यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं
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रविवार, 6 फ़रवरी 2011

भष्टïचार के विरुद्ध जनयुद्ध का अर्थ ही है कि जनता को अब और बरगलाया नहीं जा सकता

भ्रष्टाचार के विरुद्ध अब आक्रोश प्रगट होने लगा है। यह बात तो लोगों को अच्छी तरह से समझ में आ गयी है कि सरकार भ्रष्टïाचार रोकने के लिए कृतसंकल्पित नहीं है। जहां कोई मामला उजागर होता है तो उसकी भी लीपापोती करने से परहेज नहीं किया जाता। विदेशों में जमा कालाधन हो या महंगाई सबकी जड़ में भ्रष्टï तंत्र ही जिम्मेदार दिखायी देता है। सब कुछ जानकर भी प्रधानमंत्री जब तक हल्ला नहीं मचता तब तक देखकर भी अंजान बने रहते हैं। इंतहा तो यह है कि कैग की रिपोर्ट को ही कपिल सिब्बल जैसा मंत्री खारिज कर देता है। कपिल सिब्बल कहते हैं कि 2 जी स्पेक्ट्रम मामले में कोई भ्रष्टाचार नहीं हुआ है। जब भ्रष्टाचार नहीं हुआ है तो जेपीसी से जांच कराने की विपक्ष की मांग से सरकार सहमत क्यों नहीं है? कालेधन के मामले में सरकार नाम उजागर करने के लिए तैयार नहीं है और इसके लिए अंतर्राष्टï्रीय संधियों की आड़ ले रही है। यह सिर्फ कर चोरी का ही मामला नहीं है, उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी भी सरकार को परेशान नहीं करती। सतर्कता आयुक्त थामस के दागी होने से सरकार स्वयं को अंजान बता रही है। अंतत: महाराष्टï्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण का नाम आदर्श घोटाले की एफआईआर में आ ही गया।
भ्रष्टïाचार जो सामने आ रहा है, वही हरि अनंत हरि कथा अनंता की तरह है तो जो सामने नहीं आया है, उसकी कल्पना ही घबराहट पैदा करने वाली है। अब तो सीवीसी और सीबीआई को भी भंग करने की मांग उठने लगी। बुद्धिजीवियों के नेतृत्व में 60 शहरों में रैलियां कर लोगों ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनयुद्ध की घोषणा कर दी है। माहौल फिर जयप्रकाश नारायण के आंदोलन की याद दिला रहा है। योग गुरु स्वामी रामदेव पूरे भारत के दौरे पर हैं और गांव-गांव भ्रष्टïाचार और विदेशों में जमा भारतीय धन के विषय में जनजागृति फैला रहे हैं। जनता भी बड़े उत्साह के साथ स्वामी रामदेव के अंदोलन को गति और शक्ति प्रदान कर रही है। आज कम से कम सरकार के सांसद बल के कारण तानाशाह बनने का खतरा नहीं है। इंदिरा गांधी के पास जैसा दो तिहाई बहुमत था, वैसा बहुमत सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के पास नहीं है और न ही सभी राज्यों में उनकी सत्ता है। इसलिए न तो आपातकाल का खतरा है और न ही सरकार के पास मनमानी करने का अधिकार।
आर्थिक विकास के नाम पर जिस तरह से देश में भ्रष्टïाचार और कालेधन को आश्रय मिला, उसने जनता पर कर का बोझ तो बढ़ाया ही, साथ ही सब्सिडी के लाभ से भी मासूम जनता को महरुम कर दिया। फलस्वरुप   जनता महंगाई की गिरफ्त में इस तरह से जकड़ गयी जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। एक, दो, पांच रुपए के नोट हों या सिक्के इनका चलन में कोई बहुत मायने नहीं रह गया। सरकार में बैठे लोग बेशर्मी से कहते हैं कि विकास की कीमत तो चुकानी पड़ेगी। जनता की आय में वृद्धि हुई लेकिन किस जनता की? आज भी देश की आधी आबादी 20 रुपए प्रतिदिन में गुजारा करती है। शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूल आवश्यकताएं तो धन की गुलाम बन गयी। अच्छी शिक्षा का अर्थ महंगी शिक्षा। निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें गरीबों को देने की बात भी फाइलों में दर्ज है लेकिन वास्तव में कितने स्कूल हैं देश के जो गरीबों को उनका हक दे रहे हैं। बातें सबके पास बड़ी-बड़ी और लंबी चौड़ी है लेकिन अमलीजामा पहनाने के मामले में सरकार फिसड्डïी ही साबित हो रही है। हजारों करोड़ों की मनरेगा योजना ही भ्रष्टïाचार का शिकार हो गयी है और किसी तरह का नियंत्रण नहीं दिखायी देता।
जब सरकार सीवीसी जैसे पद पर दागी व्यक्ति को बिठाने में हिचक महसूस नहीं करती और प्रतिपक्ष की नेता की बात सुनने के लिए तैयार नहीं तो इसी से सरकार की नीयत की चुगली होती है। फिर इस मामले में तो सीधे-सीधे हमारे प्रधानंमत्री ही सम्मिलित रहे। अब सरकार सतर्कता आयुक्त से कह रही है कि इस्तीफा दे दो तो खबर है कि वह इस्तीफा देने  से इंकार कर रहे हैं। पूर्व संचार मंत्री राजा से ही इस्तीफा लेने में सरकार को पसीना छूट गया था। पहले तो राजा ने इस्तीफा देने से इंकार कर दिया था। राजा ने तो स्पष्ट कहा था कि सब कुछ प्रधानमंत्री की जानकारी में किया गया। मंत्रिमंडल के फेरबदल में उम्मीद की जा रही थी कि मंत्रिमंडल के कुछ बदनाम चेहरों को सरकार से बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा लेकिन विभागों में बदलाव के सिवाय कुछ नहीं किया गया। पूरा का पूरा लोकसभा का एकसत्र जेपीसी की मांग सरकार के न मानने के कारण बिना काम-काज के ही समाप्त हो गया।
सत्तारुढ़ दल की ही ऐसी स्थिति है, ऐसी बात नहीं है। भाजपा जिसे वर्तमान राजनैतिक परिस्थिति का सबसे ज्यादा लाभ मिलता, वह भी सत्ता के मोह में कर्नाटक के येदुरप्पा को बचाने के कारण अपनी छबि पर बट्टïा लगा बैठी। कभी शंकर सिंह वाघेला के बगावत के कारण सत्ता गंवाने वाली भाजपा में अब वह बात दिखती नहीं। अब राज्यपाल ने मुख्यमंत्री के विरुद्ध मामला चलाने की इजाजत दे दी है। यही कारण है कि भ्रष्टाचार और महंगाई के विरुद्ध भाजपा के आंदोलन को कार्यकर्ताओं का समर्थन भले ही मिले लेकिन जनता का समर्थन तो नहीं मिल रहा है। यह तो कोई भी नहीं कह सकता कि सिर्फ कांग्रेस की सरकारों में ही भ्रष्टïाचार है। भाजपा की राज्य सरकारें भी पूरी तरह से भ्रष्टाचार मुक्त मुक्त तो नहीं है। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी भ्रष्टïाचार के विरुद्ध कड़े कदम उठाने की बात करते हैं। 20 वर्ष में नहीं 6 माह में फैसले की बात करते हैं। सोनिया गांधी के भी बयान भ्रष्टाचार के विरुद्ध हैं लेकिन बयान और वास्तविक स्थिति का भेद किसी से छुपा नहीं है।
इसीलिए देश में स्थिति ऐसी उत्पन्न हो रही है कि अब कोई भी व्यक्ति सिर्फ कसमसाकर नहीं रह सकता। उसे विरोध के लिए सड़क पर उतरना पड़े तो वह उतरेगा। बाबा रामदेव ने अलख सबसे पहले जगाया है और उनका संगठन भी देश में तैयार हो रहा है। स्थापित राजनेताओं और राजनैतिक पार्टियों को यह नहीं भूलना चाहिए कि जब जनता ही उठ खड़ी होती है तो वह फिर किसी को बख्शती नहीं। इंदिरा गांधी ने तो जेल में बंद कर रखा था राजनेताओं को लेकिन जनता ने जब इंदिरा गांधी से मुक्ति का संकल्प ले लिया तो सत्ता से बेदखल कर ही दिया था। स्वयं इंदिरा गांधी तक को चुनाव में पराजित कर दिया था। जनता की सहनशक्ति की एक सीमा है और वह समाप्त हो रही है। नेतृत्व की कमी थी। लगता था कि एक तरफ कुंआ है तो दूसरी तरफ खाई। किधर भी जाओ मरना अपने को ही है लेकिन अब बाबा रामदेव के रुप में सशक्त नेतृत्व मिल गया है। जनता में यह विश्वास तो पैठ रहा है कि यह बाबा उन्हें धोखा नहीं देगा और जनता का विश्वास से बड़ी ताकत प्रजातंत्र में और कुछ नहीं होती। अब भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनयुद्ध की घोषणा ही इस बात की निशानी है कि पानी नाक के ऊपर आ गया है। जनता को और बरगलाया नहीं जा सकता।
- विष्णु सिन्हा
दिनांक : 31.01.2011 

