यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं
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रविवार, 24 अक्टूबर 2010

काली स्याही फेंकने वालो के पीछे कौन है, यह बात आलाकमान को बताने से कांग्रेसी डरते क्यों हैं?

अजब हाल है, कांग्रेस का। राज्यपाल के पास पहुंच गए। फरियाद करने कि
पुलिस की चाक चौबंद व्यवस्था केंद्रीय मंत्री के सुरक्षा के लिए की गई
होती तो नारायण सामी पर काली स्याही नहीं फेंकी जा सकती थी। पुलिस की
लापरवाही से यह घटना घटी और इसके लिए भाजपा सरकार जिम्मेदार है। राजभवन
के सामने खड़े होकर फोटो खिंचवाओ और कर्तव्य की इति श्री। नारायण सामी से
जब तक किसी की नाराजगी नहीं होगी तब तक वह उन पर काली स्याही क्यों
फिकवाएगा? काली स्याही फेंकना या कालिख फेंकने का तो एक ही अर्थ होता है,
अपमानित करना। न तो नारायण सामी को अपमानित करने में भाजपा सरकार की ही
रुचि है और न ही पुलिस की। कोई ऐसा कारण ही नहीं है कि ये दोनों नारायण
सामी का अपमान करें। दरअसल ये कांग्रेस के अपने घर का अंदरुनी विवाद है
और पकड़े गए लोगों ने पप्पू फरिश्ता का नाम ले ही लिया। अब पप्पू पुलिस
की पकड़ में आए तो पुलिस उससे पूछताछ कर उसके पीछे कौन व्यक्ति है, इसका
पता लगाने के लिए भी तैयार हैं।

कांग्रेसी जानते हैं कि असल में कौन व्यक्ति इस घटना के लिए जिम्मेदार
है? कम से कम बड़े नेताओं को तो पक्का विश्वास है कि पप्पू फरिश्ता के
पीछे किसका चेहरा है। ये आपस में रास्ता देख रहे हैं कि कोई तो उस शख्स
का नाम ले। किसी तरह से उसका नाम सामने आए। ये गुप्त बैठकें करते हैं और
रणनीति पर विचार करते हैं कि आलाकमान तक असली नाम कैसे पहुंचाया जाए? सभी
सयाने एकमत हैं  कि हाथ उसी का है। जिस तरह से उस नेता की चल नहीं रही है,
उससे पैदा अवसाद ने इस तरह का कृत्य करवाया है। पप्पू फरिश्ता को पकड़ कर
पुलिस उसका नाम पप्पू से कहलवा दे तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाए।
छत्तीसगढ़ सरकार और पुलिस उसके लिए सुविधा जनक माध्यम दिखायी दे रहे हैं।
राज्यपाल के द्वारा पुलिस और सरकार पर दबाव डलवाना आसान लग रहा है।
राज्यपाल निर्देश दे दें तो पप्पू को पकडऩा पुलिस के लिए कोई कठिन काम तो
है, नहीं।

धनेन्द्र साहू, चरणदास महंत, सत्यनारायण शर्मा और रविन्द्र चौबे ने कल
रायपुर में मोतीलाल वोरा से मुलाकात कर घटना से अवगत तो कराया ही है।
मोतीलाल वोरा ने भी सुरक्षा की व्यवस्था में कोताही के लिए राज्य सरकार
पर ही निशाना साधा है। प्रदेशाध्यक्ष का मनोनयन सोनिया गांधी को करना है।
खबर है कि वे 24 से 30 अक्टूबर तक देश से बाहर रहने वाली हैं। इससे
अनुमान लगाया जा रहा है कि अब 1 तारीख के बाद ही प्रदेशाध्यक्ष का मनोनयन
होगा। हो सकता है दीपावली के कारण यह मामला दीपावली के बाद के लिए टल
जाए। उसके पहले ही कालिख फेंकवाने वाले असली व्यक्ति का नाम पुलिस
स्पष्ट कर दे तो मनोनयन में  आसानी ही होगी। क्योंकि ऐसा कोई व्यक्ति
प्रदेशाध्यक्ष के लिए सोनिया गांधी के द्वारा मनोनीत हो जाता है और बाद
में पता चलता है कि काली स्याही फेंकने वाले व्यक्ति के पीछे का असली
चेहरा वही है तो कांग्रेस की और फजीहत ही होगी।

