यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं
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शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

जो पकड़ में आ गया वही दोषी लेकिन बाकी सब ईमानदार हैं क्या?


सुबह-सुबह सो कर उठते ही दरवाजे पर पुलिस और आयकर अधिकारी दिखायी दें तो किसी का भी रक्तचाप सामान्य नहीं रह सकता। फिर वह बड़ा अधिकारी हो शासन का तब तो मूड पूरी तरह से खराब होना ही है। जिसे सिर्फ अकडऩे और सलाम लेने की आदत हो, उसके घर के जर्रे-जर्रे की कोई तलाशी लेने पर उतारु हो और अधिकारी का अधिकार कोई काम नहीं आए तो स्थिति बड़ी बेचारगी की पैदा हो जाती है। उसके फोन, मोबाइल तक आयकर अधिकारी अपने पास रखवा लें तो फिर किसी से संपर्क कर किसी तरह की सिफारिश की भी उम्मीद नहीं रह जाती। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के कुछ आई.ए.एस. अधिकारियों की कल सुबह इसी तरह से थी। उनके साथ उनके रिश्तेदारों को भी तलाशी का सामना करना पड़ रहा था। अभी जांच चल रही है लेकिन प्रारंभिक जांच में मध्यप्रदेश के जोशी दंपत्ति के घर से जो 3 करोड़ रुपए के नोट पकड़ में आए हैं, वह अपनी कहानी स्वयं कह रहे है। आयकर, विभाग को तो नोटों की गिनती के लिए मशीन तक मंगवानी पड़ी। एक आई.ए.एस. अधिकारी के विषय में कहा जा रहा है कि उनकी बीमा की किश्तें वार्षिक उनके  वेतन से भी ज्यादा है । जांच पूरी होने के बाद ही पता चलेगा कि वास्तव में हमारे, जिम्मेदार अधिकारियों ने अपने पदों का दुरुपयोग कर कितना धन भ्रष्टाचार  से कमाया है। 

राजनेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं लेकिन भ्रष्टïचार की असली जड़ तो नौकरशाही में है। यह बात कोई गोपनीय नहीं है बल्कि एक खुली किताब की तरह है। देश में आई.ए.एस. अधिकारियों का बड़ी कठिन परीक्षा चयन से होता है। एक तरह से श्रेष्ठ लोगों का चयन होता है। इन श्रेष्ठ लोगों के चयन के पीछे जो एकमात्र विचार काम करता है कि ये लोग ईमानदारी से देश के विकास में और जो जिम्मेदारियां इन्हें सौंपी जाएंगी, उसे सही मकाम तक पहुंचाएंगे लेकिन वास्तव में ऐसा होता तो नहीं। राजनेता भ्रष्टïचार कर धन कमाता है तो उसके पीछे महंगा चुनाव एक बहाना होता है लेकिन नौकरशाह जो भ्रष्टïचार से कमाता है, वह तो उसका निजी धन हो जाता है। वह सरकारी योजनाओं को तो तहस-नहस करता ही है, उन लोगों के मुंह से भी निवाला छीन लेता है जिनका वास्तव में निवाले पर अधिकार है। हर काम में भ्रष्टाचार, हर जगह दलाली कमीशन तो फिर निर्माण कार्य सही हों तो कैसे?