यदि सरकार ने न्यायालय में झूठा हलफनामा दायर किया है तो यह गिरावट की पराकाष्ठï है

सरकार ने हलफनामा दायर कर उच्चतम न्यायालय को बताया कि उसे भ्रष्टïाचार के मामले में केंद्रीय सतर्कता आयुक्त पी.जे. थामस के खिलाफ चार्जशीट दाखिल होने की जानकारी नहीं थी। जनता से झूठ बोलना, झूठे वायदे करना तो सरकारों के लिए एक आम बात है। स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नरसिंहराव की सरकार में वित्त मंत्री रहते हुए संसद में कहा था कि चुनाव में वायदा करना अलग बात है और उसे पूरा करना अलग। मानसिकता तो स्पष्टï है। अभी बहुत दिन नहीं हुए जब लोकसभा के  चुनाव में कांग्रेस ने वायदा किया था कि वह गरीबों को 3 रू. किलो अनाज देगी लेकिन डेढ़ वर्ष से अधिक हो गया, सरकार अपना वायदा पूरा करती नहीं दिखायी पड़ती। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इसके लिए दबाव भी बनाया लेकिन सरकार ने दबाव को स्वीकार नहीं किया। मोटे तौर पर यह आम बात है। मनमोहन सिंह की सरकार ही ऐसा करती है, ऐसा नहीं है। अधिकांश सरकारों की फितरत इसी तरह की है।
लेकिन केंद्र सरकार उच्चतम न्यायालय में झूठा हलफनामा भी दाखिल कर सकती है, यह बात तो किसी को भी स्वीकार नहीं होगी। लोकसभा में प्रतिपक्ष की नेता सुषमा स्वराज कहती हैं कि सरकार सफेद झूठ बोल रही है। सीबीसी की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और प्रतिपक्ष की नेता को मिलाकर तीन सदस्यीय समिति होती है। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के साथ सुषमा स्वराज भी समिति की सदस्य थी। तीन सदस्यीय पैनल में से थामस के नाम का विरोध सुषमा स्वराज ने किया था। कारण उन पर चार्जशीट ही थी। यह तो स्पष्टï है कि प्रधानमंत्री और गृहमंत्री थामस को सतर्कता आयुक्त बनाना चाहते थे। इसलिए सर्वसम्मति से न होकर उनका नाम बहुमत के आधार पर तय किया गया। जिसका यह भी स्पष्टï अर्थ होता है कि समिति की बैठक औपचारिकता थी। प्रधानमंत्री, गृहमंत्री ने पहले से ही तय किया हुआ था कि थामस को सतर्कता आयुक्त नियुक्त करना है। तब थामस की चार्जशीट की जानकारी बैठक में क्यों रखी जाती? गृह विभाग को यह जानकारी न हो, इस बात पर तो कोई विश्वास नहीं कर सकता।
इसके साथ 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के समय थामस दूरसंचार मंत्रालय में सचिव थे। विपक्ष संसद की कार्यवाही पूरे एक सत्र भर नहीं चलने देता कि 2जी स्पेक्ट्रम की जांच के लिए संयुक्त संसदीय दल बनाया जाए। सरकार भी अड़ी हुई है कि वह जेपीसी नहीं बनाएगी। यदि आप ईमानदार हैं और आपकी सरकार ने कुछ गलत नहीं किया है तो जेपीसी जांच से परहेज क्यों ? शक संदेह के लिए सरकार ही कारण बन रही है। जब कोई कुछ छुपाना चाहता है तब ही वह किसी भी तरह की जांच से घबराता है। आज मनमोहन सिंह की सरकार की स्थिति भी वैसी ही हो गयी है जैसी कभी विभिन्न आरोपों में घिरी नरसिंहराव सरकार की हो गयी थी और कभी बोफोर्स के कारण राजीव गांधी की हो गयी थी। बोफोर्स का जिन्न अभी भी चिराग के अंदर जाने के लिए तैयार नहीं है। आयकर विभाग ने उसे फिर से अपने फैसले से जिंदा कर दिया है।
काश्मीर के श्रीनगर के लाल चौक पर 26 जनवरी को झंडा फहराने के कार्यक्रम ने भाजपा को फिर से जिंदा कर दिया है। भले ही ये निखालिस राजनीति हो लेकिन राष्टï्र प्रेमियों के मन पर कांग्रेस की छवि खराब ही हुई है। कांग्रेस हिंदू उग्रवाद के नाम पर जिस तरह से संघ और भाजपा की छवि खराब करना चाहती थी और इससे अपनी छवि निखारना चाहती थी, वह भी अब संभव नहीं दिखायी देता। कोर्ट के आदेश पर जिस तरह से मस्जिद हटायी गयी और मुसलमानों के विरोध के बाद दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने मस्जिद पुन: बनवाने का आश्वासन दिया, उससे कांग्रेस ने मुसलमानों का दिल जीतने का भले ही प्रयास किया लेकिन चौक चौराहों से जिस तरह से हिंदू मंदिर हटाए जा रहे हैं, उससे संदेश स्पष्टï है। यह उच्चतम न्यायालय के आदेश से हो रहा है और छुटपुट विरोध के सिवाय हिंदू मंदिर हटाने में प्रशासन को कोई दिक्कत नहीं आ रही है। हिंदुओं में यदि उग्रवाद होता तो क्या यह संभव था?
कांग्रेस की छवि खराब हो रही है और भाजपा की छवि निखर रही है। उच्चतम न्यायालय में यह कहकर कि सतर्कता आयुक्त को हटाया जा सकता है, सरकार ने अपनी कमजोरी भी प्रगट कर दी है। सरकार जब उच्चतम न्यायालय में झूठ का सहारा लेकर बचने की कोशिश कर रही है और सुषमा स्वराज हलफनामा दायर कर उच्चतम न्यायालय में सत्य को प्रगट करने का इरादा रखती है तो इससे बड़ी शर्मिंदगी की बात सरकार के लिए और क्या हो सकती है? बजट सत्र भी आ रहा है। फिर सरकार और विपक्ष आमने सामने होगा। विपक्ष सरकार से इस्तीफा भी मांग सकता है। अविश्वास का प्रस्ताव भी ला सकता है। 2जी स्पेक्ट्रम मामले से बड़ा मामला तो उच्चतम न्यायालय में दिया गया झूठा हलफनामा भी बन सकता है। सतर्कता आयुक्त की कुर्सी पर जब एक दागी व्यक्ति को सरकार बहुमत के आधार पर बिठाती है तो वह जनता को स्पष्टï संदेश अपने चरित्र के विषय में देती है।
जहां तक मनमोहन सिंह का प्रश्र है तो उनकी ईमानदारी पर कोई संदेह व्यक्त नहीं कर रहा लेकिन उनकी नाक के नीचे जो भ्रष्टïाचार और गलत नियुक्ति हुई, उसकी नैतिक जिम्मेदारी से वे भले ही इंकार करें लेकिन उन्हें राष्टï्र को बताना चाहिए कि गठबंधन की मजबूरी भ्रष्टïाचार को देखकर अनदेखा करने के लिए उन्हें बाध्य करती थी तो सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति में ऐसा किसका दबाव था जो सब कुछ जान बूझकर उन्होंने किया।  क्योंकि सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति मनमोहन सिंह  से अप्रत्यक्ष रूप से नहीं प्रत्यक्ष रूप से संबंधित मामला है। राहुल गांधी महंगाई को गठबंधन की मजबूरी बता सकते हैं लेकिन सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति भी गठबंधन की मजबूरी है, क्या? थामस की नियुक्ति के लिए दो लोग जिम्मेदार हैं। मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री के रूप में और गृहमंत्री के रूप में पी. चिदंबरम।
ये दोनों कांग्रेसी हैं। तीसरी सदस्य सुषमा स्वराज ने तो असहमति प्रगट की थी। इसलिए सीधे सीधे यह कांग्रेस का ही निर्णय है। अब कहा जा रहा है, उच्चतम न्यायालय से कि थामस को हटाया जा सकता है। एक बार मान भी लिया जाए कि थामस की चार्जशीट के मामले में मनमोहन सिंह को जानकारी नहीं थी लेकिन आज हटाने की बात करने के पहले ही उन्हें क्यों नहीं हटा दिया गया? कोई उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर होने के बाद ही सरकार को तो मालूम नहीं पड़ा कि थामस दागी है। जब सुषमा स्वराज ने जानकारी दी तभी जांच कर लेना चाहिए था। नहीं किया गया तो दाल में काला ही काला तो स्पष्टï दिखायी देता है। सतर्कता आयुक्त की कुर्सी की महत्ता सेे मनमोहन सिंह परिचित नहीं, ऐसा तो मानने का कोई कारण नहीं। यदि गलत उद्देश्य से नियुक्ति नहीं की गयी तो सफेद झूठ बोलने की क्या जरूरत है? यह तो सिर्फ अब अपनी चमड़ी बचाने का ही तरीका दिखायी देता है लेकिन क्या इससे झूठ सच हो जाएगा?
- विष्णु सिन्हा
28-01-2011


