यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं

रविवार, 6 फ़रवरी 2011

भष्टïचार के विरुद्ध जनयुद्ध का अर्थ ही है कि जनता को अब और बरगलाया नहीं जा सकता

भ्रष्टाचार के विरुद्ध अब आक्रोश प्रगट होने लगा है। यह बात तो लोगों को अच्छी तरह से समझ में आ गयी है कि सरकार भ्रष्टïाचार रोकने के लिए कृतसंकल्पित नहीं है। जहां कोई मामला उजागर होता है तो उसकी भी लीपापोती करने से परहेज नहीं किया जाता। विदेशों में जमा कालाधन हो या महंगाई सबकी जड़ में भ्रष्टï तंत्र ही जिम्मेदार दिखायी देता है। सब कुछ जानकर भी प्रधानमंत्री जब तक हल्ला नहीं मचता तब तक देखकर भी अंजान बने रहते हैं। इंतहा तो यह है कि कैग की रिपोर्ट को ही कपिल सिब्बल जैसा मंत्री खारिज कर देता है। कपिल सिब्बल कहते हैं कि 2 जी स्पेक्ट्रम मामले में कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ है। जब भ्रष्टाचार नहीं हुआ है तो जेपीसी से जांच कराने की विपक्ष की मांग से सरकार सहमत क्यों नहीं है? कालेधन के मामले में सरकार नाम उजागर करने के लिए तैयार नहीं है और इसके लिए अंतर्राष्टï्रीय संधियों की आड़ ले रही है। यह सिर्फ कर चोरी का ही मामला नहीं है, उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी भी सरकार को परेशान नहीं करती। सतर्कता आयुक्त थामस के दागी होने से सरकार स्वयं को अंजान बता रही है। अंतत: महाराष्टï्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण का नाम आदर्श घोटाले की एफआईआर में आ ही गया।
भ्रष्टïाचार जो सामने आ रहा है, वही हरि अनंत हरि कथा अनंता की तरह है तो जो सामने नहीं आया है, उसकी कल्पना ही घबराहट पैदा करने वाली है। अब तो सीवीसी और सीबीआई को भी भंग करने की मांग उठने लगी। बुद्धिजीवियों के नेतृत्व में 60 शहरों में रैलियां कर लोगों ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनयुद्ध की घोषणा कर दी है। माहौल फिर जयप्रकाश नारायण के आंदोलन की याद दिला रहा है। योग गुरु स्वामी रामदेव पूरे भारत के दौरे पर हैं और गांव-गांव भ्रष्टïाचार और विदेशों में जमा भारतीय धन के विषय में जनजागृति फैला रहे हैं। जनता भी बड़े उत्साह के साथ स्वामी रामदेव के अंदोलन को गति और शक्ति प्रदान कर रही है। आज कम से कम सरकार के सांसद बल के कारण तानाशाह बनने का खतरा नहीं है। इंदिरा गांधी के पास जैसा दो तिहाई बहुमत था, वैसा बहुमत सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के पास नहीं है और न ही सभी राज्यों में उनकी सत्ता है। इसलिए न तो आपातकाल का खतरा है और न ही सरकार के पास मनमानी करने का अधिकार।
आर्थिक विकास के नाम पर जिस तरह से देश में भ्रष्टïाचार और कालेधन को आश्रय मिला, उसने जनता पर कर का बोझ तो बढ़ाया ही, साथ ही सब्सिडी के लाभ से भी मासूम जनता को महरुम कर दिया। फलस्वरुप   जनता महंगाई की गिरफ्त में इस तरह से जकड़ गयी जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। एक, दो, पांच रुपए के नोट हों या सिक्के इनका चलन में कोई बहुत मायने नहीं रह गया। सरकार में बैठे लोग बेशर्मी से कहते हैं कि विकास की कीमत तो चुकानी पड़ेगी। जनता की आय में वृद्धि हुई लेकिन किस जनता की? आज भी देश की आधी आबादी 20 रुपए प्रतिदिन में गुजारा करती है। शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूल आवश्यकताएं तो धन की गुलाम बन गयी। अच्छी शिक्षा का अर्थ महंगी शिक्षा। निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें गरीबों को देने की बात भी फाइलों में दर्ज है लेकिन वास्तव में कितने स्कूल हैं देश के जो गरीबों को उनका हक दे रहे हैं। बातें सबके पास बड़ी-बड़ी और लंबी चौड़ी है लेकिन अमलीजामा पहनाने के मामले में सरकार फिसड्डïी ही साबित हो रही है। हजारों करोड़ों की मनरेगा योजना ही भ्रष्टïाचार का शिकार हो गयी है और किसी तरह का नियंत्रण नहीं दिखायी देता।
जब सरकार सीवीसी जैसे पद पर दागी व्यक्ति को बिठाने में हिचक महसूस नहीं करती और प्रतिपक्ष की नेता की बात सुनने के लिए तैयार नहीं तो इसी से सरकार की नीयत की चुगली होती है। फिर इस मामले में तो सीधे-सीधे हमारे प्रधानंमत्री ही सम्मिलित रहे। अब सरकार सतर्कता आयुक्त से कह रही है कि इस्तीफा दे दो तो खबर है कि वह इस्तीफा देने  से इंकार कर रहे हैं। पूर्व संचार मंत्री राजा से ही इस्तीफा लेने में सरकार को पसीना छूट गया था। पहले तो राजा ने इस्तीफा देने से इंकार कर दिया था। राजा ने तो स्पष्ट कहा था कि सब कुछ प्रधानमंत्री की जानकारी में किया गया। मंत्रिमंडल के फेरबदल में उम्मीद की जा रही थी कि मंत्रिमंडल के कुछ बदनाम चेहरों को सरकार से बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा लेकिन विभागों में बदलाव के सिवाय कुछ नहीं किया गया। पूरा का पूरा लोकसभा का एकसत्र जेपीसी की मांग सरकार के न मानने के कारण बिना काम-काज के ही समाप्त हो गया।
सत्तारुढ़ दल की ही ऐसी स्थिति है, ऐसी बात नहीं है। भाजपा जिसे वर्तमान राजनैतिक परिस्थिति का सबसे ज्यादा लाभ मिलता, वह भी सत्ता के मोह में कर्नाटक के येदुरप्पा को बचाने के कारण अपनी छबि पर बट्टïा लगा बैठी। कभी शंकर सिंह वाघेला के बगावत के कारण सत्ता गंवाने वाली भाजपा में अब वह बात दिखती नहीं। अब राज्यपाल ने मुख्यमंत्री के विरुद्ध मामला चलाने की इजाजत दे दी है। यही कारण है कि भ्रष्टाचार और महंगाई के विरुद्ध भाजपा के आंदोलन को कार्यकर्ताओं का समर्थन भले ही मिले लेकिन जनता का समर्थन तो नहीं मिल रहा है। यह तो कोई भी नहीं कह सकता कि सिर्फ कांग्रेस की सरकारों में ही भ्रष्टïाचार है। भाजपा की राज्य सरकारें भी पूरी तरह से भ्रष्टाचार मुक्त मुक्त तो नहीं है। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी भ्रष्टïाचार के विरुद्ध कड़े कदम उठाने की बात करते हैं। 20 वर्ष में नहीं 6 माह में फैसले की बात करते हैं। सोनिया गांधी के भी बयान भ्रष्टाचार के विरुद्ध हैं लेकिन बयान और वास्तविक स्थिति का भेद किसी से छुपा नहीं है।
इसीलिए देश में स्थिति ऐसी उत्पन्न हो रही है कि अब कोई भी व्यक्ति सिर्फ कसमसाकर नहीं रह सकता। उसे विरोध के लिए सड़क पर उतरना पड़े तो वह उतरेगा। बाबा रामदेव ने अलख सबसे पहले जगाया है और उनका संगठन भी देश में तैयार हो रहा है। स्थापित राजनेताओं और राजनैतिक पार्टियों को यह नहीं भूलना चाहिए कि जब जनता ही उठ खड़ी होती है तो वह फिर किसी को बख्शती नहीं। इंदिरा गांधी ने तो जेल में बंद कर रखा था राजनेताओं को लेकिन जनता ने जब इंदिरा गांधी से मुक्ति का संकल्प ले लिया तो सत्ता से बेदखल कर ही दिया था। स्वयं इंदिरा गांधी तक को चुनाव में पराजित कर दिया था। जनता की सहनशक्ति की एक सीमा है और वह समाप्त हो रही है। नेतृत्व की कमी थी। लगता था कि एक तरफ कुंआ है तो दूसरी तरफ खाई। किधर भी जाओ मरना अपने को ही है लेकिन अब बाबा रामदेव के रुप में सशक्त नेतृत्व मिल गया है। जनता में यह विश्वास तो पैठ रहा है कि यह बाबा उन्हें धोखा नहीं देगा और जनता का विश्वास से बड़ी ताकत प्रजातंत्र में और कुछ नहीं होती। अब भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनयुद्ध की घोषणा ही इस बात की निशानी है कि पानी नाक के ऊपर आ गया है। जनता को और बरगलाया नहीं जा सकता।
- विष्णु सिन्हा
दिनांक : 31.01.2011 