वैसे भी प्रदेशाध्यक्ष का मनोनयन जिस व्यक्ति का होगा, उसी पर जिम्मेदारी
आगामी विधानसभा चुनाव की भी होगी। छत्तीसगढ़ सरकार 2 वर्ष पूरे करने जा
रही है तो चुनाव के लिए बचते हैं, 3 वर्ष। ऐसे में प्रदेशाध्यक्ष का काम
और जिम्मेदारी कांग्रेस को सत्ता की आसंदी तक पहुंचाने की होगी। इसलिए
तलाश तो ऐसे व्यक्ति की ही की जा रही है जो गुटबाजी से परे कांग्रेस की
छवि को जनमानस में पुन: लोकप्रिय बनाने की कर सके। आजकल कांग्रेस में
सबसे ज्यादा डर फूल छाप कांग्रेसियों का ही है। सरकार से लाभ प्राप्त
करना और सरकार की खिलाफत करना एक साथ तो संभव नहीं। छत्तीसगढ़ में कइयों
को प्रदेशाध्यक्ष बनाकर देखा परखा जा चुका है। अभी तक कांग्रेस को न तो
ऐसा मुख्यमंत्री मिला और न ही प्रदेशाध्यक्ष और न ही प्रतिपक्ष का नेता
जो जनता से सत्ता के लिए कांग्रेस को सहमति दिला सके। आलाकमान पर
नियुक्ति की जिम्मेदारी सौंप कर कांग्रेसी तो जिम्मेदारी से मुक्त हो
जाते हैं और मनोनीत व्यक्ति को असफल करने के अपने खेल में लग जाते हैं।
सत्ताधीश होने पर तो किसी को भी प्रदेश अध्यक्ष बना कर काम चलाया जा सकता
है। पहले भी मुख्यमंत्री के पिछलग्गू की भूमिका प्रदेशाध्यक्ष निभाते रहे
हैं लेकिन सत्ता से बाहर रहते हुए प्रदेशाध्यक्ष की कुर्सी ही सर्वोच्च
कुर्सी होती है। प्रतिपक्ष का नेता भी यदि प्रदेशाध्यक्ष शक्तिशाली हो तो
उसके अनुसार चलने के लिए बाध्य होता है। प्रतिपक्ष का नेता तो चुने हुए
विधायकों का ही नेता होता है लेकिन प्रदेशाध्यक्ष की जिम्मेदारी तो पूरे
प्रदेश के हर विधानसभा क्षेत्र की होती है। पूरी पार्टी के संगठन को
सक्रिय रखना और कांग्रेस की दमदार उपस्थिति दिखाना सबसे अधिक महत्व का
काम है। इसके लिए अति सक्रिय और ऊर्जावान नेता की जरुरत होती है। कोई भी
चुनाव सिर्फ जातिगत आधार पर नहीं जीते जा सकते। कांग्रेस ने यह प्रयोग
अजीत जोगी को मुख्यमंत्री बनाकर, धनेन्द्र साहू को प्रदेशाध्यक्ष बनाकर
देख लिया। चुनाव जीतना है तो सभी वर्गों का समर्थन चाहिए। इसलिए कांग्रेस
को इंदिरा गांधी, पं. जवाहर लाल नेहरु की तरफ दृष्टि डालना चाहिए। कोई भी
संकीर्ण सोच का व्यक्ति जो अपनी जाति के दायरे से बाहर सोच ही नहीं रखता,
वह कांग्रेस को सत्ता तक नहीं पहुंचा सकता।