गुरुवार, 27 जनवरी 2011

मनमोहन इस्तीफा दें या न दें लेकिन राजा का भ्रष्टïचार कांग्रेस के लिए भारी नुकसानप्रद साबित होगा

कहा जा रहा है कि मनमोहन सिंह इस्तीफा नहीं देंगे। लोग उम्मीद ही क्यों
कर रहे हैं कि मनमोहन सिंह इस्तीफा दे देंगे? लाल बहादुर शास्त्री अकेले
ऐसे राजनेता थे जिन्होंने रेल दुर्घटना पर रेल मंत्री का पद छोड़ दिया
था। अब तो रोज दुर्घटनाएं होती हैं। कोई रेल मंत्री इस्तीफा नहीं देता।
नैतिकता और आदर्श की बातें अब छोटों के लिए भले ही आवश्यक हों लेकिन
उच्चतम पद पर बैठे लोग इस तरह की बातों पर विश्वास नहीं करते। महाधिवक्ता
कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री की चुप्पी के विषय में उच्चतम न्यायालय का
प्रश्र प्रधानमंत्री के लिए अपमानजनक नहीं हैं। अपमानजनक तो अब कुछ भी
नहीं रह गया है। लोगों को मुफत में अनाज सड़ाने के बदले बांटने का उच्चतम
न्यायालय का आदेश भी कहां शर्मिंदगी पैदा करता है बल्कि उच्चतम न्यायालय
के निर्देश को मानने से इंकार कर न्यायालय के औचित्य पर ही प्रश्रचिन्ह
लगाया जाता है।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। इस बात को सारी दुनिया
मानती है लेकिन एक व्यक्ति बिना जनता से जनादेश प्राप्त किए संवैधानिक
प्रावधानों के तहत देश का सर्वोच्च पद सुशेाभित कर सकता है, यह भी भारतीय
प्रजातंत्र की ही देन है। मंत्रिपरिषद का एक मंत्री प्रधानमंत्री के आदेश
की भी उपेक्षा कर अरबों के भ्रष्टïाचार को प्रोत्साहित करता है और
प्रधानमंत्री टुकुर टुकुर देखते रहने के सिवाय कुछ कर नहीं सकते। इससे
बड़ी विडंबना क्या होगी? मंत्री प्रधानमंत्री के कहने से इस्तीफा भी देने
के लिए तैयार नहीं होता और प्रधानमंत्री उसे हटा भी नहीं सकते, यह बडी़
से बड़ी विडंबना है। न्यायालय पूछने के लिए बाध्य होता है कि मुकदमा
चलाने की अनुमति 16 माह तक क्यों नहीं दी गयी तो इससे सरकार की नीयत पर
ही संदेह खड़ा होता है। स्पष्टï प्रथम दृष्टिï में तो यही दिखायी देता है
कि प्रधानमंत्री अपने मंत्री को संरक्षण दे रहे हैं।
भ्रष्टïाचार के मामले में न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जाता है लेकिन
प्रधानमंत्री के कान पर जूं भी नहीं रेंगती। जब कैग की रिपोर्ट ही इस
संबंध में आ जाती है कि करीब 1 लाख 76 हजार करोड़ का नुकसान सरकारी खजाने
को पहुंचाया गया है और विपक्ष सांसद में हंगामा करता है तब भी मंत्री
पूरी बेशर्मी से कहता हैं कि मैं इस्तीफा नहीं दूंगा। प्र्रधानमंत्री
मनमोहन सिंह 79 वर्ष के हो गये। वे कहते हैं कि अवकाश ग्रहण करने की उनकी
इच्छा नहीं है तो युवा मंत्री कैसे सोच सकता है कि वह राजपाठ का त्याग कर
दे। जब अशोक चव्हाण से आदर्श घोटाले के नाम पर इस्तीफा ले लिया जाता है
और निर्णय सोनिया गांधी करती हैं तब मनमोहन सिंह भी अशोक चव्हाण की तरह
अपना इस्तीफा सोनिया गांधी को ही देने से क्यों हिचक रहे हैं? सोनिया
गांधी स्वीकार करें या न करें लेकिन पहल तो उन्हें करना ही चाहिए।
खुद का ईमानदार होना ही पर्याप्त नहीं होता। वे सामूहिक रूप से अपने
मंत्रियों के कामों के लिए भी जिम्मेदार हैं। फिर यह मामला तो सीधा और
साफ है। सब कुछ जानते बुझते हुए भी सिर्फ सरकार बनी रहे और वे
प्रधानमंत्री बने रहें, इसलिए उन्होंने राजा को मंत्रिमंडल से बर्खास्त
करने की हिम्मत नहीं दिखायी। यह उनकी कमजोरी का ही परिचायक है। सब कुछ
जानते समझते हुए इतने बड़े भ्रष्टïाचार को रोकने में असफल रहना,
प्रधानमंत्री की स्वयं की असफलता है। प्रधानमंत्री की कुर्सी पर जमे रहने
के लिए वे हर तरह का समझौता करने के लिए तैयार हैं। अर्जुनसिंह ने उनके
मंत्रिमंडल में रहते हुए जब राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद के लिए योग्य
करार दिया तो मनमोहन सिंह ऐसे नाराज हुए कि दूसरी बार सरकार बनाते समय
अपने मंत्रिमंडल में सम्मिलित करने के लिए तैयार नहीं हुए। उनके स्थान पर
कपिल सिब्बल को मानव संसाधन मंत्री बनाया और राजा के इस्तीफा देने पर
संचार मंत्रालय का कार्यभार भी सिब्बल को ही सौंप दिया।
वे महान अर्थशास्त्री हैं लेकिन इतने ही बड़े इंसान हैं, यह तो साबित
नहीं होता। नरसिंह राव के मंत्रिमंडल में वित्तमंत्री बनकर उन्होंने
राजनीति में प्रवेश किया था। नरसिंहराव ऐसे कांग्रेसी प्रधानमंत्री हुए
जिन पर तरह तरह के आरोप लगे। बाबरी मस्जिद विध्वंस तक में सहयोगी होने का
आरोप उन पर लगा। सांसदों की खरीद फरोख्त का आरोप लगा। जब हवाला का आरोप
उनके मंत्रियों पर लगा तो उन्होंने मंत्रियों से इस्तीफा ले लिया लेकिन
खुद पर लगे आरोपों के कारण इस्तीफा नहीं दिया। मनमेाहन सिंह तो अपने
मंत्री से भी इस्तीफा नहीं ले सके। मंत्री ने इस्तीफा भी दिया तो अपनी
पार्टी के नेता के कहने पर दिया। नरसिंहराव को भी विद्वान व्यक्ति माना
जाता था और मनमोहन सिंह को भी विद्वान माना जाता है। उनकी आर्थिक विद्वता
के कारण ही नरसिंहराव ने उन्हें वित्त मंत्री बनाया था। नरसिंहराव की
सरकार चले जाने के बाद अपनी सज्जनता से मनमोहन सिंह ने सोनिया गांधी का
विश्वास अर्जित किया। मनमोहन सिंह कांग्रेस के नेता ऐसे रहे जिनका कभी
कोई गुट नहीं रहा। ठीक वैसे ही जैसे नरसिंहराव का भी कोई गुट नहीं था।
कांग्रेस के आलाकमानों की दृष्टिï में ये ऐसे नेता रहे जिन्होंने
हार्मलेस होने की छवि अपनी बनायी। आलाकमान का विश्वास जीतने का यह सौ
फीसदी आजमाया हुआ नुस्खा है। जब कोई गुट ही नहीं है। कोई अपना आदमी नहीं।
आलाकमान के प्रति वफादारी ही एकमात्र सिद्घांत तो विश्वसनीयता का इससे
बड़ा तरीका और क्या होगा? महाराष्टï्र के नवनियुक्त मुख्यमंत्री
पृथ्वीराज चव्हाण भी इसी छवि के व्यक्ति हैं और महाराष्टï्र में सर्वोच्च
पद के हकदार बन गए। आलाकमान के नाम की माला जपी तो एक दिन बरदान मिलता ही
है। ऐसा ही वरदान छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी को भी मिला था। पद में आने के
बाद फिर अपने लोग पैदा हो ही जाते हैं और पद बचाने के लिए हर तरह के
कृत्य जायज लगने लगते हैं।
जनसेवा का राग कितना भी राजनेता गाएं लेकिन असली उद्देश्य तो सत्ता होती
है। एक बार सत्ता की आसंदी पर बैठने का अवसर मिल जाए तो आसंदी से ऐसे
चिपकते हैं कि उठने का नाम ही नहीं लेते। जमे रहने के लिए हर तरह का
कृत्य जायज लगता है। नाजायज भी लगे तो भी बर्दाश्त किया जाता है। पद पर
पदारूढ़ होना इतना सम्मानजनक लगता है कि बड़े से बड़ा अपमान भी कोई बहुत
मायने नहीं रखता। नहीं तो क्या कारण है कि जो एक ईमानदार व्यक्ति भ्रष्टï
व्यक्ति को अपने मंत्रिमंडल में बर्दाश्त करता है। वह कैग को ही उपदेश
देता है कि भूल से किए गए काम और जान बूझकर किए काम में उसे भेद करना
चाहिए। 150 वर्ष हो गए, कैग को अस्तित्व में आए। कैग की रिपोर्ट नहीं आती
तो राजा आज भी मंत्री पद पर जमे रहते। क्योंकि कैग की रिपोर्ट ने झूठ की
पोल खोल दी और विपक्ष इसे गले से नीचे उतारने में स्वयं को सक्षम नहीं
महसूस कर सका। उसके पास इसके सिवाय कोई चारा नहंी था कि वह राजा के
इस्तीफे के लिए सरकार को बाध्य करे। उच्चतम न्यायालय के निर्देश के बाद
तो विपक्ष का हक बनता है कि वह प्रधानमंत्री से भी इस्तीफा मांगे। सोनिया
गांधी को बाध्य करे कि वे मनमेाहन सिंह का इस्तीफा ले लें। या फिर
कांग्रेस पार्टी राजा के पाप के बोझ को ढोए। बोफोर्स ने कांग्रेस की क्या
हालत की थी, यह आलाकमान सहित सबको अच्छी तरह से पता है। वह तो सौ करोड़
से भी कम का मामला था लेकिन यह मामला तो 1 लाख 76 हजार करोड़ का है और यह
चुनावी मुद्दा बना तो कांग्रेस की लुटिया डूबा सकता है।
- विष्णु सिन्हा
18-11-2010


मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

उच्चतम न्यायालय के व्यंग्य के बावजूद कुछ बदलेगा, ऐसा तो नहीं लगता

भ्रष्टïचार के मामले में उच्चतम न्यायालय ने कड़ी टिप्पणी की है और यहां
तक कहने से परहेज नहीं किया कि सरकार घूस की दर क्यों नहीं तय कर देती ?
भ्रष्टïचार एक सर्वव्यापी मामला बन गया है। वरिष्ठ अधिवक्ता शांतिभूषण
ने तो उच्चतम न्यायालय में ही कहा कि कम से कम 8 पूर्व चीफ जस्टिस
भ्रष्ट थे। फिर कौन सा ऐसा क्षेत्र बच जाता है जहां भ्रष्टïचार ने अपने
डैने न फैला रखे हो? जब न्यायपालिका ही भ्रष्टïचार से मुक्त नहीं तो फिर
किससे उम्मीद की जा सकती है। कहा जाता है कि भ्रष्टïचार की जननी राजनीति
है। चुनाव और राजनीति में असुरक्षित भविष्य राजनीतिज्ञों को सुरक्षा के
लिए भ्रष्टïचार से धन कमाने के लिए बाध्य करता है। चुनाव जीतने के लिए
धन की और अब तो बेहिसाब धन की जरूरत होती है। नगर निगम का पार्षद बनने के
लिए ही लोग 50-60 लाख खर्च कर देते हैं तो उसका सीधा और साफ मतलब तो यही
है कि चुनाव जीतकर इससे कहीं ज्यादा का लाभ उठाया जा सकता है। नहीं तो
मोहल्ले का कचरा उठवाने, नाली साफ कराने के लिए और बदले में ढाई हजार
वेतन प्राप्त करने के लिए कोई इतनी बड़ी रकम दांव पर नहीं लगाएगा।

चुनाव लडऩे के लिए ही नहीं, अब तो टिकट प्राप्त करने के लिए भी धन की
जरूरत होती है। चुनाव जीतने लायक धन है या नहीं, यह पार्टी को बताना
पड़ता है। कहा जाता है कि पिछले लोकसभा चुनाव में प्रत्याशियों ने 8 हजार
करोड़ रूपये खर्च किए। 75 लाख से 1 करोड़ रूपये तक की मदद तो जीतने में
सक्षम प्रत्याशियों की मदद पार्टी ने भी की। चुनाव के समय हवा में उडऩा
तो अब हर पार्टी के बड़े नेता के लिए जरूरी हो गया है। चुनाव आयोग कड़ी
से कड़ी कार्यवाही की चेतावनी देता है और अब तो बैंक में खाता खोलकर खर्च
करने की व्यवस्था भी की गयी है और प्रत्याशी की वित्तीय  जांच के लिए
आयकर अधिकारियों को लगाया गया है। उच्चतम न्यायालय के जज कह रहे हैं कि
सबसे ज्यादा भ्रष्टïचार आयकर, बिक्री कर और आबकारी विभाग ही करता है। अब
उन्हीं आयकर अधिकारियों को चुनाव खर्च की जांच और निगरानी के लिए  लगाया
गया है।

भले ही उच्चतम न्यायालय के जजों ने व्यंग्य में कहा हो कि भ्रष्टïचार की
दर तय कर देना चाहिए। जिससे लेने और देने वालों को सुविधा हो लेकिन सरकार
तय भी कर देगी तो भ्रष्टïचार कम होने वाला नहीं है। छठवां वेतन आयोग
लागू होने के बाद शासकीय कर्मचारियों को सरकार भरपूर वेतन दे रही है
लेकिन मन किसी का भर रहा है, क्या ? केंद्र सरकार ने 10 प्रतिशत तो
छत्तीसगढ़ सरकार ने 8 प्रतिशत महंगाई भत्ता और बढ़ा दिया है लेकिन  कोई
काम करना चाहता है, क्या? फिर जिस काम में कुछ भी मिलने की उम्मीद न हो
उस काम की फाइल को तो वर्षों कोई हाथ नहीं लगाना चाहता। काम कराना है तो
फाइल लेकर टेबल टेबल घूमो और भेंट चढ़ाओं। यह सब खुलेआम होता है। कुछ लोग
दिखाने के लिए पकड़े भी जाते हैं तो होता जाता कुछ नहीं।  वर्षों जांच
चलती है। मुकदमा चलाने की अनुमति विभाग से मांगे, तो अनुमति नहीं मिलती।
फिर सबसे बड़ी बात तो यह है कि भ्रष्टïचार के मामले में पकड़े जाने से
भी समाज  में मान सम्मान की कमी नहीं होती।

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी पत्रकार वार्ता कर कहते हैं कि
सत्तापक्ष और कांग्रेस में ऊपर से नीचे तक मिली भगत है। भटगांव का
उपचुनाव हारने के बाद यह बात जोर शोर से उठ रही है कि कांग्रेसियों को
भाजपाइयों ने खरीद लिया था।  इसी कारण कांग्रेस बुरी तरह से हारी।
भाजपाइयों ने खरीदा और कांग्रेसी बिक गए, यह बात जब कांग्रेस का ही एक
बड़ा नेता कहता है और आलाकमान को पत्र लिखकर इस मामले की जांच कराने की
मांग  खुलेआम करता है तो यह कांग्रेस आलाकमान  के ही सोच का विषय है कि वह
जांच कर बिके हुए कांग्रेसियों पर कार्यवाही करे या फिर मुद्दा उठाकर
कांग्रेस की छवि खराब करने के आरोप में मुद्दा उठाने वाले पर कार्यवाही
करे। जबकि आरोप लगाने वाले पर भी विधायकों की खरीद फरोख्त का आरोप है।
इसीलिए तो अपनी पार्टी के विषय में कोई मुद्दा सार्वजनिक रूप से उठाने
वाले को पार्टियां अनुशासनहीन मानती हैं और हर पार्टी का यही निर्देश
होता है कि मामला पार्टी फोरम में उठाया जाए।

