावती सब के सब एक साथ खड़े दिखायी पड़ रहे हैं। इन्हीं लोगों ने पिछले कार्यकाल में कांग्रेस के नेतृत्व में संप्रग की सरकार बनवायी थी। डर था, कहीं भाजपा सत्ता में न आ जाए। एकमात्र मामले में राजनैतिक दलों में विभाजन था कि सांप्रदायिकता या धर्म निरपेक्षता। अमेरिका से परमाणु संधि के मामले में जब वामदलों ने समर्थन वापस लिया तो मुलायम सिंह और अमर सिंह कांग्रेस की सरकार बनाने के लिए आगे आए। उन्होंने सरकार भी बचा ली लेकिन हासिल क्या हुआ? मतलब निकल गया तो कांग्रेस ने समाजवादी मुलायम सिंह और अमर सिंह को पहचानने से इंकार कर दिया। उत्तरप्रदेश में नुकसान भी मुलायम सिंह को उठाना पड़ा और सीटें बटोर ली कांग्रेस ने। जब मुलायम सिंह कमजोर हुए तो अमरसिंह ने भी उनका साथ छोड़ दिया। 


पिछली संप्रग सरकार में कांग्रेस के खास समर्थक लालू प्रसाद यादव थे। वे तो तब भी समर्थक थे जब कांग्रेस के पास सत्ता नहीं थी। मुखर विरोधी भाजपा के वे ही माने जाते थे। जब बिहार में लालू प्रसाद की शक्ति क्षीण हुई तो कांग्रेस ने एक अदद केंद्रीय मंत्री का दर्जा भी उन्हें देना गंवारा नहीं किया। मुलायम सिंह को भी वे ही समझा बुझाकर कांग्रेस के समर्थन में लाए थे। वर्तमान में जो संप्रग सरकार द्वितीय है, उसे बिना शर्त लालू यादव, मुलायम यादव, मायावती ने समर्थन घोषित किया। बिना मांगे समर्थन मिले तो कोई भी फूल कर गुब्बारा हो सकता है और कांग्रेस हो गयी। दोनों यादव मन मसोस कर रह गए पर वक्त का तकाजा था और अपना ही बोया काटना था तो कर क्या सकते थे? फिर भी अवसर की तलाश तो थी और तेल की बढ़ी कीमत ने अवसर दे दिया। 


महंगाई की मार से बेचैन जनता पर डीजल पेट्रोल  की बढ़ी कीमत किसी कहर से कम नहीं है। यह बात सभी अच्छी तरह से समझते हैं। ऐसे में जनता का खोया हुआ विश्वास फिर से प्राप्त करना है, अवसर अच्छा है। सब एक हो गए हैं। पेट्रोल, डीजल की कीमत को लेकर सरकार के विरुद्ध खड़ी पार्टियां अपने-अपने राज्यों में धरना प्रदर्शन कर रही है। आंध्र, केरल, त्रिपुरा, उत्तरप्रदेश, दिल्ली सर्वत्र बंद प्रदर्शन हो रहा है। लोकसभा, राज्यसभा की कार्यवाही नहीं चलने दी जा रही है। तेल की बढ़ी कीमत के विरोध में बैलगाड़ी, साइकल प्रदर्शनों में सड़क पर उतर आयी है। लोकसभा के चुनाव में भले ही अभी 4 वर्ष का समय हो लेकिन राज्यों में तो चुनाव कहीं न कहीं होने वाले ही है। कांग्रेस की केंद्र सरकार के विरुद्ध माहौल खड़ा करने का इससे बेहतर मौका कौन सा हो सकता है? 


