यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं
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गुरुवार, 26 अगस्त 2010

नई पीढ़ी आती है तो पुराने लोगों को उनके लिए पद खाली करना ही पड़ता है

 कांग्रेस में अल्पसंख्यक नेताओं की तो कोई कमी नहीं है। मनोनीत ही नहीं
निर्वाचित नेता हैं। मोहम्मद अकबर, बदरूद्दीन कुरैशी, गुरूमुखसिंह होरा,
कुलदीप जुनेजा जैसे नेताओं को तो जनता ने ही चुनकर विधानसभा में भेजा।
अजीत जोगी और रेणु जोगी का नाम और जोड़ लिया जाए तो अल्पसंख्यक वर्ग के
विधायकों की बड़ी संख्या विधानसभा में कांग्रेस की है। अजीत जोगी ईसाई
हैं। इसलिए वे भी अल्पसंख्यक ही कहे जाएंगे। भले ही वे अपने आपको
अल्पसंख्यक के बदले बहुसंख्यक आदिवासी नेता कहलाना पसंद करें।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह स्वयं अल्पसंख्यक हैं और उनका यह कथन तो
सर्वविदित है कि देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का होना चाहिए।
बहुसंख्यकों की नाराजगी की परवाह न करते हुए जब प्रधानमंत्री तक ऐसे
विचार रखते हैं तब रायपुर का कोई अल्पसंख्यक नेता अपनी नाराजगी इस आधार
पर प्रगट करे कि उसकी उपेक्षा हुई कितना उचित है।

इकबाल अहमद रिजवी को कहीं से भी प्रदेश कांग्रेस कमेटी का सदस्य बना दिया
जाता तो उनकी कोई नाराजगी नहीं होती। राजीव गांधी के जन्मदिन पर जो
नाराजगी उन्होंने पार्टी कार्यक्रम के दौरान व्यक्त की उसे वे जायज मानते
हैं। क्योंकि उन्होंने अपनी बात पार्टी फोरम में रखी। अपने दिवंगत नेता
के जन्मदिन के कार्यक्रम को वे इस तरह की बात कहने के लिए उचित समझते हैं
तो इसे उचित कैसे कहा जा सकता है? इसकी आलोचना पार्टी के ही नेता एवं
कार्यकर्ता करते हैं तो इकबाल अहमद इसे अनुशासनहीनता बताते हैं। जबकि
स्वयं को प्रदेश कांग्रेस में सदस्य मनोनीत न होने पर उन्होंने प्रेस से
कहा था कि उन्हें सदमा लगा है।  वे पार्टी के प्रवक्ता भी हैं। उनका ऐसा
प्रेस से कहना क्या अनुशासनहीनता नहीं है, उनकी नजर में। 10-11 वर्ष तक
वे शहर कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। आज प्रदेश प्रवक्ता हैं तो उन्हें स्वयं
सोच विचार कर अपनी बात कहना चाहिए । पार्टी फोरम के नाम पर राजीव गांधी
के जन्मदिन पर उनका कहा तो अक्षरश: समाचार पत्रों में छपा और सबको मालूम
पड़ गया कि इकबाल अहमद रिजवी नाराज हैं। क्योंकि उन्हें प्रदेश प्रतिनिधि
नहीं बनाया गया।