राजनीति और भ्रष्टïचार का तो चोली दामन का साथ है। जीसस ने कहा कि पत्थर
वह मारे जिसने कोई पाप नहीं किया लेकिन राजनीति तो ऐसी जगह है, जहां पापी
ही पापी पर पत्थर मारते हैं। जब कोई किसी पर भ्रष्टïचार का आरोप लगाता
है तब यह जरूरी नहीं कि आरोप लगाने वाला कोई पुण्यात्मा हो। इस मामले में
भी जलनखोरी कम नहीं है। खुद भ्रष्टïचार करे तो सही और दूसरा करे तो गलत।
इसीलिए तो कहते हैं, पूरी बेशर्मी से कि कोई किसी को  कमाता खाता नहीं
देख सकता। जब सभी चुनावों में हर तरह की सेटिंग की जाती है तो भटगांव
चुनाव में नहीं की गई होगी, ऐसा मानने का तो कोई कारण नहीं है। साम, दाम,
दंड, भेद सभी का उपयोग कर चुनाव जीतने का प्रयत्न सभी अपनी शक्तिभर करते
हैं। भाजपा इस मामले में सफल हो रही है और कांग्रेस असफल तो इतनी खुन्नस
की आईबी से जांच कराएंगे।

विधायकों को तो कांग्रेस के राज्य प्रभारी नारायण सामी ने धमकी तक दी थी
कि चुनाव प्रचार के लिए अपने निर्धारित क्षेत्र में नहीं गए और
अंबिकापुर में दिखायी दिए तो अगले चुनाव में टिकट तक कट जाएगी लेकिन धमकी
का परिणाम क्या निकला? कांग्रेस बुरी तरह से हार गयी और सांप के निकल
जाने के बाद लकीर पीटने से कुछ मिलने वाला नहीं लेकिन अक्लमंद कांग्रेस
की ही मिट्टी  पलीद करने में लगे हैं। कांग्रेसी यदि सरकार के साथ
मिलीभगत कर रहे हैं तो दोषी कौन है? किससे उन्होंने यह हुनर सीखा है?
आखिर बच्चे अच्छा बुरा जो भी सीखते हैं तो सीखते अपने बुजुर्गों से ही
हैं। कांग्रेस में ऐसा बिखराव है तो जिम्मेदारी स्वयं लेना चाहिए। आईबी
जांच से क्या सब कुछ ठीक हो जाने वाला है? जब सांसद लोकसभा में प्रश्र
पूछने के लिए धन लेने से नहीं हिचकते तो फिर रह ही क्या जाता है? सांसदों
की खरीद फरोख्त कर जब बहुमत जुटाया जाता है तब कांग्रेसी और सीख भी क्या
सकते हैं? वे यह भी  तो देखते हैं कि ईमानदारी से काम करने वालों को कौन
पूछता है?

फिर सब से बड़ी बात तो यही है कि जनता सब कुछ देख रही है। वह सब कुछ समझ
भी रही है। जहां तक भ्रष्टïचार का अनुभव है तो जनता से बड़ा भुक्तभोगी
कौन है? भ्रष्टïचार के परिणाम को भोगना तो जनता को ही पड़ता है। दिल्ली
में केंद्र सरकार और राज्य सरकार दोनों कोंग्रेस की है और उनकी नाक के
नीचे ही कामनवेल्थ गेम्स के नाम पर भ्रष्टïचार का ऐसा खेल खेला गया कि
रोकने वाला कोई नहीं था? अंत में यही कहा गया कि देश की इज्जत का मामला
है और खेल हो जाने दो। भ्रष्टïचार के मामले बाद में देख लिए जाएंगे। 70
हजार करोड़ रूपये खर्च करने का मामला है। वह तो भारतीय खिलाडिय़ों के
अच्छे प्रदर्शन ने लोगों को खुश कर दिया और विश्व में मिली प्रशंसा से
भारतीय गदगद हैं। नहीं तो कामनवेल्थ गेम्स के नाम से ही लोग बिचक रहे थे
और कांग्रेस के ही मणिशंकर अय्यर दुआ कर रहे थे कि खेल असफल हो। उच्चतम
न्यायालय के व्यंग्य के बावजूद कुछ बदलेगा, इसकी उम्मीद तो किसी को नहीं
है।

- विष्णु सिन्हा
11-10-2010


रविवार, 12 सितंबर 2010

सूचना के अधिकार के कारण ही प्रधानमंत्री कार्यालय को मंत्रियों की धनसंपदा की जानकारी देना पड़ा

सूचना के अधिकार कानून के तहत जब सुभाषचंद्र अग्रवाल ने केंद्रीय
मंत्रियों की संपत्ति का ब्यौरा मांगा तब प्रधानमंत्री कार्यालय ने
ब्यौरा देने से इंकार कर दिया था लेकिन केंद्रीय सूचना आयोग में अपील के
बाद ब्यौरा देने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय को तैयार होना पड़ा। कोन
मंत्री कितनी संपदा का मालिक है, यह तो जानने का अधिकार भारतीय नागरिकों
को होना ही चाहिए। जनता को पता तो चले कि कौन सा मंत्री कितना अमीर है और
कौन कितना गरीब। जिस लोकसभा में 200 से अधिक सदस्य करोड़पति हैं और फिर
भी वे वेतन, भत्तों में वृद्घि की मांग करते हैं, उनमें से ही तो कुछ
मंत्री भी हैं। मंत्रियों की संपत्ति की घोषणा से यह तो पता चल गया कि
किसके पास कितनी संपत्ति है लेकिन वास्तव में इनके पास इतनी ही संपत्ति
है, इसकी जांच भी होना चाहिए। एक विभाग तो कायदे से इसी के लिए होना
चाहिए जो विधायकों, सांसदों, मंत्रियों, सदनों के अध्यक्षों की आर्थिक
स्थिति की पूरी तरह से हमेशा जांच करे कि पद में आने के पहले इनके पास
कितनी धन संपदा थी और पद पर रहते हुए इनकी धन संपदा किस तरह से बढ़ रही
है या घट रही है।

इन जनप्रतिनिधियों के साथ नौकरशाहों की  भी इसी तरह से निगरानी की
व्यवस्था होना चाहिए। यदि जनप्रतिनिधियों और नौकरशाह ईमानदारी से काम
करें तो देश में व्याप्त भ्रष्टïचार को समाप्त भले ही न किया जा सके
लेकिन कम से कम तो किया जा सकता है। मनमोहन सिंह एक ईमानदार प्रधानमंत्री
माने जाते हैं। ईमानदारी का तकाजा है कि वे स्वयं तो ईमानदार रहें ही,
साथ अपने सहयोगियों की भी ईमानदारी पर नजर रखें। देश को आर्थिक विकास की
जितनी जरूरत है, उससे कम जरूरत भ्रष्टïचार पर निगरानी की नहीं है बल्कि
ज्यादा है। जिन पर करोड़ों के घोटालों का आरोप है वे अपनी लाखों की घोषणा
करते हैं तो इससे जनता सहमत नहीं होने वाली। करोड़ों रूपये चुनाव में
खर्च कर चुनाव जीतने वाले भी तो चुनाव खर्च चुनाव आयोग को सीमा में ही
दिखाते हैं। पकड़ में तो कोई नहीं आता। कालेधन की एक समानांतर सत्ता से
भी इंकार नहीं किया जा सकता।

वन विभाग के अदने से अधिकारी के यहां ही छापा पड़ता है तो करोड़ों की धन
संपदा का पता चलता है। एक अधिकारी के तो विभिन्न बैंकों के लाकर खोलने
में जब राजस्थान में 10 करोड़ रूपये नगद निकलते हैं तो पता चलता ही है कि
भ्रष्टïचार का क्या आलम है? लेकिन अभी तक तो किसी जांच एजेंसी ने किसी
मंत्री के घर पर छापा मारा और करोड़ों की धन संपदा प्राप्त की ऐसा उदाहरण
नहीं मिलता। फिर पकड़े भी ऐसे लोग जाते हैं जिन्हें भ्रष्टïचार से धन
उगाहना तो आता है लेकिन उसे सही ढंग से ठिकाने लगाना नहीं आता। देश भर
में जनता महंगाई को लेकर हाहाकार कर रही है तो महंगाई से बढ़ी कमायी भी
तो किसी न किसी की जेब में जा रही है लेकिन पकड़ में तो कोई नहीं आ रहा
है। चुनाव के लिए नामांकन फार्म भरते समय ही प्रत्याशी अपनी धनसंपदा की
घोषणा करता है और जीत जाने पर जब वह दोबारा उम्मीदवार बनता है तब उसकी
संपदा में जो इजाफा होता है, उसे तो पूछने वाला कोई नहीं है कि यह धन
संपदा आयी कहां से ?

