अपनी पहली भारत यात्रा में ही बराक ओबामा भारतीयों के हृदय में स्थान
बनाने में सफल हो गए। उनसे जो कुछ भारतीय सुनना चाहते थे, वह सब वे संसद
के अपने 36 मिनट के भाषण में कह गए। मेरी याददाश्त में तो वे पहले ऐसे
विदेशी हुक्मरान हैं जिन्होंने जय हिंद का उदघोष किया। सुनने वालों का
हृदय गदगद हो गया। अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बराक ओबामा ने
स्पष्ट कहा कि वे अमेरिका के राष्टपति के रुप में यहां खड़े हैं तो
उसका कारण महात्मा गांधी हैं। आज दुनिया को शांति और अहिंसा की सबसे
ज्यादा जरुरत है और गांधीजी के विचारों के बिना यह संभव नहीं। भारत को
दुनिया की महाशक्ति बताने से न तो उन्होंने परहेज किया और न ही पाकिस्तान
को आतंकवाद के विरुद्ध चेतावनी देने में। आतंकवादी अड्डों को खत्म करने
के विषय में तो उनके विचार एकदम स्पष्ट थे। 21 वीं सदी में भारत और
अमेरिका मिलकर विश्वशांति के लिए सहयोग करें, यह कामना उन्होंने प्रगट
की। राष्टपति बनने के बाद किसी भी देश से सबसे ज्यादा समय उन्होंने
भारत में बिताया और अपने शानदार स्वागत के लिए हिंदी में 'बहुत धन्यवाद'
कहा।
बराक ओबामा और उनकी पत्नी मिशेल ओबामा ने अपने हाव भाव, व्यवहार से कहीं
से भी यह लगने नहीं दिया कि वे कोई विशिष्ट व्यक्ति हैं बल्कि एकदम
सामान्य व्यक्ति की तरह व्यवहार कर सहजता से लोगों के हृदय में स्थान बना
लिया। इसे सुक्ष्मदर्शी बुद्धिजीवी भले ही उनका अभिनय करार दें लेकिन आम
आदमी के लिए तो एक अच्छे अभिनेता का अभिनय, अभिनय न होकर सत्य होता है और
निश्चित रुप से बराक ओबामा ने अमेरिका के लोगों के दिल को जीत कर
राष्टपति की गद्दी पर बैठने का हक प्राप्त किया, यह सिर्फ अभिनय के
कारण ही तो नहीं हो सकता। धारा प्रवाह लोग जो सुनना चाहें, उनकी ही तरह
बोलना बराक ओबामा की योग्यता का ही परिचायक है। गरीब, दलितों के लिए उनके
उदगार और भावनाएं भारतीयों के लिए खास मायने रखती हैं। उन्होंने स्पष्ट
कहा कि 30 लाख भारतीय मूल के राष्ट्रभक्त अमेरिकी भारत के प्रति आशा
जगाते हैं।
कभी अमेरिकी राष्टपति जॉन एफ केनेडी और भारत के प्रधानमंत्री पंडित
जवाहर लाल नेहरु की दोस्ती भी विश्व राजनीति में चर्चित रही है तो
भारतीयों के लिए भी बड़ी अहमियत रखती थी। भारत में जगह-जगह इनके चित्र,
यहां तक कि घरों में भी दिखायी देते थे। फिर वक्त बदला और अमेरिका और
भारत के बीच वैसे संबंध नहीं रहे। अब लगता है कि वह युग पुन: लौट रहा है।
उस समय तो ताजा-ताजा स्वतंत्र हुआ भारत एक निर्धन देश था जिसका वर्षों से
शोषण विभिन्न शक्तियां कर रही थी। अपनी 36 करोड़ जनता का ही उदर पोषण
करने में भारत समर्थ नहीं था। यह अमेरिका ही था जो पीएल 480 के तहत हमें
गेहूं देता था तो पेट की भूख मिटायी जाती थी। आज 120 करोड़ भारतीय हैं और
भारत सक्षम है अपने देशवासियों का पेट भरने में। इतना ही नहीं भारत