जब पार्टी में नए लोगों को जगह देना हो तो  पुरानों को तो  हटना ही
पड़ेगा। कोई जगह ही खाली नहीं करेगा तो पार्टी में नए कार्यकर्ताओं को
आगे बढऩे का मार्ग कैसे मिलेगा? फिर यह पहली बार इकबाल अहमद रिजवी के साथ
ही हो रहा है, क्या ? कांग्रेस में वे पहले और इकलौते शख्स हैं क्या
जिन्हें प्रदेश प्रतिनिधि बनने का अवसर नहीं मिला। वास्तव में कोई पार्टी
के लिए निष्ठïपूर्वक ईमानदारी से काम करना चाहता है तो किसी भी  तरह के
पद की जरूरत क्या है? अपने नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी की ही तरफ
देखें। सोनिया गांधी को तश्तरी में सजाकर प्रधानमंत्री का पद दिया गया था
लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया। मनमोहन सिंह राहुल गांधी को अपने
मंत्रिमंडल में शामिल करना चाहते थे लेकिन राहुल गांधी ने सरकार में
सम्मिलित होने के बदले पार्टी के लिए जनसमर्थन जुटाने के कार्य को
स्वीकार किया। कांग्रेस में ऐसे कितने लोग हैं जो मंत्री बनने का अवसर
मिले तो मंत्री बनने के बदले पार्टी का काम करना ज्यादा पसंद करें।
आज कांग्रेस में सोनिया गांधी और राहुल गांधी ऐसे व्यक्ति हैं जो बिना
किसी पद के भी जनता में सर्वाधिक लोकप्रिय और स्वीकार्य  है। कोई कहे कि
मैंने इतने वर्ष कांग्रेस की सेवा की, इसलिए मैं पद का अधिकारी हूं तो
इससे यही सिद्घ होता है कि सेवा का कारण पद है। फिर जनता स्वयं अच्छी तरह
से जानती है कि किसने उसकी सेवा की।

इकबाल अहमद रिजवी वर्षों रायपुर शहर के कांग्रेस अध्यक्ष रहे लेकिन न तो
रायपुर विधानसभा की सीट पर कांग्रेस को जितवा सके और न ही रायपुर को
कांग्रेस का गढ़ बना सके। जबकि पहले रायपुर कांग्रेस का ही गढ़ था। एक
समय तो ऐसा भी था जब रायपुर शहर रायपुर ग्रामीण रायपुर लोकसभा, नगर निगम
सब पर भाजपा का ही कब्जा था। बहुत वर्षों के बाद 4 विधानसभा सीट होने पर
एक सीट से कांग्रेस  विधायक का चुनाव जीत सकी। कुलदीप जुनेजा के कारण और
नगर निगम पर किरणमयी नायक ने महापौर के रूप में कब्जा किया। उपलब्धि यदि
माना जाए तो यह उपलब्धि शहर कांग्रेस अध्यक्ष इंदरचंद धाड़ीवाल की मानी
जाएगी। रायपुर के विधायक बृजमोहन अग्रवाल वर्षों से विधायक चुने जाते रहे
हैं। उन्हें आज तक तो कांग्रेस हरा नहीं सकी। जबकि उन्हें हराने के लिए
तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने तो रायपुर में नुक्कड़ सभाएं तक की
थी।

