यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं
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गुरुवार, 27 जनवरी 2011

मनमोहन इस्तीफा दें या न दें लेकिन राजा का भ्रष्टïचार कांग्रेस के लिए भारी नुकसानप्रद साबित होगा

कहा जा रहा है कि मनमोहन सिंह इस्तीफा नहीं देंगे। लोग उम्मीद ही क्यों
कर रहे हैं कि मनमोहन सिंह इस्तीफा दे देंगे? लाल बहादुर शास्त्री अकेले
ऐसे राजनेता थे जिन्होंने रेल दुर्घटना पर रेल मंत्री का पद छोड़ दिया
था। अब तो रोज दुर्घटनाएं होती हैं। कोई रेल मंत्री इस्तीफा नहीं देता।
नैतिकता और आदर्श की बातें अब छोटों के लिए भले ही आवश्यक हों लेकिन
उच्चतम पद पर बैठे लोग इस तरह की बातों पर विश्वास नहीं करते। महाधिवक्ता
कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री की चुप्पी के विषय में उच्चतम न्यायालय का
प्रश्र प्रधानमंत्री के लिए अपमानजनक नहीं हैं। अपमानजनक तो अब कुछ भी
नहीं रह गया है। लोगों को मुफत में अनाज सड़ाने के बदले बांटने का उच्चतम
न्यायालय का आदेश भी कहां शर्मिंदगी पैदा करता है बल्कि उच्चतम न्यायालय
के निर्देश को मानने से इंकार कर न्यायालय के औचित्य पर ही प्रश्रचिन्ह
लगाया जाता है।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। इस बात को सारी दुनिया
मानती है लेकिन एक व्यक्ति बिना जनता से जनादेश प्राप्त किए संवैधानिक
प्रावधानों के तहत देश का सर्वोच्च पद सुशेाभित कर सकता है, यह भी भारतीय
प्रजातंत्र की ही देन है। मंत्रिपरिषद का एक मंत्री प्रधानमंत्री के आदेश
की भी उपेक्षा कर अरबों के भ्रष्टïाचार को प्रोत्साहित करता है और
प्रधानमंत्री टुकुर टुकुर देखते रहने के सिवाय कुछ कर नहीं सकते। इससे
बड़ी विडंबना क्या होगी? मंत्री प्रधानमंत्री के कहने से इस्तीफा भी देने
के लिए तैयार नहीं होता और प्रधानमंत्री उसे हटा भी नहीं सकते, यह बडी़
से बड़ी विडंबना है। न्यायालय पूछने के लिए बाध्य होता है कि मुकदमा
चलाने की अनुमति 16 माह तक क्यों नहीं दी गयी तो इससे सरकार की नीयत पर
ही संदेह खड़ा होता है। स्पष्टï प्रथम दृष्टिï में तो यही दिखायी देता है
कि प्रधानमंत्री अपने मंत्री को संरक्षण दे रहे हैं।
भ्रष्टïाचार के मामले में न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जाता है लेकिन
प्रधानमंत्री के कान पर जूं भी नहीं रेंगती। जब कैग की रिपोर्ट ही इस
संबंध में आ जाती है कि करीब 1 लाख 76 हजार करोड़ का नुकसान सरकारी खजाने
को पहुंचाया गया है और विपक्ष सांसद में हंगामा करता है तब भी मंत्री
पूरी बेशर्मी से कहता हैं कि मैं इस्तीफा नहीं दूंगा। प्र्रधानमंत्री
मनमोहन सिंह 79 वर्ष के हो गये। वे कहते हैं कि अवकाश ग्रहण करने की उनकी
इच्छा नहीं है तो युवा मंत्री कैसे सोच सकता है कि वह राजपाठ का त्याग कर
दे। जब अशोक चव्हाण से आदर्श घोटाले के नाम पर इस्तीफा ले लिया जाता है
और निर्णय सोनिया गांधी करती हैं तब मनमोहन सिंह भी अशोक चव्हाण की तरह
अपना इस्तीफा सोनिया गांधी को ही देने से क्यों हिचक रहे हैं? सोनिया
गांधी स्वीकार करें या न करें लेकिन पहल तो उन्हें करना ही चाहिए।
खुद का ईमानदार होना ही पर्याप्त नहीं होता। वे सामूहिक रूप से अपने
मंत्रियों के कामों के लिए भी जिम्मेदार हैं। फिर यह मामला तो सीधा और
साफ है। सब कुछ जानते बुझते हुए भी सिर्फ सरकार बनी रहे और वे
प्रधानमंत्री बने रहें, इसलिए उन्होंने राजा को मंत्रिमंडल से बर्खास्त
करने की हिम्मत नहीं दिखायी। यह उनकी कमजोरी का ही परिचायक है। सब कुछ
जानते समझते हुए इतने बड़े भ्रष्टïाचार को रोकने में असफल रहना,
प्रधानमंत्री की स्वयं की असफलता है। प्रधानमंत्री की कुर्सी पर जमे रहने
के लिए वे हर तरह का समझौता करने के लिए तैयार हैं। अर्जुनसिंह ने उनके
मंत्रिमंडल में रहते हुए जब राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद के लिए योग्य
