यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं
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शनिवार, 13 नवंबर 2010

बराक और मिशेल ओबामा ने भारत यात्रा में भारतीयों के दिल में जगह बनाने की कोशिश की

दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा
हैं। हर समय उनके पास वह बटन होता है जिसे दबाने से दुनिया में
त्राहि-त्राहि मच सकती है और उसे दबाने के लिए किसी से इजाजत लेने की भी
उन्हें जरुरत नहीं है। वह अमेरिका जिसके सामने हमारे हुक्मरान कभी अनाज
के लिए कटोरा लेकर खड़े रहते थे कि हमारी भूख मिटाओ। उसी अमेरिका का
राष्टपति आज हमारे पास आया है कि हमारी मदद करो। इसी को वक्त का बदलना
कहते हैं। मुंबई में जो व्यापारिक समझौते हुए उससे राष्टपति बराक
ओबामा के चेहरे पर प्रसन्नता दिखायी दी। क्योंकि अब इन समझौतों के कारण
अमेरिका में 50 हजार से अधिक बेरोजगारों को नौकरी मिल जाएगी। आर्थिक मंदी
से जूझते अमेरिका को आज इसकी सबसे ज्यादा जरुरत है। भारत में अमेरिका का
आयात बढ़े। महात्मा गांधी के प्रशंसक बराक ओबामा ने यह कहने में हिचक
महसूस नहीं की कि महात्मा गांधी भारत के ही नहीं, दुनिया के महानायक हैं।
किसी के भी हृदय में प्रवेश करने के लिए उसके बच्चे सबसे अच्छा माध्यम
होते हैं। किसी के भी सामने उसके बच्चों को प्रसन्न करें तो उसके माता
पिता प्रसन्न ही होते हैं। इस मर्म को भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित
जवाहर लाल नेहरु ने अच्छी तरह से समझा था और भारतीय बच्चों के लिए वे
चाचा नेहरु थे। वर्षों भारतीयों में उनकी लोकप्रियता का यह भी प्रमुख
कारण रहा। बराक ओबामा भी इस राज को अच्छी तरह से समझते हैं। इसलिए मुंबई
में बच्चों के साथ नृत्य करने में बराक ओबामा और उनकी पत्नी मिशेल ओबामा
को कोई हिचक महसूस नहीं हुई। टीवी के माध्यम से अधिकांश भारतीयों ने
दोनों पति पत्नी को बच्चों के साथ कोली नृत्य में थिरकते देखा। इसके साथ
ही दिल्ली में हुमायूं के मकबरे पर मकबरे की देखरेख करने वाले मजदूरों के
बच्चों के साथ जो हृदय स्पर्शी व्यवहार दोनों ने किया, वह दृश्य भी
संवेदनशीलता का संदेश दे गया। बच्चों के सामने घुटने टेक कर बराक ओबामा
का बैठना उनकी विनम्रता का परिचायक तो था ही, इंसानियत का भी परिचायक था।
दुनिया का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति जिसके रोएं-रोएं से अहंकार ही झलकना
चाहिए था, उसकी विनम्रता मन को मोहने वाली लगी। कहां तो छोटा सा पद पा कर
ही लोग इतने अहंकारी हो जाते हैं कि किसी को कुछ समझते नहीं। झुकने की
बात तो सोच भी नहीं सकते। वहीं जिस सहजता से मिट्टी पर ही घुटने टेक कर
ओबामा बैठ गए यह भारतीय पदाधिकारियों के लिए सीखने की बात है। सबसे बड़ी
बात तो यही थी कि बराक और मिशेल की भाव भंगिमाओं से कहीं से भी बनावट की
झलक नहीं मिल रही थी। सरल, सहज, सामान्य हावभाव, भंगिमाएं उनकी विनम्रता
का ही बोध करा रही थी। आलोचक कुछ भी कहें लेकिन अपनी मुस्कान से ही बराक
ने भारतीयों का दिल जीत लिया है। जिस प्रेम से बराक ओबामा ने भारत के
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को हवाई अड्डे पर गले से लगाया, उससे तो
मनमोहन सिंह ही धन्य-धन्य हो गए। यह उनके चेहरे से ही दिखायी दे रहा था।
शीत युद्ध के समय अमेरिका और रुस दुनिया की दो बड़ी शक्तियां थी। उस समय
भारत की दोस्ती रुस के साथ थी। स्वाभाविक रुप से इसका दूसरा पक्ष  पाकिस्तान अमेरिका
की दोस्ती के रुप में था। रुस के विश्व शक्ति न रहने के बाद अब दुनिया के
हालात बदले हैं। अमेरिका के समानान्तर अब चीन एक शक्ति के रुप में उभर
रहा है। भविष्य का आंकलन करने वाले कह रहे हैं कि अमेरिका के बराबर चीन
जल्द ही खड़ा हो जाएगा। आर्थिक मंदी से वैसे भी अमेरिका तकलीफ में है।
इसके विपरीत भारत और चीन फल  फूल रहे हैं। अमेरिका अफगानिस्तान में फंसा
हुआ है और जुलाई तक उसके अफगानिस्तान से बाहर निकलने की उम्मीद है। अभी
अमेरिका को पाकिस्तान की ज्यादा जरुरत है। इसलिए वह दिल खोलकर उसकी मदद
करने के लिए भी बाध्य है। ऐसे में भारत अमेरिका से दोस्ती की शर्त के रुप
में पाकिस्तान पर अमेरिका का दबाव देखना चाहता है तो यह भारत की मांग कुछ
ज्यादा है। अमेरिका यह भी जानता है कि पाकिस्तान की चीन से दोस्ती भी है
और चीन हर तरह से पाकिस्तान की मदद कर रहा है। पाकिस्तान को परमाणु शक्ति
संपन्न बनाने में भी चीन का हाथ है।

