यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं
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गुरुवार, 27 जनवरी 2011

उच्चतम न्यायालय को जवाब देकर मनमोहन सिंह सिद्ध करें कि वे कमजोर प्रधानमंत्री नहीं हैं

उच्चतम न्यायालय प्रधानमंत्री से पूछ रहा है कि राजा के खिलाफ मुकदमा
चलाने के मामले पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई? उच्चतम न्यायालय  ने 3 माह
का समय दिया था लेकिन 16 माह बीत जाने के बाद भी निर्णय नहीं हुआ। उच्चतम
न्यायालय अपनी कार्रवाई आगे बढ़ाने के लिए भले ही सरकार का उत्तर चाहता
है लेकिन क्यों कार्रवाई नहीं की गयी, यह बात तो सभी को पता है। सरकार को
बनाए रखने के लिए बहुमत की आवश्यकता ने ही प्रधानमंत्री को रोके रखा।
राजा मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल के ऐसे मंत्री थे जो प्रधानमंत्री की बात भी
नहीं मानते थे। करुणानिधि की जिद थी कि राजा इस्तीफा नहीं देंगे और उनसे
इस्तीफा लिया गया या उन्हें बर्खास्त किया गया तो वे सरकार से समर्थन
वापस ले लेंगे। करुणानिधि की इस बंदर घुड़की से ही सरकार दबी हुई थी
लेकिन जब करुणानिधि ने देख लिया कि राजा को इस्तीफा देना ही पड़ेगा और
सरकार अब राजा को बचा नहीं सकती तो उन्होंने इस्तीफा देने का निर्देश
राजा को दिया।
मनमोहन सिंह की कमजोरी यह थी कि वे मुकदमा चलाने की अनुमति देते तो
उन्हें राजा से इस्तीफा लेना पड़ता। इस्तीफा न देने पर बर्खास्त करना
पड़ता। संसद में विपक्ष के हंगामे के बाद भी राजा इस्तीफा देने के पहले
स्वयं को न केवल पाक साफ बताते रहे बल्कि इस्तीफे को सिरे से नकारते रहे।
फिर क्यों नहीं नकारते, जब उन्हें अपने दल के सुप्रीमो करुणानिधि का
आशीर्वाद मिला हुआ था। विपक्ष दृढ़ संकल्प से राजा को हटाने की और
संयुक्त संसदीय दल से जांच की मांग पर अड़ा रहा और उसने संसद नहीं चलने
दिया तब कहीं जाकर करुणानिधि राजा के इस्तीफे के लिए तैयार हुए। यह तो
ऊपर-ऊपर की कहानी है और इससे सभी परिचित हैं लेकिन अंदर की कहानी भी
स्पष्टï है। राजा का इस्तीफा  करुणानिधि को भारी पडऩा था और पड़  रहा है।
देश भर में तो उनकी प्रतिष्ठा धूल धूसरित हुई ही। तमिलनाडु में भी उनके
लिए आसन्न विधानसभा चुनाव भारी पडऩे वाला हैं। 1 लाख 76 हजार रुपए का
भ्रष्टाचार उनकी मिट्टी पलीद करने के लिए पर्याप्त हैं।
क्योंकि यह बात कोई व्यक्ति या राजनैतिक पार्टी नहीं कर रही है बल्कि कैग
की रिपोर्ट कह रही है। जिसे संसद के पटल पर रख दिया गया है। प्रधानमंत्री
मनमोहन सिंह लोकसभा में इस संबंध में बयान देने वाले थे लेकिन फिर अचानक
राजा के इस्तीफा देने के बाद उन्होंने बयान नहीं दिया। निश्चित रुप से
मनमोहन सिंह एक ईमानदार व्यक्ति हैं लेकिन राजा के कृत्य ने उनकी
ईमानदारी को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। सब कुछ जानते हुए कार्रवाई न
करना उन्हें न केवल नैतिक रुप से जिम्मेदार बनाता है बल्कि संवैधानिक रुप
से भी उनकी ही जिम्मेदारी थी कि वे राजा के कृत्य के लिए उसे न्यायालय के
हवाले करते। भारत में 120 करोड़ जनता के धन के साथ ऐसा लूटमार एक
प्रधानमंत्री कैसे देख और बर्दाश्त कर सकता है?  इस मामले में निश्चय ही
मनमोहन सिंह ने सोनिया गांधी से भी निर्देश मांगा होगा। क्योंकि वास्तव
में वे ऐसे प्रधानमंत्री नहीं जो सब कुछ का निर्णय स्वयं लें। उनकी लगाम
सोनिया गांधी के हाथ में है और इस बात से तो कोई भी इंकार नहीं कर सकता।
आजकल समाचार पत्रों में सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के बीच न पटने के भी
समाचार प्रकाशित हो रहे हैं। इससे यह भी संदेश पैदा होता है कि कहीं
मनमोहन सिंह की छबि खराब करने का प्रयास तो नहीं किया जा रहा है। जिससे