जब बाबा रामदेव कहते है कि विदेशी बैंकों में भारत का इतना काला धन जमा है कि उसे लाकर देश में लगाया जाए तो देश में कोई गरीब न रहे। तब वे गलत तो नहीं कहते। विदेशी बैंकों में क्या देश में ही बहुतेरों ने अपने घरों में ही रुपया छिपा कर रखा है। सरकार एक सिरे से बिना भेदभाव के नौकरशाहों की तलाशी ले तो काला धन तो बाहर आएगा ही, इसके साथ ही देश को पता भी चल जाएगा कि कौन अधिकारी कितना भ्रष्टïचारी है और कौन अधिकारी कितना ईमानदार लेकिन मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने की हिम्मत है, क्या? आयकर अधिकारियों के यहां ही छापे में करोड़ों रुपए मिल चुके हैं। जिनका काम आयकर की चोरी पकडऩा है, प्रश्र यही है कि वे भी कितने ईमानदार हैं? वास्तव में अधिकारी ईमानदार हो जाए तो छोटे कर्मचारी भ्रष्टïचार की बात तो सोच  भी नहीं सकते। छोटे कर्मचारी क्या, राजनीतिज्ञ भी भ्रष्टाचार नहीं कर सकते। क्योंकि आदेश तो अधिकारियों के हस्ताक्षर से ही होते हैं। भ्रष्टाचार का आलम तो यह  है कि पिछले दिनों फौज के एक बड़े अधिकारी के विरुद्ध ही रक्षामंत्री को कोर्ट मार्शल का आदेश देना पड़ा। लगता नहीं कि कोई क्षेत्र भ्रष्टाचार से अछूता रह गया है। 


लेकिन छुटपुट कार्यवाही से भी भय का एक वातावरण तो बनता है। यह बात दूसरी है कि समय पाकर भय उडऩ छू हो जाता है और नौकरशाह और आश्रित हो जाता है, राजनीतिज्ञों के। जनता सिर्र्फ तमाशा देखती है। जो पकड़ में आ गया, वह बेवकूफ ही साबित होता है। भ्रष्टाचार से प्राप्त धन को ठिकाने लगाना उचित तरीके से उसे नहीं आता। जब एक आई.ए.एस. अधिकारी कहता है कि उसे षडय़ंत्र के तहत फंसाया जा रहा है तो वह गलत भी नहीं कहता। उसे अपना कृत्य गलत नहीं लगता। उसे छापा गलत लगता है। क्योंकि वह अच्छी तरह से जानता है कि उसने ऐसा कोई काम नहीं किया है जो दूसरे नहीं करते। वह अपने सहयोगियों की पोल पट्टी  अच्छी तरह से जानता है। फर्क इतना ही है कि एक बिल्डर कृस्मास के यहां पड़े छापे से ऐसे कुछ  सुराग आयकर अधिकारियों को लगते है जिससे वह पकड़ में आता है। 


मंत्रालय के सुरक्षित केबिनों में बैठने वाले इन अधिकारियों का न तो जनता से सीधा संपर्र्क होता है और न ही ये जनता की पकड़ में होते हैं लेकिन छोटे से छोटा और बड़ा से बड़ा निर्णय इनके हस्ताक्षर के बिना नहीं होता। ये न चाहे तो कोई काम किसी का नहीं हो सकता। ये कामों को उलझाने , सरकाने, अड़ंगा डालने में अपनी बुद्धि का उपयोग करते हैं। जिससे लगता है कि सरकार के प्रति ये कितने ईमानदार हैं। ये जनता के धन की बर्बादी नहीं देख सकते लेकिन अचानक कुछ होता है और सारी नोट शीट बदल जाती है। टिप्पणियां काम के पक्ष में दिखायी देने लगती है। ये चाहें तो दिन को रात कर सकते हैं और रात को दिन। इतना ही नहीं ये दिन को दिन मानने से भी इंकार कर सकते हैं। आखिर कुछ मंत्री क्यों शिकायत करते हैं कि अधिकारी उनकी नहीं सुनते। मतलब साफ है कि अधिकारी न सुने, मंत्री के अनुरुप काम करने को तैयार नहीं तो मंत्री इसके सिवाय कुछ नहीं कर सकता कि वह अपने मुखिया से अधिकारी को हटाने का निवेदन करे। मुखिया अधिकारी को न हटाए तो मंत्री सिर्फ  अपने निर्देशों, आदेशों का हश्र ही देख सकता है और जनता से अपने निकम्मेपन का उलाहना सुनने के सिवाय उसके पास कोई चारा नहीं होता। 