करार दिया तो मनमोहन सिंह ऐसे नाराज हुए कि दूसरी बार सरकार बनाते समय
अपने मंत्रिमंडल में सम्मिलित करने के लिए तैयार नहीं हुए। उनके स्थान पर
कपिल सिब्बल को मानव संसाधन मंत्री बनाया और राजा के इस्तीफा देने पर
संचार मंत्रालय का कार्यभार भी सिब्बल को ही सौंप दिया।
वे महान अर्थशास्त्री हैं लेकिन इतने ही बड़े इंसान हैं, यह तो साबित
नहीं होता। नरसिंह राव के मंत्रिमंडल में वित्तमंत्री बनकर उन्होंने
राजनीति में प्रवेश किया था। नरसिंहराव ऐसे कांग्रेसी प्रधानमंत्री हुए
जिन पर तरह तरह के आरोप लगे। बाबरी मस्जिद विध्वंस तक में सहयोगी होने का
आरोप उन पर लगा। सांसदों की खरीद फरोख्त का आरोप लगा। जब हवाला का आरोप
उनके मंत्रियों पर लगा तो उन्होंने मंत्रियों से इस्तीफा ले लिया लेकिन
खुद पर लगे आरोपों के कारण इस्तीफा नहीं दिया। मनमेाहन सिंह तो अपने
मंत्री से भी इस्तीफा नहीं ले सके। मंत्री ने इस्तीफा भी दिया तो अपनी
पार्टी के नेता के कहने पर दिया। नरसिंहराव को भी विद्वान व्यक्ति माना
जाता था और मनमोहन सिंह को भी विद्वान माना जाता है। उनकी आर्थिक विद्वता
के कारण ही नरसिंहराव ने उन्हें वित्त मंत्री बनाया था। नरसिंहराव की
सरकार चले जाने के बाद अपनी सज्जनता से मनमोहन सिंह ने सोनिया गांधी का
विश्वास अर्जित किया। मनमोहन सिंह कांग्रेस के नेता ऐसे रहे जिनका कभी
कोई गुट नहीं रहा। ठीक वैसे ही जैसे नरसिंहराव का भी कोई गुट नहीं था।
कांग्रेस के आलाकमानों की दृष्टिï में ये ऐसे नेता रहे जिन्होंने
हार्मलेस होने की छवि अपनी बनायी। आलाकमान का विश्वास जीतने का यह सौ
फीसदी आजमाया हुआ नुस्खा है। जब कोई गुट ही नहीं है। कोई अपना आदमी नहीं।
आलाकमान के प्रति वफादारी ही एकमात्र सिद्घांत तो विश्वसनीयता का इससे
बड़ा तरीका और क्या होगा? महाराष्टï्र के नवनियुक्त मुख्यमंत्री
पृथ्वीराज चव्हाण भी इसी छवि के व्यक्ति हैं और महाराष्टï्र में सर्वोच्च
पद के हकदार बन गए। आलाकमान के नाम की माला जपी तो एक दिन बरदान मिलता ही
है। ऐसा ही वरदान छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी को भी मिला था। पद में आने के
बाद फिर अपने लोग पैदा हो ही जाते हैं और पद बचाने के लिए हर तरह के
कृत्य जायज लगने लगते हैं।
जनसेवा का राग कितना भी राजनेता गाएं लेकिन असली उद्देश्य तो सत्ता होती
है। एक बार सत्ता की आसंदी पर बैठने का अवसर मिल जाए तो आसंदी से ऐसे
चिपकते हैं कि उठने का नाम ही नहीं लेते। जमे रहने के लिए हर तरह का
कृत्य जायज लगता है। नाजायज भी लगे तो भी बर्दाश्त किया जाता है। पद पर
पदारूढ़ होना इतना सम्मानजनक लगता है कि बड़े से बड़ा अपमान भी कोई बहुत
मायने नहीं रखता। नहीं तो क्या कारण है कि जो एक ईमानदार व्यक्ति भ्रष्टï
व्यक्ति को अपने मंत्रिमंडल में बर्दाश्त करता है। वह कैग को ही उपदेश
देता है कि भूल से किए गए काम और जान बूझकर किए काम में उसे भेद करना
चाहिए। 150 वर्ष हो गए, कैग को अस्तित्व में आए। कैग की रिपोर्ट नहीं आती
तो राजा आज भी मंत्री पद पर जमे रहते। क्योंकि कैग की रिपोर्ट ने झूठ की
पोल खोल दी और विपक्ष इसे गले से नीचे उतारने में स्वयं को सक्षम नहीं
महसूस कर सका। उसके पास इसके सिवाय कोई चारा नहंी था कि वह राजा के
इस्तीफे के लिए सरकार को बाध्य करे। उच्चतम न्यायालय के निर्देश के बाद
तो विपक्ष का हक बनता है कि वह प्रधानमंत्री से भी इस्तीफा मांगे। सोनिया
गांधी को बाध्य करे कि वे मनमेाहन सिंह का इस्तीफा ले लें। या फिर
कांग्रेस पार्टी राजा के पाप के बोझ को ढोए। बोफोर्स ने कांग्रेस की क्या
हालत की थी, यह आलाकमान सहित सबको अच्छी तरह से पता है। वह तो सौ करोड़
से भी कम का मामला था लेकिन यह मामला तो 1 लाख 76 हजार करोड़ का है और यह
चुनावी मुद्दा बना तो कांग्रेस की लुटिया डूबा सकता है।
- विष्णु सिन्हा
18-11-2010