उन्हें प्रधानमंत्री के पद से हटाया जा सके। यदि यह सच है तो एक ईमानदार
व्यक्ति के साथ यह कोई अच्छी राजनैतिक चाल  नहीं है। मनमोहन सिंह को जब
चाहें पूरी भलमनसाहत के साथ हटाया जा सकता है लेकिन शायद मन में डर हो कि
भले आदमी को बिना किसी वजह के पद से हटाना राजनैतिक रुप से नुकसानप्रद न
साबित हो। मनमोहन सिंह का अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ता कद किसी न
किसी को तो बौनेपन का आभास करा रहा है। दुनिया की ताकतवर हस्ती जब मनमोहन
सिंह की तारीफ में कसीदे काढ़े तो किसी न किसी के हृदय में टीस उठती ही
होगी।
गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं। गठबंधन में कौन सा दल रहे और कौन सा
नहीं, यह तय करना मनमोहन सिंह का नहीं सोनिया गांधी का काम है। फिर
गठबंधन के किस दल को मंत्रिमंडल में कितना स्थान और कौन सा विभाग मिले,
यह तय करना भी मनमोहन सिंह के हाथ में नहीं है। राजनैतिक रुप से कभी न
कभी मनमोहन सिंह ने कोशिश की और न ही सोनियागांधी ने अवसर दिया कि मनमोहन
सिंह देश की जनता के बीच एक राजनेेता की तरह प्रतिष्ठिïत हों। चुनाव
प्रचार में भी उनकी भूमिका एक टोकन की तरह रही। मनमोहन सिंह ने इस
व्यवस्था को लेकर कभी नाराजगी भी प्रगट नहीं की। वे अपनी भूमिका को अच्छी
तरह से जानते और समझते हैं। वे यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि वे
सोनिया गांधी के चुने हुए प्रधानमंत्री हैं। जब तक सोनिया गांधी चाहेंगी
वे पद पर बने रहेंगे। इसके बावजूद उन्होंने पिछले दिनों कहा कि अभी वे
अवकाश ग्रहण नहीं करना चाहते। उनकी स्थिति का आभास तो इसी बात से हो जाता
है कि उनकी ही मंत्रिपरिषद का सदस्य उनकी बात मानने के लिए तैयार नहीं था
और उसके बावजूद वे उसे अपने मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता नहीं दिखा सकते
थे। इस कमजोरी का असली कारण तो स्पष्टï है। बिना आलाकमान के निर्णय के वे
कुछ कर नहीं सकते। तमाम कारणों के बावजूद मनमोहन सिंह अपनी स्थिति के लिए
किसी दूसरे पर दोषारोपण कर बच नहीं सकते। संवैधानिक रुप से वे
प्रधानमंत्री की हैसियत से अपने मंत्री के कार्यों के प्रति जवाबदार है।
वे सुप्रीम कोर्ट में अपनी दयनीय स्थिति का बखान कर बच नहीं सकते कि उनका
मंत्री उनका कहा नहीं सुनता तो वे  चुप्पी लगाते हैं। अर्थशास्त्र के इस
प्रकांड पंडित को प्रधानमंत्री बने रहने की ही ऐसी क्या मजबूरी है कि
इतना बड़ा आर्थिक घोटाला होते हुए वे न तो रोक सके और न ही उसे
मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर सके। वे यदि राजा को हटाने में अक्षम थे तो वे
स्वयं प्रधानमंत्री का पद छोड़ सकते थे। उनकी जिम्मेदारी प्रधानमंत्री के
रुप में सोनिया गांधी से ज्यादा राष्टï्र के प्रति थी और वे इस मामले में
अक्षम सिद्ध हुए, इसके लिए अब प्रमाण की जरुरत नहीं है।
लोकसभा चुनाव के समय जब लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि मनमोहन सिंह एक
कमजोर प्रधानमंत्री हैं तब तो मनमोहन सिंह ने बड़े गुस्से से कहा था कि
वे कमजोर प्रधानमंत्री नहीं है लेकिन राजा के मामले में उच्चतम न्यायालय
के निर्देश का पालन न कर एक भ्रष्टï व्यक्ति को इतने दिनों तक अपने
मंत्रिमंडल में रख कर तो उन्होंने यह संदेश दिया है कि वे कमजोर
प्रधानमंत्री हैं। यह दूसरी बात है कि देश को आर्थिक रुप से सुदृढ़ करने
के मामले में उनकी सेवाएं अद्वितीय हैं लेकिन 1 लाख 76 हजार करोड़ रुपए
का नुकसान अपनी आंखों के सामने होता देखना, उनकी योग्यता पर भी
प्रश्रचिन्ह ही लगाता है। अब दें जवाब उच्चतम न्यायालय को पूरी ईमानदारी
से कि क्यों उन्होने मुकदमा चलाने की अनुमति 16 माह तक नहीं दी?