जिनके शासन और संगठन पर रहते हुए प्रदेश से कांग्रेस की सत्ता लुप्त हो
गयी, उन्हें तो स्वयं पद स्वीकार करने से इंकार कर देना चाहिए लेकिन जो
लोग पार्टी से स्वयं को बड़ा समझते हैं, वे ऐसा नहीं कर सकते। वे तो अपने
लिए तर्क का जुगाड़ करते हैं। हालांकि जब वे पद में रहते हैं तब दूसरों
को भी अपना हक मार दिए जाने की पीड़ा होती है। यह तो वक्त की मांग है। जब
नई पीढ़ी आती है तो वह पुरानी पीढ़ी को धकियाकर आगे बढऩे का रास्ता तलाश
ही लेती है। पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के संघर्ष की दास्तां कांग्रेस में
कोई नई नहीं है बल्कि इस संघर्ष ने तो पार्टी को कई बार विभाजित भी किया
लेकिन अंतत: जनसमर्थन पुरानी पीढ़ी के बदले नई पीढ़ी को ही मिला। स्वयं
इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी इसके ज्वलंत उदाहरण हैं।
इंदिरा गांधी को अपनी जगह बनाने के लिए धाकड़ पुराने कांग्रेसी दिग्गजों
से संघर्ष करना पड़ा। उन्हें दो बार पार्टी से निकाला गया तो उन्होंने
अपनी पार्टी बनायी और जनता ने उन्हें ही समर्थन दिया। राजीव गांधी के
विरूद्घ भी पुराने कांग्रेसियों ने विद्रोह किया और सत्ता भी  उनसे छीन
ली लेकिन अंतत. अपनी जान कुर्बान कर कांग्रेस को पुन: सत्ता दिलायी। उस
समय भी सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बन सकती थी। सीताराम केसरी ने तो अपनी
गांधी टोपी उनके पैरों पर रख दी कि वे प्रधानमंत्री का पद और कांग्रेस की
अध्यक्षता संभालें लेकिन सोनिया गांधी ने स्वीकार नहीं किया और उनके
इशारे पर नरसिंहराव को सत्ता सौंपी गयी। नरसिंहराव कांग्रेस को सत्ता पर
काबिज नहीं रख सके और अंतत: सीताराम केसरी को उन्होंने अध्यक्षता सौंपी
लेकिन तब कांग्रेस की दुर्दशा सोनिया गांधी से बर्दाश्त नहीं हुई तो
कांग्रेसियों के अनुरोध पर सोनिया गांधी ने अध्यक्षता संभाली। उन्होंने
पूरा अवसर दिया कि उनके बिना कांग्रेसी कांग्रेस को संभालें लेकिन अंतत:
यह हो न सका और सोनिया गांधी के प्रयासों के कारण ही आज कांग्रेस के पास
देश की सत्ता है। उनके विदेशी मूल के होने के कारण कांग्रेसियों ने ही
उनका विरोध भी किया, लेकिन जब जनता ने उन्हें स्वीकार कर लिया तब आज कोई
विदेशी मूल की बात नहीं करता।

अब देश तैयार है, राहुल गांधी को सत्ता सौंपने के लिए तो पुराने
कांग्रेसियों को जगह तो खाली करना ही पड़ेगा। वे सम्मान से खाली करें या
असम्मान से, यह उनकी मर्जी। इतिहास फिर उसी दोराहे पर खड़ा है। जहां नए
लोग आते हैं और पुराने चले जाते हैं।

-विष्णु सिन्हा
24-08-10ृ0

रविवार, 21 फ़रवरी 2010

ए टीम को जनता ने नकारा तो बी टीम ही सत्ता पर होगी

दिग्विजय सिंह कह रहे हैं कि भाजपा कांग्रेस की बी टीम बन रही है। वामपंथी तो पहले से ही यह बात कहते थे। अब कौन ए टीम है और कौन बी टीम इससे परे यह बात स्मरणीय है कि कांग्रेस कभी समाजवादी पार्टी हुआ करती थी। उसका झुकाव स्वतंत्रता के बाद सत्ता में आने पर अपने को गरीबों की पार्टी बताने पर ज्यादा जोर था। यहां तक कि इंदिरा गांधी ने तो गरीबी हटाओ का नारा देकर ही एक आम चुनाव जीता। फिर जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तब धीरे धीरे कांग्रेस ने समाजवाद का चोला छोड़कर पूंजीवाद को अपनाना प्रारंभ किया और नरसिंहराव के वित्त मंत्री बनकर मनमोहन सिंह ने तो कांग्रेस को पूरी तरह से पूंजीवादी पार्टी बना दिया। उदारीकरण के नाम पर कांग्रेस ने पूंजीवाद को आश्रय देना प्रारंभ कर दिया। भाजपा और पूर्व में भारतीय जनसंघ तो प्रांरभ से ही दक्षिण पंथी पार्टी मानी जाती थी। कांग्रेसी ही भाजपा को बनियाओं की पार्टी कहा करते थे। बीच में कुछ समय के लिए भाजपा ने अपने को गांधीवादी समाजवाद के नाम पर प्रचारित करना शुरू किया था लेकिन बहुत जल्द भाजपा इस भ्रम से बाहर निकल गयी।