अमेरिका ने जब भारत के साथ परमाणु समझौता किया तब पाकिस्तान ने भी
अमेरिका से इसकी मांग की थी लेकिन अमेरिका ने इंकार कर टका सा जवाब दे
दिया था। व्यापार की दृष्टि से देखें, दोस्ती की दृष्टि से देखें तो
अमेरिका ने पाकिस्तान के बदले भारत को तव्वजो दी। यह ठीक है कि इसमें
अमेरिका का हित निहित था लेकिन अंतर्राष्टरीय राजनीति में अपना हित
देखना तो सभी का कर्तव्य है। भारत की यात्रा पर आए बराक ओबामा को भारत के
साथ पाकिस्तान आने के लिए भी पाकिस्तान ने कम जोर नहीं  लगाया लेकिन बराक
ओबामा ने इंकार कर दिया और कहा कि अगले वर्ष वे पाकिस्तान आएंगे। साफ है
कि पाकिस्तान की तुलना में भारत को बराक ओबामा ने ज्यादा तव्वजो दी।
भविष्य की दृष्टि से देखें तो यह कम बड़ी उपलब्धि नहीं है भारत की। बराक
ओबामा जब सेंट जेवियर स्कूल के बच्चों को कहते हैं कि एक स्थिर पाकिस्तान
भारत के लिए फायदेमंद हैं तो वे गलत क्या कहते हैं?

यह सही है कि यूरोप के देश अब अपने यहां किसी तरह का युद्ध नहीं चाहते
लेकिन एशिया में युद्ध के हालात जिस तरह से बनते हैं, उसमें हथियारों के
लिए एशिया बड़ी मंडी दिखायी देता है। भारत ही सबसे बड़ा खरीददार दिखायी
देता है। भारत खरीदने भी जा रहा है तो भारत के तरफ झुकाव भी स्वाभाविक
है। चीन की बढ़ती ताकत भारत के लिए खतरे से खाली नहीं है। भारत की प्रगति
से चीन को भी खतरा दिखायी देता है। तब चीन का मित्र अमेरिका बने या भारत
का तो लक्षण यही दिखायी देता है कि भारत का मित्र अमेरिका बने। अभी तो
दोस्ती का प्रारंभ हो रहा है और जिस तरह से भारत आर्थिक विकास कर रहा है,
यूरोप के देशों की नजर भारत पर है। प्रजातांत्रिक देश होने के कारण वैसे
भी भारत प्रजातांत्रिक देशों के ज्यादा समीप है। ओबामा ने स्वयं कहा है
कि भारत बढ़ती हुई ताकत नहीं है बल्कि भारत एक महाशक्ति है। हम स्वयं
नहीं मानते इस बात को लेकिन यह जरुर जानते हैं कि विकास का रथ इसी तरह से
सरपट भागता रहा तो वह दिन दूर नहीं है जब भारत वास्तव में महाशक्ति होगा।
दुनिया में यह बात चीन और पाकिस्तान को रास नहीं आने वाली है। हालांकि
किसी को रास आए या नहीं इससे कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन ये दोनों जिस तरह
से तनाव बढ़ाने का काम करते हैं, उसके पीछे कारण भी यही है कि बढ़ते भारत
को रोका जाए। आज अमेरिका को भारत की जरुरत महसूस हो रही है तो यह भारत के
लिए शुभ संदेश है। बराक ओबामा की यात्रा से यह संदेश तो उन लोगों को मिल
ही गया कि भारत और अमेरिका की बढ़ती दोस्ती उनके इरादों को असफल करने में
सक्षम है। वैसे भी भारतीय मूल के अमेरिकियों का प्रभाव अमेरिका में बढ़
रहा है। भारतीय मूल की एक अमेरिकी महिला एक राज्य की गवर्नर ही चुनी गयी
है। भारतीयों ने अमेरिका पर अच्छा प्रभाव डाला है। इस सबका असर भविष्य
में और स्पष्ट दिखायी देगा।

- विष्णु सिन्हा
दिनांक : 08.10.2010
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मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