लेकिन इस विपक्ष की कार्यवाही से हटकर सरकार की सोच तो यही दिखायी पड़ रही है कि कब तक ये हल्ला-गुल्ला करेंगे। देर सबेर सब ठंडा पड़ जाएगा। तब सरकार उस अवसर की तलाश में है कि पेट्रोल डीजल  की दरों को नियंत्रण से मुक्त कर दे। जनता जाने और बाजार जाने। उसे तो अपने को मिलने वाले करों के रुप में धन से मतलब। उसका खजाना भरा पूरा रहे। जिससे वह अपने मनमाफिक खर्च कर सके। जनता को राहत के  रुप में सब्सिडी देना आर्थिक प्रगति को रोकने वाला है। आम जनता को नहीं, देश को आर्थिक प्रगति करना है तो आम जनता को उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। कौन मरता है और कौन लाभ उठाता है, इससे सरकार को कोई लेना देना नहीं। जिसमें दम हो, बुद्धि हो वह लाभ उठा ले। उसे चिंता है तो अपने वर्ग की या फिर अपने कर्मचारियों की। जिनके वेतन  वृद्धि के लिए छठवां वेतन आयोग की सिफारिश लागू करने में उसे कोई हिचक नहीं हुई। नेता और कर्मचारी फले-फूलें तो आम जनता के लिए सरकार का उपकार मनरेगा है, न। पहले नरेगा था। अब महात्मा गांधी का नाम जोड़कर योजना और महान हो गयी। 


प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी की स्पष्ट सोच है कि तेल मूल्य वृद्धि वापस लेने से जनकल्याणकारी कार्यक्रमों पर विपरीत असर पड़ेगा। यदि सरकार लोक लुभावन वित्तीय नीति अपनाती रही तो देश को कभी महंगाई से छुटकारा नहीं मिलेगा। मतलब साफ है कि सरकार की लोक लुभावन वित्तीय नीतियों के कारण महंगाई बढ़ रही है। जब ऐसा एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री कहता है तो यह भी बता दे कि पेट्रोल डीजल की कीमत बढ़ाने से या इन्हें खुले बाजार में सरकार के नियंत्रण से अलग कर महंगाई कैसे कम की जा सकती है या कैसे इस नीति के कारण महंगाई से छुटकारा मिलेगा? स्वतंत्र भारत के  63 वर्ष के इतिहास में आज तक तो कभी नहीं देखा गया कि महंगाई एक बार जो बढ़ जाती है, वह फिर से नीचे गिरती है। कुछ समय तक महंगाई स्थिर रहते तो देखा गया लेकिन फिर उसने जो छलांग लगायी तो वापस लौटने का नाम ही नहीं लेती।


अक्सर चुनावों के समय ही महंगाई कुछ नियंत्रित दिखती है। तब सरकार मतदाताओं को लुभाने के लिए तरह-तरह की छूट की घोषणा करती है लेकिन जैसे ही चुनाव हुआ, सरकार अपने रंग में लौट आती है। किसान कर्ज के तले दब कर आत्महत्या करता है, वह सरकार को दिखायी नहीं देता लेकिन चुनाव के पूर्व कर्ज माफ करने का क्या औचित्य है, यह क्या समझ में लोगों को नहीं आता? समाजवाद को लेकर चली कांग्रेस आज पूरी तरह से पूंजीवाद पर उतारु हो गयी है। कितने आराम से प्रधानमंत्री कहते हैं कि मूल्य वृद्धि से लोगों को तकलीफ अवश्य होगी लेकिन दीर्घकालीन हितों के लिए ऐसा करना जरुरी है। पेट में भूख की अग्रि आज प्रज्जवलित है तो क्या उस अग्रि को दीर्घकाल में शांत करेंगे। तब तक क्या होगा?


- विष्णु सिन्हा
दिनांक 03.03.2010
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शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

महंगाई कम करना डॉ. रमन सिंह के हाथ में होता तो महंगाई बढ़ती ही क्यों ?

स्वाभाविक है, नौटंकी लगना। राज्य सरकार साइकिल पर सवार होकर महंगाई के  प्रति विरोध प्रदर्शित करती है तो कांग्रेस के पास इसके सिवाय कहने को और क्या है कि यह नौटंकी है। केंद्र सरकार मंत्रिमंडल की बैठक कर महंगाई पर चिंता प्रगट करती है और महंगाई कम करने के लिए कड़े कदम उठाने की बात करती है तो कृषि मंत्री शरद पवार महंगाई कम होने के लिए अगली फसल का इंतजार करने को कहते हैं। शक्कर की बढ़ती कीमत के लिए उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को दोषी बताते हैं। केद्र सरकार पूरी बेशर्मी से राज्य सरकारों को महंगाई के  लिए दोषी बताती है। इसका तो अर्थ होता है कि राज्यों में स्थित विभिन्न पार्टियों की सरकारों में महंगाई बढ़ाने को लेकर एकता है। क्या यह संभव है? साफ  पता चलता है कि केंद्र सरकार के  बस में नहीं है महंगाई कम करना तो स्वयं को दोषी भी तो वह नहीं मान सकती। इसलिए राज्य सरकारें दोषी हैं। राज्य सरकारें व्यापारियों पर डंडा चलाएं। उन्हें परेशान करें और अलोकप्रिय बनें।