आज केंद्र में कांग्रेस गठबंधन की सरकार है और वह ऊपर-ऊपर पैकिंग के रूप में गरीबों की हितैषी दिखने का प्रयास कुछ कार्यक्रमों को लेकर भले ही करती है लेकिन उसकी नजर हर बजट में इसी बात पर ही लगी रहती है कि जनता के हित में जारी किसी भी तरह की सब्सिडी को कैसे खत्म किया जाए? जैसे जैसे सब्सिडियां खत्म होती गयी, सरकार का खजाना चौड़ा होता गया। जिस तरह से एक पूंजीपति कितना भी धन कमा ले संतुष्ट नहीं होता, उसी तरह से अब सरकार भी कितना ही टैक्स वसूल कर ले, खुश नहीं होती। वह अवसरों की तलाश में रहती है कि कैसे नागरिकों पर और बोझ डाला जाए। नागरिकों को पूरी तरह से बाजार के हवाले कर दिया गया है। पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस जैसी कुछ वस्तुएं सरकार के नियंत्रण में है तो सरकार उससे भी छुटकारा पा लेना चाहती है। जिससे उसे इन मदों में होने वाले घाटे से निजात मिले और जनता स्वयं इस बोझ को उठाए। सरकार भरसक प्रयास कर रही है कि तेरा तू जाने, हमें क्या लेना देना?


कहने का अर्थ यही है कि कांग्रेस अब पूरी तरह से पूंजीवादी हो गयी है। जैसे बड़े-बड़े सेठ करोड़ों, अरबों कमाकर  कुछ दान दक्षिणा देते हैं कि इस जन्म में पाप यदि कुछ किए हैं तो उसे पुण्य में बदल लें। उसी तरह से सरकार भी टैक्स वसूली में कोई कृपणता न दिखाते हुए मीठा मीठा गप गप और कड़वा कड़वा थू थू करने में लगी है। सरकार में रहना है तो गरीबों के  वोट चाहिए। इसलिए गरीब नवाज होने का एक मुखौटा भी चाहिए। सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली के द्वारा गरीबों की मदद का ढोंग करती है। गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों को 3 रू. किलो में चांवल गेहूं देती है।  इसका कोटा भी कम करने का अवसर तलाशती है। शक्कर महंगी हुई तो राज्य सरकार का कोटा काटा जा रहा है। सब्सिडी इसलिए समाप्त की जाती है कि धन सरकार के खजाने में बचेगा तो सरकार देश का विकास करेगी। खाद्यान्न का सट्टा हो तो सरकार इसे रोकने की कोशिश नहीं करती। उसकी सोच है कि खाद्यान्न की कीमत बढ़ेगी तो फायदा किसान को होगा। किसान को कैसे फायदा होगा? किसान सरकार के द्वारा निर्धारित समर्थन मूल्य पर अनाज सरकार को बेच देता है। उसे तो उतना ही धन अपनी फसल का मिलता है जितना सरकार तय करती है।


फिर बाजार में बढ़ती महंगाई का लाभ उसे कैसे मिलेगा ? लाभ तो इस महंगाई का जमाखोर, व्यापारी, खाद्यान्न का सट्टा खेलने वाले उठाते हैं और नुकसान देश की आम जनता को उठाना पड़ता है। भाजपा की नकल में कांग्रेस दक्षिण पंथी तो हो गयी लेकिन परिणाम तो जनता भुगत रही है। अब कोई कैसे माने कि कांग्रेस गरीबों की पार्टी है। कहा जा रहा है कि शक्कर से ही एक लाख करोड़ रूपये व्यापारियों ने कमा लिए। सरकार खुश है कि उसकी आर्थिक नीति सफल है। विकास दर में इजाफा हो रहा है। सरकार की छाती चौड़ी हो रही है। सरकार को और धन चाहिए। अगले वर्ष 1 करोड़ और लोगों को रोजगार देना है। इस बहाने जनता की गर्दन पर महंगाई अपनी पकड़ और सख्त करे। खाद्यान्न के साथ अब दूसरी चीजों पर महंगाई अपनी नकेल कसने वाली है। आखिर जनता चाहती है कि देश विकसित हो तो उसे ही तो इसकी कीमत चुकानी है। यह सब ए टीम कांग्रेस कर रही है।