- विष्णु सिन्हा
दिनांक : 17.11.2010
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मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

उच्चतम न्यायालय के व्यंग्य के बावजूद कुछ बदलेगा, ऐसा तो नहीं लगता

भ्रष्टïचार के मामले में उच्चतम न्यायालय ने कड़ी टिप्पणी की है और यहां
तक कहने से परहेज नहीं किया कि सरकार घूस की दर क्यों नहीं तय कर देती ?
भ्रष्टïचार एक सर्वव्यापी मामला बन गया है। वरिष्ठ अधिवक्ता शांतिभूषण
ने तो उच्चतम न्यायालय में ही कहा कि कम से कम 8 पूर्व चीफ जस्टिस
भ्रष्ट थे। फिर कौन सा ऐसा क्षेत्र बच जाता है जहां भ्रष्टïचार ने अपने
डैने न फैला रखे हो? जब न्यायपालिका ही भ्रष्टïचार से मुक्त नहीं तो फिर
किससे उम्मीद की जा सकती है। कहा जाता है कि भ्रष्टïचार की जननी राजनीति
है। चुनाव और राजनीति में असुरक्षित भविष्य राजनीतिज्ञों को सुरक्षा के
लिए भ्रष्टïचार से धन कमाने के लिए बाध्य करता है। चुनाव जीतने के लिए
धन की और अब तो बेहिसाब धन की जरूरत होती है। नगर निगम का पार्षद बनने के
लिए ही लोग 50-60 लाख खर्च कर देते हैं तो उसका सीधा और साफ मतलब तो यही
है कि चुनाव जीतकर इससे कहीं ज्यादा का लाभ उठाया जा सकता है। नहीं तो
मोहल्ले का कचरा उठवाने, नाली साफ कराने के लिए और बदले में ढाई हजार
वेतन प्राप्त करने के लिए कोई इतनी बड़ी रकम दांव पर नहीं लगाएगा।