किरणमयी स्वयं चाहती हैं कि उनका कार्यकाल असफल साबित हो तो कुछ भी कहना बेकार है

संकीर्णता मानसिकता से किसी का भी भला नहीं होने वाला है। सुनील सोनी के रायपुर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष बनने पर समाचार पत्र में विज्ञापन में महापौर किरणमयी नायक का चित्र छप गया तो इससे कोई भूचाल नहीं आ गया लेकिन किरणमयी को कांग्रेस संगठन नोटिस देकर पूछ रहा है कि विज्ञापन में उनकी सहमति से उनका चित्र छापा गया, क्या? जैसे चित्र छपने से कांग्रेस की इज्जत खराब हो गयी। कोई भी व्यक्ति किसी भी पद को सुशोभित करता है तो लोकाचार में सभी उसे शुभकामनाएं देते हैं, बधाई देते हैं। सुनील सोनी को ही कितने ही कांग्रेसी नेताओं ने दूरभाष पर बधाई और शुभकामनाएं दी। यदि चित्र छप जाने से अनुशासनहीनता होती है तो शुभकामनाएं देने से नहीं होती, क्या? कितने ही कांग्रेसी है जो मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की आपसी चर्चा में तारीफ करते हैं। सार्वजनिक रुप से तारीफ करने से डरते हैं। क्योंकि डर है कि अनुशासन का डंडा उनके विरुद्ध इस्तेमाल हो सकता है।
कांग्रेसी ही कहने से नहीं हिचकते कि कांग्रेसी नेताओं की आपसी प्रतिद्वंदिता डॉ. रमन सिंह के सिर पर जीत का सेहरा तीसरी बार भी बांध सकता है। जब केंद्र से आए मंत्री डॉ. रमन सिंह की तारीफ करते हैं तो कांग्रेसियों के चेहरे देखने लायक हो जाते हैं। कांग्रेसियों को संकीर्णता का त्याग करना चाहिए और यह सोचना चाहिए कि रायपुर शहर की जनता ने जब महापौर के रुप में एक कांग्रेसी का चयन किया है तो रायपुर की जनता का हित कैसे पूरा किया जाए? रायपुर की जनता के हित को पूरा करने में यदि महापौर सफल नहीं हुई तो फिर रायपुर में कांग्रेस का भविष्य ही क्या होगा? रायपुर के विकास के लिए शासकीय स्तर पर नगर निगम और रायपुर विकास प्राधिकरण दो संस्थाएं हैं। जब किरणमयी नायक महापौर चुनी गयी थी और उनका शपथ ग्रहण समारोह हुआ था तब पूर्व महापौर सुनील सोनी ने खुले मंच से उन्हें अपनी शुभकामनाएं दी थी। भाजपा के मंत्री ने भी दी थी। शुभकामनाएं और बधाई देने में भाजपा के लोगों ने संकीर्णता प्रदर्शित नहीं की थी।
कोई कांग्रेस के साथ है तो कोई भाजपा के साथ लेकिन हैं तो सभी रायपुरवासी। सोच का विषय यह होना चाहिए कि कैसे मिल जुलकर रायपुरवासियों का भला किया जाए। यह सबको अच्छी तरह से पता है कि नगर निगम अपने आर्थिक संसाधनों से रायपुर शहर के वासियों की आकांक्षा पर खरा साबित नहीं हो सकता। उसे राज्य सरकार के सहयोग की जरुरत है तो उसे राज्य सरकार से संबंध बनाना ही पड़ेगा। केंद्र में कांग्रेस की सरकार है और छत्तीसगढ़ में भाजपा की लेकिन राज्य के हित में केंद्रीय मंंत्रियों से मिलने के डॉ. रमन सिंह और उनके मंत्री जाते हैं। क्योंकि वे अच्छी तरह से जानते हैं कि राजनैतिक विचारधारा भले ही अलग हो लेकिन नागरिकों का हित सर्वोपरि है। कांग्रेसी तो यही आरोप लगाते रहते हैं कि केंद्र की योजना को राज्य सरकार अपने नाम से प्रसारित करती है। राज्य सरकार तो फिर भी उतनी केंद्र सरकार पर आश्रित नहीं है जितना आश्रित नगर निगम राज्य सरकार पर है। राज्य सरकार संकीर्णता दिखाए तो नगर निगम तो कुछ भी करने की स्थिति में नहीं है।
किरणमयी को 1 वर्ष से अधिक समय हो गया, महापौर बने। नगर निगम में विवाद के सिवाय हो क्या रहा है? राज्य सरकार से आर्थिक असहयोग का रोना रोया जा रहा है। भाजपा पार्षद मंत्री से मिलकर सहयोग की मांग करते हैं तो मंत्री जी सहयोग के लिए तुरंत तैयार हो जाते हैं। प्रत्येक वार्ड के लिए रकम दी जाती है। कोई भेदभाव नहीं किया जाता। सरकार पर दोषारोपण करने से ही शहर की समस्याएं हल नहीं होने वाली हैं। सभापति सामान्य सभा के लिए बार-बार महापौर को लिखते है लेकिन 5 माह से सामान्य सभा ही नहीं होती। भाजपा पार्षद आयुक्त के पास जाकर शिकायत करते हैं। नगर निगम में त्रिकोणात्मक सत्ता काम करती है। एक तरफ महापौर हैं तो दूसरी तरफ सभापति और तीसरी तरफ आयुक्त के अधीन कर्मचारियों की फौज। सबको मालूम हैं कि आयुक्त के पास सीधे चले जाओ तो सही काम हो जाता है। महापौर से कहो तो काम नहीं होता।
बड़ी विचित्र स्थिति है। महापौर को कानून कायदों के साथ व्यवहारिक होने की जरुरत हैं लेकिन वो भी क्या करें? कांग्रेस संगठन उनके महापौर बनने के बाद उन्हें नोटिस ही देता रहता है। अपने ही टांग खींचने से पीछे नहीं तो वे कितने मुकाम पर संघर्ष करें। महापौर महिला हैं, वकील हैं, सब कुछ समझती है। उन्हें भी आभास नहीं होगा कि महापौर बनने के बाद उन्हें नगर विकास के लिए इतना संघर्ष करना पड़ेगा लेकिन वे संघर्ष कर रही है। दरअसल उन्हें संघर्ष के बदले समन्वय की तरफ अपनी राजनीति को मोडऩा चाहिए। वे पढ़ी लिखी हैं तो उन्हें अमर्यादित शब्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। सभापति को बाबू कहना, मात्र पार्षद बताना शोभनीय शब्दावली नहीं है। सभापति पार्षदों के बहुमत से चुना जाता है और जिस तरह से विधानसभा में विधानसभा अध्यक्ष की स्थिति होती है, सम्मान की दृष्टि से, उसी तरह से नगर निगम के सभापति की भी होती है।
रायपुर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष पद को महापौर से छोटा बताना भी कोई अच्छी बात नहीं है। आदमी पद से छोटा बड़ा नहीं होता वह अपनी सोच और चरित्र से छोटा बड़ा होता है। सुनील सोनी रायपुर नगर निगम के 6 वर्ष तक महापौर रहे। 43 हजार सीटों  से रायपुर की जनता ने उन्हें महापौर बनाया था। वे किरणमयी नायक से वरिष्ठ हैं। सभापति संजय श्रीवास्तव भी वरिष्ठï पार्षद हैं। महापौर सोच समझकर शब्दों का प्रयोग करेंगी तो अपना और अपने पद का गौरव बढाएंगी। रायपुर शहर के नागरिकों ने उन्हें महापौर चुनकर उन पर विश्वास व्यक्त किया है।
उस विश्वास पर खरा उतरता रायपुर के नागरिक देखना चाहते हैं। हर बात पर कानून की धमकी महापौर जैसे पद पर बैठी महिला के मुंह से शोभा नहीं देता। इसलिए लोग कहते हैं कि काला कोट उतारकर किरणमयी राजनीतिज्ञ की तरह व्यवहार करें। बड़ा अवसर मिला है। 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा होने पर कोई यह नहीं पूछेगा कि उनकी समस्याओं का निपटारा क्यों नहीं हुआ? तब जनता फैसला सुनाएगी। फैसला अपने पक्ष में चाहती हैं तो व्यवहार में परिवर्तन करें। व्यवहारिक बनें। विनम्र बनें। तभी भविष्य में जनता से समर्थन की उम्मीद करें। कोई नहीं चाहता। सिवाय चंद राजनैतिक प्रतिद्वंदियों के कि किरणमयी का कार्यकाल असफल साबित हो लेकिन किरणमयी भी वास्तव में ऐसा चाहती हैं, क्या?
- विष्णु सिन्हा
दिनांक : 30.01.2011
----------------