कांग्रेस पिछड़ी, अगड़ी, आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यक सभी की पार्टी हैं।
उसे जातिगत गुणों के बदले वास्तविक योग्यता पर ध्यान देना चाहिए। हुड़दंग
और अभद्र कृत्यों को प्रोत्साहित करने वालों से परहेज करना चाहिए। काली
स्याही फेंकने जैसी घटनाओं से जो नुकसान पार्टी को होता है, उससे भी
सावधान रहने की जरुरत है। छत्तीसगढ़ एक शांत प्रदेश है। यहां का मतदाता
ऐसे लोगों को पसंद नहीं करता। कांग्रेसी कितना भी भाजपा सरकार को दोषी
ठहराएं लेकिन आम आदमी की सोच भाजपा सरकार के विरुद्ध नहीं है। भाजपा के
किसी कार्यकर्ता या नेता ने ऐसी अनुशासनहीनता की होती तो पार्टी पुलिस
जांच और परिणाम का इंतजार नहीं करती। छत्तीसगढ़ में ही अपने
प्रदेशाध्यक्ष तक को पार्टी ने निलंबित करने में हिचक महसूस नहीं की।
कांग्रेस को ही और विशेष कर आलाकमान को ही सोचना है कि वह कब तक ऐसे
लोगों को ढोते रहेगी। कांग्रेस के गढ़ को जिन्होंने ढहा दिया, उनके
कृत्यों से जब सभी वाकिफ हैं तब आलाकमान को जानकारी नहीं होगी, ऐसा तो
कोई भी नहीं मानेगा। जब पूरी पार्टी मनोनयमन से ही चलती है तो मनोनीत
व्यक्ति के क्रियाकलापों की जिम्मेदारी भी तो आलाकमान की ही है। जब तक
ऐसे लोग पार्टी में रहेंगे तब तक पार्टी का भला नहीं होने वाला है।

कांग्रेसियों की तो स्पष्ट सोच है कि सभी पद इनके और इनके परिवार के लिए
ही है, क्या? वक्त बदल गया है और जो एक बार नजरों से उतर जाता है, वह
दोबारा जनता की निगाहों में नहीं चढ़ता है। छत्तीसगढ़ में भी आलाकामान
चाहता है कि कांग्रेस का वह हाल हो जो कई प्रदेश में है तो फिर कुछ सोचने
विचारने की जरुरत नहीं है। जनता तो तमाशा देख रही है और मुस्करा रही है।

- विष्णु सिन्हा
दिनांक : 23.10.2020
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मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010

आलाकमान के प्रतिनिधि के चेहरे पर काली स्याही फेंकना आलाकमान के चेहरे पर फेंकना ही समझा जाएगा

छत्तीसगढ़ कांग्रेस के गठन का जिम्मा सोनिया गांधी को सौंप दिया गया।
सबको अच्छी तरह से पता था कि यही होने वाला है लेकिन प्रजातांत्रिक
पार्टी होने का स्वांग तो दिखाना पड़ता है। दिल्ली से प्रदेश प्रभारी
नारायण सामी और विप्लव ठाकुर आए। उम्मीद से परे इनका स्वागत किया गया।कुछ लोगों ने नारायण सामी पर काली स्याही फेंक कर स्वागत किया। 4 युवक पकड़े भी गए हैं और वे इंकार कर रहे हैं कि उन्होंने यह कृत्य नहीं किया।उनके पास से कुछ पर्चे भी मिले हैं जिस पर गरीब कांग्रेसियों की उपेक्षा का आरोप है।


 बीआरओ, डीआरओ स्वयं प्रदेश प्रतिनिधि बन गए, यह बात तो
पुरानी हो गयी। अब केंद्रीय नेताओं का ऐसा स्वागत सत्कार कांग्रेस की
कहानी जनता के सामने स्वयं उजागर करती है कि कांग्रेसी कहां से चले थे और कहां पहुंच गए।निश्चित रुप से स्वतंत्रता संग्राम की महात्मा गांधी की कांग्रेस और सोनिया गांधी की कांग्रेस में जमीन आसमान का अंतर आ गया। कभी कांग्रेस अंग्रेजों से लड़ती थी, तब भी ऐसी हरकतें नहीं करती थी, जैसी हरकतें अब कांग्रेसी, कांग्रेसी से ही लडऩे में, विरोध प्रदर्शन में कर रहे हैं। घर की इज्जत को बचाने के बदले उसे तार-तार करने में कांग्रेसियों की ज्यादा रुचि हैं। तभी तो कहने में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अजीत जोगी को हिचक नहीं होती कि नीचे से ऊपर तक कांग्रेसी बिक गए हैं। आलाकमान को शिकायत करते हैं कांग्रेसी, तो उस पर कोई फैसला आलाकमान नहीं लेता। खबर तो यह भी है कि छत्तीसगढ़ के झगड़ों को देखकर आलाकमान ने छत्तीसगढ़ के प्रति उपेक्षा का रुख अपना लिया है। किसी को भी किसी पद पर बिठाया जाता है और जिनकी नहीं चलती, वे शिकायत का पुलंदा लेकर आलाकमान का दरवाजा खटखटाने
लगते हैं। कभी कांग्रेसियों के लिए दिल्ली क्या भोपाल ही बहुत दूर था
लेकिन अब नगर निगम तक के मामले में शिकायत करने पार्षद दिल्ली पहुंच जाते हैं।