उच्चतम न्यायालय को जवाब देकर मनमोहन सिंह सिद्ध करें कि वे कमजोर प्रधानमंत्री नहीं हैं

उच्चतम न्यायालय प्रधानमंत्री से पूछ रहा है कि राजा के खिलाफ मुकदमा
चलाने के मामले पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई? उच्चतम न्यायालय  ने 3 माह
का समय दिया था लेकिन 16 माह बीत जाने के बाद भी निर्णय नहीं हुआ। उच्चतम
न्यायालय अपनी कार्रवाई आगे बढ़ाने के लिए भले ही सरकार का उत्तर चाहता
है लेकिन क्यों कार्रवाई नहीं की गयी, यह बात तो सभी को पता है। सरकार को
बनाए रखने के लिए बहुमत की आवश्यकता ने ही प्रधानमंत्री को रोके रखा।
राजा मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल के ऐसे मंत्री थे जो प्रधानमंत्री की बात भी
नहीं मानते थे। करुणानिधि की जिद थी कि राजा इस्तीफा नहीं देंगे और उनसे
इस्तीफा लिया गया या उन्हें बर्खास्त किया गया तो वे सरकार से समर्थन
वापस ले लेंगे। करुणानिधि की इस बंदर घुड़की से ही सरकार दबी हुई थी
लेकिन जब करुणानिधि ने देख लिया कि राजा को इस्तीफा देना ही पड़ेगा और
सरकार अब राजा को बचा नहीं सकती तो उन्होंने इस्तीफा देने का निर्देश
राजा को दिया।
मनमोहन सिंह की कमजोरी यह थी कि वे मुकदमा चलाने की अनुमति देते तो
उन्हें राजा से इस्तीफा लेना पड़ता। इस्तीफा न देने पर बर्खास्त करना
पड़ता। संसद में विपक्ष के हंगामे के बाद भी राजा इस्तीफा देने के पहले
स्वयं को न केवल पाक साफ बताते रहे बल्कि इस्तीफे को सिरे से नकारते रहे।
फिर क्यों नहीं नकारते, जब उन्हें अपने दल के सुप्रीमो करुणानिधि का
आशीर्वाद मिला हुआ था। विपक्ष दृढ़ संकल्प से राजा को हटाने की और
संयुक्त संसदीय दल से जांच की मांग पर अड़ा रहा और उसने संसद नहीं चलने
दिया तब कहीं जाकर करुणानिधि राजा के इस्तीफे के लिए तैयार हुए। यह तो
ऊपर-ऊपर की कहानी है और इससे सभी परिचित हैं लेकिन अंदर की कहानी भी
स्पष्टï है। राजा का इस्तीफा  करुणानिधि को भारी पडऩा था और पड़  रहा है।
देश भर में तो उनकी प्रतिष्ठा धूल धूसरित हुई ही। तमिलनाडु में भी उनके
लिए आसन्न विधानसभा चुनाव भारी पडऩे वाला हैं। 1 लाख 76 हजार रुपए का
भ्रष्टाचार उनकी मिट्टी पलीद करने के लिए पर्याप्त हैं।
क्योंकि यह बात कोई व्यक्ति या राजनैतिक पार्टी नहीं कर रही है बल्कि कैग
की रिपोर्ट कह रही है। जिसे संसद के पटल पर रख दिया गया है। प्रधानमंत्री
मनमोहन सिंह लोकसभा में इस संबंध में बयान देने वाले थे लेकिन फिर अचानक
राजा के इस्तीफा देने के बाद उन्होंने बयान नहीं दिया। निश्चित रुप से
मनमोहन सिंह एक ईमानदार व्यक्ति हैं लेकिन राजा के कृत्य ने उनकी
ईमानदारी को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। सब कुछ जानते हुए कार्रवाई न
करना उन्हें न केवल नैतिक रुप से जिम्मेदार बनाता है बल्कि संवैधानिक रुप
से भी उनकी ही जिम्मेदारी थी कि वे राजा के कृत्य के लिए उसे न्यायालय के
हवाले करते। भारत में 120 करोड़ जनता के धन के साथ ऐसा लूटमार एक
प्रधानमंत्री कैसे देख और बर्दाश्त कर सकता है?  इस मामले में निश्चय ही
मनमोहन सिंह ने सोनिया गांधी से भी निर्देश मांगा होगा। क्योंकि वास्तव
में वे ऐसे प्रधानमंत्री नहीं जो सब कुछ का निर्णय स्वयं लें। उनकी लगाम
सोनिया गांधी के हाथ में है और इस बात से तो कोई भी इंकार नहीं कर सकता।
आजकल समाचार पत्रों में सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के बीच न पटने के भी
समाचार प्रकाशित हो रहे हैं। इससे यह भी संदेश पैदा होता है कि कहीं
मनमोहन सिंह की छबि खराब करने का प्रयास तो नहीं किया जा रहा है। जिससे
उन्हें प्रधानमंत्री के पद से हटाया जा सके। यदि यह सच है तो एक ईमानदार
व्यक्ति के साथ यह कोई अच्छी राजनैतिक चाल  नहीं है। मनमोहन सिंह को जब
चाहें पूरी भलमनसाहत के साथ हटाया जा सकता है लेकिन शायद मन में डर हो कि
भले आदमी को बिना किसी वजह के पद से हटाना राजनैतिक रुप से नुकसानप्रद न
साबित हो। मनमोहन सिंह का अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ता कद किसी न
किसी को तो बौनेपन का आभास करा रहा है। दुनिया की ताकतवर हस्ती जब मनमोहन
सिंह की तारीफ में कसीदे काढ़े तो किसी न किसी के हृदय में टीस उठती ही
होगी।
गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं। गठबंधन में कौन सा दल रहे और कौन सा
नहीं, यह तय करना मनमोहन सिंह का नहीं सोनिया गांधी का काम है। फिर
गठबंधन के किस दल को मंत्रिमंडल में कितना स्थान और कौन सा विभाग मिले,
यह तय करना भी मनमोहन सिंह के हाथ में नहीं है। राजनैतिक रुप से कभी न
कभी मनमोहन सिंह ने कोशिश की और न ही सोनियागांधी ने अवसर दिया कि मनमोहन
सिंह देश की जनता के बीच एक राजनेेता की तरह प्रतिष्ठिïत हों। चुनाव
प्रचार में भी उनकी भूमिका एक टोकन की तरह रही। मनमोहन सिंह ने इस
व्यवस्था को लेकर कभी नाराजगी भी प्रगट नहीं की। वे अपनी भूमिका को अच्छी
तरह से जानते और समझते हैं। वे यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि वे
सोनिया गांधी के चुने हुए प्रधानमंत्री हैं। जब तक सोनिया गांधी चाहेंगी
वे पद पर बने रहेंगे। इसके बावजूद उन्होंने पिछले दिनों कहा कि अभी वे
अवकाश ग्रहण नहीं करना चाहते। उनकी स्थिति का आभास तो इसी बात से हो जाता
है कि उनकी ही मंत्रिपरिषद का सदस्य उनकी बात मानने के लिए तैयार नहीं था
और उसके बावजूद वे उसे अपने मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता नहीं दिखा सकते
थे। इस कमजोरी का असली कारण तो स्पष्टï है। बिना आलाकमान के निर्णय के वे
कुछ कर नहीं सकते। तमाम कारणों के बावजूद मनमोहन सिंह अपनी स्थिति के लिए
किसी दूसरे पर दोषारोपण कर बच नहीं सकते। संवैधानिक रुप से वे
प्रधानमंत्री की हैसियत से अपने मंत्री के कार्यों के प्रति जवाबदार है।
वे सुप्रीम कोर्ट में अपनी दयनीय स्थिति का बखान कर बच नहीं सकते कि उनका
मंत्री उनका कहा नहीं सुनता तो वे  चुप्पी लगाते हैं। अर्थशास्त्र के इस
प्रकांड पंडित को प्रधानमंत्री बने रहने की ही ऐसी क्या मजबूरी है कि
इतना बड़ा आर्थिक घोटाला होते हुए वे न तो रोक सके और न ही उसे
मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर सके। वे यदि राजा को हटाने में अक्षम थे तो वे
स्वयं प्रधानमंत्री का पद छोड़ सकते थे। उनकी जिम्मेदारी प्रधानमंत्री के
रुप में सोनिया गांधी से ज्यादा राष्टï्र के प्रति थी और वे इस मामले में
अक्षम सिद्ध हुए, इसके लिए अब प्रमाण की जरुरत नहीं है।
लोकसभा चुनाव के समय जब लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि मनमोहन सिंह एक
कमजोर प्रधानमंत्री हैं तब तो मनमोहन सिंह ने बड़े गुस्से से कहा था कि
वे कमजोर प्रधानमंत्री नहीं है लेकिन राजा के मामले में उच्चतम न्यायालय
के निर्देश का पालन न कर एक भ्रष्टï व्यक्ति को इतने दिनों तक अपने
मंत्रिमंडल में रख कर तो उन्होंने यह संदेश दिया है कि वे कमजोर
प्रधानमंत्री हैं। यह दूसरी बात है कि देश को आर्थिक रुप से सुदृढ़ करने
के मामले में उनकी सेवाएं अद्वितीय हैं लेकिन 1 लाख 76 हजार करोड़ रुपए
का नुकसान अपनी आंखों के सामने होता देखना, उनकी योग्यता पर भी
प्रश्रचिन्ह ही लगाता है। अब दें जवाब उच्चतम न्यायालय को पूरी ईमानदारी
से कि क्यों उन्होने मुकदमा चलाने की अनुमति 16 माह तक नहीं दी?

