अब बाबूलाल अग्रवाल कितना भी कहें कि उन्हें षडय़ंत्र कर फंसाया गया है लेकिन कोई भी उनकी बात मानने के लिए तैयार नहीं होगा। 300 करोड़ की बेनामी संपत्ति और बैंकों में 220 ऐसे खाते, जिनके नाम से है, वे ही कहते है कि हमारे नहीं हैं लेकिन बाबूलाल का सी ए कहता है कि सभी खाते बाबूलाल के हैं और वे स्वयं उसे आपरेट करते थे, के बाद अब सोचने समझने के लिए बच ही क्या जाता है? पता नहीं क्या सोचकर बाबूलाल अग्रवाल के माता-पिता ने उनका नाम बाबूलाल रखा था। हालांकि उन्होंने नाम को सार्थक तो किया है। बाबूलाल ने बाबू बनकर इतना धन तिकड़मों से इकट्ठा कर लिया कि किसी की भी कल्पना से परे है। अभी तक नौकरशाहों के भ्रष्टाचार के किस्से ही प्रचारित होते थे और भ्रष्टचार का प्रमुख कारण भी उन्हें माना जाता था लेकिन इतना भ्रष्टाचार कि आयकर विभाग को हिसाब लगाने में ही कई दिन नहीं माह लग जाएं तो स्पष्ट दिखायी देता है कि कैसे लोगों के हाथ देश की बागडोर है। आखिर ये बाबू ही तो देश को चलाते हैं।
कहने को भले ही सरकार जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों की हो लेकिन स्थायी रुप से राजकाज तो इन बाबुओं के पास ही है। जनता के प्रतिनिधियों को तो हर 5 वर्ष में चुनाव की अग्रिपरीक्षा से गुजरना पड़ता है। मतदाताओं के सामने हाथ जोड़कर खड़े ही नहीं होना पड़ता है बल्कि हर तरह की विनम्रता का प्रदर्शन करना पड़ता है। भ्रष्टाचार से कमायी रकम को मतदाताओं पर, कार्यकर्ताओं पर खर्च भी करना पड़ता है। चुनाव इतने महंगे हो गए कि लाखों करोड़ों रुपए खर्च कर चुनाव जीतने वाला गलत तरीके से कमाए नहीं तो अगला चुनाव लड़ेगा, कैसे? जनता हो या विपक्ष खरी-खोटी जनप्रतिनिधियों को ही सुनना पड़ता है। इनके ही कृत्यों पर चुनाव में जीत हार निश्चित होती है लेकिन वास्तव में कृत्य तो नौकरशाहों और शासकीय मशीनरी का होता है। ये स्थायी होते हैं। जनता किसी को भी चुने इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। इन्हें ज्यादा से ज्यादा उठा कर इस कुर्सी से उस कुर्सी पर बिठाया जा सकता है लेकिन होशियार लोग तो लहर गिनने का काम भी मिले तो उसमें भी धन उगाहने के तरीके निकाल लेते हैं।
भ्रष्टाचारियों में यह किस्सा बहुत चर्चित है। एक राजा के एक सिपहसालार पर दरबारियों ने भ्रष्टाचार के आरोप लगाए और राजा से दरख्वास्त की कि उसे उसकी वर्तमान जगह से हटाया जाए और ऐसा काम दिया जाए, जिसमें भ्रष्टाचार की कोई गुंजाईश न हो। राजा ने बहुत सोचा कि ऐसा कौन सा काम हो सकता है जिसमें भ्रष्टाचार की जगह न हो तो उसने नदी में लहर गिनने के काम में सिपहसालार को लगा दिया। दरबारी बहुत खुश हुए कि अब वह भ्रष्टाचार से धन नहीं कमा सकेगा लेकिन कुछ दिन बाद ही खबर आयी कि वह तो अति प्रसन्न है और खूब चांदी काट रहा है। पता लगाया गया कि लहरें गिनने में भ्रष्टïचार की जगह कैसे बन गयी तो पता चला कि वे सुबह से नदी किनारे जा कर बैठ जाते हैं और सिपाहियों को आदेश दे देते हैं कि कोई भी नाव, जहाज न तो आ सकती है न ही जा सकता। जो जहां है वहीं खड़ा रहे। क्योंकि साहब लहरें गिन रहे है। नाव और जहाज के आने-जाने से लहर गिनने में अड़चन होती है। सिपाहियों ने ही जहाज और नावों के मालिक से कहा कि आना-जाना है तो साहब को भेंट चढ़ाओ। इस तरह से लहरें गिनने के नाम से भेंट मिलने लगा।
कोई बुद्धि से कमजोर आदमी तो नौकरशाह बन नहीं सकता। कठिन प्रतियोगी परीक्षा से इनका चुनाव होता है। फिर साक्षात्कार भी होता है। सब तरह से ठोक बजा कर अति होशियार व्यक्ति को ही नौकरशाही मिलती है। जब इतने चतुर चालाक व्यक्ति को अधिकार मिलेगा तो कितने लोग हैं जो अपनी बुद्धि का प्रयोग सिर्फ अपने कर्तव्य के निर्वाह में करेंगे। नया-नया रंगरुट ईमानदार भी होता है। वह ईमानदारी से काम भी करता है लेकिन उसके ऊपर बैठा अधिकारी और नीचे काम करने वाले कर्मचारी भी ईमानदार हों तब न वह ईमानदारी से काम करे। फिर भी वह ईमानदार होने की जिद करता है तो उसे तरह-तरह से प्रताडऩा झेलनी पड़ती है। उसके संगी साथी ही समझाते हैं कि इस तरह से कितने दिन चलेगा। वह क्या सोच कर नौकरी में आता है और उसके एकदम विरुद्ध माहौल पाता है तो उसे निर्णय करना पड़ता है कि भेड़ों के झुंड में भेड़ बन जाए या शेर बनने की कोशिश करे। वह शेर बनने की कोशिश करता है। नियम, कायदे की बात करता है लेकिन उसे असफल करने पर तुले लोग उसकी चलने नहीं देते। वह संरक्षण देने वाले की तलाश करता है तो उसे कोई संरक्षण देने वाला दिखायी नहीं देता। धीरे-धीरे उसे समझ में अच्छी तरह से आ जाता है कि वह व्यवस्था को बदल नहीं सकता तो फिर उसके पास व्यवस्था का अंग बनने के सिवाय चारा क्या रहता है? वह एक बार सोचता अवश्य है कि नौकरी ही छोड़ दे लेकिन फिर यही प्रश्र कि करेगा क्या? उसे अपने परिवार का ध्यान आता है। नौकरी छोडऩे से भी बदलने वाला तो कुछ नहीं। तब वह झुकता है और झुकता है, समझौता करता है तो करता ही चला जाता है।
बाबूलाल अग्रवाल, अरविंद जोशी, दीनू जोशी तो आयकर शिकंजे में फंस गए। क्या ये सिर्फ तीन ही भ्रष्टïचार के जनक हैं? इनके पकड़े जाने से सिर्फ यही पता चलता है कि भ्रष्टïचार कितना ज्यादा है। सरकार ने अभी छठवां वेतन आयोग देकर अपने नौकरशाहों, कर्मचारियों की हर जरुरत पूरी करने की कोशिश की। फिर भी ये ईमानदार नहीं बन सके तो दोष किसका है? कहा जाता है कि दुनिया के भ्रष्टतम देशों में भारत का नंबर ऊपर है। भ्रष्टïचार इतना है कि सी ए भी बचाने की स्थिति में नहीं है तो वह आयकर विभाग के सामने आत्मसमर्पण कर देता है और अपने ही क्लायंट की पूरी पोल खोल देता है। जनता की गाढ़ी कमायी से वसूला गया टैक्स व्यापारी, अधिकारी मिल कर लूट रहे हैं। सरकार सही ढंग से भ्रष्ट लोगों पर शिकंजा कसने के लिए तैयार हो तो एक पंचवर्षीय योजना से ज्यादा धन उगाह सकती है। आज छत्तीसगढ़ की ही सरकार किसानों को बोनस नहीं दे पा रही है। एक अधिकारी के पास 300 करोड़ रुपए निकल रहे है तो तीन अधिकारियों के पास से इतनी रकम निकले तो किसानों को बोनस दिया जा सकता है। सिर्फ 3 लोग ही इतना धन लूट रहे हैं जिससे लाखों लोगों की आर्थिक स्थिति सुधर सकती है।
इन छापों के बाद भी केंद्र और राज्य सरकारों की आंख नहीं खुलती है तो फिर सरकारों को जनकल्याण का ढोंग छोड़ देना चाहिए। राजीव गांधी कहते-कहते दुनिया छोड़कर चले गए कि 1 रुपया सरकार देती है तो 15 पैसे ही जनता तक पहुंचते हैं। यह बीच में गायब होने वाले 85 पैसों का खेल है। जो भ्रष्टाचार के द्वारा विभिन्न लोगों की जेब ही नहीं भर रहा है बल्कि उनके पास धन के ठिकानों की कमी पड़ गयी है। है भी अचरज की बात कि नौकरानी के नाम से विदेशी मुद्रा जमा है और नौकरानी को पता ही नहीं कि वह करोड़पति है। गांव के मजदूरों को पता नहीं कि लाखों रुपए उनके नाम से बैंकों में जमा है। कितना बड़ा जाल है भ्रष्टाचार का। पता चलने के बाद सरकारें कुछ करेंगी या यह ऐसा ही चलता रहेगा?