एक सांसद जब संसद में तर्क देता है कि लाखों लोगों का प्रतिनिधित्व करने
के कारण उस पर आर्थिक बोझ बढ़ता है और वेतन भत्ते से काम नहीं चलता तब
उससे यह कोई नहीं पूछता कि जब वेतन से अधिक खर्च होता है तब भी उसकी
धनसंपदा कैसे बढ़ती जाती है? आय से खर्च अधिक हो तो धन कम होना चाहिए या
बढऩा चाहिए। यदि वह चंदा लेकर भी काम चलाता है तो आय व्यय का ब्यौरा रखता
है क्या और यह आय व्यय का ब्यौरा वह आयकर विभाग को देता है क्या ?
क्योंकि कानूनन तो धन कहीं से भी किसी भी रूप में प्राप्त किया जाए, उसका
विवरण आयकर विभाग को दिया जाना चाहिए । आय में से छूट भी उसी दान दक्षिणा
को मिलती है जो संस्थाएं आयकर से छूट की पात्र होती है। जब सांसद संसद
में कह रहे थे, वेतन वृद्घि की मांग को लेकर तो कह रहे थे शादी विवाह से
लेकर हर कार्यक्रम में उन्हें चंदा देना पड़ता है। अभी गणेश जी बैठे हैं,
फिर दुर्गा जी बैठेंगी तब ये नेता चंदा देते हैं, अपने क्षेत्र की
संस्थाओं को लेकिन कोई पूछने वाला तो नहीं है कि कहां से पैसा आता है और
कैसे खर्च होता है ? आयकर विभाग पूछने लगे तो यही प्रतिनिधि हल्ला
मचाएंगे कि आस्था पर आक्रमण हो रहा है ।

कानूनन तो आयकर विभाग के पास हर किसी के पास कितना धन है, जो आयकर की
सीमा में आता है, उसका रिकार्ड होना चाहिए। यह जिम्मेदारी हर नागरिक की
है कि वह ईमानदारी से आयकर पटाए और अपने आय और व्यय का विवरण आयकर विभाग
को दे लेकिन असल में तो छोटे शिकार ही आयकर के चक्कर में फंसते हैं।
सांसदों का वेतन भत्ता भी सरकार ने बढ़ा दिया है। मंत्रियों को तो हर तरह
की सुविधा सरकार देती ही है। इसके बावजूद गलत तरीके से धन कमाने के अवसर
कम नहीं हैं, उनके पास। अक्सर भ्रष्टïचार के आरोप भी लगते रहते हैं। आय
से अधिक संपत्ति के आरोप भी लगते हैं। यह तो उनकी बात है राजनैतिक द्वेष
का शिकार हो जाते हैं लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि जिन पर आरोप नहीं लगते
वे सभी दूध के धुले हुए हैं। निश्चित रूप से सूचना के अधिकार ने एक
घबराहट तो पैदा कर दी है। जिसके विषय में सूचना के अधिकार के तहत जानकारी
मांगी जाती है, वही घबराने लगता है। जब प्रधानमंत्री कार्यालय अपने
मंत्रियों के विषय में जानकारी देने से कतराने की कोशिश करता है तो बाकी
लोगों के विषय में आसानी से समझा जा सकता है। निश्चित रूप से सरकार ने
सूचना का अधिकार कानून बनाकर जनता को ऐसा अधिकार दिया है जिसकी जितनी भी
तारीफ की जाए कम है। सूचना के अधिकार के तहत जानकारी न देने वाले या समय
पर जानकारी न देने वाले पर जुर्माने का भी प्रावधान किया गया है। इससे अब
अधिकांश मामले जनता के सामने उजागर होने का अवसर उपलब्ध हो गया है। पहले
बहुत सी जानकारी लोकसभा और विधानसभा में देने से इंकार कर दिया जाता है,
यह तर्क देकर कि जनहित में यह उचित नहीं है ।

मुझे याद आता है। मध्यप्रदेश में सुंदरलाल पटवा के मुख्यमंत्री बनने के
पहले कोई विधानसभा में प्रश्र करता था कि सरकार ने किस समाचार पत्र को
कितना विज्ञापन दिया तो सरकार का उत्तर होता था कि जनहित में यह बताना
उचित नहीं है और सदस्य इस तर्क को मानकर चुप रह जाते थे लेकिन 1989 में
मुख्यमंत्री बनने के बाद सुंदरलाल पटवा की सरकार से जब यह प्रश्र पूछा
गया तो सरकार ने सदन को बता दिया कि किस समाचार पत्र को उसने कितना
विज्ञापन दिया। राष्ट्रीय  हित और जनहित में बताने से इंकार के पीछे तो
असली कारण यही होता है कि बता देने से सरकार के कारनामों की पोल खुल जाती
है। जब मंत्री चुनाव लड़ता है तब वह नामांकन पत्र में अपनी और अपने
परिवार की धन संपदा की स्वयं घोषणा करता है। ऐसा न करे तो उसका नामांकन
ही रद्द हो जाए। तब मंत्री बनने के बाद उसकी जानकारी देने में क्या अड़चन
थी ? लेकिन ऐसा हुआ है, यही सत्य है। लेकिन सूचना आयुक्त के कारण जानकारी
देना तो पड़ा। प्रजातंत्र में वैसे भी सब कुछ खुला होना चाहिए। यही तो
उसकी खूबी है।

- विष्णु सिन्हा
11-10-2010

गुरुवार, 9 सितंबर 2010

एक तिहाई आबादी देश की भ्रष्टïचार में लिप्त है तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है ?

भूतपूर्व केंद्रीय सतर्कता आयुक्त प्रत्यूष सिन्हा कहते हैं कि 30
प्रतिशत लोग पूरी तरह से भ्रष्ट हो चुके हैं और 50 प्रतिशत लोग भ्रष्ट
होने की कगार पर है। मात्र 20 प्रतिशत लोग ही पक्के तौर पर ईमानदार हैं।
यह आंकड़े उन्होंने कैसे प्राप्त किए, यह तो वे ही जानें लेकिन उनकी बात
पर विश्वास किया जाए तो देश में कानून व्यवस्था की स्थिति अच्छी नहीं है।
जिस देश में 30 प्रतिशत लोग पक्के तौर पर भ्रष्ट हैं और यह बात और कोई
नहीं पूर्व सतर्कता आयुक्त कह रहा है तब इन भ्रष्ट लोगों को पकडऩे और
सजा दिलाने की जिम्मेदारी जिनकी है, वे क्या कर रहे हैं? 30 प्रतिशत लोग
कम नहीं होते। 30 प्रतिशत का अर्थ होता है कि हर तीसरा व्यक्ति पक्के तौर
पर भ्रष्टï। कम से कम यह वह व्यक्ति तो नहीं है जो गरीबी रेखा के नीचे
जीवन बसर कर रहा है। इसमें भी कुछ लोग हो सकते हैं जो वास्तव में गरीबी
रेखा के नीचे तो नहीं हैं लेकिन शासकीय सुविधाओं का उपयोग करने के लिए
अपने को गरीबी रेखा से नीचे दर्ज करा रखा है। कुछ वास्तव में बोगस राशन
कार्डों के द्वारा गरीब बने हुए हैं तो अधिकांश बोगस कार्ड का लाभ वे
संपन्न लोग उठा रहे हैं जो इस तरह के बोगस राशन कार्ड बनवाने में सक्षम
हैं।

लेकिन इस तरह के भ्रष्टïचार को संरक्षण कौन देता है? राजनीति और
नौकरशाही। अब लोग देखते हैं कि तथाकथित बड़े बड़े सम्मानित लोग
भ्रष्टïचार में लिप्त हैं और उनकी संपत्ति, धन वैभव दिन दूनी रात चौगुनी
गति से बढ़ रहा है तो लगता है सभी को कि यही रास्ता है सुख सुविधा से
जीने का। रोजगार गारंटी योजना तक के धन में भी धांधली होती है। कामनवेल्थ
गेम्स के नाम पर खुलेआम भ्रष्टïचार किया जाता है। भ्रष्टïचार के तो
इतने आयाम हैं कि कोई भी नंगी आंखों से इन्हें देख सकता है। एंटी करप्शन
ब्यूरो, आयकर विभाग जहां भी छापा डालता है, करोड़ों का गोलमाल पकड़ में
आता है। भ्रष्टïचार की तो ऐसी गटर गंगा बहती है कि वे 30 प्रतिशत लोग
कौन हैं, जो पक्के तौर पर ईमानदार हैं। राजनीति तो मानकर चलती है कि जब
तक किसी का अपराध न्यायालय में सिद्घ न हो जाए तब तक वह ईमानदार। इस एक
पतली गली से ही लोग अपराधी होने के बावजूद निकल जाते हैं और शान से सत्ता
के राज सिंहासन पर विराजमान रहते हैं।