चुनाव लडऩे के लिए ही नहीं, अब तो टिकट प्राप्त करने के लिए भी धन की
जरूरत होती है। चुनाव जीतने लायक धन है या नहीं, यह पार्टी को बताना
पड़ता है। कहा जाता है कि पिछले लोकसभा चुनाव में प्रत्याशियों ने 8 हजार
करोड़ रूपये खर्च किए। 75 लाख से 1 करोड़ रूपये तक की मदद तो जीतने में
सक्षम प्रत्याशियों की मदद पार्टी ने भी की। चुनाव के समय हवा में उडऩा
तो अब हर पार्टी के बड़े नेता के लिए जरूरी हो गया है। चुनाव आयोग कड़ी
से कड़ी कार्यवाही की चेतावनी देता है और अब तो बैंक में खाता खोलकर खर्च
करने की व्यवस्था भी की गयी है और प्रत्याशी की वित्तीय  जांच के लिए
आयकर अधिकारियों को लगाया गया है। उच्चतम न्यायालय के जज कह रहे हैं कि
सबसे ज्यादा भ्रष्टïचार आयकर, बिक्री कर और आबकारी विभाग ही करता है। अब
उन्हीं आयकर अधिकारियों को चुनाव खर्च की जांच और निगरानी के लिए  लगाया
गया है।

भले ही उच्चतम न्यायालय के जजों ने व्यंग्य में कहा हो कि भ्रष्टïचार की
दर तय कर देना चाहिए। जिससे लेने और देने वालों को सुविधा हो लेकिन सरकार
तय भी कर देगी तो भ्रष्टïचार कम होने वाला नहीं है। छठवां वेतन आयोग
लागू होने के बाद शासकीय कर्मचारियों को सरकार भरपूर वेतन दे रही है
लेकिन मन किसी का भर रहा है, क्या ? केंद्र सरकार ने 10 प्रतिशत तो
छत्तीसगढ़ सरकार ने 8 प्रतिशत महंगाई भत्ता और बढ़ा दिया है लेकिन  कोई
काम करना चाहता है, क्या? फिर जिस काम में कुछ भी मिलने की उम्मीद न हो
उस काम की फाइल को तो वर्षों कोई हाथ नहीं लगाना चाहता। काम कराना है तो
फाइल लेकर टेबल टेबल घूमो और भेंट चढ़ाओं। यह सब खुलेआम होता है। कुछ लोग
दिखाने के लिए पकड़े भी जाते हैं तो होता जाता कुछ नहीं।  वर्षों जांच
चलती है। मुकदमा चलाने की अनुमति विभाग से मांगे, तो अनुमति नहीं मिलती।
फिर सबसे बड़ी बात तो यह है कि भ्रष्टïचार के मामले में पकड़े जाने से
भी समाज  में मान सम्मान की कमी नहीं होती।

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी पत्रकार वार्ता कर कहते हैं कि
सत्तापक्ष और कांग्रेस में ऊपर से नीचे तक मिली भगत है। भटगांव का
उपचुनाव हारने के बाद यह बात जोर शोर से उठ रही है कि कांग्रेसियों को
भाजपाइयों ने खरीद लिया था।  इसी कारण कांग्रेस बुरी तरह से हारी।
भाजपाइयों ने खरीदा और कांग्रेसी बिक गए, यह बात जब कांग्रेस का ही एक
बड़ा नेता कहता है और आलाकमान को पत्र लिखकर इस मामले की जांच कराने की
मांग  खुलेआम करता है तो यह कांग्रेस आलाकमान  के ही सोच का विषय है कि वह
जांच कर बिके हुए कांग्रेसियों पर कार्यवाही करे या फिर मुद्दा उठाकर
कांग्रेस की छवि खराब करने के आरोप में मुद्दा उठाने वाले पर कार्यवाही
करे। जबकि आरोप लगाने वाले पर भी विधायकों की खरीद फरोख्त का आरोप है।
इसीलिए तो अपनी पार्टी के विषय में कोई मुद्दा सार्वजनिक रूप से उठाने
वाले को पार्टियां अनुशासनहीन मानती हैं और हर पार्टी का यही निर्देश
होता है कि मामला पार्टी फोरम में उठाया जाए।