250 शराब दुकानों को बंद करना ही अंतिम लक्ष्य नहीं होना चाहिए

कुल 1054 शराब दुकानें छत्तीसगढ़ में हैं और इसमें से 250 दुकानें 1 अप्रैल से बंद करने का इरादा सरकार ने व्यक्त किया है। कहा जा रहा है कि इससे 100 करोड़ रुपए की राजस्व हानि होगी लेकिन शेष दुकानों में बढ़ी बिक्री से यह घाटा पूरा हो जाएगा। जानकर अच्छा लगता है कि डॉ. रमन सिंह की सरकार शराब को हतोत्साहित करना चाहती है। क्योंकि शराब को मनुष्य के लिए किसी भी दृष्टि से उपयोगी नहीं माना जाता। कभी कभार ऐसे समाचार भी मिलते हैं कि निश्चित मात्रा में शराब के सेवन से स्वास्थ्य को लाभ होता है लेकिन व्यवहारिक पहलू तो यही है कि शराब व्यक्ति सहित उसके परिवार की बर्बादी का ही कारण बनती है। मध्यप्रदेश के समय में ही निर्णय हुआ था कि जिस क्षेत्र की महिलाएं शराब दुकानें बंद करने की मांग करेंगी, वहां शराब दुकान बंद कर दी जाएगी, लेकिन अधिकांश मामलों में यह संभव नहीं हुआ।
प्रदेश में शराब बंदी नहीं है। कभी मध्यप्रदेश में शराब बंदी थी। जब तक महात्मा गांधी का प्रभाव कांग्रेस पर संपूर्ण था तब तक कांग्रेस सरकारें शराब बंदी पर कायम रही लेकिन सरकारों की बढ़ती आर्थिक आवश्यकताओं ने शराब बंदी समाप्त कर दी। स्व. द्वारका प्रसाद मिश्र जब मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने तब उन्होंने शराब बंदी पूरी तरह से समाप्त कर दी। इसके बाद किसी भी सरकार ने मध्यप्रदेश में शराब बंद करने की कोशिश नहीं की। शराब से मिलने वाले राजस्व और शराब ठेकेदारों से मिलने वाली सौगातों ने शराब बंदी की सोच को ही समाप्त कर दिया। शराब का जितना वैध कारोबार होता है, उसके सामानान्तर ही अïवैध कारोबार भी होता है। दरअसल धन की लालसा अच्छे बुरे का भेद मिटा देती है। चुनाव आयोग कितना भी आदर्श आचार संहिता लगाए लेकिन चुनावों में शराब का छक कर प्रयोग होता है। कोई बिरला बिना शराब बांटे चुनाव जीत जाता हो तो जीत जाता हो। नहीं तो शराब  बांटे बिना जीत की उम्मीद नहीं की जा सकती।
छत्तीसगढ़ सरकार की अति महत्वाकांक्षी योजना 1 रु. और 2 रु. में 35 किलो चांवल की भी आलोचना इस बात को लेकर की जाती है कि बढ़ती संपन्नता का दुरुपयोग शराबखोरी के लिए किया जाता है। सरकार की नीयत तो साफ है। वह चाहती है कि कोई भी भूखा न रहे लेकिन इसका भी दुरुपयोग कुछ लोग करें तो सर्वहित की योजना को सरकार बंद तो नहीं कर सकती। छत्तीसगढ़ के आम आदमी की संपन्नता बढ़े, इसके लिए सरकारी प्रयासों की सराहना की जाती हैं लेकिन बढ़ती संपन्नता के दुरुपयोग को रोकना भी तो सरकार का ही काम है और प्रथम चरण में सरकार 250 शराब दुकानें बंद करने का इरादा रखती है तो उसकी तारीफ ही की जाएगी। यह बात सरकार भी अच्छी तरह से समझती है कि जिन क्षेत्रों में शराब दुकानें बंद की जाएगी, वहां अवैध व्यापारी अवैध शराब बेचने में हिचकेंगे नहीं। सिर्फ दुकानें बंद करने से ही उद्देश्य प्राप्त नहीं किया जा सकता। जब तक कि शासकीय मशीनरी कृतसंकल्पित नहीं होगी, अवैध कारोबार को रोकने के लिए। यह कटु सत्य है कि वैध कारोबार की तुलना में अवैध कारोबार शासकीय मशीनरी की जेब ज्यादा गर्म करेगा। इस पर रुकावट की व्यवस्था नहीं की गई तो शराब दुकान बंद कर सरकार जो उद्देश्य प्राप्त करना चाहती है, उसमें सफल नहीं होगी।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली के मामले में स्वयं डॉ. रमन सिंह ने रुचि लेकर जिस तरह की व्यवस्था की और आज पूरा देश छत्तीसगढ़ की वितरण प्रणाली से प्रभावित होकर अपने राज्य में छत्तीसगढ़ की व्यवस्था को लागू करने के लिए तैयार है। ठीक उसी तरह से अवैध शराब बिक्री को निरुत्साहित करने की जरुरत है। 1 रु. और 2 रु. किलो चांवल की योजना यदि व्यवस्था सुचारु नहीं होती तो असफल सिद्ध हो जाती। असफल होती तो सरकार को आज जो लोकप्रियता हासिल है, वह अलोकप्रियता में बदल जाती। तब ऐसा जनसमर्थन नहीं मिलता जो अभी तक मिल रहा है। इसलिए अच्छी नीति बनाना अलग बात है और उसे लागू करना अलग। यह नहीं कहा जा सकता कि राशन माफिया का तंत्र पूरी तरह से समाप्त हो चुका है लेकिन राशन माफिया कमजोर तो पड़ा है। बोगस राशन कार्ड आज भी पकड़े जाते हैं लेकिन हितग्राहियों को राशन नहीं मिलता, यह तो नहीं कहा जा सकता।
राजस्व के मान से भले ही 15 प्रतिशत शराब दुकानें बंद की जा रही हैं लेकिन दुकानों की संख्या के आधार पर तो एक चौथाई दुकानें बंद की जा रही है। इसकी सफलता पर ही भविष्य में शराब बंदी की योजना लागू हो सकती है । सरकार जितना धन सस्ते दर पर अनाज देने में खर्च कर रही है, उसके आसपास ही सरकार की शराब से आय है। एक जनहितकारी सरकार शराब राजस्व के लोभ को छोड़ सकती है। यदि इससे छत्तीसगढ़वासियों का उद्धार होता है। सरकार पूर्ण शराब बंदी चुनाव से पूर्व लागू करने में सफल हो गयी तो प्रदेश की आधी जनसंख्या महिलाओं की उसे सहज ही सहानुभूति मिल सकती है। यह छोटा काम नहीं है बल्कि बड़े से बड़ा काम है। यह तो एक उदाहरण होगा कि महात्मा गांधी के नाम पर राजनीति की रोटी सेंकने वालों ने शराब दुकानें खुलवायी  और भाजपा ने दुकानें बंद करवायी। शराब का विरोध धर्मों ने सिर्फ आर्थिक नुकसान के कारण नहीं किया बल्कि शराब के कारण जो बेहोशी व्यक्ति पर तारी होती है, उसके कारण किया। नशे में धूत्त व्यक्ति को अच्छे बुरे का बोध नहीं होता। इस कारण हर तरह की बुराइयों का जन्म होता है। सबसे पीड़ाजनक स्थिति शराब के कारण महिलाओं को होती है। क्योंकि अंतत: पुरुष के कृत्यों का भुगतान तो महिला को ही करना पड़ता है।
समाचार है कि मंत्रिमंडल की बैठक में शराब के अवैध कारोबार को लेकर कुछ मंत्रियों ने चिंता प्रगट की। स्वाभाविक है। जिम्मेदार जनप्रतिनिधि को नित्य अपने मतदाताओं के संबंध में जानकारी  मिलती है। महिलाएं तो सिसक-सिसक कर अपना दुख प्रगट करती है। डॉ. रमन सिंह और अमर अग्रवाल कृतसंकल्पित हों तो पूरे प्रदेश में भी शराब बंदी की जा सकती है। डॉ. रमन सिंह को तो वैसे भी प्रदेश की जनता की कीमत पर राजस्व की चिंता होती नहीं। यह उन्होंने विभिन्न योजनाओं से सिद्ध किया है। राज्य का सकल उत्पाद बढ़ रहा है। राजस्व बढ़ रहा है। 3 हजार करोड़ का वार्षिक बजट 30 हजार करोड़ पहुंच रहा है। तब शराब की 8-9 सौ करोड़ की आय की विशेष आवश्यकता तो सरकार को होना नहीं चाहिए। पूर्णत: शराबबंदी की भविष्य में सरकार की सोच नहीं है तो 250 दुकानों को बंद करने से कुछ होगा, नहीं। सिर्फ अवैध शराब विक्रेताओं को लाभ पहुंचाने के। कदम आगे बढ़ाया है तो मंजिल तक पहुंचाने का माद्दा भी होना चाहिए। डॉ. रमन सिंह और अमर अग्रवाल में यह माद्दा नहीं है, यह सोचने का तो कोई कारण नहीं। दोनों को कदम आगे बढ़ाने के लिए साधुवाद।
- विष्णु सिन्हा
दिनांक : 29.01.2011
---------------