- विष्णु सिन्हा
दिनांक : 17.11.2010
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सोमवार, 13 सितंबर 2010

राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनने के लिए तैयार नहीं हुए तब भी सोनिया गांधी के पास वफादारों की कमी नहीं है

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भले ही कहें कि उनकी अभी अवकाश ग्रहण करने की
इच्छा नहीं हैं लेकिन यह बात कहने की उन्हें जरुरत ही क्यों पड़ी? यह बात
तो साफ है कि पिछले कार्यकाल की तरह वर्तमान कार्यकाल उनकी लोकप्रियता
में इजाफा नहीं कर रहा है बल्कि निरंतर उनकी लोकप्रियता में ह्राश ही हो
रहा है। वैसे भी सरकार पर होने वाले राजनैतिक आक्रमणों के लिए ढाल का काम
प्रणव मुखर्जी ही करते हैं। समस्या कैसी भी हो प्रणव मुखर्जी का जहां
हस्तक्षेप नहीं, वहां समस्या गंभीर है। काश्मीर के मामले में प्रधानमंत्री
कुछ कर नहीं पा रहे हैं। यहां तक कि पीडीपी की नेता महबूबा सईद ने तो
उनके आमंत्रण को भी अस्वीकार कर दिया था। पिछले 2 माह से अधिक समय हो गया
लेकिन काश्मीर कफ्र्यू के साये से मुक्त नहीं हो पा रहा है। ईद के दिन भी
हिंसक प्रदर्शन जारी रहा और एक थाने को निशाना बनाया गया। फौज के
अधिकारों को कम करने की नीति में भी मतभेद कम नहीं है और इसके बाद भी
समस्या शांत नहीं हुई तब क्या करेंगे? काश्मीर पूरी तरह से बेलगाम हो गया
है और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से राजनैतिक समाधान की जो उम्मीद उमर
फारुख कर रहे हैं, उस मामले में मनमोहन सिंह कुछ कर नहीं पा रहे हैं।
ऐसे में प्रधानमंत्री की यह टिप्पणी कि जवाहर लाल नेहरु के समय भी
मंत्रिमंडल में पूरा सामंजस्य नहीं था, कांग्रेसियों को पूरी तरह से
नापसंद आने वाला वक्तव्य है। जवाहर लाल नेहरु की सरकार से तुलना तो कोई
भी कांग्रेसी सरकार नहीं कर सकती। जवाहर लाल नेहरु क्या इंदिरा गांधी और
राजीव गांधी की सरकार से भी तुलना मनमोहन सिंह अपनी सरकार की करेंगे तो
कांग्रेसियों को नागवार ही लगेगा। आजकल मनमोहन सिंह के मंत्रियों पर जिस
तरह से दिग्विजय सिंह निशाना साध रहे हैं और फिर भी आलाकमान उनसे कुछ
नहीं कह रहा है तो इसका अर्थ तो कांग्रेसी यही लगा रहे हैं कि दिग्विजय
वक्तव्य आलाकमान के इशारे पर ही दिए जा रहे है। पहले गृहमंत्री पी.
चिदंबरम और अब कपिल सिब्बल की नीतियों का विरोध कर दिग्विजय सिंह ने एक
तरह से निशाना तो मनमोहन सिंह पर ही साधा है। सोनिया गांधी पुन: कांग्रेस
की अध्यक्ष चुन ली गयी है। मतलब साफ है कि अब सोनिया गांधी का मनमोहन
सिंह पर पुराना विश्वास तो रहा नहीं। होता तो किसी कांग्रेसी की क्या
मजाल थी कि वह कांग्रेसी मंत्रियों की आलोचना करता।

यदि मनमोहन सिंह समझते हैं कि नरसिंह राव की तरह वे भी पद पर बने रहेंगे,
सोनिया गांधी की उपेक्षा कर तो उन्हें शीघ्र ही सब कुछ समझ में आ जाएगा।
नरसिंह राव तो प्रधानमंत्री के साथ कांग्रेस के अध्यक्ष भी थे। सोनिया
गांधी तो राजनीति से बाहर खड़ी थी। अब सोनिया गांधी कांग्रेस की राजनीति
का केंद्र बिंदु हैं। राहुल गांधी भी राजनीति में हैं। वे बिहार चुनाव
में व्यस्त हैं। चुनाव प्रचार के लिए सोनिया गांधी भी बिहार जाएंगी लेकिन
मनमोहन सिंह भी चुनाव प्रचार के लिए जाएंगे या नहीं, यह अभी तय नहीं है।
वैसे भी जो जनता से चुन कर आने का माद्दा नहीं रखता, उसका चुनाव में क्या
महत्व है? चुनाव जितवाने का पूरा जिम्मा तो सोनिया गांधी और राहुल गांधी
पर है और ये दोनों स्वयं चुनाव लडऩे में भी पीछे नहीं हैं। इन्हें स्वयं
के चुनाव हार जाने का दूर-दूर तक तो कोई डर नहीं है। इसलिए कांग्रेस की
असली ताकत तो सोनिया गांधी और राहुल गांधी ही है। मनमोहन सिंह तो इनकी
ताकत के कारण भारत के प्रधानमंत्री हैं।