- विष्णु सिन्हा
दिनांक 07.02.2010
रविवार, 7 फ़रवरी 2010
शनिवार, 6 फ़रवरी 2010
मुंबई जाकर शिवसेना को जो जवाब राहुल ने दिया उससे उनकी विश्वसनीयता बढ़ी
राहुल गांधी की जितनी तारीफ की जाए, कम है। मुंबई की लोकल ट्रेन में सफर कर जिस तरह से उन्होंने ठाकरों के विरोध प्रदर्शन की हवा निकाल दी, वह लाजवाब है। अभी तक तो मुंबई से बाहर रह कर बड़े-बड़े राजनेता सिर्फ बातें करते रहे लेकिन राहुल ने शिवसेना के काले झंडे दिखाने और विरोध प्रदर्शन की परवाह नहीं करते हुए, मुंबई की लोकल ट्रेन से स्वयं टिकट खरीद कर सफर किया और सहयात्रियों से चर्चा की और उनके मुंह से कहलवा दिया कि मुंबई सबकी है, यह पूरी तरह से ठाकरों की दहाड़ का जवाब था। राहुल से हाथ मिलाने, ऑटोग्राफ लेने के लिए जैसे लोग उतावले हो रहे थे और अपने बीच राहुल गांधी को देख कर लोग उत्साहित हो रहे थे, वह नजारा वास्तव में बेमिसाल है। टीवी के माध्यम से सारे देश ने इस नजारे को देखा और महसूस किया कि युवा नेता किसी से भी दमखम में कमजोर नहीं है। शिवसेना ने तो चुनौती दी थी कि राहुल गांधी मुंबई आकर देखें। हो गया उल्टा। राहुल गांधी मुंबई आए और उन्होंने मुंबईकरों को देखा लेकिन शिवसेना देखते ही रह गयी और कुछ कर नहीं पायी।
जैसी व्यवस्था राहुल गांधी की सुरक्षा के लिए की गयी थी, वैसी ही व्यवस्था सुरक्षा आम आदमियों के लिए की जाए तो कोई हिम्मत नहीं कर सकता, कानून को हाथ में लेकर मनमानी करने की। काश जब राज ठाकरे के सैनिक मुंबई की सड़कों पर रेहड़ी वालों को, टैक्सी वालों को, प्रतियोगी परीक्षा में सम्मिलित होने आए युवकों को मार रहे थे, तब पुलिस ने सख्ती दिखायी होती तो इनके दिमाग सातवें आसमान पर नहीं चढ़े होते। बाल ठाकरे सामना में भले ही लिखें कि वे हताश नहीं है लेकिन उनकी हताशा तो इसी से प्रगट होती है कि वे राहुल गांधी को इटैलयिन राजपुत्र की संज्ञा देते हैं। एक तो प्रजातंत्र में कोई राजपुत्र नहीं होता लेकिन फिर भी मान लें कि राहुल गांधी राजपुत्र हैं तो वे नेहरु गांधी परिवार के राजपुत्र हैं। उनकी माता के इटली से होने से वे कैसे इटैलियन राजपुत्र हो गए। वैसे भी सोनिया गांधी इटली के किसी राजपरिवार की सदस्य तो हैं, नहीं।
प्रजातंत्र में तो राजा वही है जिसे जनता का समर्थन मिले। हर 5 वर्ष में जनता के पास समर्थन के लिए जाना पड़ता है। आज दिल्ली की केंद्र सरकार में कांग्रेस है तो वह जनता के समर्थन के कारण है। यदि राहुल गांधी राजपुत्र हैं तो भारतीय जनता के समर्थन के कारण। महाराष्ट्र में भी उन्हीं की पार्टी सबसे बड़ी है। सबसे ज्यादा समर्थन महाराष्ट्र में उनके पास ही है। मराठी मानुष के मन में संकीर्णता का हर तरह का विष भरने की कोशिश कर भी ठाकरे परिवार जनता के पूरे समर्थन का क्या, आधे समर्थन का भी हकदार नहीं बन सका। शिवसेना के प्रति मुंबईकरों का ऐसा ही समर्थन होता तो पूरी मुंबई बाल ठाकरे के आव्हान पर काले झंडे दिखाने के लिए सड़क पर उतर जाती। ऐसा कुछ नहीं है कि मराठियों का समर्थन शिवसेना या मनसे के साथ है।
मुंबई के पुलिस कमिश्नर ने शाहरुख खान की फिल्म के प्रदर्शन के दौरान थिएटरों में हर तरह की सुरक्षा का आश्वासन दिया है। कुछ शिवसैनिक शाहरुख के निवास स्थान पर प्रदर्शन भी कर आए। अब बाल ठाकरे ने भी कह दिया है कि शिव सेना शाहरुख की फिल्म का विरोध नहीं करेगी। शाहरुख के समर्थन में तो सलमान खान भी उतर आए है। अभिषेक बच्चन ने भी समर्थन किया है। बाल ठाकरे को समझ में आ गया है कि फिज़ा बदल रही है। राहुल गांधी की मुंबई यात्रा से माहौल पूरी तरह से बदल गया है। महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार को भी स्पष्ट निर्देश मिल गया है। सरकार ठाकरों के विरुद्ध कार्यवाही के लिए कानूनी सलाह ले रही है। आगे उम्मीद करना चाहिए कि अब राजनैतिक गुंडागर्दी नहीं चलेगी और कोई करने की कोशिश करेगा तो उसे मुंह की खानी पड़ेगी।
सरकार की चुप्पी के कारण शिवसेना का ही नहीं राज ठाकरे का भी मनोबल बढ़ा हुआ था। वे तो धमकी दे रहे थे कि मराठियों के साथ न्याय नहीं हुआ तो महाराष्ट्र में राष्ट्र से अलग होने की भावना भी जन्म ले सकती है। मतलब साफ था कि मेरी मानो, मेरे अनुसार चलो, नहीं तो पृथक होने का आंदोलन प्रारंभ हो जाएगा। इतना कहने की हिम्मत इसीलिए आयी क्योंकि उनके नाजायज कृत्य बेलगाम चल रहे थे। कोई रोकने वाला नहीं था। कानूनी कार्यवाही की भी गयी तो इतनी लचीली की कोर्ट से जमानत हो जाए। किसी को भी इतना शह मिलेगा तो उसके हौसले बढ़ेंगे ही। चुनावी लाभ उठाने के लिए हौसला बढ़ाने की जिम्मेदारी भी तो कांग्रेस सरकार पर ही है। नहीं तो राहुल गांधी को चुनौती देने की हिम्मत कहां से आयी। राहुल गांधी तो चुनौती का जवाब दे चुके। अब कांग्रेस सरकार का काम है कि वे ऐसे तत्वों पर निगरानी रखें।