यदि सरकार ने न्यायालय में झूठा हलफनामा दायर किया है तो यह गिरावट की पराकाष्ठï है

सरकार ने हलफनामा दायर कर उच्चतम न्यायालय को बताया कि उसे भ्रष्टïाचार के मामले में केंद्रीय सतर्कता आयुक्त पी.जे. थामस के खिलाफ चार्जशीट दाखिल होने की जानकारी नहीं थी। जनता से झूठ बोलना, झूठे वायदे करना तो सरकारों के लिए एक आम बात है। स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नरसिंहराव की सरकार में वित्त मंत्री रहते हुए संसद में कहा था कि चुनाव में वायदा करना अलग बात है और उसे पूरा करना अलग। मानसिकता तो स्पष्टï है। अभी बहुत दिन नहीं हुए जब लोकसभा के  चुनाव में कांग्रेस ने वायदा किया था कि वह गरीबों को 3 रू. किलो अनाज देगी लेकिन डेढ़ वर्ष से अधिक हो गया, सरकार अपना वायदा पूरा करती नहीं दिखायी पड़ती। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इसके लिए दबाव भी बनाया लेकिन सरकार ने दबाव को स्वीकार नहीं किया। मोटे तौर पर यह आम बात है। मनमोहन सिंह की सरकार ही ऐसा करती है, ऐसा नहीं है। अधिकांश सरकारों की फितरत इसी तरह की है।
लेकिन केंद्र सरकार उच्चतम न्यायालय में झूठा हलफनामा भी दाखिल कर सकती है, यह बात तो किसी को भी स्वीकार नहीं होगी। लोकसभा में प्रतिपक्ष की नेता सुषमा स्वराज कहती हैं कि सरकार सफेद झूठ बोल रही है। सीबीसी की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और प्रतिपक्ष की नेता को मिलाकर तीन सदस्यीय समिति होती है। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के साथ सुषमा स्वराज भी समिति की सदस्य थी। तीन सदस्यीय पैनल में से थामस के नाम का विरोध सुषमा स्वराज ने किया था। कारण उन पर चार्जशीट ही थी। यह तो स्पष्टï है कि प्रधानमंत्री और गृहमंत्री थामस को सतर्कता आयुक्त बनाना चाहते थे। इसलिए सर्वसम्मति से न होकर उनका नाम बहुमत के आधार पर तय किया गया। जिसका यह भी स्पष्टï अर्थ होता है कि समिति की बैठक औपचारिकता थी। प्रधानमंत्री, गृहमंत्री ने पहले से ही तय किया हुआ था कि थामस को सतर्कता आयुक्त नियुक्त करना है। तब थामस की चार्जशीट की जानकारी बैठक में क्यों रखी जाती? गृह विभाग को यह जानकारी न हो, इस बात पर तो कोई विश्वास नहीं कर सकता।
इसके साथ 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के समय थामस दूरसंचार मंत्रालय में सचिव थे। विपक्ष संसद की कार्यवाही पूरे एक सत्र भर नहीं चलने देता कि 2जी स्पेक्ट्रम की जांच के लिए संयुक्त संसदीय दल बनाया जाए। सरकार भी अड़ी हुई है कि वह जेपीसी नहीं बनाएगी। यदि आप ईमानदार हैं और आपकी सरकार ने कुछ गलत नहीं किया है तो जेपीसी जांच से परहेज क्यों ? शक संदेह के लिए सरकार ही कारण बन रही है। जब कोई कुछ छुपाना चाहता है तब ही वह किसी भी तरह की जांच से घबराता है। आज मनमोहन सिंह की सरकार की स्थिति भी वैसी ही हो गयी है जैसी कभी विभिन्न आरोपों में घिरी नरसिंहराव सरकार की हो गयी थी और कभी बोफोर्स के कारण राजीव गांधी की हो गयी थी। बोफोर्स का जिन्न अभी भी चिराग के अंदर जाने के लिए तैयार नहीं है। आयकर विभाग ने उसे फिर से अपने फैसले से जिंदा कर दिया है।
काश्मीर के श्रीनगर के लाल चौक पर 26 जनवरी को झंडा फहराने के कार्यक्रम ने भाजपा को फिर से जिंदा कर दिया है। भले ही ये निखालिस राजनीति हो लेकिन राष्टï्र प्रेमियों के मन पर कांग्रेस की छवि खराब ही हुई है। कांग्रेस हिंदू उग्रवाद के नाम पर जिस तरह से संघ और भाजपा की छवि खराब करना चाहती थी और इससे अपनी छवि निखारना चाहती थी, वह भी अब संभव नहीं दिखायी देता। कोर्ट के आदेश पर जिस तरह से मस्जिद हटायी गयी और मुसलमानों के विरोध के बाद दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने मस्जिद पुन: बनवाने का आश्वासन दिया, उससे कांग्रेस ने मुसलमानों का दिल जीतने का भले ही प्रयास किया लेकिन चौक चौराहों से जिस तरह से हिंदू मंदिर हटाए जा रहे हैं, उससे संदेश स्पष्टï है। यह उच्चतम न्यायालय के आदेश से हो रहा है और छुटपुट विरोध के सिवाय हिंदू मंदिर हटाने में प्रशासन को कोई दिक्कत नहीं आ रही है। हिंदुओं में यदि उग्रवाद होता तो क्या यह संभव था?
कांग्रेस की छवि खराब हो रही है और भाजपा की छवि निखर रही है। उच्चतम न्यायालय में यह कहकर कि सतर्कता आयुक्त को हटाया जा सकता है, सरकार ने अपनी कमजोरी भी प्रगट कर दी है। सरकार जब उच्चतम न्यायालय में झूठ का सहारा लेकर बचने की कोशिश कर रही है और सुषमा स्वराज हलफनामा दायर कर उच्चतम न्यायालय में सत्य को प्रगट करने का इरादा रखती है तो इससे बड़ी शर्मिंदगी की बात सरकार के लिए और क्या हो सकती है? बजट सत्र भी आ रहा है। फिर सरकार और विपक्ष आमने सामने होगा। विपक्ष सरकार से इस्तीफा भी मांग सकता है। अविश्वास का प्रस्ताव भी ला सकता है। 2जी स्पेक्ट्रम मामले से बड़ा मामला तो उच्चतम न्यायालय में दिया गया झूठा हलफनामा भी बन सकता है। सतर्कता आयुक्त की कुर्सी पर जब एक दागी व्यक्ति को सरकार बहुमत के आधार पर बिठाती है तो वह जनता को स्पष्टï संदेश अपने चरित्र के विषय में देती है।
जहां तक मनमोहन सिंह का प्रश्र है तो उनकी ईमानदारी पर कोई संदेह व्यक्त नहीं कर रहा लेकिन उनकी नाक के नीचे जो भ्रष्टïाचार और गलत नियुक्ति हुई, उसकी नैतिक जिम्मेदारी से वे भले ही इंकार करें लेकिन उन्हें राष्टï्र को बताना चाहिए कि गठबंधन की मजबूरी भ्रष्टïाचार को देखकर अनदेखा करने के लिए उन्हें बाध्य करती थी तो सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति में ऐसा किसका दबाव था जो सब कुछ जान बूझकर उन्होंने किया।  क्योंकि सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति मनमोहन सिंह  से अप्रत्यक्ष रूप से नहीं प्रत्यक्ष रूप से संबंधित मामला है। राहुल गांधी महंगाई को गठबंधन की मजबूरी बता सकते हैं लेकिन सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति भी गठबंधन की मजबूरी है, क्या? थामस की नियुक्ति के लिए दो लोग जिम्मेदार हैं। मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री के रूप में और गृहमंत्री के रूप में पी. चिदंबरम।
ये दोनों कांग्रेसी हैं। तीसरी सदस्य सुषमा स्वराज ने तो असहमति प्रगट की थी। इसलिए सीधे सीधे यह कांग्रेस का ही निर्णय है। अब कहा जा रहा है, उच्चतम न्यायालय से कि थामस को हटाया जा सकता है। एक बार मान भी लिया जाए कि थामस की चार्जशीट के मामले में मनमोहन सिंह को जानकारी नहीं थी लेकिन आज हटाने की बात करने के पहले ही उन्हें क्यों नहीं हटा दिया गया? कोई उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर होने के बाद ही सरकार को तो मालूम नहीं पड़ा कि थामस दागी है। जब सुषमा स्वराज ने जानकारी दी तभी जांच कर लेना चाहिए था। नहीं किया गया तो दाल में काला ही काला तो स्पष्टï दिखायी देता है। सतर्कता आयुक्त की कुर्सी की महत्ता सेे मनमोहन सिंह परिचित नहीं, ऐसा तो मानने का कोई कारण नहीं। यदि गलत उद्देश्य से नियुक्ति नहीं की गयी तो सफेद झूठ बोलने की क्या जरूरत है? यह तो सिर्फ अब अपनी चमड़ी बचाने का ही तरीका दिखायी देता है लेकिन क्या इससे झूठ सच हो जाएगा?
- विष्णु सिन्हा
28-01-2011


कानून के रक्षक को ही जब जिंदा जला दिया गया तब यह नौकरशाहों के लिए सोच विचार का विषय है