आज तो किसी के विषय में कहो कि फलां व्यक्ति ईमानदार हैं तो लोग चौंककर
पूछते हैं कि अच्छा ईमानदार है, आश्चर्य की बात है। काजल की कोठरी में
रहकर भी ईमानदार हों तो है तो आश्चर्य की बात। क्योंकि मन का कोई न कोई
कोना कहता अवश्य है कि बड़े आए ईमानदार। इनकी बेईमानी पकड़ में नहीं आयी
होगी। बहुत होशियार और चतुर चालाक होंगे। नहीं तो धन मिलता हो और कोई
लेने से इंकार करे तो यह चमत्कार से कम नहीं है। भगवान के मंदिर तक के
रखवाले तक तो भ्रष्ट पाए जाते हैं। न्यायालय भी पूरी तरह से भ्रष्टïचार
से मुक्त है, यह कोई मानता नहीं। राजनीति तो गले तक भ्रष्टïचार में डूबी
दिखायी देती है। प्रश्र तो यह भी खड़ा होता है कि जिनकी जिम्मेदारी
भ्रष्टïचारियों को पकडऩे की है कि वे भी कितने ईमानदार हैं। क्योंकि जिस
देश में हर तीसरा आदमी भ्रष्ट है, उस देश की जेलों को तो
भ्रष्टïचारियों से ही भरा होना चाहिए लेकिन इक्का दुक्का सीधे सादे वे
लोग ही जेल की हवा खाते हैं जो भ्रष्टïचार से धन तो प्राप्त कर लेते हैं
लेकिन उसे किस तरह से छुपाया जाए, यह उन्हें समझ में नहीं आता।
क्योंकि अक्लमंद तो धन को ठिकाने लगाना जानते हैं। इनका धन स्विस बैंकों
में जमा हो जाता है। जहां से पता लगाना किसी के बस में नहीं है। कहा जाता
है कि सर्वाधिक कालाधन जो निश्चित रूप से भ्रष्टïचार की ही उपज है,
स्विस बैंकों में जमा है। कहा तो यहां तक जाता है कि सर्वाधिक भारत के
लोगों का ही है। बाबा रामदेव तो कहते हैं कि स्विस बैंक से यह धन
प्राप्त किया जा सके तो देश में गरीबी का नामोनिशान नहीं रहेगा। 51 रूपये
लीटर बिकने वाला पेट्रोल साढ़े सोलह रूपये में ही बेचा जा सकता है। पहले
ईस्ट इंडिया कंपनी भारत से धन लूटकर इंग्लैंड ले गयी। उसके पहले की बात
तो जाने दें लेकिन स्वतंत्र होने के बाद भारत से काला धन इतना स्विस
बैंकों में जमा किया गया है जो एक आम आदमी की कल्पना से भी परे है।
भ्रष्टाचार का आलम देखिए कि माओवादी ही 15 सौ करोड़ रूपये वार्षिक
प्राप्त कर लेते हैं, ऐसा अनुमान है। कांग्रेस के खजाने में भी करीब इतना
ही धन प्रति वर्ष आता है। हमारे देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक
ईमानदार व्यक्ति हैं लेकिन उनके मंत्रिमंडल में संचार मंत्री ऐसे भ्रष्ट
हैं जिन पर 1 लाख करोड़ रूपये के भ्रष्टïचार का आरोप है। बहुमत का गणित
सरकार के लिए ऐसा है कि प्रधानमंत्री चाहकर भी न तो कार्यवाही कर पा रहे
हैं और न ही उन्हें मंत्रिमंडल से हटा पा रहे हैं। आरोप तो यह भी सरकार
पर है कि सीबीआई का उपयोग कर भ्रष्टïचार में फंसे लोगों का समर्थन
जुटाया जाता है। यह कोई कांग्रेस की ही कहानी नहीं है बल्कि कम ज्यादा
सभी का इससे जुड़ाव है। जिस तरह से चुनाव के समय धन लुटाया जाता है और
नियम कायदों को धत्ता बताया जाता है, चुनाव जीतने के लिए, उससे
भ्रष्टïचार और पुख्ता ही होता है।

प्रत्यूष सिन्हा ठीक कहते हैं कि समाज में अब भ्रष्टïचार को निम्र
दृष्टि से नहीं देखा जाता। भ्रष्टïचार के मामले में पकड़े जाने पर भी
सामाजिक प्रतिष्ठï कम नहीं होती। अब यह देखने की प्रथा नहीं है कि किसके
पास धन कहां से आया। धन है तो प्रतिष्ठï है। जब समाज के मापदंड बदल गए
तो भ्रष्टïचार से मुंह काला होने की बात कहां रह गयी। लोकसभा में प्रश्र
पूछने के लिए धन लेने वालों के चेहरे में किसी तरह की शर्म हया नहीं
दिखायी देती। जबकि ऋण न चुका पाने की पीड़ा से किसान आत्महत्या कर लेता
है। ऋण न चुकाने से आत्महत्या का क्या संबंध? उसके लिए संबंध है जो अपनी
जमीन को नीलाम होता नहीं देखना चाहता। इससे उसकी मान प्रतिष्ठï को चोट
लगती है लेकिन आज बड़े बड़े लोग करोड़ों का ऋण बैंकों से लेते हैं। ऋण
चुकाते नहीं और उनकी संपत्ति को बैंक नीलाम करता है तो उन्हें कोई फर्क
नहीं पड़ता। क्योंकि ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो ऋण लेकर नही  पटाते और
वे धनवान होते जाते हैं। यह भी अमीर बनने का एक तरीका है, कुछ लोगों के
लिए। कुछ लोग तो एक ही संपत्ति पर कई जगह से लोन लेते हैं। बैंकों को
चूना लगाना ही जिनका धंधा है। ये सब कुछ जानते समझते हुए करते हैं तो
इनके मन में किसी तरह का अपराध बोध नहीं होता।

20 प्रतिशत वे ही लोग ईमानदार हैं जो अपराध बोध से ग्रसित नहीं होना
चाहते। या कह लें भ्रष्ट लोगों की नजरों में जो कायर हैं। क्योंकि साहसी
तो वे ही लोग हैं जो कानून को धत्ता बताकर सब कुछ करना जायज समझते हैं।
जब एक देखता है कि दूसरा भ्रष्टाचार  कर मालामाल हो रहा है तो वह भी अपनी
ईमानदारी को छोडऩे में ही अक्लमंदी समझता है। यह ऐसा प्रभाव है जिससे
बचना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है। जिनके पास कुछ नहीं था, जब वे
संपन्नता की सीढ़ी भ्रष्टïचार के कारण तेजी से चढ़ते हैं तो सबको सफलता
का मूल मंत्र भ्रष्टïचार ही लगता है। इससे 50 प्रतिशत लोग भ्रष्टïचार
के कगार पर खड़े हो जाते हैं तो आश्चर्य कैसा?