राहुल गांधी ने बिहार के मतदाताओं को भी बता दिया है कि उन्होंने बिहार में जो कहा, वह कर के दिखा दिया। मुंबई और महाराष्ट्र सारे भारत का है। हो सकता है बिहार का युवा इससे प्रभावित हो और कांग्रेस को आने वाले चुनाव में इसका लाभ मिले। कहा जा रहा है कि देश का 50 प्रतिशत मतदाता युवा है और राहुल गांधी युवाओं, छात्रों को ही कांग्रेस के प्रति आकर्षित करने में लगे हैं। भारत में आज राष्ट्रीय स्तर पर सबसे युवा नेता राहुल गांधी ही हैं। जिस तरह से वे युवा पीढ़ी को आकर्षित कर रहे हैं, उससे कांग्रेस को लाभ ही होगा। वे युवक कांग्रेस के चुनाव करवा रहे हैं। जिससे युवा लोगों को आगे आने का मौका मिले। एनएसयूआई के भी पदाधिकारी चुनाव के द्वारा बनाए जा रहे हैं। फिर भी पुराने नेता अपने खेल से बाज नहीं आ रहे है। वे प्रत्यक्ष रुप से हस्तक्षेप कर अपने प्रत्याशी को पद पर बिठाने के लिए हर तरह का प्रयास कर रहे हैं। ये नेता यदि सफल होते है तो राहुल गांधी जो चाहते हैं, वह सफल नहीं होगा। युवा पीढ़ी साफ सुथरी राजनीति हो तब ही राजनीति में टिक सकती है। योग्य व्यक्ति जरुरी नहीं कि जोड़ तोड़ की राजनीति को पसंद करे। फिर पुराने नेताओं के मोहरे ही यदि पदारुढ़ हुए तो वह सब नहीं हो सकेगा जो राहुल गांधी चाहते हैं।
इसके लिए जरुरी है कि युवक कांग्रेस और एनएसयूआई के नए राज्यवार पदाधिकारियों को राहुल गांधी का सीधा संरक्षण मिले। जिससे ये सीधे-सीधे जनता से जुड़ें। जहां भी कांग्रेस का नया फ्रेश चेहरा दिखायी देता है लोग कांग्रेस का समर्थन करना चाहते हैं लेकिन जब देखते हैं कि उसके साथ वही पुराना कांग्रेसी है तो मन फिर जनता का बदल जाता है। ऐसे में राहुल गांधी जो भी कर रहे हैं, वह तो ठीक है लेकिन इसके साथ ही उन्हें कांग्रेस संगठन को पाक साफ कैसे किया जाए, इस पर भी ध्यान देना चाहिए। भारतीय युवा बड़ी आशा भरी नजरों से उनकी तरफ देख रहे हैं। ऐसा ही उन्होंने राजीव गांधी की तरफ भी देखा था। राजीव गांधी भारत को कम्प्यूटर युग में नहीं लाते तो देश में युवाओं के लिए रोजगार के जो अवसर बढ़े और अमेरिका तक मानने लगा कि भविष्य भारत का है, वह स्थिति खड़ी नहीं होती। अब देश के सामने राहुल गांधी है और उन्होंने शिव सेना को मुंबई जाकर जो जवाब दिया है, उससे स्वाभाविक रुप से उनके प्रति विश्वास बढ़ा है।
- विष्णु सिन्हा
दिनांक 06.02.2010
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शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010
जो पकड़ में आ गया वही दोषी लेकिन बाकी सब ईमानदार हैं क्या?
सुबह-सुबह सो कर उठते ही दरवाजे पर पुलिस और आयकर अधिकारी दिखायी दें तो किसी का भी रक्तचाप सामान्य नहीं रह सकता। फिर वह बड़ा अधिकारी हो शासन का तब तो मूड पूरी तरह से खराब होना ही है। जिसे सिर्फ अकडऩे और सलाम लेने की आदत हो, उसके घर के जर्रे-जर्रे की कोई तलाशी लेने पर उतारु हो और अधिकारी का अधिकार कोई काम नहीं आए तो स्थिति बड़ी बेचारगी की पैदा हो जाती है। उसके फोन, मोबाइल तक आयकर अधिकारी अपने पास रखवा लें तो फिर किसी से संपर्क कर किसी तरह की सिफारिश की भी उम्मीद नहीं रह जाती। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के कुछ आई.ए.एस. अधिकारियों की कल सुबह इसी तरह से थी। उनके साथ उनके रिश्तेदारों को भी तलाशी का सामना करना पड़ रहा था। अभी जांच चल रही है लेकिन प्रारंभिक जांच में मध्यप्रदेश के जोशी दंपत्ति के घर से जो 3 करोड़ रुपए के नोट पकड़ में आए हैं, वह अपनी कहानी स्वयं कह रहे है। आयकर, विभाग को तो नोटों की गिनती के लिए मशीन तक मंगवानी पड़ी। एक आई.ए.एस. अधिकारी के विषय में कहा जा रहा है कि उनकी बीमा की किश्तें वार्षिक उनके वेतन से भी ज्यादा है । जांच पूरी होने के बाद ही पता चलेगा कि वास्तव में हमारे, जिम्मेदार अधिकारियों ने अपने पदों का दुरुपयोग कर कितना धन भ्रष्टाचार से कमाया है।
राजनेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं लेकिन भ्रष्टïचार की असली जड़ तो नौकरशाही में है। यह बात कोई गोपनीय नहीं है बल्कि एक खुली किताब की तरह है। देश में आई.ए.एस. अधिकारियों का बड़ी कठिन परीक्षा चयन से होता है। एक तरह से श्रेष्ठ लोगों का चयन होता है। इन श्रेष्ठ लोगों के चयन के पीछे जो एकमात्र विचार काम करता है कि ये लोग ईमानदारी से देश के विकास में और जो जिम्मेदारियां इन्हें सौंपी जाएंगी, उसे सही मकाम तक पहुंचाएंगे लेकिन वास्तव में ऐसा होता तो नहीं। राजनेता भ्रष्टïचार कर धन कमाता है तो उसके पीछे महंगा चुनाव एक बहाना होता है लेकिन नौकरशाह जो भ्रष्टïचार से कमाता है, वह तो उसका निजी धन हो जाता है। वह सरकारी योजनाओं को तो तहस-नहस करता ही है, उन लोगों के मुंह से भी निवाला छीन लेता है जिनका वास्तव में निवाले पर अधिकार है। हर काम में भ्रष्टाचार, हर जगह दलाली कमीशन तो फिर निर्माण कार्य सही हों तो कैसे?