अब कांग्रेस की बी टीम भाजपा क्या करे ? वह यह सब आंख बंद कर देख तो नहीं सकती। इसलिए उसका कर्तव्य है कि वह कांग्रेस सरकार के विरोध में प्रदर्शन करे। भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में तय हुआ है कि 21 अप्रेल  को भाजपा संसद का घेराव करेगी। 15 लाख नागरिको को लाकर दिल्ली में ऐसा प्रदर्शन किया जाएगा कि सरकार की चूल हिल जाए। लालकृष्ण आडवाणी ने तो आह्वïन किया है कि सिर्फ भाजपा के कार्यकर्ता ही इस प्रदर्शन में सम्मिलित नहीं हों बल्कि महंगाई के  विरूद्घ जनता भी प्रदर्शन में भाग ले। जिससे जनता को पता चले कि उसकी असली हितैषी भाजपा है। जब कांग्रेस के महामंत्री दिग्विजयसिंह ही कांग्रेस को ए टीम और भाजपा को बी टीम बता रहे हैं तो दोनों के  बीच सत्ता के लिए फे्रंडली मैच होना तो जायज है।


यह राजनीति का खेल है। जिस तरह से किसी भी  खेल में दो टीम होती है और वे आपस में जीत के लिए खेलती है और दर्शक ताली बजाते हैं। उसी तरह का यह भी खेल है। दिल्ली में कांग्रेस की सरकार है तो भाजपा दिल्ली में प्रदर्शन करती है। छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार है तो कांग्रेस छत्तीसगढ़ में धरना प्रदर्शन करती है। देश भर के  भाजपाई महंगाई का कारण केंद्र की कांग्रेस सरकार को बताते हैं तो छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी महंगाई के लिए राज्य की भाजपा सरकार को दोषी बताते हैं। अब यह जनता पर है कि  वह तय करे कि कौन सही है? चुनाव में निर्णय का अधिकार जनता के पास ही होता है। जनता के  वोट ही निर्णायक होते हैं कि खेल में कौन जीता, कौन हारा? लेकिन कोई जीते कोई हारे, अंतत: हार तो जनता ही जाती है। क्योंकि उसका एक बार किया निर्णय जिसके भी पक्ष में होता है, वही 5 वर्ष के लिए सत्ता का हकदार बन जाता है।


कभी कभी जनता किसी अच्छे व्यक्ति को भी चुन लेती है। वह अपनी क्षमता भर बल्कि उससे बढ़कर जनता की समस्याओं को हल करने का ईमानदारी से प्रयास करता है। तब दूसरी बार भी  निर्णय के वक्त जनता दुष्प्रचारों से प्रभावित न होकर पुन: सत्ता उसे ही सौंप देती है। कभी देश में एक छत्र शासन करने वाली कंग्रेस जिसे ए टीम बताया जाता है केंद्र में मिली जुली सरकार चला रही है तो कितने ही राज्यों में उसका सुपड़ा साफ हो गया है। भाजपा जिसे बी टीम बताया जा रहा है वह 9 राज्यों में सत्ता पर है और 100 से अधिक लोकसभा सदस्य उसके पास हैं। वह 6 वर्ष तक केंद्र की सत्ता पर काबिज भी रह चुकी। मतलब साफ  है कि जनता ए टीम  से नाराज हुई तो सत्ता बी टीम के पास ही जाना है। सत्ता जिसके पास हो वहीं ए टीम है तो आज की ए टीम कल को बी टीम बन जाती है तो यही तो राजनीति का खेल है।


- विष्णु सिन्हा
20-2-2010