अभी वह दिन तो नहीं आया जब महापौर को महापौर परिषद और जोन अध्यक्ष में चयन के लिए आलाकमान की अनुमति लेना पड़े लेकिन विवाद इसी तरह से बढ़ा तो वह दिन दूर नहीं जब पंच सरपंच तक का चुनाव कौन लड़ेगा, यह आलाकमान ही तय करेगा। प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष कौन हो, जिला कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष कौन हो, कार्यकारिणी में कौन किस पद पर बैठे, ये सभी निर्णय तो आलाकमान ही कर रहा है। सत्ता में हों झगड़ें तो एक बार समझ में भी आता है लेकिन सत्ताविहीन होकर झगड़ा और किसी एक नाम पर सर्वसम्मति का न बनना कांग्रेस की सांगठनिक स्थिति का खुलासा ही करता है। जब शासन और सत्ता नहीं है  तब भी संगठन पर कब्जा इसलिए आवश्यक लगता है कि कभी सत्ता भूले
भटके हाथ में आ गयी तो सांगठनिक प्रमुख को ही मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिल सकता है। टिकट वितरण में भी भूमिका मिल सकती है लेकिन ऐसी स्थिति में जैसी आज है, सत्ता का ढोल दूर की ही बात लगती है।

आज कांग्रेसियों की सबसे बड़ी कमजोरी ही यह बन गयी है कि उनकी न चले तो काग्रेस हार भी जाए तो कोई बात नहीं। कांग्रेस बड़ी या कांग्रेसी तो कहें भले ही नहीं लेकिन स्पष्ट तो यही दिखायी देता है कि कांग्रेसी बड़े।
नारायण सामी के कपड़े पर, चेहरे पर काली स्याही फेंकने वाले या फेंकने के लिए उकसाने वाले किस तरह से सही कांग्रेसी हो सकते हैं। फिर नारायण सामी पर काली स्याही फेंकने से कांग्रेस की छवि तो खराब कर सकते हैं लेकिन बदले में प्राप्त क्या कर सकते हैं? काली स्याही फेंकने से क्या नारायण सामी डर जाएंगे? फिर फेंकने वालों के पास तो इतना मनोबल भी नहीं है कि वे भागने के बदले सामने आकर बताते कि वे कौन हैं और क्यों सामी का चेहरा काला करना चाहते हैं? आखिर नारायण सामी तो आलाकमान के प्रतिनिधि हैं।नारायण सामी के बदले आलाकमान किसी अन्य को अपना प्रतिनिधि बनाकर भेजता तो वह व्यक्ति आता। यह काली स्याही नारायण सामी के चेहरे और वस्त्रों पर नहीं फेंकी गयी बल्कि आलाकमान के ही चेहरे पर फेंकी गयी है। क्योंकि नारायण सामी का तो काम ही इतना है कि वे जो भी स्थिति देखें, यहां की, उसकी सूचना आलाकमान को दें। फिर आलाकमान के पास छत्तीसगढ़ की कांग्रेस की
सूचनाओं के लिए नारायण सामी ही अकेले सूचना स्त्रोत नहीं हैं और न ही
आलाकमान सिर्फ नारायण सामी की सूचनाओं, जानकारियों के आधार पर कोई निर्णय लेता है।


काली स्याही फेंकने वाले कितना भी छुपने का प्रयास करें लेकिन आलाकमान को जानकारी मिल ही जाएगी कि इस तरह का काम किस नेता के प्यादों ने किया है। कौन छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की दुर्गति का असली खलनायक है? कुछ भी छुपने वाला नहीं है। भय, आतंक की राजनीति पर कौन विश्वास करता है? कांग्रेस को छत्तीसगढ़ में बचाना है तो आलाकमान को कड़े निर्णय लेना चाहिए। जैसा कि इंदिरा गांधी लिया करती थी। नरसिंहराव के समय निर्णय को टाला जाता रहा तो परिणाम भी सामने आया। कांग्रेस ने सत्ता गंवा दी थी। आलाकमान का कोई भय
ही नहीं रहेगा तो फिर सभी मनमानी करने लगेंगे। भाजपा की ही तरफ देखें।अनुशासनहीनता करने पर बड़े से बड़े नेता को भी बख्शा नहीं जाता। पार्टी से निलंबित या निष्कासित करने में हिचक नहीं होती।