जब बाबा रामदेव कहते है कि विदेशी बैंकों में भारत का इतना काला धन जमा है कि उसे लाकर देश में लगाया जाए तो देश में कोई गरीब न रहे। तब वे गलत तो नहीं कहते। विदेशी बैंकों में क्या देश में ही बहुतेरों ने अपने घरों में ही रुपया छिपा कर रखा है। सरकार एक सिरे से बिना भेदभाव के नौकरशाहों की तलाशी ले तो काला धन तो बाहर आएगा ही, इसके साथ ही देश को पता भी चल जाएगा कि कौन अधिकारी कितना भ्रष्टïचारी है और कौन अधिकारी कितना ईमानदार लेकिन मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने की हिम्मत है, क्या? आयकर अधिकारियों के यहां ही छापे में करोड़ों रुपए मिल चुके हैं। जिनका काम आयकर की चोरी पकडऩा है, प्रश्र यही है कि वे भी कितने ईमानदार हैं? वास्तव में अधिकारी ईमानदार हो जाए तो छोटे कर्मचारी भ्रष्टïचार की बात तो सोच भी नहीं सकते। छोटे कर्मचारी क्या, राजनीतिज्ञ भी भ्रष्टाचार नहीं कर सकते। क्योंकि आदेश तो अधिकारियों के हस्ताक्षर से ही होते हैं। भ्रष्टाचार का आलम तो यह है कि पिछले दिनों फौज के एक बड़े अधिकारी के विरुद्ध ही रक्षामंत्री को कोर्ट मार्शल का आदेश देना पड़ा। लगता नहीं कि कोई क्षेत्र भ्रष्टाचार से अछूता रह गया है।
लेकिन छुटपुट कार्यवाही से भी भय का एक वातावरण तो बनता है। यह बात दूसरी है कि समय पाकर भय उडऩ छू हो जाता है और नौकरशाह और आश्रित हो जाता है, राजनीतिज्ञों के। जनता सिर्र्फ तमाशा देखती है। जो पकड़ में आ गया, वह बेवकूफ ही साबित होता है। भ्रष्टाचार से प्राप्त धन को ठिकाने लगाना उचित तरीके से उसे नहीं आता। जब एक आई.ए.एस. अधिकारी कहता है कि उसे षडय़ंत्र के तहत फंसाया जा रहा है तो वह गलत भी नहीं कहता। उसे अपना कृत्य गलत नहीं लगता। उसे छापा गलत लगता है। क्योंकि वह अच्छी तरह से जानता है कि उसने ऐसा कोई काम नहीं किया है जो दूसरे नहीं करते। वह अपने सहयोगियों की पोल पट्टी अच्छी तरह से जानता है। फर्क इतना ही है कि एक बिल्डर कृस्मास के यहां पड़े छापे से ऐसे कुछ सुराग आयकर अधिकारियों को लगते है जिससे वह पकड़ में आता है।
मंत्रालय के सुरक्षित केबिनों में बैठने वाले इन अधिकारियों का न तो जनता से सीधा संपर्र्क होता है और न ही ये जनता की पकड़ में होते हैं लेकिन छोटे से छोटा और बड़ा से बड़ा निर्णय इनके हस्ताक्षर के बिना नहीं होता। ये न चाहे तो कोई काम किसी का नहीं हो सकता। ये कामों को उलझाने , सरकाने, अड़ंगा डालने में अपनी बुद्धि का उपयोग करते हैं। जिससे लगता है कि सरकार के प्रति ये कितने ईमानदार हैं। ये जनता के धन की बर्बादी नहीं देख सकते लेकिन अचानक कुछ होता है और सारी नोट शीट बदल जाती है। टिप्पणियां काम के पक्ष में दिखायी देने लगती है। ये चाहें तो दिन को रात कर सकते हैं और रात को दिन। इतना ही नहीं ये दिन को दिन मानने से भी इंकार कर सकते हैं। आखिर कुछ मंत्री क्यों शिकायत करते हैं कि अधिकारी उनकी नहीं सुनते। मतलब साफ है कि अधिकारी न सुने, मंत्री के अनुरुप काम करने को तैयार नहीं तो मंत्री इसके सिवाय कुछ नहीं कर सकता कि वह अपने मुखिया से अधिकारी को हटाने का निवेदन करे। मुखिया अधिकारी को न हटाए तो मंत्री सिर्फ अपने निर्देशों, आदेशों का हश्र ही देख सकता है और जनता से अपने निकम्मेपन का उलाहना सुनने के सिवाय उसके पास कोई चारा नहीं होता।
पहले एक सचिव और अंडर सेक्रेटरी ही पूरा विभाग चला लेते थे। अब प्रमुख सचिव, सचिव, विशेष सचिव, उप सचिव, अपर सचिव जैसे सचिव ही सचिव हो गए और काम है कि एक की भी अनुपस्थिति से सरकने का नाम नहीं लेता। मुख्यमंत्री, मंत्री ने आदेश दे दिया तो आदेश जाकर सचिव के पास से होता हुआ अंडर सेक्रेटरी के पास पड़ा रहेगा। वह अपनी जगह से हिलेगा भी नहीं। जब तक कि उस आदेश से लाभान्वित होने वाला व्यक्ति फाइलों को एक टेबल से दूसरे टेबल तक सरकाने का उपक्रम न करें। पहले तो मंत्रालय में घुसना ही हर किसी के बस की बात नहीं। फिर घुस भी जाए तो जटिल प्रक्रिया को समझना आसान नहीं। फिर फाइलें ऐसे ही तो आगे नहीं सरकती। जो जानकार हैं, तजुर्बेकार हैं वे पहले ही दान दक्षिणा कर फाइलों को आगे बढ़ाने का काम जानते हैं तो उनकी फाइलें सरकती नहीं, दौड़ती है। यह दान दक्षिणा और कुछ नहीं, वही रकम होती है जो कभी कभार के छापे में पकड़ी जाती है।
एक वेतन भोगी आदमी को आयकर का रिटर्न भरने के लिए किसी सी.ए. की क्या जरुरत? उसका आयकर तो काट कर जमा कराना विभाग का ही दायित्व है। फिर भी सबके अपने-अपने सी.ए. है। कइयों के तो पूरे परिवार के रिटर्न दाखिल होते हैं। जितना काले धन को सफेद बनाने के तरीके है, उन सबका उपयोग किया जाता है। फिर भी कहीं न कहीं कभी न कभी कोई चूक हो जाती है। धन जहां लगाया जाता है वही सपड़ में आ जाता है तो फिर उसके द्वारा दूसरे भी सपड़ में आते हैं। फिर छोटा सा सुराग, इन्वेस्टमेंट पूरी खोज का रास्ता मुहैया करा देता है। यह अजब-गजब का खेल है। फौजदारी कार्यवाही करना आयकर का काम नहीं। वह टैक्स और पेनाल्टी लेकर शांत हो जाता है तो फिर सब कुछ पहले की तरह चलता रहता है। नहीं तो न्यायालय के दरवाजे खटखटा कर मामले को लंबे समय तक लंबित करने का रास्ता तो है, ही। इसलिए कुछ दिन का हल्ला-गुल्ला और फिर?