मंदिर मस्जिद ही नहीं हर समस्या को सुलझाने के लिए समझौता ही सर्वश्रेष्ठ रास्ता है

लखनऊ खंडपीठ का फैसला मील का पत्थर साबित होने जा रहा है। अखिल भारतीय
अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत ज्ञानदास, मोहम्मद हाशिम अंसारी और रामलला
विराजमान की ओर से डा. रामविलास वेदांती के बीच जो चर्चाएं हो रही हैं,
उससे लगता है कि समझौते के लिए मार्ग प्रशस्त होगा। दूसरी तरफ उच्चतम
न्यायालय में अपील करने की भी तैयारी के साथ आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल
बोर्ड निर्णय करने वाला है कि आगे क्या कदम उठाया जाए? सुन्नी वक्फ बोर्ड
के वकील उच्च न्यायालय में रहे जफरयाब जिलानी के विषय में हाशिम अंसारी
का कहना है कि सुलह की उनकी कोशिशो  के लिए उन्हें धमकियां दी जा रही
हैं और उनकी जान को खतरा है। पुलिस सुरक्षा के इंतजाम हाशिम अंसारी के
लिए किए गए हैं और अखाड़ा परिषद ने  भी घोषणा की है कि हाशिम अंसारी की
सुरक्षा उनके साधु संत करेंगे। जमीयत उलेमा हिन्द के अध्यक्ष मौलाना
मोहम्मद मदनी ने कहा है कि मुस्लिम समाज को उच्च न्यायालय का फैसला मानना
चाहिए। फैसले को कबूल करना देश के व्यापक हित में है।

बड़ों की बात जाने दें तो आम भारतीय चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान इस
विवाद को आगे बढ़ाने के पक्ष में नहीं है। अखाड़ा परिषद और हाशिम अंसारी
के बीच जो चर्चाएं हो रही हैं, उसको व्यक्त नहीं किया जा रहा है लेकिन जो
खबर है, वह तो यह है कि हिंदू मस्जिद निर्माण में कारसेवा करें और
मुसलमान मंदिर निर्माण में। मतलब साफ है कि हिंदू मुसलमान मिल जुलकर
मंदिर मस्जिद बनाएं और देश में सांप्रदायिक सौहार्द्र का ऐसा वातावरण
निर्मित हो जिसकी वास्तव में देश को जरूरत है। मंदिर मस्जिद को लेकर
लड़ते हिंदू मुसलमान राजनीतिज्ञों को भले ही हितकर लगें लेकिन आम आदमी को
हितकर नहीं लगते। इसलिए जो भी देश और आम आदमी का हितचिंतक होगा वह आगे
सुप्रीम कोर्ट में ले जाने के लिए इस विवाद का समर्थक नहीं हो सकता।

वायु सेना के प्रमुख वायु सेना दिवस पर अपने सैनिकों से कह रहे हैं कि
देश ज्वालामुखी पर बैठा है और देश को बाह्य खतरे और आंतरिक खतरे से
सुरक्षित रखने के लिए हमें हर समय तैयार रहना चाहिए। देश के आम आदमी के
सामने वैसे भी समस्याओं की कमी नहीं है। महंगाई के साथ ही हिंसक
गतिविधियां अंतत: नुकसान तो आम आदमी का ही करती हैं। किसी के राजनैतिक
लाभ के लिए राम और रहीम को बांटा जाए यह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं
है। हिंदुओं और मुसलमानों का उपयोग वोट बैंक की तरह हो, यह इन्हीं के
सोचने का विषय है कि क्या ये वस्तु हैं जो लोग इनका उपयोग करें। यह सबसे
अच्छी बात हो रही है कि समझौते का प्रयास गैर राजनीतिक लोग कर रहे हैं।
गैर राजनैतिक लोग जब किसी समस्या या विवाद का हल करते हैं तो स्पष्ट
मस्तिष्क और शुद्घ हृदय से करते हैं। उनके मन में किसी तरह की कुटिलता के
लिए जगह नहीं होती। इसलिए वे सर्वहित में निर्णय करने में समर्थ होते
हैं।

भारत में ही मंदिर मुसलमान बना सकता है और मस्जिद हिंदू। यही भारत की
गंगा जमुना संस्कृति का अर्थ भी है और यही असली धर्मनिरपेक्षता भी है।
रामलला के लिए कपड़े, माला कोई मुसलमान बनाता है तो यही हमारी असली
संस्कृति है। ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह पर जितनी श्रद्घा कोई मुसलमान
प्रगट करता है, उतनी ही श्रद्घा हिंदू भी प्रगट करता है। दुख में सुख में
सबकी एक समान सहभागिता है। राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद के मुकदमे के लिए
न्यायालय जाते समय जब एक ही टांगे पर बैठकर दोनों पक्ष जाते थे तो यह
भारत में ही संभव है। आज दोनों मिलकर मामले को सुलझा लेना चाहते हैं तो
यह उनका अधिकार है। जब यह विवाद न्यायालय में प्रारंभ हुआ था तब किसने
सोचा था कि यह मामला पूरे देश को झकझोर देगा लेकिन अब अयोध्या वासी ही
नहीं चाहते कि यह मामला और आगे न्यायालय में चले तो सारे देश को उनकी सोच
का सम्मान करना चाहिए।