विभिन्न खाद्यान्न सामग्री निर्यात भी करता है।वक्त बदला है। विश्व मंदी की चपेट में अमेरिका है। सैकड़ों बैंकों पर ताला लग गया है। गिरती आर्थिक व्यवस्था के समय बराक ओबामा को अमेरिकियों
ने अपना राष्टपति चुना है। मनमोहन सिंह आज भारत के प्रधानमंत्री हैं
और भारत फल फूल रहा है लेकिन 1992 में जब वित्त मंत्री के रुप में मनमोहन
सिंह ने सरकार में प्रवेश किया था तब भारत की आर्थिक स्थिति संकट में थी।
उनकी पूर्ववर्ती चंद्रशेखर सरकार ने सोना गिरवी रखकर देश का काम चलाया
था। नरसिंह राव सरकार के वित्त मंत्री की हैसियत से मनमोहन सिंह ने
उदारीकरण के नए युग में भारत को प्रवेश कराया था। 1992 में कोई सोच भी
नहीं सकता था कि आर्थिक रुप से जर्जर भारत मात्र 18 वर्ष में ही दुनिया
को अर्थशास्त्र की शिक्षा दीक्षा दे रहा होगा। अमेरिका जैसी महाशक्ति का
राष्टपति भारत आकर भारत को महाशक्ति घोषित कर रहा होगा। भारतीय
कंपनियां अमेरिका में निवेश करें, इसकी पुरजोर कोशिश करने के लिए अमेरिकी
राष्ट्रपति तीन दिन तक भारत में रुकेगा। अमेरिका की बेरोजगारी दूर करने
के लिए भारतीय निवेश से 50 हजार से अधिक नौकरियां अमेरिका में बढ़ेंगी,
यह घोषणा करने में बराक ओबामा को गर्व की अनुभूति होगी।
कितनी जल्दी सब कुछ बदल गया। आज भारतीय कंपनियां विदेशी कंपनियों को
अधिग्रहित कर रही हैं। भारतीय इंजीनियर, डॉक्टर भारत के लिए ही जरुरी
नहीं दुनिया के लिए जरुरी हो गए हैं। 80 हजार नौकरियां बैंक ही भारत में
देने के लिए तैयार बैठे हैं। बराक ओबामा ने कहा कि दुनिया का सबसे बड़ा
मध्यम वर्ग आज भारत में ही है। गरीबी है, गरीब हैं, इससे कोई इंकार नहीं
कर रहा है लेकिन समृद्धि भी तो बढ़ी है। भारत चंद्रमा में अपना चंद्रयान
भेज सकता है, सफलतापूर्वक यह भी संभव नहीं था लेकिन संभव हुआ। आज अमेरिका
में 30 प्रतिशत चिकित्सक भारतीय हैं तो नासा में भी भारत की भागीदारी
अच्छी खासी है। कल ही इंग्लैंड ने निवेश आमंत्रित करने के लिए भारी
सुविधाएं देने की घोषणा की है। दुनिया के धनपतियों में भारतीय धनपतियों
की भी अच्छी खासी संख्या है। अमेरिका के राष्टपति कहते हैं कि जब भारत
के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते हैं, दुनिया बड़े ध्यान से सुनती है।
विश्व मंदी में प्रजातांत्रिक भारत में जहां सब कुछ खुला हुआ है 9-10
प्रतिशत विकास दर बहुत मायने रखती है। यह विकास दर दस बीस वर्षों तक कायम
रही तो निश्चित रुप से भारत दुनिया का सबसे धनी राष्ट्र बन जाएगा और
विश्व की आर्थिक व्यवस्था को नियंत्रित करने की क्षमता उसके पास होगी।
कभी भविष्य वक्ता 2010 में भारत के विश्व शक्ति बनने की भविष्यवाणी करते
थे तो हंसी के पात्र लगते थे। समस्याओं से ग्रस्त भारत, निर्धन भारत
विश्व शक्ति बन जाएगा, यह किसी कपोल कल्पना से कम नहीं लगता था लेकिन आज
तो तथ्य हैं। भारत के महाशक्ति होने की घोषणा अमेरिका का राष्टपति कर
रहा है। यह किसी चमत्कार से कम नहीं लेकिन असल में तो यह मनमोहन सिंह की