पहले एक सचिव और अंडर सेक्रेटरी ही पूरा विभाग चला लेते थे। अब प्रमुख सचिव, सचिव, विशेष सचिव, उप सचिव, अपर सचिव जैसे सचिव ही सचिव हो गए और काम है कि एक की भी अनुपस्थिति से सरकने का नाम नहीं लेता। मुख्यमंत्री, मंत्री ने आदेश दे दिया तो आदेश जाकर सचिव के पास से होता हुआ अंडर सेक्रेटरी के पास पड़ा रहेगा। वह अपनी जगह से हिलेगा भी नहीं। जब तक कि उस आदेश से लाभान्वित होने वाला व्यक्ति फाइलों को एक टेबल से दूसरे टेबल तक सरकाने का उपक्रम न करें। पहले तो मंत्रालय में घुसना ही हर किसी के बस की बात नहीं। फिर घुस भी जाए तो जटिल प्रक्रिया को समझना आसान नहीं। फिर फाइलें ऐसे ही तो आगे नहीं सरकती। जो जानकार हैं, तजुर्बेकार हैं वे पहले ही दान दक्षिणा कर फाइलों को आगे बढ़ाने का काम जानते हैं तो उनकी फाइलें सरकती नहीं, दौड़ती है। यह दान दक्षिणा और कुछ नहीं, वही रकम होती है जो कभी कभार के छापे में पकड़ी जाती है। 


एक वेतन भोगी आदमी को आयकर का रिटर्न भरने के लिए किसी सी.ए. की क्या जरुरत? उसका आयकर तो काट कर जमा कराना विभाग का ही दायित्व है। फिर भी सबके अपने-अपने सी.ए. है। कइयों के तो पूरे परिवार के रिटर्न दाखिल होते हैं। जितना काले धन को सफेद बनाने के तरीके है, उन सबका उपयोग किया जाता है। फिर भी कहीं न कहीं कभी न कभी कोई चूक हो जाती है। धन जहां लगाया जाता है वही सपड़ में आ जाता है तो फिर उसके द्वारा दूसरे भी सपड़ में आते हैं। फिर छोटा सा सुराग, इन्वेस्टमेंट पूरी खोज का रास्ता मुहैया करा देता है। यह अजब-गजब का खेल है। फौजदारी कार्यवाही करना आयकर का काम नहीं। वह टैक्स और पेनाल्टी लेकर शांत हो जाता है तो फिर सब कुछ पहले की तरह चलता रहता है। नहीं तो न्यायालय के दरवाजे खटखटा कर मामले को लंबे समय तक लंबित करने का रास्ता तो है, ही। इसलिए कुछ दिन का हल्ला-गुल्ला और फिर?



- विष्णु सिन्हा

दिनांक 05.02.2010

मंगलवार, 19 जनवरी 2010

इस देश का नौकरशाह ईमानदार होने की दृढ़ इच्छाशक्ति प्रदर्शित करे तो देश का कायाकल्प हो सकता है

कल का दिन कुछ पूर्व आईएएस और वर्तमान आईएएस के लिए अच्छा नहीं रहा। बारदाना घोटाला कांड में कल आर्थिक  अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने दो पूर्व एवं एक वर्तमान आईएएस के विरूद्घ अपराध दर्ज कर लिया। अजीत जोगी शासनकाल के  घोटाले की लंबी जांच के बाद मुख्यमंत्री ने अपराध दर्ज करने की अनुमति दे दी। पूर्व मुख्य सचिव आर. पी. बगई, टी. एस. छतवाल और वर्तमान में पर्यटन सचिव सुब्रत साहू को आरोपी बनाया गया है। अपराध दर्ज करने की अनुमति देकर डा. रमनसिंह ने स्पष्ट कर दिया है  कि वे किसी को भी बख्शने के  पक्ष में नहीं हैं। बारदाना घोटाला करीब 150 करोड़ रूपये का है। आरोप है कि बिना किसी टेंडर के बारदाने खरीदे गए थे। 6 वर्ष हो गए, घोटाले को। जांच बड़ी लंबी चली। किसी को कोई उम्मीद नही थी कि इस मामले में कुछ होने वाला है। एक तरह से वक्त की राख ने इस मामले को ढंक लिया था लेकिन अंदर ही अंदर आग सुलग रही थी और जब राख उड़ायी गयी तो पता चला कि साक्ष्य और दस्तावेज के आधार पर भ्रष्टाचार साबित होता है।