आज दुनिया में तेजी से भारत की प्रतिष्ठï बढ़ रही है। कामन वेल्थ गेम्स
देश  ने सफलता पूर्वक करवा लिया। तैयारियों को लेकर कितनी आलोचनाएं की
गई। शायद वे जरूरी थी। क्योंकि आलोचना नहीं होती तो आज जो तैयारी हुई
हैं, उसमें मीनमेख निकाला जा सकता था। सारी दुनिया भारत की तैयारियों को
देखकर आश्चर्यचकित हैं और उद्घाटन समारोह की तो पूरी दुनिया की मीडिया ने
तारीफ की है। भारत के खिलाड़ी खेलों में भी आश्चर्यजनक रूप से सफल हो रहे
हैं। खेलों में मिल रही सफलता से पूरा देश गदगद है। अब तो यह भी कहा जा
रहा है कि भारत ओलंपिक कराने की पात्रता रखता है। क्या यह देश के लिए
गर्व की बात नहीं है? भारत से जलन की भावना रखने वाले भी आश्चर्यचकित हैं
कि यह सब भारत में संभव कैसे हो गया? क्योंकि तैयारियों को लेकर जिस तरह
की आलोचनाएं हो रही थी, उससे तो लगता था कि देश की छवि खराब होगी। अब
किसी को कोई गिला शिकवा नहीं है और देश का नागरिक गर्व का अनुभव कर रहा
है। यह तो पहली बार पता चल रहा है कि वास्तव में खेलों को प्रोत्साहन
मिले तो देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है।

खेलों के बाद दूसरी बड़ी बात है, अमेरिका के राष्टपति बराक ओबामा की
भारत यात्रा। अपने कार्यक्रम से दो दिन पहले ओबामा ठीक दीपावली के दिन
भारत आ रहे हैं। दीपावली बहुसंख्यक हिंदुओं का सबसे बड़ा त्यौहार है।
बराक ओबामा भारत की दीपावली देखना चाहते हैं। उनकी तो सोच है कि भारत
तेजी से आगे बढ़ रहा देश है। विश्वव्यापी मंदी मे भी भारत ने अपनी
विकास  8.5 प्रतिशत बनाए रखी है तो यह बहुत बड़ी उपलब्धि है, भारत की।
फिर ओबामा दीपावली की रात उसी ताज होटल में मनाने जा रहे हैं जो
आतंकवादियों का शिकार हुआ था और आज फिर से सीना तानकर खड़ा है। ओबामा ने
स्पष्ट भी किया है कि आतंकवाद के विरूद्घ युद्घ में वह भारत के साथ हैं।
ओबामा भी यह बात अच्छी तरह से समझते हैं कि अमेरिका का कोई वास्तव में
मित्र हो सकता है तो वह भारत है। भारत दोस्ती करना जानता है तो उसे
निभाना भी जानता है। ओबामा के लिए आदर्श है डा. मार्टिन लूथर किंग और
महात्मा गांधी। जबकि मार्टिन लूथर किंग महात्मा गांधी को अपना मार्गदर्शक
मानते थे और अमेरिका में गांधी जी की तरह सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाया था।
अब यह भारतीयों की ही सोच का विषय है कि वे मंदिर मस्जिद को लेकर ही
लड़ते रहेंगे या फिर दुनिया में बढ़ती भारत की शक्ति को बढ़ाने में अपनी
ऊर्जा खर्च करेंगे। यह उनकी ही सोच का विषय है कि वे अपनी भावी पीढ़ी के
लिए देश को कैसी सौगात देना चाहते हैं। उच्च न्यायालय के फैसले के बाद
सर्वोच्च न्यायालय में जाने का संवैधानिक अधिकार भले ही हो लेकिन विवाद
में ही उलझे रहना अक्लमंदी है, क्या? आज दुनिया देख रही है, भारत की तरफ।
आज दुनिया को शांति और अहिंसा की जरूरत है। भारत के पास अवसर है कि वह
दुनिया को दिखाए कि देखों कैसे शांति से रहा जा सकता है। चुनाव हमारे हाथ
में है और हमे ही चुनना है कि हम चाहते क्या है ?
- विष्णु सिन्हा
09-10-2010


गुरुवार, 23 सितंबर 2010

अमेरिका की घटती और चीन की बढ़ती ताकत के कारण भारत के पास अपनी ताकत बढ़ाने के सिवाय और क्या चारा ?