अभी तक तो बहुओं को मिट्टïी का तेल डालकर जलाने की व्यथा कथा सामने आती थी लेकिन अब अपराधियों और खासकर आर्थिक अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हो गए हैं कि वे कानून के रक्षक को ही मिट्टïी का तेल डालकर जलाने लगे। किसी भी जिंदा आदमी पर मिट्टïी का तेल डालकर जलाना क्रूरता की पराकाष्ठïा है। ऐसा काम कोई जानवर नहीं करता लेकिन इंसान तो करता है। आज इंसान को किसी जानवर से इतना खतरा नहीं है जितना इंसान से है। आम आदमी की बात तो जाने दीजिए, उसकी आज भी क्या बिसात है लेकिन कानून की रक्षा करने वाले एक एडिशनल कलेक्टर यशवंत सोनवणे को ही जब जिंदा जला दिया जाता है तो फिर सोचने के लिए मजबूर होना पड़ता है कि जब रक्षक ही सुरक्षित नहीं तो कौन सुरक्षित होगा?
समाज में बेईमानी, भ्रष्टïाचार इतना बढ़ रहा है कि ईमानदार की जान तो जोखिम में है, ही । उसे किसी का इकलौता सहारा है तो वह कानून का है। कानून का रक्षक ही सुरक्षित नहीं है तो फिर भगवान भरोसे हो गया, एक ईमानदार इंसान। यशवंत सोनवणे का कसूर क्या था ? यही कि वे एक ईमानदार अधिकारी थे और अपराधियों को पकडऩा चाहते थे। अपराधियों को कानून के रक्षक का यह हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं हुआ। अपराधियों का दुस्साहस इतना बढ़ा हुआ था कि दिन दहाड़े यशवंत सोनवणे के पी. ए.  एवं ड्रायवर के सामने ही यशवंत सोनवणे पर मिट्टïी का तेल डालकर आग लगा दिया। यशवंत सोनवणे ने जलते जलते भी अपराधी को पकड़ लिया ओर खबर यह है कि सोनवणे तो शहीद हो गए लेकिन अपराधी भी अस्पताल में 60 प्रतिशत जलकर जीवन और मौत के बीच झूल रहा है। अपराधियों के साथियों को भी पुलिस ने गिरफतार कर लिया है ।
यह आज सभी के लिए सोच का विषय होना चाहिए कि ऐसी घटना क्यों घटित हुई ? बढ़ती अर्थ पिपासा ही  इसकी जड़ तो नहीं है। क्योंकि अपराध और भ्रष्टïाचार का सबसे बड़ा कारण अर्थ पिपासा ही है। राजनैतिक पार्टियां और सरकारें एक ही बात करती है, आर्थिक विकास। कैसे आदमी की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो ? जब एक ही मंत्र बार बार दोहराया जाए तो वह अपना असर भी दिखाता है। एक अंधी विकास की दौड़ में इंसान को उलझा दिया गया है और जब लोग देखते हैं कि अपराध से सुगमता से धन प्राप्त किया जा सकता है और प्राप्त धन से कानून के रक्षकों की जेब गर्म कर अपराध से बचा भी जा सकता है तो प्राप्त किया धन हौसला अफजाई का ही काम करता है। जेब में धन हो और जेल में भी कुछ दिन रहना पड़े तो जेल में भी सब तरह की सुविधा उपलब्ध हो जाती है। इससे जेल जाने का भय भी समाप्त हो जाता है। कानून में सजा का प्रावधान जिस उद्देश्य से किया गया है, वही बेमतलब साबित होता है। रिश्वत लेना आज एक आम बात हो गयी है। बिना किसी हिचक के रिश्वत मांगी जाती है और रिश्वत अपना स्वार्थ सिद्घ करने के लिए दी भी जाती है। सरकारी एजेंसियां जहां भी जिस भी अधिकारी के यहां छापा मारती है, उसी के यहां करोड़ों का अघोषित धन मिलता है। जो निश्चित रूप से प्राप्त वेतन से कई गुना अधिक होता है। जांच की जवाबदारी जिनकी है वे ही कहां दूध के धुले हुए हैं। वे भी सपड़ में आते हैं तो करोड़पति ही पाए जाते हैं। राजनेता, नौकरशाह, व्यापारी इनके बीच काले धन की गटर गंगा इस तीव्रता से बहती है जो राष्टï्र की कुल आय के समतुल्य है। विदेशी बैंकों में देश का काला धन कोई आम आदमी ने तो जमा नहीं कराया है। नाम भले ही सामने न आए और सरकार संधि के बहाने उच्चतम न्यायालय को भी बताने के लिए तैयार न हो लेकिन असलियत तो एकदम साफ है। फौज तक तो भ्रष्टाचार से बच नहीं सका। न्यायालयों पर भी संदेह के बादल उमड़ते रहते हैं।
आखिर खेल तो धन का ही है। एक तरफ इफरात धन चंद लोगों के पास जा रहा है। इतना धन है कि फूहड़ प्रदर्शन भी होता है। इसकी कीमत आम आदमी महंगाई के नाम पर चुकाता है। हर तरह का सट्टïा बाजार गर्म है। ऐसे में अर्थ कमाने की सोच को कैसे बदला जा सकता है ? मेहनत मशक्कत से तो जीवन भर कमाने के बाद रहने के लिए एक मकान ही आदमी बना ले तो बड़ी बात होती है लेकिन अपराध का रास्ता सारी सुख सुविधा मुहैया करा देता है। कल ही रायपुर मेें एक चंदन तस्कर की हत्या कर दी गई। उसकी पुलिस को तलाश थी लेकिन वह शान से रह रहा था। मतलब कानून की पकड़ से बाहर था। हरियाणा, दिल्ली से आकर वह अंतर्राष्टï्रीय तस्करी कर रहा था। कहा जा रहा है कि उसका एक भाई सुपारी किलर है और मरते मरते चंदन तस्कर अपनी हत्या में उसी का नाम ले गया है।
कभी कहा जाता था कि कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं लेकिन उसके विपरीत अब तो यह कहा जा सकता है कि अपराधियों के हाथ बहुत लंबे  होते हैं। कानून के नेटवर्क से बड़ा नेटवर्क तो अपराधियों का है। न्यायालय किसी को सजा सुना देता है तो उसके विरूद्घ भी आवाज उठने लगती है। कसाब जैसे अपराधी को भी लंबी कानूनी प्रक्रिया एक तरह से संरक्षण ही देती है। उच्चतम न्यायालय सजा फांसी की सुना भी दे तो राष्टï्रपति से क्षमा प्रार्थना कर अपराधी लंबा जीवन जीता है। ऐसे में ईमानदार लोगों के लिए संरक्षण कहां है ? भले ही 7 अपराधी छूट जाएं लेकिन एक निरपराध को सजा नहीं होना चाहिए जैसा आदर्श वाक्य ईमानदारों को कम और अपराधियों को ज्यादा संरक्षण देता है।
तमाम विपरीत परिस्थितियों के बाद भी ईमानदारी जिंदा है तो उसके लिए ईमानदार लोग ही जिम्मेदार हैं। यशवंत सोनवणे तो शहीद हो गए लेकिन उन अपराधियों को जिन्होंने घृणित कृत्य किया, सजा दिलाना क्या आसान काम है ? न्यायालय तो साक्ष्य के आधार पर चलता है। यशवंत सोनवणे का पीए और ड्रायवर ही क्या गवाही दे पाएंगे? आज महाराष्टï्र के शासकीय अधिकारियों ने हड़ताल की घोषणा की है। आज हड़ताल से ज्यादा जरूरत इस बात की है कि अधिकारी कसम खाएं कि वे न तो गलत करेंगे और न गलत काम होता देखेंगे। आज देश के नौकरशाह इस बात के लिए कृतसंकल्पित हो जाएं कि वे अपने कर्तव्य का निर्वहन ईमानदारी से करेंगे। बिना किसी भय लालच के करेंगे तो वे देश में बहुत कुछ बदल सकते हैं। क्या वे ऐसा करेंगे ? उत्तर उन्हें ही देना है लेकिन उनके अंदर आत्मा जैसी कोई चीज है तो वे उसी से पूछें कि देश को जिस तरफ  ले जाया जा रहा है, उसके लिए वे भी कितने जिम्मेदार हैं ? अपराधियों का हौसला इसी तरह से बढ़ता रहा तो रहना सभी को इसी देश में है। वे कैसा भारत चाहते हैं? जहां उनके बाल बच्चे और परिवार रह सकें। यशवंत सोनवणे को सही श्रद्घांजलि तो यही होगी कि उनके रास्ते पर चलें।
- विष्णु सिन्हा
27-1-2011