राजनीति और भ्रष्टïचार का तो चोली दामन का साथ है। जीसस ने कहा कि पत्थर
वह मारे जिसने कोई पाप नहीं किया लेकिन राजनीति तो ऐसी जगह है, जहां पापी
ही पापी पर पत्थर मारते हैं। जब कोई किसी पर भ्रष्टïचार का आरोप लगाता
है तब यह जरूरी नहीं कि आरोप लगाने वाला कोई पुण्यात्मा हो। इस मामले में
भी जलनखोरी कम नहीं है। खुद भ्रष्टïचार करे तो सही और दूसरा करे तो गलत।
इसीलिए तो कहते हैं, पूरी बेशर्मी से कि कोई किसी को  कमाता खाता नहीं
देख सकता। जब सभी चुनावों में हर तरह की सेटिंग की जाती है तो भटगांव
चुनाव में नहीं की गई होगी, ऐसा मानने का तो कोई कारण नहीं है। साम, दाम,
दंड, भेद सभी का उपयोग कर चुनाव जीतने का प्रयत्न सभी अपनी शक्तिभर करते
हैं। भाजपा इस मामले में सफल हो रही है और कांग्रेस असफल तो इतनी खुन्नस
की आईबी से जांच कराएंगे।

विधायकों को तो कांग्रेस के राज्य प्रभारी नारायण सामी ने धमकी तक दी थी
कि चुनाव प्रचार के लिए अपने निर्धारित क्षेत्र में नहीं गए और
अंबिकापुर में दिखायी दिए तो अगले चुनाव में टिकट तक कट जाएगी लेकिन धमकी
का परिणाम क्या निकला? कांग्रेस बुरी तरह से हार गयी और सांप के निकल
जाने के बाद लकीर पीटने से कुछ मिलने वाला नहीं लेकिन अक्लमंद कांग्रेस
की ही मिट्टी  पलीद करने में लगे हैं। कांग्रेसी यदि सरकार के साथ
मिलीभगत कर रहे हैं तो दोषी कौन है? किससे उन्होंने यह हुनर सीखा है?
आखिर बच्चे अच्छा बुरा जो भी सीखते हैं तो सीखते अपने बुजुर्गों से ही
हैं। कांग्रेस में ऐसा बिखराव है तो जिम्मेदारी स्वयं लेना चाहिए। आईबी
जांच से क्या सब कुछ ठीक हो जाने वाला है? जब सांसद लोकसभा में प्रश्र
पूछने के लिए धन लेने से नहीं हिचकते तो फिर रह ही क्या जाता है? सांसदों
की खरीद फरोख्त कर जब बहुमत जुटाया जाता है तब कांग्रेसी और सीख भी क्या
सकते हैं? वे यह भी  तो देखते हैं कि ईमानदारी से काम करने वालों को कौन
पूछता है?

फिर सब से बड़ी बात तो यही है कि जनता सब कुछ देख रही है। वह सब कुछ समझ
भी रही है। जहां तक भ्रष्टïचार का अनुभव है तो जनता से बड़ा भुक्तभोगी
कौन है? भ्रष्टïचार के परिणाम को भोगना तो जनता को ही पड़ता है। दिल्ली
में केंद्र सरकार और राज्य सरकार दोनों कोंग्रेस की है और उनकी नाक के
नीचे ही कामनवेल्थ गेम्स के नाम पर भ्रष्टïचार का ऐसा खेल खेला गया कि
रोकने वाला कोई नहीं था? अंत में यही कहा गया कि देश की इज्जत का मामला
है और खेल हो जाने दो। भ्रष्टïचार के मामले बाद में देख लिए जाएंगे। 70
हजार करोड़ रूपये खर्च करने का मामला है। वह तो भारतीय खिलाडिय़ों के
अच्छे प्रदर्शन ने लोगों को खुश कर दिया और विश्व में मिली प्रशंसा से
भारतीय गदगद हैं। नहीं तो कामनवेल्थ गेम्स के नाम से ही लोग बिचक रहे थे
और कांग्रेस के ही मणिशंकर अय्यर दुआ कर रहे थे कि खेल असफल हो। उच्चतम
न्यायालय के व्यंग्य के बावजूद कुछ बदलेगा, इसकी उम्मीद तो किसी को नहीं
है।

- विष्णु सिन्हा
11-10-2010