हम गर्व कर सकते हैं, यह जानकर कि भारत दुनिया की सबसे बड़ी तीसरी ताकत
आज है और 2025 में भी भारत तीसरी बड़ी ताकत रहेगा। आज हमारी ताकत 8 फीसदी
है जो 2025 में बढ़कर 10 फीसदी हो जाएगी। अमेरिका आज दुनिया की सबसे बड़ी
ताकत है और उसके पास दुनिया की कुल ताकत का 22 फीसदी है। चीन दूसरी बड़ी
ताकत है और उसके पास आज दुनिया की कुल ताकत का 12 प्रतिशत है।  भारत 8 और
चीन 12 प्रतिशत का अर्थ होता है कि चीन की ताकत हमारी ताकत से डेढ़ गुना
है। भारत और चीन की ताकत को जोड़ भी दिया जाए तो 20 प्रतिशत होता है।
जबकि अमेरिका की ताकत 22 प्रतिशत है। मतलब साफ है कि आज दुनिया की दूसरी
और तीसरी ताकत मिल कर भी अमेरिका की ताकत से कम है लेकिन 2025 में स्थिति
बहुत कुछ बदल जाएगी। क्योंकि अनुमान यह कहता है कि तब अमेरिका की ताकत 18
प्रतिशत हो जाएगी जबकि चीन की 16 और भारत की 10 प्रतिशत हो जाएगी। जिसका
सीधा और साफ मतलब है कि चीन अमेरिका के लगभग समकक्ष खड़ा हो जाएगा।
भारत की ताकत 2 प्रतिशत बढ़ेगी तो चीन की ताकत 4 प्रतिशत और अमेरिका की
ताकत 4 प्रतिशत कम हो जाएगी। ये कोई ओलंपिक या कामनवेल्थ गेम्स के परिणाम
नहीं हैं कि कौन प्रथम, कौन द्वितीय या कौन तृतीय से फर्क नहीं पड़ता।
रूस के कमजोर होने के बाद जिस तरह से दुनिया का संतुलन बदला और
सर्वशक्तिशाली राष्ट्र  अमेरिका ही रह गया, उसके बाद दुनिया में निर्णयों
को लेकर अमेरिका की पूरी तरह से दादागिरी स्थापित हो गयी। फिर भी एक
प्रजातांत्रिक राष्ट्र  होने के कारण दुनिया के लिए अमेरिका किसी खतरे की
तरह नहीं हुआ बल्कि आतंकवाद का सबसे कड़वा स्वाद उसे ही चखना पड़ा। उसने
आतंकवादी नेता ओसामा बिन लादेन की खोज में अफगानिस्तान में अपनी फौज भेजी
और इराक में अपनी फौज भेजकर सद्दाम के शासन का खात्मा किया। फिर भी ओसामा
बिन लादेन को पकड़ पाने में अमेरिका अभी तक तो असफल ही सिद्घ हुआ। इससे
अमेरिका की प्रतिष्ठïा को नुकसान हुआ। उसने पाकिस्तान से दोस्ती की लेकिन
उसका जो लाभ उसे मिलना चाहिए था, वह भी नहीं मिला। पाकिस्तान अमेरिका और
चीन दोनों से दोस्ती का राग अलापता है और आतंकवादियों को जन्म देने का
कारखाना भी पाकिस्तान में ही है।

अमेरिका कुल जोड़ घटाना से अच्छी तरह से समझ रहा है कि पाकिस्तान ने उससे
दोस्ती का राग अलाप कर हर तरह का लाभ उठाया लेकिन उपहार में काश्मीर की
भूमि चीन को दी। आज काश्मीर का 44 प्रतिशत भाग भारत के पास है तो 36
प्रतिशत भाग पाकिस्तान के पास और चीन के पास 20 प्रतिशत भाग है। चीन ने
पाकिस्तान को परमाणु संपन्न राष्ट्र  बनाया। आज भी चीन पाकिस्तान में
परमाणु ऊर्जा संयंत्र लगा रहा है।  ऐसा कोई समय आया कि पाकिस्तान को अपने
कब्जे वाला काश्मीर छोडऩा पड़ा तो वह उस पर भारत के बदले चीन का कब्जा
होना पसंद करेगा। चीन की विस्तारवादी नीति से सारी दुनिया अच्छी तरह से
परिचित है। भारत की लाखों वर्ग किलोमीटर भूमि पर उसने कब्जा किया हुआ है
और अभी भी उसका दावा समाप्त नही  हुआ है।