ही देन है। उनकी ही आर्थिक नीतियों का परिणाम है। अमेरिका के राष्टपति
बराक ओबामा, मनमोहन सिंह से आर्थिक सलाह र्भी लेते हों तो कोई आश्चर्य की
बात नहीं। बराक ओबामा की भारत यात्रा से मनमोहन सिंह का कद जो
अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ा है है, वह भारत में भी और ऊंचा हो गया है।
भारत की वर्तमान आर्थिक स्थिति के लिए कोई एक व्यक्ति श्रेय का हकदार है
तो वे निश्चित रुप से डॉ. मनमोहन सिंह ही है। हमेशा लो प्रोफाइल में रहने
वाले मनमोहन सिंह ने सभी दिग्गज राजनीतिज्ञों को बौना साबित कर दिया है।
अब कांग्रेसियों की ही नजर में मनमोहन सिंह खटकने लगें तो कोई आश्चर्य की
बात नहीं लेकिन वक्त अपना करतब दिखाता है और जिससे जो काम लेना चाहता है,
उसे चुनता भी वही है। पता नहीं सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को
प्रधानमंत्री के रुप में क्या सोच कर चुना था लेकिन एक बात तो स्पष्ट है
कि स्वयं सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री न बन कर मनमोहन सिंह को
प्रधानमंत्री बना कर देश का हित किया। दूसरे शब्दों में कहें तो यह प्रभु
की ही देन है। क्योंकि देश का भाग्यविधाता तो वही है।
- विष्णु सिन्हा
दिनांक : 09.10.2010
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शनिवार, 13 नवंबर 2010
शुक्रवार, 13 अगस्त 2010
अर्जुनसिंह ने तो फिर गांधी परिवार के प्रति अपनी वफादारी दिखा दी लेकिन गांधी परिवार उनकी कद्र करेगा, क्या?
एंडरसन की जमानत पर रिहाई के मामले में राजीव गांधी को लपेटने की मंशा
सफल नहीं हुई। अर्जुनसिंह ने राज्यसभा में स्पष्ट कर दिया कि राजीवगांधी ने उन्हें एंडरसन की रिहाई के बाद के विषय में कोई निर्देश नहीं
दिया था। जो लोग उम्मीद कर रहे थे कि केंद्रीय मंत्रिमंडल में स्थान न
मिलने के कारण अर्जुनसिंह नाराज हैं और वे एंडरसन के मामले में राजीव
गांधी का नाम लेकर पार्टी और सोनिया गांधी के लिए मुसीबत खड़ी करेंगे,
उन्हें अर्जुनसिंह के वक्त्व्य से निराशा ही हाथ लगी। शक की सुई को उन्होंने
गृह मंत्रालय की तरफ कर दिया। जिसके मंत्री वी. पी. नरसिंहराव थे। ये वही
नरसिंहराव थे जिन्हें सोनिया गांधी के निर्देश पर प्रधानमंत्री और
कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया था लेकिन प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष
बनते ही इन्होंने सोनिया गांधी की उपेक्षा प्रारंभ कर दी थी। तब बड़े
बड़े कांग्रेसी वफादार नरसिंहराव के प्रति अपनी वफादारी व्यक्त कर रहे
थे। बोफोर्स के मामले में राजीव गांधी को मृत्यु के बाद भी उलझाने का
प्रयास कर रहे थे।
तब अर्जुनसिंह ने ही नरसिंहराव के विरूद्घ शंखनाद किया था। नरसिंहराव को
कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की थी। राजीव गांधी के हत्यारों के मामले
में ढिलायी से लेकर बाबरी मस्जिद विध्वंस के मामले में मुसलमानों से माफी