बिहार चुनाव में क्या निर्णय करता है, यह देखने वाली बात है। कांग्रेस
पूरी तरह से लालू यादव के सहारे बिहार में चुनाव लड़ती रही है लेकिन
लोकसभा चुनाव से कांग्रेस बिना किसी गठबंधन के अकेले चुनाव लड़ रही है।
कांग्रेस से गठबंधन के बिना चुनाव लड़कर लालू प्रसाद यादव और राम विलास
पासवान देख चुके और लालू प्रसाद तो किसी तरह से चुनाव जीत भी गए लेकिन
राम विलास पासवान चुनाव तक नहीं जीत सके। जबकि सर्वाधिक मतों से चुनाव
जीतने का रिकार्ड उन्हीं के नाम पर है। लालू प्रसाद यादव और राम विलास
पासवान मिल कर चुनाव लड़ रहे हैं। लालू प्रसाद यादव को मुख्यमंत्री के
रुप में प्रोजेक्ट किया गया है लेकिन इसका लाभ इस गठबंधन को होगा या
नीतीश कुमार कांग्रेस के अलग से लडऩे का लाभ उठा ले जाएंगे, यह फैसला
बहुत कुछ तय कर देगा। कांग्रेस के पास बिहार में खोने के लिए कुछ नहीं है
लेकिन संपूर्ण बिहार में अपने प्रत्याशी खड़ा कर कांग्रेस जो मृतप्राय हो
रही थी, नई संजीवनी अवश्य प्राप्त कर लेगी। कांग्रेस से गठबंधन तोड़ कर
लालू यादव और राम विलास पासवान ही कहीं के नहीं रहे। केंद्रीय मंत्रिमंडल
में ही स्थान देने की जरुरत नहीं समझी गई। इस बार यदि लालू पासवान की
जोड़ी चुनाव में सफल नहीं हुई तो इनके पास कांग्रेस के समक्ष घुटने टेकने
के सिवाय कोई चारा नहीं रहेगा। कांग्रेस के तो हित में है कि लालू पासवान
को पूर्ण बहुमत प्राप्त हो और सरकार बनाने का अवसर मिले भी तो बिना
कांग्रेस के समर्थन के न मिले और तब कांग्रेस का जो अपमान पिछले चुनाव
में लोकसभा में इन दोनों ने किया था, उसका बदला निकाला जा सके।
मुलायम सिंह आज भी सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने के मामले में
रुकावट बनने के इतिहास को याद अवश्य करते हैं। लोकसभा में विश्वास मत
प्राप्त करने के लिए उनका उपयोग तो कांग्रेस कर लेती है लेकिन सत्ता का
लाभ देने का अवसर आता है तो हाथ झाड़ लेती है। जब तक मतलब है तब तक
कांग्रेस पोटरना अच्छी तरह से जानती है। कांग्रेसी राजनीति के मंझे हुए
खिलाड़ी हैं। मनमोहन सिंह तो राजनीति का अक्षर ज्ञान भी नहीं रखते।
विपरीत परिस्थितियों में भी लड़ते झगड़ते दिखने वाले कांग्रेसी सत्ता के
लिए ऐसा गोलबंद होते हैं कि देखते ही बनता है और यही उनकी कामयाबी का राज
भी है। मनमोहन सिंह के भी जाने का वक्त हो गया है। दिन तारीख समय तो
सोनिया गांधी ही तय करेंगी। वैसे भी मनमोहन सिंह की जब लोकप्रियता ही
जनमानस में नहीं है और कांग्रेस को उनकी अलोकप्रिय नीतियों का दंश झेलना
पड़ रहा है तो उन्हें प्रधानमंत्री बनाए रखने का लाभ क्या?

बिहार चुनाव के बाद राहुल गांधी पर पूरा दबाव पड़ेगा कि वे प्रधानमंत्री
की कुर्सी पर कांग्रेस के हित में बैठने के लिए तैयार हों। बिहार में
कांग्रेस के पक्ष में जरा सा भी चमत्कारी प्रभाव पड़ा तो यह दबाव और
बढ़ेगा। महंगाई ने कांग्रेस की स्थिति को खराब किया हैं। यह बात आइने की
तरह साफ है। अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री जब इस स्थिति से देश को उबार नहीं
सकते तो उनके पद पर बने रहने का औचित्य क्या है? कांग्रेस को फिर से
चुनाव के लिए तैयार होना है और यह मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते संभव
नहीं। राहुल बनें प्रधानमंत्री तो ठीक। नहीं तो किसी अन्य को मौका दिया
जाना चाहिए। यह सोच कांग्रेस के अंदर स्पष्ट है। कुछ लोग स्वप्न भी संजो
रहे हैं कि मनमोहन सिंह हटें और राहुल गांधी तैयार नहीं हुए तो उनको अवसर
मिल सकता है लेकिन ऐसी स्थिति होने पर जब किसी वफादार की तलाश की जाएगी
तो कांग्रेस में कमी नहीं है।

- विष्णु सिन्हा
दिनांक : 13.10.2010

रविवार, 12 सितंबर 2010

सूचना के अधिकार के कारण ही प्रधानमंत्री कार्यालय को मंत्रियों की धनसंपदा की जानकारी देना पड़ा