अमेरिका को यह बात तो अच्छी तरह से समझ में आ गयी है कि एशिया में उसका
कोई विश्वसनीय मित्र हो सकता है तो वह भारत ही है। इसीलिए भारत के प्रति
उसके झुकाव में वृद्घि हुई है। अमेरिका के साथ यूरोपीय संघों के देश भी
इस बात को अच्छी तरह से समझ रहे हैं कि चीन की बढ़ती ताकत विश्व शांति के
लिए खतरा है। चीन पर यदि लगाम नही  लगाया जा सका तो उसकी विस्तारवादी
नीति सभी के लिए खतरा ही पैदा करेगी। चीन की आबादी दुनिया में सबसे अधिक
है और उसके बाद भारत का ही नंबर आता है। अनुमान तो यह लगाया जा रहा है कि
भारत और किसी मामले में चीन को पीछे छोड़े न छोड़े लेकिन जनसंख्या के
मामले में पीछे छोड़ देगा। कुछ दिन पहले ही समाचार पत्रों में आंकड़े
छपे थे कि 2025 तक चीन की आबादी का करीब 28 प्रतिशत हिस्सा 60 वर्ष से
ऊपर के बुजुर्गों का होगा। जिस प्रकार की शासन व्यवस्था चीन में है,
उसमें इन बुजुर्गों के पालने की जिम्मेदारी सरकार की है तब चीन की आर्थिक
स्थिति को इससे नुकसान पहुचेगा परंतु चीन में एक पार्टी की सरकार है और
इसे तानाशाही व्यवस्था कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। इसलिए चीन के
हुक्मरान अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए कुछ भी कर सकते हैं। एक
बार जिसे ताकत की भूख प्यास लग जाए, वह क्रूरता की हद को भी पार कर जाता
है। फिर राष्टहित में सब कुछ करने की आजादी प्राप्त कर लेता है।
आंकड़े और अनुमान के अनुसार ही प्रकृति के कारोबार नहीं चलते। सब कुछ
सामान्य रहा तब की स्थिति का आंकलन आज किया जा सकता है लेकिन सब कुछ ऐसा
ही रहेगा, जैसा आज है, यह कोई नहीं जानता। आज ही सब कुछ ठीक कहां है?
प्रकृति का प्रकोप तो चीन, भारत और पाकिस्तान सभी जगह दिखायी दे रहा है।
मनुष्य भी ऊपर ऊपर शांत भले ही दिखायी देता हो लेकिन असंतोष मन में सुलग
तो रहा है। राजनीति अपने स्वार्थ के लिए असंतोष को हवा देने में भी पीछे
नहीं है। और कोई मुद्दा न मिले तो धर्म को ही मुद्दा बनाकर अशांति फैलाने
की कोशिश भी  सर्वत्र दिखायी देती है। धार्मिक उन्माद फैलाने की कोशिश
भारत में ही नहीं अमेरिका में भी फैलाने की कोशिश करने वालों की कमी नहीं
है। प्राकृतिक प्रकोप बिना किसी धार्मिक भेदभाव के सबके साथ एक तरह का
व्यवहार करता है। आज जो दुनिया में ताकत का अनुमान लगाया जा रहा है, यह
भी प्रकृति के कहर के सामने किसको कितना ताकतवर बनाएगा या कमजोर यह तो
वक्त आने पर ही पता चलेगा।

कोई भी राष्ट्र  कितना भी शक्तिशाली हो गया लेकिन गरीबी तो कायम है। भारत
में ही गरीब हैं, ऐसा नहीं है। चीन और अमेरिका में भी गरीब हैं। वह तो
कहा ही गया है कि जब एक अट्टïलिका खड़ी होती है तो उसको बनाने वालों की
झोपडिय़ां भी पास में ही बनती है। जहां तक किसी भी तरह की शक्ति या ताकत
का प्रश्र है तो वह चंद लोगों की मुट्ठियों में ही कैद होती है। आम आदमी
उस ताकत का उपभोक्ता नहीं होता। पीडि़त पक्ष भले ही हो। ताकत यदि शांति,
सहृदय, करूणा को विस्तारित नहीं करती तो आततायी के हाथों में ताकत तो
इंसान के लिए सदा से खतरे का कारण रही है। भारत भले ही गर्व करे कि वह
दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी ताकत है और दिन ब दिन तो उसकी ताकत में वृद्घि
ही होगी लेकिन यह ताकत मूल्यों को स्थापित करने के काम आएगी या नष्ट
होते हुए सामाजिक मूल्यों का और बंटाधार करेगी। ताकत अक्सर तो अहंकार की
पोषक होती है लेकिन मजबूरी भी है। पड़ोस में दुर्दान्तों के पास ताकत बढ़
रही हो तो ताकत की दौड़ में शामिल होने के सिवाय चारा क्या है? भारत की
बाध्यता है कि चीन को अपनी सीमाओं तक बंधे रहने के लिए बाध्य करने के लिए
वह चीन से भी बड़ी ताकत बने। फिर इसकी कीमत आम जनता को जिस भी तरह से
चुकानी पड़े।

- विष्णु सिन्हा
22-09-2010

शनिवार, 18 सितंबर 2010

यह पृथकतावादियों को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि काश्मीर भारत से अलग नहीं हो सकता