- विष्णु सिन्हा
दिनांक 05.02.2010
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गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010
राहुल और सोनिया के विषय में अनर्गल बात का अर्थ सिर्फ बौखलाहट और कुछ नहीं
जब सही जवाब न हो तब निम्न स्तर की बातों को जवाब बनाया जाता है। यह कहना बाल ठाकरे का कि मुंबई इटैलियन मम्मी का नहीं है, अभद्रता का ही प्रतीक नहीं है बल्कि इस बात की भी निशानी है कि मुंबई और महाराष्ट्र सिर्फ मराठियों का जैसी बात ग्राह्य नहीं हो रही है। बहुमत इस बात से सहमत नहीं है। न तो कांग्रेस, न ही राष्ट्रवादी कांग्रेस और न ही भाजपा मुंबई और महाराष्ट्र को सिर्फ मराठियों की बात से सहमत है। विधानसभा के चुनाव में ही शिवसेना, मनसे को मिले वोट ही यह स्पष्ट कर देते हैं कि अधिकांश जनता उनके पक्ष में नहीं है। क्योंकि 288 विधानसभा क्षेत्रों में 60 से भी कम सीटों पर चाचा भतीजा को जीत मिली और 228 विधारनसभा क्षेत्र के लोग उनसे सहमत नहीं है। जब मराठी ही इनकी बातों से सहमत नहीं हैं तब उनकी बातों का क्या महत्व रह जाता है ? यह तो मीडिया की मेहरबानी से इनके विवादास्पद विचार और कृत्य लोगों तक पहुंच रहे हैं और जिस तरह से कड़ी कार्यवाही की इनके विरूद्घ कानून के पालन के लिए जरूरत थी, उसमें सरकार विफल रही है। यदि कानून हाथ में लेकर मारपीट करते हुए इनके कार्यकर्ताओं पर सरकार ने कड़ी कार्यवाही की होती तो न इनके हौसले बढ़ते और न बात यहां तक पहुंचती।
सोनिया गांधी के विषय में यह कहना कि वे इटैलियन मम्मी हैं, राहुल की, न केवल सभ्य आचार के विरूद्घ है बल्कि भारतीय संस्कृति के भी विरूद्घ है। यह सत्य है कि सोनिया गांधी का जन्म इटली में हुआ लेकिन भारतीय संस्कृति के अनुसार स्त्री का घर उसका मायका नहीं होता बल्कि ससुराल होता है। राजीव गांधी से विवाह के बाद सोनिया गांधी का घर भारत है और वह किसी भी भारतीय महिला की तरह भारतीय हैं। जब हर भारतीय का अधिकार मुंबई पर है तो सोनिया गांधी का क्यों नहीं होगा? फिर महाराष्ट्र के लोगों ने तो अपने ऊपर शासन करने का अधिकार भी उस पार्टी को दिया है जिसकी राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं। कभी कांग्रेस से अलग होकर राष्ट्रवादी कांग्रेस बनाने वाले शरद पवार ने कांग्रेस सोनिया गांधी के विदेशी मूल के होने के कारण ही छोड़ी थी लेकिन आज उनकी पार्टी न केवल महाराष्ट्र में कांग्रेस के साथ भागीदारी कर सरकार चला रही है बल्कि केंद्र में सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाले संप्रग सरकार के मंत्री भी शरद पवार हैं। संप्रग विभिन्न दलों का गठबंधन है जिसमें शरद पवार का दल भी शामिल हैं। उन्होंने भी सोनिया गांधी को संप्रग का अध्यक्ष माना हुआ है।
शरद पवार स्वयं कह चुके हैं कि विदेशी मूल का सोनिया गांधी का मुद्दा अब कोई मुद्दा नहीं हैं। क्योंकि भारत की जनता ने ही इस मुद्दे की हवा निकाल दी है। वे चाहती तो मनमोहन सिंह के बदले स्वयं प्रधानमंत्री बन सकती थी। संप्रग के सभी दलों ने उन्हें ही अपना नेता चुना था। कहीं कोई अड़चन नहीं थी। तब सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया। आज केंद्र में उनकी सरकार है। महाराष्ट में उनकी सरकार है। कई प्रांतों में उनकी सरकार है। वे देश की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी की अध्यक्ष हैं। तब बाल ठाकरे के कह देने मात्र से तो मुंबई सोनिया गांधी की नहीं हो सकती। मुंबई जितनी किसी भारतीय की है, उससे कम सोनिया गांधी की नहीं हैं। इटैलियन मम्मी जैसे शब्द का प्रयोग कर बाल ठाकरे खुश हो सकते हैं लेकिन इससे जनता भी उनसे सहमत है, ऐसा तो नहीं दिखायी पड़ता।
दरअसल मुंबई के विषय मे ठाकरे चाचा भतीजा से असहमति की बात अब इतने लोगों ने कह दी है कि विरोध का कभी सामना न करने वाले अब बौखला गए हैं। उन्हें उम्मीद नहीं थी कि राहुल गांधी ठाकरों के विचारों के विरूद्घ वक्तव्य देंगे। अभी तक कांग्रेस पर ही संदेह किया जाता था कि चाचा भतीजा की लड़ाई से फायदा उठाने के लिए कांग्रेस उन्हें शह दे रही है। इसलिए राहुल से ऐसे वक्तव्य की उम्मीद नहीं थी लेकिन राहुल ने जब खुलकर बोल दिया कि बिहार उत्तरप्रदेश सहित सभी राज्यों के कमांडों ने मुंबई हमले के समय मुंबई की रक्षा की तो मामला एकदम साफ हो गया। राहुल के पहले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत अपनी मुंबई और महाराष्ट्र के विषय में राय व्यक्त कर ही चुके थे। उन्होंने तो स्वयं सेवकों से कहा कि उत्तर भारतीयों पर हमला होता है तो उनकी रक्षा करें। इसके बाद भारतीय जनता पार्टी की नीति स्पष्ट हो गयी। ऐसे में कांग्रेस को अपनी बात तो स्पष्ट करनी ही थी। अब राज ठाकरे कह रहे हैं कि राहुल गांधी रोम पुत्र हैं। यह वक्तव्य खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे की तरह है। राज ठाकरे और बाल ठाकरे के विषय में भी तो कहा जा रहा है कि वे मराठी नहीं हैं बल्कि मध्यप्रदेश के इंदौर खंडवा से आकर मुंबई में बसे हैं।
कल ही एक न्यूज चैनल में दिखाया जा रहा था कि बाल ठाकरे पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ी जावेद मियांदाद के साथ अपने निवास स्थान पर हंस हंस कर बात कर रहे हैं। वहीं पास में हाथ बांधे राज ठाकरे और उनके निकट उद्घव ठाकरे खड़े हैं। फिर जावेद मियांदाद सिर्फ क्रिकेट खिलाड़ी नहीं हैं बल्कि वे कुख्यात माफिया डान दाऊद इब्राहिम के समधी भी हैं। जिन्हें मुंबई बम विस्फोट का मुख्य कर्ताधर्ता माना जाता है। इस बम विस्फोट से हिंदुओं को बचाने का दावा उद्घव ठाकरे कर रहे हैं। शाहरूख खान के वक्तव्य कि आईपीएल में पाकिस्तानी खिलाडिय़ों को भी खेलना चाहिए, का विरोध करने वाले अपने गिरेबां में भी तो झांक लें। वे घर बुलाकर पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ी को दावत दें तो सही और शाहरूख खान सिर्फ खेलने की बात कह रहे हैं तो उनसे कहा जा रहा है कि माफी मांगो। खुद करो तो सही और दूसरा कहे तो गलत।