सूचना के अधिकार कानून के तहत जब सुभाषचंद्र अग्रवाल ने केंद्रीय
मंत्रियों की संपत्ति का ब्यौरा मांगा तब प्रधानमंत्री कार्यालय ने
ब्यौरा देने से इंकार कर दिया था लेकिन केंद्रीय सूचना आयोग में अपील के
बाद ब्यौरा देने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय को तैयार होना पड़ा। कोन
मंत्री कितनी संपदा का मालिक है, यह तो जानने का अधिकार भारतीय नागरिकों
को होना ही चाहिए। जनता को पता तो चले कि कौन सा मंत्री कितना अमीर है और
कौन कितना गरीब। जिस लोकसभा में 200 से अधिक सदस्य करोड़पति हैं और फिर
भी वे वेतन, भत्तों में वृद्घि की मांग करते हैं, उनमें से ही तो कुछ
मंत्री भी हैं। मंत्रियों की संपत्ति की घोषणा से यह तो पता चल गया कि
किसके पास कितनी संपत्ति है लेकिन वास्तव में इनके पास इतनी ही संपत्ति
है, इसकी जांच भी होना चाहिए। एक विभाग तो कायदे से इसी के लिए होना
चाहिए जो विधायकों, सांसदों, मंत्रियों, सदनों के अध्यक्षों की आर्थिक
स्थिति की पूरी तरह से हमेशा जांच करे कि पद में आने के पहले इनके पास
कितनी धन संपदा थी और पद पर रहते हुए इनकी धन संपदा किस तरह से बढ़ रही
है या घट रही है।

इन जनप्रतिनिधियों के साथ नौकरशाहों की  भी इसी तरह से निगरानी की
व्यवस्था होना चाहिए। यदि जनप्रतिनिधियों और नौकरशाह ईमानदारी से काम
करें तो देश में व्याप्त भ्रष्टïचार को समाप्त भले ही न किया जा सके
लेकिन कम से कम तो किया जा सकता है। मनमोहन सिंह एक ईमानदार प्रधानमंत्री
माने जाते हैं। ईमानदारी का तकाजा है कि वे स्वयं तो ईमानदार रहें ही,
साथ अपने सहयोगियों की भी ईमानदारी पर नजर रखें। देश को आर्थिक विकास की
जितनी जरूरत है, उससे कम जरूरत भ्रष्टïचार पर निगरानी की नहीं है बल्कि
ज्यादा है। जिन पर करोड़ों के घोटालों का आरोप है वे अपनी लाखों की घोषणा
करते हैं तो इससे जनता सहमत नहीं होने वाली। करोड़ों रूपये चुनाव में
खर्च कर चुनाव जीतने वाले भी तो चुनाव खर्च चुनाव आयोग को सीमा में ही
दिखाते हैं। पकड़ में तो कोई नहीं आता। कालेधन की एक समानांतर सत्ता से
भी इंकार नहीं किया जा सकता।

वन विभाग के अदने से अधिकारी के यहां ही छापा पड़ता है तो करोड़ों की धन
संपदा का पता चलता है। एक अधिकारी के तो विभिन्न बैंकों के लाकर खोलने
में जब राजस्थान में 10 करोड़ रूपये नगद निकलते हैं तो पता चलता ही है कि
भ्रष्टïचार का क्या आलम है? लेकिन अभी तक तो किसी जांच एजेंसी ने किसी
मंत्री के घर पर छापा मारा और करोड़ों की धन संपदा प्राप्त की ऐसा उदाहरण
नहीं मिलता। फिर पकड़े भी ऐसे लोग जाते हैं जिन्हें भ्रष्टïचार से धन
उगाहना तो आता है लेकिन उसे सही ढंग से ठिकाने लगाना नहीं आता। देश भर
में जनता महंगाई को लेकर हाहाकार कर रही है तो महंगाई से बढ़ी कमायी भी
तो किसी न किसी की जेब में जा रही है लेकिन पकड़ में तो कोई नहीं आ रहा
है। चुनाव के लिए नामांकन फार्म भरते समय ही प्रत्याशी अपनी धनसंपदा की
घोषणा करता है और जीत जाने पर जब वह दोबारा उम्मीदवार बनता है तब उसकी
संपदा में जो इजाफा होता है, उसे तो पूछने वाला कोई नहीं है कि यह धन
संपदा आयी कहां से ?

एक सांसद जब संसद में तर्क देता है कि लाखों लोगों का प्रतिनिधित्व करने
के कारण उस पर आर्थिक बोझ बढ़ता है और वेतन भत्ते से काम नहीं चलता तब
उससे यह कोई नहीं पूछता कि जब वेतन से अधिक खर्च होता है तब भी उसकी
धनसंपदा कैसे बढ़ती जाती है? आय से खर्च अधिक हो तो धन कम होना चाहिए या
बढऩा चाहिए। यदि वह चंदा लेकर भी काम चलाता है तो आय व्यय का ब्यौरा रखता
है क्या और यह आय व्यय का ब्यौरा वह आयकर विभाग को देता है क्या ?
क्योंकि कानूनन तो धन कहीं से भी किसी भी रूप में प्राप्त किया जाए, उसका
विवरण आयकर विभाग को दिया जाना चाहिए । आय में से छूट भी उसी दान दक्षिणा
को मिलती है जो संस्थाएं आयकर से छूट की पात्र होती है। जब सांसद संसद
में कह रहे थे, वेतन वृद्घि की मांग को लेकर तो कह रहे थे शादी विवाह से
लेकर हर कार्यक्रम में उन्हें चंदा देना पड़ता है। अभी गणेश जी बैठे हैं,
फिर दुर्गा जी बैठेंगी तब ये नेता चंदा देते हैं, अपने क्षेत्र की
संस्थाओं को लेकिन कोई पूछने वाला तो नहीं है कि कहां से पैसा आता है और
कैसे खर्च होता है ? आयकर विभाग पूछने लगे तो यही प्रतिनिधि हल्ला
मचाएंगे कि आस्था पर आक्रमण हो रहा है ।