गुरुवार, 27 जनवरी 2011

गांधी जी आज भी यही कहेंगे कि सबको सन्मति दे भगवान

26 जनवरी को काश्मीर में श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराने के भारतीय जनता युवा मोर्चा के घोषित कार्यक्रम को असफल करने के प्रयास में जम्मू काश्मीर की सरकार के साथ केंद्र सरकार भी सम्मिलित हो गयी है। कल रायपुर से जम्मू के लिए विशेष आरक्षित ट्रेन को गृह मंत्रालय ने रद्द करवा दिया। इस ट्रेन को आरक्षित करने के लिए बाकायदा भाजयुमो ने 18 लाख रुपए रेलवे के मांगने पर पटाए थे। यदि रेल सुविधा नहीं दी जानी थी तो धन लेकर ट्रेन आरक्षित करने की जरुरत ही क्या थी? ऐसा तो नहीं था कि रेल और गृह मंत्रालय को जानकारी नहीं थी कि ट्रेन किस उद्देश्य से आरक्षित करवायी गई है। इस तरह की रणनीति कम से कम एक साफ सुथरी सरकार की अच्छी रणनीति नहीं समझी जा सकती। भाजयुमो को भी उम्मीद नहीं थी कि रेल विभाग इस तरह से धन लेने के बावजूद ट्रेन चलाने से इंकार कर देगा। इससे सरकार के संबंध में कोई अच्छा संदेश तो जनता के बीच नहीं गया।
बेंगलुरु से चलने वाली ट्रेन को भी महाराष्टï्र से रात के अंधेरे में वापस बेंगलुरु भेज देना, सरकार की कमजोरी का ही द्योतक है। जब श्रीनगर यात्री नींद में हों तब उन्हें धोखा देकर ट्रेन को वापस कर देना केंद्र सरकार की छबि खराब करने वाला काम ही समझा जाएगा। इससे कांग्रेसी सरकार यह न सोचे कि उसने कोई बड़ा तीर मार लिया है। श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराने का कार्यक्रम निखालिस राजनीति से संबंधित है और लाल चौक पर भाजयुमो झंडा फहरा सके या न फहरा सके, उसने राजनैतिक संदेश तो देश के लोगों को दे ही दिया। भाजपा भाजयुमो के द्वारा यह संदेश भी देने में तो सफल हो ही गयी कि केंद्र सरकार देश के ही एक राज्य में तिरंगा फहराने के कार्यक्रम को बाधित करने के लिए कैसे-कैसे हथकंडे अपनाती है। भाजयुमो का लाल चौक पर 26 जनवरी को झंडा फहराने के कार्यक्रम से सहमति असहमति होना तो स्वाभाविक है लेकिन जिस तरह से रोका जा रहा है कार्यक्रम को उसे कैसे उचित कहा जा सकता है? कम से कम जम्मू तक तो लोगों को जाने ही दिया जाता। इससे यह तो प्रतिध्वनित होता कि देश में कहीं से भी काश्मीर जाने पर कोई प्रतिबंध नहीं है।
श्रीनगर जाने का अवसर भाजयुमो को नहीं मिलता तो 26 जनवरी भी गुजर जाती और प्रदर्शनकारी जम्मू में प्रदर्शन कर लौट आते। इसमें कोई दो राय नहीं है कि तिरंगा देश के नागरिकों के स्वाभिमान से जुड़ा मामला है। तिरंगा फहराने का अधिकार हर भारतीय नागरिक को पूरे देश में है। काश्मीर में जब तिरंगा न फहराने दिया जाए तो इससे लोगों के हृदय पर चोट लगती है। फिर भी भारतीय इतने सहनशील हैं ही कि सब कुछ बर्दाश्त कर लेते हैं। भाजयुमो के इस कार्यक्रम पर देश के नागरिकों की ही नजर नहीं है बल्कि दुनिया भी देख रही है कि किस तरह की राजनीति देश में हो रही है। दुनिया में ऐसा कौन सा देश होगा जहां राष्ट्रीय झंडे को फहराने से रोका जाए? भारत शायद इकलौता देश है जहां राष्टï्रीय झंडे के साथ इस तरह का व्यवहार किया जा रहा है। यदि पड़ोसी देश काश्मीर को विवादास्पद क्षेत्र बताते हैं तो भारत सरकार का कृत्य उनकी बातों को और ताकत ही देता है।
जो लोग काश्मीर के भारत में विलय को ही नहीं मानते और वे भारतीय हैं। उनके खिलाफ तो भारत सरकार कोई कदम नहीं उठाती। आजादी का क्या यही अर्थ होता है? राष्टï्र विरोधी विचारों की भी आजादी। काश्मीर में पाकिस्तानी झंडा फहराया जाता है तब क्या सरकार के स्वाभिमान पर चोट नहीं लगती? भारतीयों के मन पर तो चोट लगती है लेकिन तुष्टिकरण की राजनीति ऐसी है कि सब चलता है। यह तो एकदम स्पष्टï है कि श्रीनगर के लाल चौक पर झंडा फहराने की कोशिश में क्या होगा, यह भाजपा और भाजयुमो अच्छी तरह से जानते हैं। वे भी चाहते तो यही हैं कि सरकार केंद्र और राज्य की उन्हें रोकने के लिए हर तरह का प्रयत्न करे। जिससे वे नायक बन कर उभरें। वे सफल हैं अपने कार्यक्रम में। एक राम जन्मभूमि आंदोलन जब भाजपा को सत्ता तक पहुंचा सकता है तो काश्मीर में झंडा फहराने की कोशिश भी कुछ उसी तरह का कृत्य है।
लोगों की भावनाओं को, संवेदनाओं को किस तरह से उकसाया जाए। यदि लोग उत्तेजित होते हैं तो राजनीति अपना उल्लू सीधा करना जानती है। क्योंकि यह बात तो कई बार स्पष्ट हो चुकी है कि भारतीय मतदाता सरकार के 5 वर्ष के कार्य पर तो आम समय में दृष्टिï डालकर फैसला करता है लेकिन संवेदनाओं का उफान उठे तो वह सब कुछ भूल भाल जाता है। उसे महंगाई और भ्रष्टाचार उतना नहीं उकसाते जितना भावनाओं से जुड़े मुद्दे। भारतीयों का चरित्र तो इस तरह का है कि जरुरत पडऩे पर वह राष्ट्र के लिए सप्ताह में एक समय उपवास भी रख सकता है। युद्ध के समय सरकार मांगे तो माताएं बहनें अपने जेवर दान कर सकती हैं। चीन के युद्ध के समय यह सब हुआ देश में। लाल बहादुर शास्त्री के आव्हान पर खाद्य समस्या से निपटने के लिए लोगों ने सप्ताह में एक समय का भोजन त्याग दिया था। महात्मा गांधी के आïव्हान पर अंग्रेजों की लाठियां खाने के लिए लोग तैयार हो गए थे। भावनाओं को उकसाया जाए तो भारतीय सब कुछ कर सकते हैं।
भाजपा के विरुद्ध अल्पसंख्यकों को सतर्क करने का काम कर राजनैतिक पार्टियां सत्ता सुख लूटती रही हैं। अल्पसंख्यकों को इसका लाभ क्या हुआ, यह अब तो स्पष्टï है। खेल अब भी चालू है। भ्रष्टाचार सारी सीमाओं को तोड़ रहा है। महंगाई लोगों का गला दबा रही है। संसद की कार्यवाही पूरे एक सत्र नहीं चलती। न तो विपक्ष मानने को तैयार है और न ही सरकार। विकास, विकास और विकास की बातें सभी सरकारों की जबान की शोभा है। विश्व की प्रमुख शक्ति बनने की राह पर भारत है। कितने विरोधाभासों से भरा भारतीयों का जीवन है। कितने ही राज्य नक्सली समस्या से पीडि़त है। यह सब एक तरफ है लेकिन इससे जरुरी है काश्मीर में श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराना। भारत की दूसरे नंबर की राजनैतिक पार्टी के लिए तिरंगा फहराने से अहम कोई काम नहीं है तो प्रथम राजनैतिक पार्टी जो सरकार में है, उसके लिए तिरंगा न फहराने देना। महात्मा गांधी स्वर्ग में बैठ कर देखते होंगे कि जिनके लिए आजादी का संघर्ष उन्होंने किया, वे इस देश को किस तरफ ले जा रहे हैं तो निश्चित रुप से प्रसन्न नहीं होते होंगे। वे फिर से गाने लगते हों कि अल्ला ईश्वर तेरो नाम सबको सन्मति दे भगवान लेकिन आश्चर्य से देखते होंगे कि कोई उनका भजन भी सुनने के लिए तैयार नहीं है। जितना श्रम और धन इस तरह के कार्यक्रमों पर खर्च किया जा रहा है, वह लोगों की समस्या हल करने में लगाया जाए तो ही राजनीति सही मार्ग पर चलेगी।