विचार भिन्नता हो सकती है। प्रजातंत्र उसका सम्मान भी करता है। संविधान हर किसी को अपने विचार रखने की स्वतंत्रता भी देता है। अभिव्यक्ति की भी स्वतंत्रता देता है लेकिन किसी को किसी के विचारों को मानने की बाध्यता नहीं देता। किसी को भी इसका अधिकार नहीं है कि वह दूसरे को नाजायज रूप से बाध्य करे। यदि कोई ऐसा करने की कोशिश करता है तो कानून को अपना काम करना चाहिए। कानून अपना काम पूरी मुस्तैदी से करे, यह देखना शासन का काम है। राहुल गांधी के सिर्फ वक्तव्य देने से काम नहीं चलने वाला है। उनकी महाराष्ट्र में सरकार है तो उन्हें उसके कान ऐंठने चाहिए कि यह महाराष्ट्र में हो क्या रहा है? शाहरूख खान की फिल्म दिखाने वाले थियेटरों को धमकाने वालों पर कड़ी कार्यवाही क्यों नहीं जा रही हैै? पिछले दिनों इन्हीं ने एक न्यूज चैनल के दफतर में तोड़फोड़ की। भारत जैसे स्वतंत्र देश में किसी को भी इस बात की आजादी नहीं दी जा सकती कि वह बाहुबल से किसी को भी दबाए। ऐसा होता है और शासन मूकदर्शक बना रहता है तो शासन भी पूरी तरह से दोषी है। इनका मनोबल तो इतना बढ़ा है कि राहुल को भी चुनौती दे रहे हैं कि दम हो तो महाराष्ट्र में आकर यह बात कहें। राहुल को अवश्य मुंबई में जाकर खुली आम सभा में यह बात कहना चाहिए।
- विष्णु सिन्हा
4-2-2010
सोनिया गांधी के विषय में यह कहना कि वे इटैलियन मम्मी हैं, राहुल की, न केवल सभ्य आचार के विरूद्घ है बल्कि भारतीय संस्कृति के भी विरूद्घ है। यह सत्य है कि सोनिया गांधी का जन्म इटली में हुआ लेकिन भारतीय संस्कृति के अनुसार स्त्री का घर उसका मायका नहीं होता बल्कि ससुराल होता है। राजीव गांधी से विवाह के बाद सोनिया गांधी का घर भारत है और वह किसी भी भारतीय महिला की तरह भारतीय हैं। जब हर भारतीय का अधिकार मुंबई पर है तो सोनिया गांधी का क्यों नहीं होगा? फिर महाराष्ट्र के लोगों ने तो अपने ऊपर शासन करने का अधिकार भी उस पार्टी को दिया है जिसकी राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं। कभी कांग्रेस से अलग होकर राष्ट्रवादी कांग्रेस बनाने वाले शरद पवार ने कांग्रेस सोनिया गांधी के विदेशी मूल के होने के कारण ही छोड़ी थी लेकिन आज उनकी पार्टी न केवल महाराष्ट्र में कांग्रेस के साथ भागीदारी कर सरकार चला रही है बल्कि केंद्र में सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाले संप्रग सरकार के मंत्री भी शरद पवार हैं। संप्रग विभिन्न दलों का गठबंधन है जिसमें शरद पवार का दल भी शामिल हैं। उन्होंने भी सोनिया गांधी को संप्रग का अध्यक्ष माना हुआ है।
शरद पवार स्वयं कह चुके हैं कि विदेशी मूल का सोनिया गांधी का मुद्दा अब कोई मुद्दा नहीं हैं। क्योंकि भारत की जनता ने ही इस मुद्दे की हवा निकाल दी है। वे चाहती तो मनमोहन सिंह के बदले स्वयं प्रधानमंत्री बन सकती थी। संप्रग के सभी दलों ने उन्हें ही अपना नेता चुना था। कहीं कोई अड़चन नहीं थी। तब सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने से इंकार कर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया। आज केंद्र में उनकी सरकार है। महाराष्ट में उनकी सरकार है। कई प्रांतों में उनकी सरकार है। वे देश की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी की अध्यक्ष हैं। तब बाल ठाकरे के कह देने मात्र से तो मुंबई सोनिया गांधी की नहीं हो सकती। मुंबई जितनी किसी भारतीय की है, उससे कम सोनिया गांधी की नहीं हैं। इटैलियन मम्मी जैसे शब्द का प्रयोग कर बाल ठाकरे खुश हो सकते हैं लेकिन इससे जनता भी उनसे सहमत है, ऐसा तो नहीं दिखायी पड़ता।
दरअसल मुंबई के विषय मे ठाकरे चाचा भतीजा से असहमति की बात अब इतने लोगों ने कह दी है कि विरोध का कभी सामना न करने वाले अब बौखला गए हैं। उन्हें उम्मीद नहीं थी कि राहुल गांधी ठाकरों के विचारों के विरूद्घ वक्तव्य देंगे। अभी तक कांग्रेस पर ही संदेह किया जाता था कि चाचा भतीजा की लड़ाई से फायदा उठाने के लिए कांग्रेस उन्हें शह दे रही है। इसलिए राहुल से ऐसे वक्तव्य की उम्मीद नहीं थी लेकिन राहुल ने जब खुलकर बोल दिया कि बिहार उत्तरप्रदेश सहित सभी राज्यों के कमांडों ने मुंबई हमले के समय मुंबई की रक्षा की तो मामला एकदम साफ हो गया। राहुल के पहले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत अपनी मुंबई और महाराष्ट्र के विषय में राय व्यक्त कर ही चुके थे। उन्होंने तो स्वयं सेवकों से कहा कि उत्तर भारतीयों पर हमला होता है तो उनकी रक्षा करें। इसके बाद भारतीय जनता पार्टी की नीति स्पष्ट हो गयी। ऐसे में कांग्रेस को अपनी बात तो स्पष्ट करनी ही थी। अब राज ठाकरे कह रहे हैं कि राहुल गांधी रोम पुत्र हैं। यह वक्तव्य खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे की तरह है। राज ठाकरे और बाल ठाकरे के विषय में भी तो कहा जा रहा है कि वे मराठी नहीं हैं बल्कि मध्यप्रदेश के इंदौर खंडवा से आकर मुंबई में बसे हैं।
कल ही एक न्यूज चैनल में दिखाया जा रहा था कि बाल ठाकरे पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ी जावेद मियांदाद के साथ अपने निवास स्थान पर हंस हंस कर बात कर रहे हैं। वहीं पास में हाथ बांधे राज ठाकरे और उनके निकट उद्घव ठाकरे खड़े हैं। फिर जावेद मियांदाद सिर्फ क्रिकेट खिलाड़ी नहीं हैं बल्कि वे कुख्यात माफिया डान दाऊद इब्राहिम के समधी भी हैं। जिन्हें मुंबई बम विस्फोट का मुख्य कर्ताधर्ता माना जाता है। इस बम विस्फोट से हिंदुओं को बचाने का दावा उद्घव ठाकरे कर रहे हैं। शाहरूख खान के वक्तव्य कि आईपीएल में पाकिस्तानी खिलाडिय़ों को भी खेलना चाहिए, का विरोध करने वाले अपने गिरेबां में भी तो झांक लें। वे घर बुलाकर पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ी को दावत दें तो सही और शाहरूख खान सिर्फ खेलने की बात कह रहे हैं तो उनसे कहा जा रहा है कि माफी मांगो। खुद करो तो सही और दूसरा कहे तो गलत।
विचार भिन्नता हो सकती है। प्रजातंत्र उसका सम्मान भी करता है। संविधान हर किसी को अपने विचार रखने की स्वतंत्रता भी देता है। अभिव्यक्ति की भी स्वतंत्रता देता है लेकिन किसी को किसी के विचारों को मानने की बाध्यता नहीं देता। किसी को भी इसका अधिकार नहीं है कि वह दूसरे को नाजायज रूप से बाध्य करे। यदि कोई ऐसा करने की कोशिश करता है तो कानून को अपना काम करना चाहिए। कानून अपना काम पूरी मुस्तैदी से करे, यह देखना शासन का काम है। राहुल गांधी के सिर्फ वक्तव्य देने से काम नहीं चलने वाला है। उनकी महाराष्ट्र में सरकार है तो उन्हें उसके कान ऐंठने चाहिए कि यह महाराष्ट्र में हो क्या रहा है? शाहरूख खान की फिल्म दिखाने वाले थियेटरों को धमकाने वालों पर कड़ी कार्यवाही क्यों नहीं जा रही हैै? पिछले दिनों इन्हीं ने एक न्यूज चैनल के दफतर में तोड़फोड़ की। भारत जैसे स्वतंत्र देश में किसी को भी इस बात की आजादी नहीं दी जा सकती कि वह बाहुबल से किसी को भी दबाए। ऐसा होता है और शासन मूकदर्शक बना रहता है तो शासन भी पूरी तरह से दोषी है। इनका मनोबल तो इतना बढ़ा है कि राहुल को भी चुनौती दे रहे हैं कि दम हो तो महाराष्ट्र में आकर यह बात कहें। राहुल को अवश्य मुंबई में जाकर खुली आम सभा में यह बात कहना चाहिए।