आज छत्तीसगढ़ कांग्रेस में अनुशासन के डंडे की सबसे ज्यादा जरुरत है। यह डंडा कांग्रेस आलाकमान ही चला सकता है। नारायण सामी पर फेंकी गई काली स्याही सब चलता है कि तर्ज पर उपेक्षा करने लायक घटना नहीं है बल्कि यह तो अनुशासनहीनता का तमाचा है। जो वास्तव में नारायण सामी पर नहीं पार्टी अनुशासन पर लगाया गया है। पार्टी को जनता में लोकप्रिय बनाना है तो ऐसेलोगों की पार्टी में कोई जरुरत नहीं, इस बात को अच्छी तरह से समझना ही कल्याणकारी होगा। नहीं तो फिर छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सत्ता में वापसी की उम्मीद ही छोड़ देना चाहिए। पार्टी की गुटबाजी ने वैसे ही जनता में कांग्रेस की छवि को खराब कर रखा है। 


रायपुर नगर निगम में कांग्रेस की महापौर को चुनकर अब तो रायुपर के लोग ही सोचने लगे हैं कि उन्होंने कांग्रेस को अवसर देकर सही नहीं किया है। क्योंकि ये सुधरने वाले नहीं हैं। अपनी ही महापौर के विरुद्ध असंतोष प्रगट कर निगम को राजनीति का अखाड़ा बनाया जा रहा है। एक तरफ भाजपा की सरकार है तो दूसरी तरफ कांग्रेस के पार्षद और जनता को समस्याओं से मुक्ति दिलाने का अहम दायित्व। कैसे निपटे महापौर? सबको पद चाहिए और महापौर को सामान्य सभा में पार्षदों के बहुमत का समर्थन। निर्दलियों के सहयोग के बिना यह संभव नहीं। महापौर तो
कांग्रेस की प्रतीक हैं। यदि जनता 4 वर्ष में और असंतुष्ट हुई तो
कांग्रेस विधानसभा और लोकसभा चुनाव में क्या हासिल कर सकेगी?


छत्तीसगढ़ कांग्रेस में तो इस विषय की चिंतना करने वाला कोई दिखायी नहीं देता। जो हैं, वे भी हाशिए में ढकेल दिए जाते हैं। तब आलाकमान को ही सोचना है और निर्णय करना है कि क्या किया जाए?

-विष्णु सिन्हा
दिनांक: 19.10.2010
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सोमवार, 2 अगस्त 2010

कांग्रेस को गुटबाजी से परे ले जाकर सत्ता के सिंहासन पर बिठाना है तो अध्यक्ष पद के लिए योग्यतम मोहम्मद अकबर ही हैं

कांग्रेस ने अपने प्रदेश प्रतिनिधियों सहित ब्लाक पदाधिकारियों की सूची
जारी कर दी है। यह तो स्वाभाविक है कि जिनका नाम सूची में नहीं हैं,
उन्हें सदमा लगे। ये लोग भूल जाते हैं कि जब इन सूचियों में इनका नाम रखा
गया था तब भी बहुतों का नाम सूची से बाहर हो गया था। क्योंकि एक बार जो
सूची में आ गया, वह सोचे कि हमेशा उसी का नाम सूची में रहे तो आज जिनका
नाम सूची में है, उनमें से भी बहुतों का नाम नहीं होता। आजीवन के लिए तो
कोई सूची होती नहीं। यदि होती तो फिर किसी के स्वर्गवासी होने से ही सीट
खाली होती और तब किसी को सूची में प्रवेश मिलता। यह तो सदा से होता आया
है कांग्रेस में कि जिसकी चलती है, उसके समर्थक बहुतायत से सूची में ही
नहीं, पदाधिकारी भी बन जाते हैं। स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस के
पदाधिकारी बदलते ही रहे हैं। कौन यह चिंता करता है कि किसे सदमा लग रहा
है?