- विष्णु सिन्हा
दिनांक : 24.01.2011
----------------


श्रीनगर में झंडा फहराने से देश की सत्ता हाथ में नहीं आने वाली

26 जनवरी को श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराने की योजना पर भारतीय जनता युवा मोर्चा ने अपनी यात्रा प्रारंभ कर दी है। भारतीय जनता युवा मोर्चा भारतीय जनता पार्टी की ही युवा शाखा है। इसके पहले जब मुरली मनोहर जोशी भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष थे तब उन्होंने भी लाल चौक पर तिरंगा फहराया था लेकिन इससे हासिल क्या हुआ? काश्मीर के कुछ लोगों और चंद गिने चुने भारतीयों के सिवाय सभी भारतीयों की स्पष्टï सोच है कि काश्मीर भारत का अभिन्न अंग है । 26 जनवरी को जम्मू काश्मीर के मुख्यमंत्री उमर फारूक अब्दुल्ला श्रीनगर में तिरंगा निश्चित रूप से फहराएंगे और फोर्स की सलामी लेंगे। जहां तक शासकीय आयोजन का प्रश्र है तो देश भर में जिस तरह से सरकारें 26 जनवरी गणतंत्र दिवस मनाती हैं, उसी तरह से जम्मू काश्मीर में भी मनाया जाएगा ।
यह तो सर्वविदित है कि अपने निहित स्वार्थों के लिए अलगाववादी काश्मीर में हमेशा अशांति फैलाने के लिए प्रयासरत रहते हैं और उन्हें इस संबंध में पड़ोसी मुल्क से भी सहयोग और समर्थन मिलता है। काश्मीर में लंबी अशांति और हिंसा के बाद फिलहाल शांति है। सशस्त्र बलों पर पत्थर फेंकने वाले अब पुलिस में भर्ती हो रहे हैं। बेरोजगार युवकों को नौकरी या काम धंधे से लगाया जा सका तो अलगाववादियों को समर्थन मिलना कम हो जाएगा। काश्मीर में जरूरत इस बात की है कि लोग आतंकवादियों और अलगाववादियों के बहकावे में आने के बदले सुख शांति से रहें और हिंसा से परहेज करें। श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराकर भारतीय जनता युवा मोर्चा अपने अहम की तो संतुष्टिï कर सकता है लेकिन झंडा फहराना समस्या का समाधान नहीं है बल्कि इससे अलगाववादियों को लोगों को भड़काने का एक अवसर ही मिलेगा ।
यह सही है कि काश्मीर में पाकिस्तानी झंडा फहराया, लहराया जाता रहा है। पाकिस्तानी आतंकवादी भी सशस्त्र बलों की गोलियों का निशाना बनते रहे हैं लेकिन अपने तमाम प्रयत्नों के बावजूद काश्मीर को भारत से अलग करने में सफल नहीं हुए। यहां तक कि जम्मू काश्मीर में चुनाव भी होते हैं और विधानसभा और लोकसभा के लिए प्रतिनिधि भी चुने जाते हैं। पूरी की पूरी काश्मीरी जनता भारत से अलग होने के पक्ष में रहती तो चुनाव में मतदान ही नहीं होते। 50 प्रतिशत से अधिक लोग मतदान में आतंकवादियों एवं अलगाववादियों की धमकी के बावजूद भाग लेते हैं। भारतीय जनता पार्टी देश की दूसरी सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी है। 6 वर्ष तक वह सत्ता पर भी काबिज रह चुकी है। काश्मीर से भगाए गए काश्मीरी पंडितों को भाजपा की सरकार ही वापस बसा नहीं सकी बल्कि आज जो जम्मू काश्मीर के मुख्यमंत्री हैं, वे भी भारतीय जनता पार्टी की राज्य सरकार में मंत्री रह चुके हैं।
काश्मीर एक अति नाजुक संवेदनशील मामला है। भारतीय जनता पार्टी भले ही विपक्ष में हो लेकिन उसकी जिम्मेदारी सरकारी दल से कम नहीं है। राष्टï्रभक्ति प्रदर्शित करने का यह तरीका कितना उचित है? मुरली मनोहर जोशी के झंडा फहराने से ही जब कुछ हासिल नहीं हुआ तो भारतीय जनता युवा मोर्चा के झंडा फहराने से क्या हासिल हो जाएगा? हालांकि वर्तमान स्थिति ऐसी नहीं दिखायी पड़ती कि सरकार श्रीनगर तक झंडा फहराने के लिए भाजयुमो कार्यकर्ताताओं को पहुंचने देगी। कोई भी जिम्मेदार सरकार ऐसा नहीं करने दे सकती। सरकार यदि सुविधा देती है कि आओ और झंडा फहरा लो तो झंडा तो अवश्य भाजयुमो फहरा लेगा लेकिन इसके लिए सरकार को अनहोनी न हो, इसके लिए कफर्यू लगाना पड़ेगा। इसका परिणाम क्या होगा ? अलगाववादी तत्वों को और लोगों को उकसाने के लिए खाद पानी मिल जाएगा ।