मांगने का मुद्दा उठाया था। मंत्री पद से इस्तीफा दिया था। उस समय बहुत
से कांग्रेसी अर्जुनसिंह के मुद्दों से तो सहमत थे लेकिन सत्ता सुख
छोड़कर नरसिंहराव के विरूद्घ खड़े होने की हिम्मत नहीं दिखा रहे थे।
अर्जुनसिंह को अनुशासनहीनता की नोटिस दी गई और उनके द्वारा दिए गए जवाब
को नकार कर अर्जुनसिंह को पार्टी से ही निकाल दिया। बहुत पुराना इतिहास
नहीं है। तब यही मनमोहन सिंह, प्रणव मुखर्जी जैसे गांधी परिवार के वफादार
नरसिंहराव के साथ खड़े थे।
नरसिंहराव के नेतृत्व में कांग्रेस ने चुनाव लड़ा और कांग्रेस सत्ताच्युत
हो गयी। राजीव गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति से बनी सरकार को
कांग्रेस के वफादार नरसिंहराव के नेतृत्व में बचा नहीं सके। तब सीताराम
केसरी को पार्टी अध्यक्ष बनाया गया। सोनिया गांधी के जोर देने पर
अर्जुनसिंह और उनके समर्थकों को कांग्रेस में वापस लिया गया। अंतत:
सोनिया गांधी को ही कांग्रेस की कमान अध्यक्ष के रूप में संभालनी पड़ी।
विश्वास अविश्वास के बीच झूलती कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाने के लिए
सोनिया गांधी ने अथक प्रयास किया। सोनिया गांधी के साथ हर कदम पर
अर्जुनसिंह खड़े रहे। वह दिन भी आया जब धर्मनिरपेक्षता के नाम पर
कांग्रेस के विरूद्घ खड़ी राजनैतिक पार्टियों ने सोनिया गांधी के साथ
गठबंधन किया और गठबंधन की नेता सोनिया गांधी को माना। कांग्रेस संसदीय दल
की नेता सोनिया गांधी चुनी गयी और उन्हें ही प्रधानमंत्री बनने के लिए
कांग्रेस सहित गठबंधन के दलों ने कहा लेकिन जब सब तरफ यह संदेश प्रसारित
हो रहा था कि सोनिया गांधी प्रधानमंत्री होंगी तब बड़े ही नाटकीय ढंग से
सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद स्वीकार करने से इंकार कर दिया। सभी
समर्थकों ने उन्हें मनाने की कोशिश की लेकिन वे नहीं मानी।
स्वाभाविक था कि ऐसे में किसी ऐसे व्यक्ति का वे चयन करती जो उनके प्रति
पूरी तरह से वफादार होता। अर्जुनसिंह का पहला नाम था जिसका चुनाव
प्रधानमंत्री के लिए सोनिया गांधी को करना चाहिए था। अर्जुनसिंह का चयन
करने के बदले सोनिया गांधी ने चयन मनमोहन सिंह का किया। जो वफादारी के
नाम पर नरसिंहराव के वफादार थे और उन्हीं के कारण कांग्रेस की राजनीति
में सीधे वित्त मंत्री बनकर आए थे। अर्जुनसिंह की जगह कोई भी व्यक्ति
होता तो उसे झटका अवश्य लगता लेकिन अर्जुनसिंह ने किसी भी तरह की नाराजगी
व्यक्त नहीं की। उन्हें मंत्रिपरिषद में लिया गया और मानव संसाधन मंत्री
बनाया गया। मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल में वे 5 वर्ष तक मंत्री रहे लेकिन
फिर जब चुनाव जीत कर कांग्रेस सत्ता में आयी तो अर्जुनसिंह को मंत्रिमंडल
में नहीं लिया गया। कारण बताया गया कि अर्जुनसिंह को मनमोहन सिंह पसंद
नहीं करते। मतलब सोनिया गांधी की पसंद का कोई अर्थ नहीं।