कानूनन तो आयकर विभाग के पास हर किसी के पास कितना धन है, जो आयकर की
सीमा में आता है, उसका रिकार्ड होना चाहिए। यह जिम्मेदारी हर नागरिक की
है कि वह ईमानदारी से आयकर पटाए और अपने आय और व्यय का विवरण आयकर विभाग
को दे लेकिन असल में तो छोटे शिकार ही आयकर के चक्कर में फंसते हैं।
सांसदों का वेतन भत्ता भी सरकार ने बढ़ा दिया है। मंत्रियों को तो हर तरह
की सुविधा सरकार देती ही है। इसके बावजूद गलत तरीके से धन कमाने के अवसर
कम नहीं हैं, उनके पास। अक्सर भ्रष्टïचार के आरोप भी लगते रहते हैं। आय
से अधिक संपत्ति के आरोप भी लगते हैं। यह तो उनकी बात है राजनैतिक द्वेष
का शिकार हो जाते हैं लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि जिन पर आरोप नहीं लगते
वे सभी दूध के धुले हुए हैं। निश्चित रूप से सूचना के अधिकार ने एक
घबराहट तो पैदा कर दी है। जिसके विषय में सूचना के अधिकार के तहत जानकारी
मांगी जाती है, वही घबराने लगता है। जब प्रधानमंत्री कार्यालय अपने
मंत्रियों के विषय में जानकारी देने से कतराने की कोशिश करता है तो बाकी
लोगों के विषय में आसानी से समझा जा सकता है। निश्चित रूप से सरकार ने
सूचना का अधिकार कानून बनाकर जनता को ऐसा अधिकार दिया है जिसकी जितनी भी
तारीफ की जाए कम है। सूचना के अधिकार के तहत जानकारी न देने वाले या समय
पर जानकारी न देने वाले पर जुर्माने का भी प्रावधान किया गया है। इससे अब
अधिकांश मामले जनता के सामने उजागर होने का अवसर उपलब्ध हो गया है। पहले
बहुत सी जानकारी लोकसभा और विधानसभा में देने से इंकार कर दिया जाता है,
यह तर्क देकर कि जनहित में यह उचित नहीं है ।

मुझे याद आता है। मध्यप्रदेश में सुंदरलाल पटवा के मुख्यमंत्री बनने के
पहले कोई विधानसभा में प्रश्र करता था कि सरकार ने किस समाचार पत्र को
कितना विज्ञापन दिया तो सरकार का उत्तर होता था कि जनहित में यह बताना
उचित नहीं है और सदस्य इस तर्क को मानकर चुप रह जाते थे लेकिन 1989 में
मुख्यमंत्री बनने के बाद सुंदरलाल पटवा की सरकार से जब यह प्रश्र पूछा
गया तो सरकार ने सदन को बता दिया कि किस समाचार पत्र को उसने कितना
विज्ञापन दिया। राष्ट्रीय  हित और जनहित में बताने से इंकार के पीछे तो
असली कारण यही होता है कि बता देने से सरकार के कारनामों की पोल खुल जाती
है। जब मंत्री चुनाव लड़ता है तब वह नामांकन पत्र में अपनी और अपने
परिवार की धन संपदा की स्वयं घोषणा करता है। ऐसा न करे तो उसका नामांकन
ही रद्द हो जाए। तब मंत्री बनने के बाद उसकी जानकारी देने में क्या अड़चन
थी ? लेकिन ऐसा हुआ है, यही सत्य है। लेकिन सूचना आयुक्त के कारण जानकारी
देना तो पड़ा। प्रजातंत्र में वैसे भी सब कुछ खुला होना चाहिए। यही तो
उसकी खूबी है।

- विष्णु सिन्हा
11-10-2010

बुधवार, 8 सितंबर 2010

राहुल प्रधानमंत्री बनने के लिए तैयार होंगे तो कौन पूछेगा कि मनमोहन सिंह जी अवकाश ग्रहण करना चाहते हैं या नहीं?

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि वे अवकाश ग्रहण करने की कोई इच्छा
नहीं रखते। 78 वर्ष के होने के बावजूद जब मनमोहन सिंह अवकाश ग्रहण करने
की इच्छा नहीं रखते तो कौन बुजुर्ग अवकाश प्राप्त करने की इच्छा रखेगा?
कोई अवकाश, पद छोड़कर प्राप्त नहीं करना चाहता, लेकिन वक्त अवकाश ग्रहण करा
ही देता है। कल राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनना चाहें तो आज ही मनमोहन
सिंह को अवकाश लेना पड़ेगा। जब तक गांधी परिवार के लिए मनमोहन सिंह
सुविधाजनक हैं और परिवार सीधे गद्दी पर नहीं बैठना चाहता तब तक ही मनमोहन
सिंह गद्दी पर बिराजते रह सकते हैं। कांग्रेसी तो चाहते हैं कि राहुल
बाबा प्रधानमंत्री बनने के लिए तैयार हों तो उन्हें तुरंत प्रधानमंत्री
बना दिया जाए। मनमोहन सिंह तो चाहते हैं कि राहुल बाबा उनके मंत्रिमंडल
में सम्मिलित हों लेकिन राहुल गांधी इसके लिए तैयार नहीं हैं।
प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि वे शीघ्र मंत्रिमंडल का पुनर्गठन करेंगे और
युवा पीढ़ी को अवसर देंगे। वे चाहते हैं कि मंत्रिमंडल के सदस्यों की औसत
आयु कम हो। युवा लोगों को मंत्री तो अवश्य बनाया गया है लेकिन स्वतंत्र
प्रभार न होने के कारण वे वरिष्ठ मंत्रियों के अधीन राज्यमंत्री हैं।
वरिष्ठ मंत्री अपने कनिष्ठ मंत्रियों को कामधाम सौंपते नहीं और सौंपते
भी हैं तो दोयम दर्जे के। मुख्य नीतिगत मामले वे अपने पास ही रखते हैं।
ऐसी स्थिति में युवा मंत्री दर्शनीय हुंडी के समान हो जाते हैं। वे कहने
के लिए मंत्री अवश्य हैं लेकिन मंत्री के रूप में जिस तरह से जनता के बीच
उनका नेतृत्व उभरना चाहिए, वह तो उभरता नहीं। मनमोहन सिंह, प्रणव मुखर्जी
एवं एंटोनी जैसे बुजुर्ग मंत्रियों के सामने युवा मंत्रियों की सुनने
वाला कौन है? बुजुर्ग मंत्री अवकाश ग्रहण कर लें और राहुल गांधी
प्रधानमंत्री बन जाएं तो मंत्रिमंडल की औसत आयु एकदम युवा हो सकती है।
अभी युवाओं की दृष्टिï राहुल गांधी पर लगी हुई है। वे तैयार हों तभी
उन्हें जिम्मेदारी मिल सकती है।

गांधी परिवार के वफादार अर्जुनसिंह को मंत्री नहीं बनाया गया। जब इतने
सारे बुजुर्ग मंत्री हैं तो अर्जुनसिंह को क्यों छोड़ दिया गया? राजनैतिक
क्षेत्रों में तो यही चर्चा है कि मनमोहन सिंह उन्हें पसंद नहीं करते थे,
इसलिए उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया। मनमोहन सिंह को उनसे क्या तकलीफ थी?
क्या इसीलिए कि उन्हें राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनने के योग्य बताया
था। जो सच था, वह अर्जुनसिंह ने कहा था। उनके मन में जो भाव थे, वह
उन्होंने प्रगट किया था। यह भाव तो करीब करीब सभी कांग्रेसियों के मन में
है। यह बात दूसरी है कि लोग व्यक्त नहीं करते। अर्जुनसिंह ने छुपाने की
जरूरत महसूस नहीं की। मंत्री तो उन्हें नहीं बनाया गया लेकिन उनसे
राज्यपाल बनने के लिए कहा गया। मतलब साफ था कि सक्रिय राजनीति से अवकाश
ग्रहण कर लो। अर्जुनसिंह का मनमस्तिष्क अभी भी किसी युवा से कम प्रखर
नहीं है। यदि उम्र के कारण अवकाश दिया जाना था तो उनके हमउम्र कैसे
मंत्री पद की शोभा बढ़ाए हुए हैं?