जुर्म दर्ज होना सभी के लिए चेतावनी है कि कानून की चक्की भले ही धीरे-धीरे चलती है लेकिन पीसती बारीक है। सत्ता की कुर्सी पर सवार लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि वे मनमानी कर बच निकलेगे। अक्सर बड़े नौकरशाह बच भी निकलते है। खासकर आईएएस अधिकारियों पर ऊंगली उठाने से लोग झिझकते है लेकिन सूचना के अधिकार ने हर व्यक्ति को वह ताकत दे दी है जिससे शासकीय दस्तावेज हासिल किए जा सकते हैं। अब तो न्यायाधीशों को भी इसके अंतर्गत ले लिया गया है। प्रजातंत्र में पारदर्शिता ही असली चीज है जो गलत काम करने वालों में भय पैदा करती है। बेलगाम नौकरशाही पर अंकुश का काम करती है। आईएएस अधिकारियों को कठघरे में खड़ा कर  डा. रमन सिंह ने जनता को भी संदेश दे दिया है कि वे गलत कामों को शह देने वाले मुख्यमंत्री नहीं हैं।


कल ही मुख्यमंत्री ने मंत्रालय का अचानक निरीक्षण कर यह भी जांच कर ली कि कौन सा बड़ा अधिकारी अपनी सीट पर कार्यालयीन अवधि में  उपस्थित है और कौन अनुपस्थित। हालांकि उन्होंने साहबों के विषय में  चपारसियों से जानकारी ली और स्वास्थ्य का हाल चाल पूछा लेकिन समझदार के लिए स्पष्ट चेतावनी है कि उन्होंने अपने काम के समय को गंभीरता से नहीं लिया तो मुख्यमंत्री सख्त भी हो सकते है। दरअसल मुख्यमंत्री पर ही आरोप लगते हैं यदा कदा कि नौकरशाह उनके नियंत्रण में नहीं है। अजीत जोगी तो नौकरशाह को घोड़े की और मुख्यमंत्री को घुड़सवार की संज्ञा देते रहे हैं। अच्छे घुड़सवार के इशारे पर घोड़े दौड़ लगाते है। लगाम तो घुड़सवार के हाथ में ही होती है और अच्छा घुड़सवार न हो तो बिगड़ैल घोड़े घुड़सवार को भी पटक देते है।


उदाहरण में यह बात भले ही मन को अच्छी लगे लेकिन न तो मुख्यमंत्री घुड़सवार होता है और न ही नौकरशाह घोड़े। दोनों इंसान हैं और इंसानियत का तकाजा तो यही है कि दोनों मिलकर अपनी अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन पूरी संवेदनशीलता और जिम्मेदारी से करें। मुख्यमंत्री और सरकार को जनता ने चुना है। वे जनता की तरफ से सरकार चलाने के लिए नियुक्त किए गए हैं और नौकरशाहों का काम है कि जनता की चुनी सरकार के आदेशों का त्वरित गति से पालन करें। कहते है कि न्याय में देरी भी अन्याय के समान हैं। नौकरशाहों को तो नित्य न्याय करना पड़ता है। मुख्यमंत्री को भी तुरंत फैसला लेना पड़ता है लेकिन मुख्यमंत्री के निर्देश, आदेश का शीघ्रता से पालन हो यह काम तो नौकरशाहो का है। नौकरशाह इस मामले में कोताही करें या अपनी मनमर्जी चलाने का प्रयास करें तो इसे उचित नहीं कहा जा सकता। फिर वे सरकारी खजाने को ही नुकसान पहुंचाएं तो वे सजा के हकदार तो स्वयं बन जाते है। मुख्यमंत्री चाहें न चाहें, उन्हें ऐसे नौकरशाहों को कानून के हवाले करने की अनुमति देना ही पड़ता है।