- विष्णु सिन्हा
4-2-2010
बुधवार, 3 फ़रवरी 2010
आने वाले समय में मुलायम सिंह का भी हश्र कल्याण सिंह की तरह हो तो कोई आश्चर्य की बात नहीं
अमर सिंह को समाजवादी पार्टी से बर्खास्त कर दिया गया। जयाप्रदा ने अमरसिंह के पक्ष में वकालत करने की कोशिश की तो उन्हें तो बर्खास्त होना ही था। बिना अमरसिंह के जया बच्चन भी समाजवादी पार्टी में रह कर क्या करेंगी? मुलायम सिंह उन्हें बर्खास्त करें या न करें, अंतर कुछ नहीं पड़ता। क्योंकि जया बच्चन ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि परिवार या पार्टी में से उन्हें चुनना पड़ा तो वे परिवार को ही चुनेंगी और अमर सिंह परिवार के व्यक्ति हैं, यह तो जगजाहिर है। सोनिया गांधी और मायावती को भी अमर सिंह ने इस बीच मक्खन लगाने की कोशिश की लेकिन देवियां प्रसन्न होती तो नहीं दिखायी पड़ रही है। समाजवादी की राजनीति को देखते हुए अमिताभ बच्चन ने पहले ही नया ठिकाना ढूंढ लिया है और नरेन्द्र मोदी के साथ वे दोस्ती का नया संस्करण लिख रहे हैं। नरेन्द्र मोदी ने भी गुजरात का पर्यटन एंबेसडर उन्हें बना दिया है। राजनीति में अमरसिंह का हाथ पकड़ कर आए संजय दत्त ने वक्त की नजाकत को समझ कर समाजवादी पार्टी के महासचिव पद से पहले ही इस्तीफा दे दिया है।
समाजवादी पार्टी पर अमरसिंह के कारण जो ग्लैमर छाया था, वह अब पूरी तरह से उतर गया है। यह कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि समाजवादी पार्टी अपने ठेठ पुराने रंग में आ गयी है। जितने भी लोग मुलायम सिंह और अमर सिंह की दोस्ती के कारण अपने आपको उपेक्षित और अपमानित समझ रहे थे, उन सभी का राग समाजवादी पार्टी और मुलायम सिंह के प्रति पुन: उत्पन्न हो गया है लेकिन खबर तो यह भी है कि 4 निलंबित विधायकों के साथ और भी कुछ विधायकों की जल्द ही समाजवादी पार्टी से छुट्टी होने वाली है। उत्तरप्रदेश में ही समाजवादी पार्टी का सब कुछ है और आज वहां वह सत्ता से बाहर बैठी हुई है। अकेले दम पर मायावती से सत्ता छीनना समाजवादी पार्टी के बस में भी नहीं है। फिर कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में मुसलमानों को समाजवादी पार्टी से अपनी तरफ फोड़कर अपनी शक्ति का आभास करा दिया है।
राजनैतिक क्षेत्रों में चर्चा का बाजार गर्म है कि कांग्रेस फिर मुलायम सिंह के साथ खेल रही है। जिस तरह से पिछली लोकसभा में कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी का समर्थन प्राप्त कर मनमोहन सिंह की सरकार को बचाया लेकिन बदले में मुलायम सिंह और उनकी पार्टी को कुछ मिला नहीं, उसी तरह का खेल फिर मुलायम सिंह के साथ खेला जा रहा है। आगे गठबंधन के लिए मुलायम सिंह से कहा गया कि अमर सिंह को अलग करो। अमर सिंह के रहते समझौता मुमकिन नहीं। अमरसिंह ने जिस तरह से अमिताभ बच्चन, जया बच्चन को समाजवादी पार्टी से जोड़ा , यह कांग्रेस को पसंद आने वाली बात नहीं थी। वैसे भी मुलायम सिंह सोनिया गांधी को एक बार प्रधानमंत्री बनने से रोकने के कारण सोनिया गांधी की गुड लिस्ट में नहीं। फिर अमिताभ और जया को राजनीति में अपने पक्ष में करके तो उन्होंने आग में पेट्रोल ही डालने का काम किया। यह सब हुआ तो अमरसिंह के ही प्रयासों से। जब अमरसिंह समाजवादी पार्टी मे नहीं तो ये सब भी पार्टी से बाहर।
समाजवादी पार्टी से राज बब्बर ने अमरसिंह के कारण ही किनारा किया। आज वे कांग्रेस के सांसद हैं। अमरसिंह को समाजवादी पार्टी से निकलवाकर कांग्रेस ने एक तीर से दो शिकार किया। अमरसिंह को कहीं का नहीं छोड़ा। आज न तो अमरसिंह में कांग्रेस की कोई रुचि हैं और न ही राष्ट्रवादी कांग्रेस की। कल्याण सिंह उन्हें अपनी पार्टी में ले लें तो बात अलग है। वैसे भी कल्याण सिंह का भाजपा छोडऩे के बाद क्या हश्र हुआ यह सबको पता है। अमरसिंह भी अब ठाकुरों और अति पिछड़ों को जोड़ कर राजनीति करने की कोशिश कर रहे हैं तो मतलब कल्याण सिंह ही है लेकिन ये फिल्मी सितारे अमर सिंह के साथ कल्याण सिंह के भी साथ जाएंगे, इसकी गुंजाइश कम है। अमिताभ बच्चन तो गुजरात के नरेन्द्र मोदी के साथ जाकर स्पष्ट कर चुके हैं कि अब वे उत्तरप्रदेश के झमेले में नहीं पडऩे वाले है। उन्होंने चुना भी है तो सोनिया गांधी के घोर विरोधी को। अमरसिंह को भाजपा लेने को तैयार होगी तभी अमरसिंह की राजनीति में कोई स्थान हो सकता है लेकिन अमरसिंह जैसे स्वच्छंद व्यक्ति भाजपा को रास आएंगे, इसकी कम गुंजाईश है।
जहां तक कांग्रेस का मामला है तो कांग्रेस मुलायम सिंह के कमजोर पडऩे पर ही उत्तरप्रदेश में अपने उदय की संभावना देखती है। क्योंकि मुकाबला तो अब भाजपा से है, नहीं। विगत वर्षों में भाजपा उत्तरप्रदेश में बहुत कमजोर हो गयी है। मुकाबला सीधे-सीधे मायावती से है। मुसलमानों और सवर्णों को अपनी तरफ करने में कांग्रेस सफल हो रही है। मुलायम सिंह से कुछ ले देकर समझौता हो जाता है तो पिछड़ों के वोट बैंक को भी अपनी तरफ किया जा सकता है। इसी से संभावना बनती है कि मायावती को चुनाव में सत्ताच्युत किया जा सके। कांग्रेस को लोकसभा में पूर्ण बहुमत चाहिए तो उसे हर हाल में उत्तरप्रदेश में अपनी उपयोगिता सिद्ध करना पड़ेगा। अमरसिंह को समाजवादी पार्टी से निकलवा कर कांग्रेस ने भविष्य की अपनी योजना की तरफ एक कदम और आगे बढ़ाया है।
लेकिन यह भी सच है कि अमर सिंह चुप बैठने वाले प्राणी नहीं हैं। खुद का भला कर सकें न कर सकें लेकिन मुलायम सिंह को भी सत्ता की चौखट पर खड़ा होता वे देख नहीं सकते। इसलिए मुलायम की ताकत जितनी वे कमजोर कर सकेंगे, उतनी तो करने का पूरा प्रयास करेंगे। कल्याण सिंह अपना कुछ नहीं बना सके लेकिन भाजपा को चोट पहुंचाने में वे सफल रहे। अमरसिंह भी यही करेंगे। धन की ताकत तो उनके पास है, ही और वे जुगाड़ करना भी जानते हैं लेकिन आज की स्थिति में इसमें भी उन्हें आसानी नहीं होगी। यह तो तय है कि अमर सिंह की अमरबेल बिना सहारे बढ़ नहीं सकती लेकिन मुलायम के साथ उन्होंने जो किया, उसके बाद कौन अमरबेल को फैलाने का मौका देगा फिर भी मुलायम के लिए वे जितने हितकारी थे, अब उतने ही उनके लिए नुकसानकारी होंगे तो फायदा किसे मिलेगा?