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी इस स्थिति से बचने की अपील की है। झंडा फहराकर अहम को भले ही संतुष्टिï मिले लेकिन इससे काश्मीरी जनता के मन में स्थान नहीं बनाया जा सकता। यह किसी क्षेत्र को जीतकर झंडा फहराने वाली बात नहीं है। करना है तो ऐसा कुछ करें जिससे काश्मीरी जनता के हृदय में भारत के प्रति पे्रम बढ़े और वह स्वयं अलगाववादियों को खदेडऩे के लिए तत्पर हों। काश्मीर की जनता स्वयं घर घर में तिरंगा फहराने के लिए सहर्ष तैयार हो। उसे लगे कि 26 जनवरी और 15 अगस्त उसके अपने राष्टï्रीय त्यौहार हैं। इसके लिए बहुत श्रम, सेवा और सहिष्णुता की जरूरत है । पूरे देश से युवकों को इक_ïा कर श्रीनगर कूच करने से यह नहीं होगा। इससे यह जरूर होगा कि पूरे देश को बताया जाए कि हम कितने बड़े राष्टï्र भक्त हैं। श्रीनगर में झंडा फहराने का दम रखते हैं।
देश में राजग सरकार आने के पहले भाजपा कहती थी कि पाकिस्तान के कब्जे वाले काश्मीर को भी वापस प्राप्त किया जाएगा। वह तो हुआ नहीं। लोगों को उम्मीद तो थी कि कांग्रेस तो काश्मीर पाकिस्तान से वापस प्राप्त कर नहीं सकी। भाजपा शायद प्राप्त कर लें लेकिन भाजपा ने तो सरकार गठबंधन की बनाने के लिए अपने तीन बड़े जनता से किए वायदों को ही एक तरफ रख दिया था। इसीलिए दोबारा सत्ता में भाजपा लौट नहीं सकी। देश इस समय महंगाई और भ्रष्टïाचार से पीडि़त है। केंद्र सरकार राज्य सरकार पर दोषारोपण करती है और बाकी सभी केंद्र सरकार पर। केंद्र सरकार अपने मंत्रियों के साथ बैठक कर महंगाई कम करने के उपाय ढूंढ़ती है तो उसे कोई उपाय ढूंढ़े नहीं मिलता। सरकार बड़ी या महंगाई किसी से पूछें तो कोई भी आसानी से कह सकता है, महंगाई। क्योंकि जिस पर सरकार नियंत्रण न कर सके वही तो सरकार से बड़ी होगी। जिस असल मुद्दे पर जनता को राहत पहुंचाने के लिए भाजपा जैसी पार्टी को काम करना चाहिए, उसका युवा वर्ग श्रीनगर में तिरंगा फहराने को सबसे अहम काम मान रहा है। जिसे भ्रष्टïाचार के विरूद्घ संघर्ष करना चाहिए, वह श्रीनगर में झंडा फहरा कर क्या हासिल कर लेगा ? विदेशों में जमा काला धन वापस प्राप्त करने के लिए जिसे जनजागृति पैदा करना चाहिए, वह झंडा फहराने को अहम मुद्दा मान रहा है।
इस तरह से ध्यान भटकाने की राजनीति से देश के लोगों का भला नहीं होने वाला है। यह युवा शक्ति का सदुपयोग भी नहीं है। जनता का ध्यान भटकाकर अपना उल्लू सीधा करने का प्रयास तो हो सकता है लेकिन भाजपा पर जिस तरह का लोगों का विश्वास रहा है, वह भी टूट गया तो इससे बड़ा नुकसान और कुछ नहीं होगा। सेाच के धनी नेताओं का तो वैसे भी अकाल दिखायी देता है। अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री को ही समझ में नहीं आता कि महंगाई से कैसे निपटा जाए। राष्टï्र के समक्ष चुनौतियों की कमी नहीं है। जनता की हताशा निराशा कोई अच्छा संदेश भी नहीं देती। भाजपा के नेताओं को गंभीरता से विचार करना चाहिए कि सत्ता प्राप्त करना ही पार्टी का एकमात्र उद्देश्य तो नहीं हो गया है। उसका सबसे अलग दिखने वाली पार्टी का चेहरा बदल तो नहीं गया है। जनता को विकल्प मिल गया तो वह क्या करेगी, यह सोच कर देख लें। श्रीनगर में झंडा फहराने से ही देश की सत्ता हाथ नहीं आने वाली।
-विष्णु सिन्हा
दिनांक : 22.01.2011
---------------