डा. रमन सिंह सरकार के मंत्री साइकिल पर सवार होकर विधानसभा जाते हैं तो वे जनता को संदेश देते हैं कि महंगाई के  लिए वे नहीं, केंद्र सरकार दोषी है।केंद्र सरकार 17 रू. किलो में शक्कर विदेशों में बेचती है और फिर 34 रूपये किलो में शक्कर विदेशों से खरीदती है तो दोषी कौन है? अपनी शक्कर सस्ते में विदेशियों के लिए और विदेश की महंगी शक्कर अपने देशवासियों के लिए तो महंगाई कम होगी या बढ़ेगी ? छत्तीसगढ़ के बीपीएल परिवारों के लिए ही जब केंद्र सरकार शक्कर पूरा नहीं देती तो उसे गरीबों की कितनी चिंता है, यह आसानी से समझ में आ जाता है। बाकी निम्र मध्यम श्रेणी के लोगों  के लिए तो सोचने विचारने की जरूरत ही केंद्र सरकार नहीं समझती।


मनमोहन सिंह जैसे पूर्व नौकरशाह को प्रधानमंत्री बनाकर कांग्रेस ने तो पहले ही कांग्रेसियों को बता दिया है कि कोई भी पूरी तरह से राजनीतिज्ञ कांग्रेसी इस योग्य उसकी दृष्टि में नहीं है कि जिसे वह प्रधानमंत्री बना सके। सेवानिवृत्त होने के बाद करीब 5 दर्जन नौकरशाह मनमोहन सिंह की सरकार का कामकाज देख रहे हैं। इसका अर्थ भी स्पष्टï है कि पूर्व नौकरशाह प्रधानमंत्री के लिए नौकरशाहों से काम लेना ही सरल है। छत्तीसगढ़ राज्य बना तब भी एक पूर्व नौकरशाह अजीत जोगी को ही छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के लिए सोनिया गांधी ने चुना था। परिणाम क्या हुआ? कभी कांग्रेस का गढ़ रहा छत्तीसगढ़ कांग्रेस के हाथ से निकल गया। विद्याचरण शुक्ल, श्यामाचरण शुक्ल जैसे दिग्गज राजनीतिज्ञों के रहते नौकरशाह को तरजीह देकर कांग्रेस ने आम लोगों से अपने को काट लिया।


महंगाई के लिए जब कांग्रेस ने शरद पवार को टारगेट बनाया तब शरद पवार ने पूरी सरकार को इसके लिए जवाबदार बताया। क्योंकि निर्णय किसी का व्यक्तिगत न होकर सामूहिक रूप से मंत्रिमंडल का है। शरद पवार की एक ही घुड़की से कांग्रेस ने फिर दोबारा महंगाई के लिए शरद पवार को दोषी ठहराना बंद कर दिया । जिस सरकार का मुखिया पूर्व नौकरशाह हो और वह एक पूर्व दिग्गज राजनीतिज्ञ अर्जुनसिंह को मंत्रिमंडल में लेने से इसलिए इंकार कर दे, क्योंकि अर्जुनसिंह ने कभी राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनने के लिए योग्य बताया था और इसमें आलाकमान हस्तक्षेप न कर सके  तो इसी से समझ में आता है कि सरकार कौन और किस तरह से चला रहा है। नौकरशाहों पर पूरी तरह से आश्रित सरकार के निर्णयों पर नौकरशाहों का ही नियंत्रण है। यहां तक कि राज्यों में राज्यपाल के  रूप में भी अधिकांश नियुक्ति नौकरशाहों की ही की गई है। कल तक जो राजनीतिज्ञों को सर कहा करते थे, अब राजनीतिज्ञ उन्हें सर कहकर संबोधित कर रहे हैं। संवैधानिक प्रक्रिया ऐसी है कि दोषारोपण भी जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों पर होता है जो सरकार में है। नौकरशाहों को दोषी तो बताया नहीं जाता.