काश्मीर के मामले में सर्वदलीय बैठक हो गयी। बैठक का नतीजा तो ऐसा निकला
नहीं कि लगे समस्याओं का समाधान हो गया। हिंसा छोड़कर बातचीत करने का
आव्हान किया है लेकिन कौन हिंसा छोड़ें और किससे बातचीत करेंगे। बातचीत
करेंगे भी तो किस विषय में बातचीत करेंगे। सेना के अधिकार कम करेंगे या
सेना को ही वापस बुला लेंगे? इससे समस्या का समाधान होता तो कब का हो गया
होता। अलगाववादी तत्व और आतंकवादी जो खेल, खेल रहे हैं, उसमें सेना की
वापसी का अर्थ तो यही होगा कि राम भरोसे काश्मीर को छोड़ दिया जाए। डर ही
एकमात्र सेना का है और सेना के कारण ही काश्मीर भारत का अविभाज्य अंग बना
हुआ है। जब आतंकवादियों और पृथकतावादियों ने काश्मीरी पंडितों को
काश्मीर में नहीं रहने दिया और अब सिक्खों को धमका रहे हैं तो इसी से
उनकी मानसिकता समझ में आती है। पाकिस्तान और चीन दोनों ही चाहते हैं कि
काश्मीर अशांत क्षेत्र बना रहे। इसी में उन्हें फायदा नजर आता है। जब चीन
अपने नक्शे में काश्मीर को भारत के कब्जे वाला काश्मीर दिखाता है तब उसकी
मंशा स्पष्ट हो जाती है।

तमाम तरह की समस्याओं के बावजूद भारत विकासशील से विकसित राष्ट्र  की तरफ
कदम बढ़ा रहा है लेकिन पाकिस्तान की हालत और खासकर आर्थिक हालत पूरी तरह
से चरमरा गयी है। ऋणों के बोझ तले दबे पाकिस्तान के वित्त मंत्री कह रहे
हैं कि उनके पास अपने कर्मचारियों को देने के लिए मात्र 2 माह का ही वेतन
शेष है। 2 करोड़ के करीब आबादी बाढ़ की चपेट में आकर बेघर हो गयी है और
कहा जा रहा है कि 50 लाख लोगों ने अपनी नौकरी, रोटी रोजगार गंवा दिया है।
साफ दिखायी दे रहा है कि यदि अमेरिका या अन्य देशों ने पाकिस्तान की
आर्थिक मदद नहीं की तो पाकिस्तान दिवालिया अब हुआ कि तब। फौज और आईएसआई
का ही भारी खर्च पाकिस्तान के लिए भारी पड़ रहा है और इसीलिए उम्मीद तो
यही किया जा रहा है कि सरकार को अपदस्थ कर फौज पुन: सत्ता संभाल लेगी
लेकिन इससे समस्या का हल तो होने वाला नहीं। असल में तो अमेरिका ही
एकमात्र सहारा है पाकिस्तान के लिए, उसने हाथ खींच लिया तो पाकिस्तान का
क्या होगा और पाकिस्तानी करोड़ों नागरिकों का क्या होगा, यह समझना कठिन
नहीं है।

किसी का भी पड़ोसी भूखा हो और भोजन मिलने के अवसर न दिखायी दें तो आप भी
सुरक्षित नहीं रह सकते। भूखे व्यक्ति के लिए कायदे कानून का कोई मतलब
नहीं होता। जब भूख मार रही हो तब कानून कायदे का क्या डर ? इतनी जेल में
भी तो जगह नहीं होती कि सबको बंद कर दो समय का भोजन कराया जा सके। भारत
के पड़ोस में पाकिस्तान भूख की समस्या से ग्रसित होगा तो भारत के लिए यह
चिंता  जनक स्थिति ही होगी। पाकिस्तान में आयी बाढ़ के समय भले ही
पाकिस्तान भारतीय मदद लेने से नानुकूर कर रहा था लेकिन आज की स्थिति कहीं
ऐसी न बने कि पाकिस्तान के भूखे लोग भारत की तरफ कूच करें। बंगलादेश के
युद्घ के समय करोड़ों शरणार्थियों को ठिकाना देने के लिए भारत बाध्य ही
हुआ था। तब सबसे पहले काश्मीर में ही पाकिस्तान के कब्जे वाले काश्मीर के
लोगों का आगमन बढ़े तब ऐसे लोगों को मानवीयता की ही दृष्टि से रोकना
कठिन होगा।