नौकरशाहों को छठवां वेतन आयोग के अनुसार वेतन और सुविधाएं मिले, इस मामले में जब मुख्यमंत्री पीछे नहीं हैं तो नौकरशाहों को भी अपने कर्तव्यों के निर्वहन में पीछे नहीं रहना चाहिए। आखिर वेतन और सुविधाओ पर जो खर्च होता है, वह होता तो जनता के खजाने से ही है। सही दृष्टि तो यही है कि जनता ही सबको वेतन देती है। प्रजातंत्र में तो जनता ही मालिक है। फिर मालिक का हुक्म बजाना तो नौकरशाहों का पहला कर्तव्य है। जबकि होता उल्टा है। नौकरशाह मालिक बन बैठे हैं। वे समझते हैं, शायद कि उनकी कृपा से जनता के काम होते हैं। ऐसे भाव प्रजातंत्र के लिए अच्छे नहीं हैं। क्यों नौकरशाह आम आदमी से कटकर सुरक्षा के घेरे में मंत्रालयों में बैठते हैं? उनसे यदि कोई मिलना चाहें तो सुरक्षा की लंबी चौड़ी दीवार को लांघना क्या आसान काम है? रोज न सही कम से कम सप्ताह में एक दिन ही सही वे जनता से रूबरू क्यों नहीं होते। जो समय पर दफतर आना ही जरूरी नही समझते, वे जनता से मिलने में क्यों रूचि लें? वास्तव में जो सरकार चलाते हैं, वे सात पर्दों में छुपकर बैठते हैं।


मंत्री शिकायत करते हैं कि उसका सचिव उनकी नहीं सुनता। यह कोई  अच्छी स्थिति नहीं है। कोई काम मंत्री के द्वारा बताए जाने पर नहीं हो सकता, किसी नियम, कायदे के कारण तो मंत्री को बताना चाहिए कि इस कारण काम नहीं हो सकता। आप नियम बदलिए, तब ही काम होगा। मंत्री को सम्मान सर्वोच्च प्राथमिकता होना चाहिए। मंत्री बुलाए, उसके पहले ही उससे मिलना सौजन्यता है। फिर मंत्री के बुलाने पर भी न जाना तो घोर अनुशासनहीनता है। बहुत पहले ऐसा मामला सामने आ चुका है जब मंत्री के  बुलाने पर अधिकारी ने मीटिंग का बहाना बनाया कि वह मीटिंग में व्यस्त है। मंत्री जी ने जाकर अधिकारी के कक्ष में देखा तो अधिकारी बैठा हुआ था और कोई मीटिंग नहीं चल रही थी। स्वाभिमानी होना अलग बात है लेकिन अहंकारी होना एकदम अलग बात है।


इस देश के आईएएस अधिकारी तय कर लें कि वे गलत काम नहीं करेंगे तो देश से भ्रष्टचार को मिटाया जा सकता है लेकिन पदस्थापना के चक्कर में जब वे गलत काम करने से भी परहेज नहीं करते तो फिर अपनी ऊंगलियां भी डुबाने से बाज नहीं आते। देश का सबसे बुद्घिमान युवा आईएएस के लिए चुना जाता है तो यह उनके लिए ही विचारणीय है कि आज देश जहां आकर पहुंच गया है, उसके लिए वे कितने जिम्मेदार हैं। उनका तो संगठन भी है। वे क्यों नहीं देश की समस्याओं के लिए स्वयं को जिम्मेदार मानते ? वे चाहें और दृढ़ इच्छा शक्ति हो तो देश का कायाकल्प कर सकते हैं लेकिन इसके लिए उन्हे व्यवस्था की जड़ता को तोडऩा होगा। क्योंकि प्रारंभ तो स्वयं से होता है। स्वाध्याय करें। मतलब स्वयं का अध्ययन करें?ï अपने कामों की स्वयं समीक्षा करें तो कारण वे स्वयं को भी पाएंगे।


- विष्णु सिन्हा
19-1-2010