मधु कौड़ा 4 हजार करोड़ का भ्रष्टाचार करते हैं तो नौकरशाह भी इस जमात में शामिल हैं। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में ही अरबपति नौकरशाह पकड़ में आए हैं। कांग्रेसी कह रहे हैं कि यह राज्य सरकार का सबूत है कि कितना भ्रष्टïचार है। मधु कौड़ा की सरकार को तो कांग्रेस का समर्थन था। उस विषय में कांग्रेसी क्या कहेंगे ? दरअसल भ्रष्ट राजनीतिज्ञ और भ्रष्ट नौकरशाह के आपसी सामंजस्य के बिना भ्रष्टचार हो ही नहीं सकता। भ्रष्टाचार की बहती गंगा में थोड़ा बहुत प्रसाद तो संबंधित सभी लोगों को  मिल जाता है। जो गरीबी रेखा से नीचे जीने वालों का राशन चुराने में भी पीछे नहीं रहते, उनके विषय में तो सिर्फ यही कहा जा सकता है कि धन के सामने नैतिकता अब छोटी बात हो गयी है। जब भ्रष्टïचार की गटर गंगा में सभी डुबकी लगाने के लिए तैयार हैं तो फिर महंगाई  बढऩे ही वाली है। नहीं तो एक संवेदनशील मानवीय सरकार खाद्यान्न पर वायदा कारोबार की इजाजत दे कैसे सकती है? पेट की भूख को सट्टे के  हवाले कैसे कर सकती है?


कांग्रेस के प्रवक्ता जब कहते हैं कि सूखा और बाढ़ के लिए सरकार दोषी नहीं तो वे अर्धसत्य ही कहते हैं। क्योंकि सामान्य स्थिति में सरकार की कोई भूमिका न हो यह तो समझ में भी आता है लेकिन विपरीत परिस्थितियों में सरकार जनता के लिए प्रबंध करे, यही तो सरकार की उपयोगिता है। जब सब कुछ बाजार के हवाले होगा और सट्टा कानूनी होगा तो फिर जनता जो भोग रही है, उसके  बाद जनता के लिए सरकार का औचित्य ही क्या रह जाता है? एक संवेदनशील, मानवीय सरकार का तो यह पहला कर्तव्य है कि वह अपने नागरिकों को बताए कि महंगाई का कारण कौन है? सामान्य रूप से जनता तक संदेश पहुंचे न पहुंचे लेकिन जब सरकार विधानसभा साइकिल पर बैठकर जाती है और अपना पसीना बहाती है तो जनता को अच्छी तरह से समझ में आता है कि आज जो महंगाई की मार उस पर पड़ रही है, उसके लिए उसकी चुनी हुई राज्य सरकार दोषी नहीं है।


पिछले दिनों ताजमहल के शहर आगरा जाने का अवसर मिला। 4-5 घंटे बिजली का गायब रहना आगरा शहर में आम बात है। जगह जगह लोगों ने जनरेटर लगा रखे हैं। इनवर्टर तो आम बात है लेकिन आगरा जैसी स्थिति तो फिरोजाबाद में नही है। वहां दिन दिन भर बिजली गुल रहती है। कभी कभी तो गर्मी में दिन रात गोल रहती है। उस दृष्टि  से तो छत्तीसगढ़ में बिजली एक वरदान की तरह है। जब छत्तीसगढ़ राज्य बना था तब से बिजली की खपत छत्तीसगढ़ में दोगुनी हो चुकी है लेकिन फिर भी डा. रमन सिंह के प्रयासों से छत्तीसगढ़ के लोगों को भरपूर बिजली मिल रही है। यह उस स्थिति में है जब केद्र सरकार ने बिजली के कोटे में कटौती कर रखी है। खाद्यान्न के कोटे में कटौती की गई। फिर भी सरकार गरीबों को और करीब करीब आधे छत्तीसगढ़ को 2 रू. और 1 रू. किलो में चांवल दे रही है। कितने ही राज्यों की तुलना में छत्तीसगढ़ की स्थिति अच्छी है। महंगाई कम करना भी सरकार के बस में होता तो डा. रमन सिंह पीछे रहने वाले नहीं थे। साइकिल पर सवार होकर जनता को असलियत का परिचय देना तो उनका कर्तव्य है और इसे कोई नौटंकी कहे तो कहता रहे। जनता सब कुछ अच्छी तरह से समझती है


- विष्णु सिन्हा
16-2-2010