जब लोग नरसिंहराव के गुणगान में लगे थे तब अर्जुनसिंह ने गांधी परिवार के
मुद्दे उठाए थे। राजीव गांधी हत्याकांड का मुद्दा उठाया था। तब लोग जो आज
गांधी परिवार के वफादार बने हुए हैं, नरसिंहराव की सरकार मे सत्ता सुख
भोग रहे थे। नरसिंह राव सोनिया गांधी की बात सुनने के लिए तैयार नहीं थे।
आज वे सत्ता सुख गांधी परिवार के कारण भोग रहे हैं  और अर्जुनसिंह को
दरकिनार कर दिया गया है। फिर भी सोनिया गांधी का समर्थन करने के लिए
अर्जुनसिंह आए। उन्हें पार्टी का अध्यक्ष बनाने के लिए नामांकन पत्र में
हस्ताक्षर किया। भोपाल गैस कांड के विषय में राज्यसभा में अपने वक्तव्य
में राजीव गांधी के हस्तक्षेप से इंकार किया। गांधी परिवार के हर संघर्ष
में वे उनके साथ खड़े रहे। जब इंदिरा जी को कांग्रेस से निकाला गया था तब
भी अर्जुनसिंह इंदिरा जी के साथ ही खड़े थे।

तब मनमोहन सिंह कांग्रेस के संघर्ष के साथी नही थे। वे तो नरसिंहराव के
द्वारा सीधे वित्तमंत्री बनाकर राजनीति में उतारे गए। उन लाखों
कांग्रेसियों के संघर्ष को दरकिनार कर जब सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को
प्रधानमंत्री बनाया तब भी कांग्रेसियों ने सोनिया गांधी की इच्छा को
शिरोधार्य कर लिया। कही  से बगावत का एक स्वर नहीं फूटा। एक तरह से देखा
जाए तो कांग्रेसियों का अपमान ही था, मनमोहन सिंह का प्रधानमंत्री के रूप
में चयन। जो व्यक्ति एक अदद लोकसभा का चुनाव स्वयं नहीं जीत सकता, वह
पार्टी को क्या चुनाव जितवाएगा? आज भी प्रधानमंत्री होने के बावजूद जनता
से मनमोहन सिंह का सीधा कोई संबंध नहीं है। लोग सोनिया गांधी और राहुल
गांधी का चेहरा देखकर उन पर विश्वास कर कांग्रेस को वोट देते हैं लेकिन
अर्जुनसिंह जैसे नेता की उपेक्षा भी हजारों कांग्रेसियों को कहीं न कही 
पीड़ा तो देती है।

मनमोहन सिंह कहते हैं कि उनके अवकाश ग्रहण करने का कोई इरादा नहीं है।
उनके अवकाश ग्रहण करने के इरादे से उनके पद पर बने रहने का कोई संबंध
नहीं है। वे अवकाश ग्रहण करें और सोनिया गांधी की तरह दृढ़ इच्छाशक्ति का
इस मामले में प्रदर्शन करें तो वे अवकाश ग्रहण कर सकते हैं लेकिन जब वे
स्वयं कह रहे हैं कि उनका अवकाश ग्रहण करने का इरादा नहीं है तो जिस दिन
गांधी परिवार चाहेगा, उन्हें अवकाश ग्रहण करना पड़ेगा। क्योंकि गांधी
परिवार ने जिस दिन सोच लिया कि मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री नहीं रहना
है, उस दिन मनमोहन सिंह के साथ कोई खड़ा दिखायी नहीं देगा। आज तो गांधी
परिवार इतना शक्तिशाली है ही कि जिसे चाहे उसे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर
बिठा सकता है। उन्हें रोकने वाला कौन है?

वह तो राहुल गांधी इस प्रयास में हैं कि कांग्रेस को अपने दम पर पूर्ण
बहुमत मिले। इसी के लिए वे दिन रात प्रयत्नशील हैं। वे अच्छी तरह से
भारतीय मानसिकता को समझ लेना चाहते हैं और तब प्रधानमंत्री बनना चाहते
हैं। जिस दिन उन्हें पूर्ण बहुमत मिला तब मनमोहन सिंह अवकाश की इच्छा
रखे या न रखें, उन्हें अवकाश ग्रहण करना पड़ेगा। राहुल गांधी युवक
कांग्रेस, एनएसयूआई को सक्रिय करने में लगे हैं। वे चुनाव करवा रहे हैं।
जिससे लोकप्रिय लोग कांग्रेस में आएं और युवा पीढ़ी में कांग्रेस का
वर्चस्व बढ़े। आज की तारीख में राहुल गांधी युवा पीढ़ी में सबसे लोकप्रिय
राजनीतिज्ञ हैं। अविवाहित होने के कारण युवतियों में तो उनकी लोकप्रियता
किसी भी फिल्म स्टार से भी ज्यादा है। कांग्रेस यदि राहुल गांधी को
प्रधानमंत्री बनाने के नाम पर वोट मांगेगी तो कांग्रेस दो तिहाई बहुमत की
उम्मीद भले ही न करे लेकिन यह भी हो जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। जिस
दिन राहुल गांधी तैयार प्रधानमंत्री बनने के लिए उस दिन कोई नहीं पूछेगा
कि मनमोहन सिंह जी अवकाश ग्रहण करना चाहते हैं या नहीं।

-विष्णु सिन्हा
08-09-2010