जहां तक रिश्तेदारों के चयन का मामला है तो यह कांग्रेस की परंपरा का अंग
है। सबसे बड़ा पद ही जब वंश परंपरा से चल रहा है तो नीचे के पदों में भी
नियुक्ति वंश परंपरा से हो तो इसमें विरोध का कोई कारण नहीं होना चाहिए।
आखिर वंश परंपरा का तो यही अर्थ होता है कि जिसके पूर्वज निष्ठापूर्वक
कांग्रेस की सेवा करते आए, उसके वारिस पर विश्वास किया जाए। यत्र तत्र
सर्वत्र जिधर भी दृष्टि डाली जाए, यही तो दिखायी पड़ता है। किसी के
पिताश्री की चलेगी तो वह अपने पुत्र पुत्री को ही अवसर देगा। इस व्यवस्था
से नाराज होने का तो कोई कारण नहीं होना चाहिए। जो लोग नेताओं की सेवा कर
पार्टी में पद चाहते हैं, उन्हें इसका आभास रहता ही है कि उनके नेता की
चली तो उनके अवसर हैं। नहीं चली या कम चली तो अवसर पहले अपने परिवार के
लोगों को देंगे, न कि दूसरे कार्यकर्ताओं को।

आज मोतीलाल वोरा की चल रही है, चरणदास महंत की चल रही है तो उनके
कार्यकर्ता प्रदेश प्रतिनिधि बन रहे हैं। एक तरह से संगठन पर इन्हीं का
वर्चस्व दिखायी दे रहा है। किसी भी नेता या कार्यकर्ता से पार्टी को इनकी
जरुरत ज्यादा है। आलाकमान भी प्रदेश की बागडोर इन्हें सौंपकर निश्चिंत
होना चाहता है। फिर कांग्रेस के कार्यकर्ता हो तो क्या पद के लिए
कांग्रेसी हो? पद नहीं मिला तो क्या पार्टी छोड़ देंगे? यदि ऐसी मंशा हो
तो पार्टी परवाह कहां करती हैं। ऐसी ही गुटों में बंटी पार्टी छत्तीसगढ़
के मतदाताओं को संतुष्ट कहां कर पा रही है। पार्टी के लिए काम करना है
तो बिना पद के भी काम किया जा सकता है। परेशानी क्या है? बहुत से
कांग्रेसी नेता ऐसे हैं जिन्हें पार्टी की जरुरत है लेकिन पार्टी को भी
उनकी जरुरत है, ऐसा कहां हैं?

बड़े-बड़े नेता जो पार्टी से अपने को बड़ा समझते थे, पार्टी से बाहर जाकर
भी देख चुके। पार्टी ने उनकी वापसी के लिए कोई पलक पावड़े नहीं बिछाए थे
और न ही इन्हें आमंत्रित कर रही थी कि लौट आओ। बार-बार की मिन्नत मसाजत
के बाद पार्टी ने उन्हें लिया। उम्मीद की जा रही थी कि शायद उनके आगमन से
पार्टी को लाभ होगा और सत्ता पार्टी के हाथ में फिर से आ जाएगी लेकिन हुआ
तो नहीं ऐसा। अरविंद नेताम की वापसी के बावजूद बस्तर में पार्टी साफ हो
गयी। कितने ही उदाहरण हैं। अब पार्टी प्रदेश प्रतिनिधि बनाना भी उचित
नहीं समझती तो गिला शिकवा कैसा? पार्टी ने तो फिर भी दया दृष्टि की और
पार्टी में प्रवेश दे दिया। बिना शर्त पार्टी में वापसी के बाद कुछ मिले
इसकी आशा ही फिजूल है।