- विष्णु सिन्हा
09-09-2010


शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

शिक्षा का अधिकार कानून कहीं भ्रष्ट व्यवस्था की भेंट न चढ़ जाए

केंद्र सरकार ने शिक्षा का अधिकार कानून लागू किया है। मनमोहन सिंह बता रहे हैं कि कैसे उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। घर से स्कूल बहुत दूर था और पैदल ही स्कूल जाना आना पड़ता था। मिट्टी तेल की लालटेन में पढ़ाई करना पड़ता था और आज वे उसी पढ़ाई के कारण देश के प्रधानमंत्री हैं। सुनने में कितना अच्छा लगता है। कोई भी पढ़ लिख जाए तो देश का प्रधानमंत्री बन सकता है। वास्तव में अशिक्षा के बावजूद देश में पढ़े लिखों की कमी नहीं है। होशियार तो अच्छी जिंदगी और मोटी तनख्वाह के लालच में देश ही छोड़ देते हैं। बाकी देश में ही विभिन्न नौकरियों में खप जाते हैं या शिक्षित बेरोजगार बन जाते हैं। फिर भी सिर्फ नौकरी की ही दृष्टि से शिक्षा के विषय में विचार नहीं किया जा सकता है। पढऩा लिखना और ज्ञान अर्जित करना मनुष्य के जीवन के उद्देश्यों में से प्रमुख उद्देश्य है। इसलिए शिक्षित होना वर्तमान समाज में जीने के लिए अति आवश्यक है।

स्वतंत्रता के 63 वर्ष बाद भी सरकारें सभी की शिक्षा का पर्याप्त इंतजाम नहीं कर सकी। शायद अब केंद्र सरकार शिक्षा के अधिकार के तहत पर्याप्त इंतजाम करने में सफल हो जाए। आशावादी सरकार का होना अच्छा है। क्योंकि सरकार ही अपनी योजना के प्रति आशावादी नहीं होगी तो जनता को किस तरह से शिक्षा के लिए उत्साहित करेगी। देश में आज भ्रष्टïचार की जो संस्कृति पनपी है, उसके कारण किसी भी योजना के प्रति जनता पूर्ण आशावादी नहीं हो पाती। क्योंकि 63 वर्ष में सरकारों ने स्वप्न तो जनता को बहुत दिखाए लेकिन भ्रष्टïचार ने योजनाओं की क्रूर हत्या में अहम भूमिका निभायी। केंद्र सरकार कह रही है कि वह 5 वर्ष में शिक्षा के अधिकार कानून को लागू करने के लिए डेढ़ लाख करोड़ रुपए खर्च करेगी। मतलब 30 हजार करोड़ रुपए प्रति वर्ष। इस खर्च के साथ सरकार हर बच्चे बच्ची को स्कूल में देखना चाहती है। हर आधे किलोमीटर पर स्कूल। 30 बच्चों पर एक शिक्षक। कहा जा रहा है कि 1 करोड़ बच्चे इस कानून के तहत स्कूलों में और आएंगे। अभी ही स्कूल में शिक्षकों की कमी है और 5-5 कक्षाएं एक ही शिक्षक संभालता है।
नए स्कूल में भर्ती होने वाले बच्चों के लिए ही 3 लाख 33 हजार से अधिक शिक्षकों की जरुरत पड़ेगी। या तो शिक्षकों को कम वेतन देंगे या फिर पूरा वेतन देंगे। 5 हजार रुपए भी प्रतिमाह प्रति शिक्षक देंगे तो 60 हजार रुपए प्रत्येक शिक्षक के लिए चाहिए। इसके साथ ही स्कूल भवन चाहिए। कुर्सी टेबल, बैंच न हो तब भी टाट पट्टी चाहिए। पुस्तकें, कापियां, स्टेशनरी चाहिए। मध्यान्ह भोजन के लिए धन चाहिए। आज कितने ही स्कूलों के पास उचित भवन नहीं है। भवन जो है, उनकी हालत चिंताजनक है। शिक्षक पेड़ के नीचे कक्षाएं लगाते हैं। टायलेट की व्यवस्था नहीं है। है भी तो किसी काम की नहीं। फिर भी सरकार की योजना सफल हो सकती है लेकिन उसके लिए अनुशासित, चरित्रवान अधिकारी तो चाहिए। जिनमें भ्रष्टाचार से लडऩे की शक्ति हो। ऐसे लोग कहां से लाएंगे? जो लोग गरीबों का अनाज चुराने में हिचक महसूस नहीं करते, वे क्या ईमानदारी से इस योजना को लागू करेंगे?

जनता से टैक्स के रुप में उगाहा हुआ धन तो सरकार खर्च कर सकती है लेकिन स्वयं राजीव गांधी के बाद राहुल गांधी कहते हैं कि सरकार 1 रुपया भेजती है तो 15 पैसे पहुंचते हैं। सबसे ज्यादा जरुरी भ्रष्टाचार की व्यवस्था को तोडऩे की है। शिक्षा का अधिकार कानून ही नहीं, किसी भी योजना की सफलता का सारा दारोमदार क्रियान्वयन के लिए जिम्मेदार लोगों का है। शिक्षा के निजीकरण का प्रभाव बढऩे के पहले लोग शासकीय स्कूलों में ही पड़ते थे। तब भी 14 वर्ष तक के सभी विद्यार्थियों की शिक्षा नि:शुल्क ही थी। ट्यूशन फीस के रुप में 6रुपए 14 वर्ष की उम्र पूरी करने के बाद ली जाती थी। इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज की फीस ही 20 रुपए प्रति माह थी। आज सारी व्यवस्था बदल गयी। व्यवसायिक कॉलेजों की फीस हजारों रुपयों से लेकर लाखों रुपये में पहुंच गयी। सरकार ने कानून बनाया है कि केपिटेशन फीस लेने वाले महाविद्यालयों को जुर्माना के साथ जेल की भी सजा होगी। अभी देखना है कि इस कानून से यह व्यवस्था बदली या नहीं। क्योंकि जो इस तरह का धन देने में सक्षम हैं वे अपने बच्चों के लिए धन देने से बाज नहीं आएंगे और धन लेने वालों को जब धन मिले तो वे लेने से परहेज क्यों करेंगे?

कानून बनाना आसान काम है लेकिन कानून को लागू करना? कितने प्रकार के इस देश में कानून हैं। आम आदमी उनमें से कितने कानून को समझता है? कानून को समझने के लिए पढ़ा लिखा होना जरुरी है लेकिन पढ़े लिखे लोगों के लिए भी कानून को समझना इतना आसान है, क्या? अभी ही न्यायालय में इतने मामले हैं कि उनका निपटारा होने में वर्षों लगेंगे। न्यायालय मुकदमों के बोझ से दबे हुए हैं। शिक्षा का अधिकार कानून तो बन गया लेकिन कानून की अवहेलना न होने पर आखिरी रास्ता तो न्यायालय ही होगा और कितने हैं जो न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकेंगे। उसके लिए भी जेब में धन होना चाहिए और न्याय प्राप्त के लिए इंतजार करने का धैर्य। कल ही मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के समक्ष कुछ लोगों ने उपस्थित होकर कहा कि 25 वर्ष पूर्व उनकी जमीन सरकार ने ले ली लेकिन आज तक मुआवजा नहीं मिला। जब सरकार जमीन ले और मुआवजा न दे तब फिर किस से न्याय की उम्मीद करें?

निजी शिक्षा संस्थाओं ने जिन्हें पब्लिक स्कूल कहा जाता है, शिक्षा का अधिकार कानून के प्रावधान का विरोध करना प्रारंभ कर दिया है। प्रावधान यह है कि 25 प्रतिशत सीटें पहली से गरीब बच्चों के लिए आरक्षित रहेगी और उन्हें नि:शुल्क शिक्षा देना होगा। पहली क्या नर्सरी में ही दो तीन वर्ष तक बच्चे को पढ़ाया जाता है तब वह पहली में आता है। कितने ही बड़े नामी गिरामी स्कूलों की नर्सरी की ही फीस 25 हजार रुपए से प्रारंभ होकर वार्षिक लाखों रुपए है। वे किस तरह से अपनी 25 प्रतिशत आय छोड़ सकते हैं। फिर कितने ही स्कूल है जहां मनमानी फीस के बावजूद बच्चों को एडमिशन नहीं मिलता। कई तरह की सिफारिशें लगायी जाती हैं। वे सरकार के आदेश को कैसे स्वीकार कर सकते हैं? उनका कहना स्पष्ट है कि वे 25 प्रतिशत लोगों को नि:शुल्क शिक्षा देंगे तो बाकी 75 प्रतिशत पर इनके खर्चे का भार डालना पड़ेगा या फिर शिक्षा के स्तर में गिरावट होगी। महंगे शिक्षकों के बदले सस्ते शिक्षक रखना पड़ेंगे। सुविधाओं में कटौती करनी पड़ेगी। वे सरकार के आदेश के विरुद्ध सड़क की लड़ाई लडऩे की बात कह रहे हैं तो न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाएंगे। उनका यह भी स्पष्ट कहना है कि वे सरकार से जब कोई सुविधा लेते नहीं तब सरकार का इस तरह से उनके मामले में हस्तक्षेप अनुचित है। स्थिति स्पष्ट है कि सरकार निजी शिक्षा संस्थाओं में शिक्षा के अधिकार कानून को लागू इतनी आसानी से नहीं कर पाएगी। वे तो स्कूल बंद करने की धमकी तक दे रहे हैं। कठिन डगर है पनघट की लेकिन सरकार को शुभकामनाएं तो दी ही जा सकती है।

- विष्णु सिन्हा

दिनांक 02.04.2010