पाकिस्तान के हालात देखकर काश्मीरियों को समझ में आ जाना चाहिए कि उनके
काश्मीर में जो आज के हालत हैं वे और ज्यादा बिगड़ जाने वाले हैं। जो लोग
पत्थर हाथ में लेकर सशस्त्र बलों पर हमला कर रहे हैं, वे काश्मीरियों का
भला नहीं कर रहे हैं बल्कि उनकी शातिप्रिय जिंदगी में जहर ही घोल रहे
हैं। भारत के साथ रहकर न केवल वे हर मामले में सुरक्षित हैं, बल्कि उनकी
भावी पीढ़ी का भविष्य भी सुरक्षित है। किसी भी मुद्दे को लेकर भड़काने
वाले उनके खैरख्वाह नहीं हैं। बंटवारे के समय पाकिस्तान को लेकर जो
स्वप्न देखे गए थे, वे पूरी तरह से धाराशायी हो गए हैं। वे असलियत को
नहीं समझेंगे तो तकलीफ भी तो आखिर उन्हें ही भोगना पड़ रहा है। उनकी ही
चुनी हुई सरकार है। वे अपनी सरकार से शांतिपूर्वक भी तो मांग कर सकते
हैं, अपनी तकलीफों को दूर करने के लिए सुविधाओं की। भारत सरकार भी उन्हें
हर तरह की सुविधा देने के लिए तैयार है। आज काश्मीर में सरकारी
कर्मचारियों की संख्या जितनी है, उससे आधे से भी काश्मीर का काम चल सकता
है लेकिन फिर भी लोगों को रोटी रोजगार मिले, इसलिए सरकार अनावश्यक
कर्मचारियों का भी बोझ ढो रही है। आतंकवादियों से लडऩे में जो खर्च सरकार
कर रही है, यह खर्च भी बचाकर काश्मीरियों का आर्थिक विकास किया जा सकता
है।

भारत सरकार पिछले दस वर्षों में 1 लाख करोड़ रूपये से भी अधिक काश्मीर पर
खर्च कर चुकी है। श्रीनगर तक रेल लाईन पहुंचाने का काम भी सरकार कर रही
है। पर्यटकों से जो काश्मीरी जनता को लाभ होता था, वह भी तो हिंसा के
कारण रूक गया है। युवाओं की शिक्षा में भी व्यवधान हो रहा है। हिंसक
गतिविधियां पूरी एक पीढ़ी का भविष्य खराब कर सकती है लेकिन नेताओं को
इससे नुकसान नहीं होने वाला। क्योंकि उनके बच्चे तो विदेशों में शिक्षा
प्राप्त कर रहे हैं। यह अटल सत्य है कि काश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है
और पृथकतावादी या आतंकवादी चाहे जो भी कर लें, काश्मीर को भारत से अलग
नहीं कर सकते। पाकिस्तान कितना भी दिवास्वप्न देखे कि वह काश्मीर को भारत
से उसी तरह से अलग कर देगा जिस तरह से पाकिस्तान से बंगलादेश अलग हुआ,
स्वप्न यथार्थ नहीं होने वाला है। बंगलादेश को भारत ने पाकिस्तान से अलग
नहीं किया था बल्कि पाकिस्तानी हुक्मरानों के अत्याचार के कारण बंगलादेश
पाकिस्तान से अलग हुआ था। जब मुजीब रहमान की पार्टी के चुनाव में सफल
होने के बाद पूरे पाकिस्तान की सता उन्हें नहीं सौंपी गयी थी।

वक्त बदला और बहुत कुछ बदल गया। भारत ने निरंतर आर्थिक प्रगति की। जब
सुनामी या बाढ़ के कारण भारत के लोगों को तकलीफें झेलनी पड़ती है तो भारत
को किसी अन्य देश की मदद की आवश्यकता नहीं होती। भारत की क्षमता स्वयं की
इतनी है कि वह अपने नागरिकों को राहत पहुंचा सकता है लेकिन पाकिस्तान की
स्थिति तो ऐसी नहीं है। फिर भी वह भारत से ईमानदारी से मित्रता करने के
बदले भारत से दुश्मनी निभाने का ही भाव रखता है तो हासिल क्या होता है ?
आज अमेरिका हाथ खींच ले तो चीन से वह आर्थिक मदद की भी उम्मीद नहीं कर
सकता। फिर किसी भी देश की कोई तात्कालिक मदद तो हो सकती है लेकिन स्थायी
मदद कौन कर सकता है? कल तक भारत अमेरिका के वैसे संबंध नहीं थे जैसे
पाकिस्तान के अमेरिका के साथ थे लेकिन आज तो भारत के भी अमेरिका से अच्छे
संबंध हैं। परमाणु समझौता अमेरिका ने भारत के साथ किया लेकिन पाकिस्तान
के साथ इंकार कर दिया। दक्षिण एशिया में पश्चिमी देशों को आज भारत ही
दोस्ती के योग्य दिखायी देता है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने तो
पाकिस्तान को आतंकवादियों का आश्रयदाता ही भारत आकर कहा। अमेरिका के
राष्टपति बराक ओबामा भारत की यात्रा पर आ रहे हैं। लगता है भारत
अमेरिका की मित्रता और गहरी होगी। ऐसे में पाकिस्तान के बहकावे में
काश्मीरियों का आना उनके ही हित में नहीं है। यह तो उन लोगों को सोचना
भूल जाना चाहिए कि वे काश्मीर को भारत से अलग कर सकेंगे।

-विष्णु सिन्हा
16.10.2010