आज छत्तीसगढ़ में पार्टी की जो हालत है, उसके लिए दोषी कौन है? पार्टी तो
फिर भी इज्जत कर रही है। अपने घर का सदस्य मान रही है। यह बात तो आइने की
तरह साफ है कि नए खून को पार्टी में उचित स्थान नहीं दिया गया तो
छत्तीसगढ़ में पार्टी को नवजीवन प्राप्त करना कठिन काम है। पार्टी को ऐसे
नेता की जरुरत है जो पार्टी का कायाकल्प कर सके। लोगों में विश्वास पैदा
कर सके कि अब पार्टी पुराने रास्ते पर नहीं चलेगी। पार्टी दंभी लोगों को
नेता नहीं बनाएगी बल्कि विनम्र, पार्टी के प्रति एकनिष्ठ, जनता के प्रति
आस्थावान व्यक्ति को नेता के रुप में आगे बढ़ाएगी। खासकर उसे जो राजनीति
को धंधा नहीं समझता। राजनीति तो जनसेवा का माध्यम है और जनता की सेवा के
लिए हर पल तत्पर रह सकता है, उसे ही पार्टी को नेता के रुप में प्रस्तुत
करना चाहिए।

उसमें यह विशेषता हो कि वह किसी गुट का न हो और न ही किसी तरह की गुटबाजी
में विश्वास करता हो। उसके लिए सभी ईमानदार, कर्मठ, पार्टी के प्रति पूरी
तरह निष्ठïवान कार्यकर्ता न केवल उपयोगी हों बल्कि उनकी सेवा को पार्टी
में पूरा सम्मान मिले । वे मुखौटे वाले नेता न हों। कांग्रेस महासचिव
दिग्विजय सिंह के शब्दों का उपयोग करें तो वे फूल छाप कांग्रेसी न हों।
मोहम्मद अकबर ऐसे ही नेता हैं। आलाकमान उन्हें पार्टी का नेतृत्व सौंपता
है तो पूरी तरह से उम्मीद कर सकता है कि वे पार्टी के चुनावों में
सम्मानजनक स्थान दिलाएं। विपरीत परिस्थितियों में भी जीत का उनका इतिहास
है। जातिगत राजनीति से परे वे सर्वस्वीकार नेता हैं। पहले वीरेन्द्र नगर,
फिर पंडरिया से उनकी जीत अपनी कहानी खुद कहती हैं। भाजपा में जिस तरह से
किसी भी चुनाव में जीत की उम्मीद बृजमोहन अग्रवाल से की जाती है,
कांग्रेस में उसी तरह की जीत की उम्मीद मोहम्मद अकबर से की जाती है। एक
जमाने में दिग्गज नेता से कृषि उपज मंडी का अध्यक्ष पद उन्होंने छीन लिया
था। वे छात्र राजनीति से कांग्रेस की राजनीति में आए हैं और उनकी
राजनैतिक समझ की परिपक्वता बेमिसाल है।

पुराने दिग्गज तो अपने सामने किसी को कुछ समझते नहीं और पूरी राजनीतिक
गतिविधियां स्वयं को केंद्र में रख कर संचालित करते हैं । अब ये पुराने
जमाने के हीरो की तरह हो गए। जो भले ही कल सुपर स्टार रहे हों लेकिन आज
चरित्र अभिनेता जैसा काम पाकर भी प्रसन्न हो जाते हैं। राहुल गांधी के
साथ कांग्रेस के प्रति जो झुकाव उत्तरप्रदेश में कांग्रेस के प्रति लोगों
का बढ़ा है तो वैसा ही चेहरा राजनीति में छत्तीसगढ़ में भी चाहिए। जीत की
भावना से लबरेज नेता के हाथ में कमान सौंप कर सोनिया गांधी पुन:
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की वापसी की उम्मीद कर सकती हैं। मोहम्मद अकबर
ऐसे ही नेता हैं। विषम परिस्थिति में पंडरिया जैसे नए विधानसभा क्षेत्र
से भी जीत का परचम लहराकर मोहम्मद अकबर ने स्वयं को साबित किया है। वे
ऐसे नेता हैं जिनके लिए आलाकमान का आदेश ही सब कुछ है। विधायक के रुप में
विधानसभा में वे सरकार को हमेशा कठघरे में खड़ा करने का प्रयत्न करते
दिखायी देते हैं। आलाकमान ही सोचे कि वह किसी के हाथ की कठपुतली बनकर
प्रदेश को भाजपा के हाथ में ही देखना चाहती है या फिर वास्तव में पार्टी
को सत्ता में लौटता देखना चाहती है। अवसर अभी है और पूरा अवसर है।
सदुपयोग कर सकते हैं तो कर लें।

-विष्णु सिन्हा
दिनांक : 01.08.2010
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