यह वही अर्जुनसिंह हैं जिनके नेतृत्व में मध्यप्रदेश में भोपाल गैस
त्रासदी के बावजूद कांग्रेस ने लोकसभा की 40 में से 40 सीटें जीती थी। यह
इतिहास है और ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। विधानसभा की भी 320 सीटों में से
कांग्रेस ने 240 सीटें जीती थी। अर्जुनसिंह पुन: मुख्यमंत्री बने और बनते
ही राजीव गांधी के निर्देश पर मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया।
उन्हें राजीव गांधी ने पंजाब का राज्यपाल बना दिया। उस पंजाब का जहां
आतंकवाद ने लोगों का जीवन नर्क बना दिया था। वहाँ किसी के भी सफल होने की
कोई संभावना नहीं थी लेकिन विपरीत परिस्थितियों में भी अर्जुनसिंह ने
पंजाब में चमत्कार किया और एतिहासिक राजीव लोंगोवाल समझौता कराया। चुनाव
कराए और शांति के लौटने के लिए राह प्रशस्त किया। उसके बाद उन्हें केंद्र
सरकार में मंत्री बनाया गया। दक्षिण दिल्ली से चुनाव लड़ाया गया। जहां से
अर्जुनसिंह चुनाव जीतकर आए और यही वह सीट है जहां से मनमोहन सिंह चुनाव
जीत नहीं सके थे। अर्जुनसिंह को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया। पूरी
वफादारी से गांधी परिवार और कांग्रेस की सेवा करने का अर्जुनसिंह का
रिकार्ड रहा।
अल्पसंख्यकों के विश्वास को कांग्रेस के प्रति कायम रखने में अर्जुनसिंह
की भूमिका अहम रही। इसके कारण तो भाजपाई उन्हें मौलाना अर्जुनसिंह तक
कहते थे। आज उम्र की जिस दहलीज पर वे खड़े हैं तब उन्हें जिस तरह की
तवज्जो कांग्रेस को देना चाहिए, वह नहीं दे रही है। उनके हमउम्र
मंत्रिमंडल में बने हुए हैं और उनसे कहा जा रहा है कि वे किसी राज्य का
राज्यपाल बन जाएं। इसके बावजूद कल राज्यसभा में अपने वक्तव्य से
अर्जुनसिंह ने पुन: सिद्घ किया कि वे गांधी परिवार के वफादार हैं। वे
चाहते तो कह सकते थे कि राजीव गांधी के कहने पर एंडरसन को छोड़ा गया।
उनका इतना कहना कांग्रेस के लिए कितना नुकसानदायी साबित होता, इसकी
कल्पना की जा सकती है। कितने लोग हैं जिन्होंने राजीव गांधी के प्रति ऐसी
वफादारी दिखायी। स्वयं प्रणव मुखर्जी राजीव गांधी की खिलाफत कर पार्टी
छोड़कर अपनी पार्टी एक जमाने में बना चुके हैं। मनमोहन सिंह तो जीवन भर
नौकरशाह रहे और सीधे वित्त मंत्री के रूप में कांग्रेस में आए। सभी
वफादारों को पीछे छोड़ते हुए वे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज हैं।
सरकार के पिछले कार्यकाल में जो लोकप्रियता मिली, वह आज तो नहीं है। देश
महंगाई, आतंकवाद, अलगाववाद जैसी समस्याओं से दो चार हो रहा है। भ्रष्ट
मंत्रियों के साथ जो व्यवहार होना चाहिए वह करने में मनमोहन सिंह सफल
नहीं हो रहे हैं। तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी आशा की किरण
अर्जुनसिंह जैसे कांग्रेसी ही हैं लेकिन उन्हें उचित सम्मान क्या सोनिया
गांधी दे सकेंगी?
-विष्णु सिन्हा
12-8-2010
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