स्वाभाविक रुप से मायावती को या कांग्रेस को। अमरसिंह ने तो समाजवादी पार्टी को यादवों की पार्टी का तमगा भी दे दिया है। मतलब मुलायम के विरुद्धजितना भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दुष्प्रचार संभव होगा, अमरसिंह करेंगे। भले ही वे कहते हैं कि अब समाजवादी पार्टी का नाम भी नहीं लूंगा। पहले ही वे कह चुके हैं कि मुलायम सिंह के कई राज उनके पास हैं लेकिन वे उनको उजागर नहीं करेंगे। वे तो यहां तक कहते हैं कि ये राज उनकी मृत्यु के साथ उनके साथ ही जाएंगे लेकिन ऐसी बातों की राजनीति में क्या अहमियत है, सभी इसे अच्छी तरह से जानते है। फिर जरुरी थोड़े ही है कि राज को अमरसिंह ही उजागर करें। दूसरे स्रोत से राज उजागर होंगे तो अमरसिंह पर भले ही दोषारोपण लगे लेकिन वे दूध के धुले स्वयं को तो कह ही सकते हैं। वैसे भी कहा जाता है कि दोस्त जब दुश्मन बनता है तो उससे बड़ा दुश्मन और कोई नहीं होता। अभी तो यही दिखायी पड़ता है कि हम तो डूबेंगे सनम तुमको भी ले डूबेंगे।
- विष्णु सिन्हा
दिनांक 03.02.2010
मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010
मराठियों के नाम पर सत्ता प्राप्त करने की महत्वाकांक्षा रखने वाले कभी सफल नहीं होंगे
मोहन भागवत के मुंबई सबकी है, कहने के बाद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरी ने पहले तो इस विषय में मोहन भागवत से चर्चा करने की बात कही लेकिन बाद में उन्होंने भी वही कहा जो मोहन भागवत ने कहा था। इससे यह बात भी सही साबित हो गयी कि संघ के स्टैंड पर ही भाजपा चलती है। संघ और भाजपा दो नहीं हैं। नीतिन गडकरी भले ही कहें कि भाजपा अलग संगठन है लेकिन उनकी स्वयं की नियुक्ति अध्यक्ष पद पर संघ के कारण ही हुई है। अब तो भाजपा के राजनैतिक कार्यकर्ताओं को भी संघ की तरह 3 वर्ष का प्रशिक्षण देने की बात कही जा रही है। यह व्यवस्था लागू हो गयी तो भाजपा के रास्ते शॉर्ट कट से राजनीति करने का रास्ता वैसे ही बंद हो जाएगा। पदाधिकारियों का कार्यकाल भी संविधान में परिवर्तन कर 3 वर्ष के बदले 5 वर्ष करने की योजना है जिससे पदाधिकारी अपने पूरे कार्यकाल का फल चुनाव के माध्यम से देख सकें। साफ मतलब है कि भाजपा अगला लोकसभा और विधानसभा का चुनाव नीतिन गडकरी के नेतृत्व में ही लडऩे का इरादा रखती है और इस मामले में संघ की पूरी तरह से सहमति है।
शिवसेना का कार्यक्षेत्र मुंबई और उससे विस्तृत होकर महाराष्ट्र तक ही है तो उसकी सोच का दायरा भी मुंबई से बाहर नहीं जाता। मोहन भागवत के मुंबई सबकी है, के वक्तव्य के जवाब में शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने कहा कि संघ मुंबई की चिंता करना छोड़ दे और वह दक्षिण भारतीयों को हिन्दी पढ़ाए। स्पष्ट है कि शिवसेना अपने मराठी मामले से पीछे हटने वाली नहीं है। वह हट भी नहीं सकती। क्योंकि इसके सिवाय उसके पास और कुछ है, भी नहीं। राज ठाकरे कह रहे हैं कि मराठी जानने से ही काम नहीं चलेगा। इसके लिए तो मराठी सीखने के लिए उत्तरप्रदेश, बिहार में स्कूल ही खुल जाएंगे। मुंबई और महाराष्ट्र में वही नौकरी प्राप्त कर सकेगा जो महाराष्ट्र में ही जन्म लेगा। यह मामला भी बहुत दिनों तक चलने वाला नहीं है। क्योंकि लाखों की संख्या में उत्तर भारत से जाकर लोग महाराष्ट्र में रह रहे हैं। उनके बच्चों ने महाराष्ट्र में ही जन्म लिया है। ठाकरे परिवार स्वयं मध्यप्रदेश से आकर मुंबई में बसा है। शायद यही कारण है कि जन्म के कारण दोनों ठाकरे भाई मराठी है। इसलिए स्वयं को मराठी साबित करने के लिए जन्म का राग राज ठाकरे अलाप रहे हैं।
मतलब जो खुद को मुफीद लगे, वह परिभाषा मराठी की। राजनैतिक स्वार्थ सोच को कितना नीचे ले जा सकता है, इसका उदाहरण हैं, ठाकरों का विचार। कभी वामपंथियों की ताकत को कम करने के लिए कांग्रेस ने शिवसेना को टेका लगाया था। तब उनका नारा था कि लुंगी उठाओ पूंगी बजाओ। दक्षिण भारतीयों को मुंबई से भगाने का आंदोलन शिवसेना ने चलाया था। फिर वह बात आयी गयी हो गई। शिवसेना हिंदुओं की हितचिंतक बन गयी। इसी सोच ने भाजपा को सेना के करीब लाया। सब ठीक ठाक ही चल रहा था लेकिन राज ठाकरे के विद्रोह ने शिवसेना को फिर वहीं लौटने के लिए मजबूर कर दिया। दो भाइयों के राजनैतिक द्वन्द का शिकार उत्तर भारतीय लोग मुंबई और महाराष्ट्र में बने। कांग्रेस मुस्कराती रही। लोग सड़कों पर पिटते रहे और कांग्रेस को अपना भविष्य उज्जवल दिखायी देता रहा। कांग्रेस इस खेल की माहिर खिलाड़ी तो है ही और चुनाव परिणामों ने बता भी दिया कि राज ठाकरे के बहाने कांग्रेस ने किला फतह कर लिया। उसकी सीटों में इजाफा भी हो गया। राज ठाकरे ने भी शिवसेना से कुछ सीटें झटक ली।
यह बात दूसरी है कि कांग्रेस के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण बाद में अपनी बात से पलट गए लेकिन पहले तो उन्होंने निर्णय सुना ही दिया था कि मुंबई में टैक्सी का लाइसेंस परमिट उसे ही मिलेगा जिसे मराठी पढऩा, लिखना, बोलना आएगा। अब केंद्रीय गृहमंत्री पी.चिदम्बरम कह रहे हैं कि मुंबई सबकी है और उत्तर भारतीयों की पूरी तरह से सुरक्षा की जाएगी। कांग्रेस की मुंबई में सरकार होने के बावजूद जब सड़कों पर रेहड़ी वाले, टैक्सी वाले मार खाते रहे तब उनकी सुरक्षा तो सरकार नहीं कर सकी। प्रतियोगी परीक्षा में सम्मिलित होने गए, युवा मार खाते रहे लेकिन उनकी सुरक्षा न की जा सकी। दरअसल मोहन भागवत के स्पष्ट कथन के बाद जब भाजपा ने भी स्पष्ट कर दिया कि वह मोहन भागवत के विचारों से सहमत है तब कांग्रेस के पास भी अपनी स्थिति स्पष्ट करने के सिवाय कोई चारा नहीं बचा। फिर देर से ही सही भाजपा और कांग्रेस ने अपनी राय प्रगट की तो यही उनका कर्तव्य भी था। आखिर वे राष्ट्रीय पार्टियां हैं और कम से कम उनकी सोच तो राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में होना चाहिए। तात्कालिक लाभ के लिए विष रोपण को प्रोत्साहित करने से न केवल बचना चाहिए बल्कि ऐसा करने वालों के विरुद्ध खड़े होने का दम भी दिखाना चाहिए।
कल ही बिहार में राहुल गांधी ने कहा कि जब मुंबई पर आतंकवादी हमला हुआ तब मुंबई को बचाने के लिए गए कमांडो उत्तरप्रदेश और बिहार के थे। उत्तरप्रदेश और बिहार के ही नहीं थे, पूरे देश के थे। मुंबई पर हमला कोई व्यक्तिगत मुंबई पर हमला नहीं था बल्कि भारतीयों की अस्मिता पर हमला था और पूरा देश एक था। काश्मीर जिस तरह से भारत का अविभाज्य अंग है, उसी तरह से मुंबई और महाराष्ट्र भी भारत का अविभाज्य अंग है। नफरत की सोच काश्मीर को भारत से अलग नहीं कर सकती तो मुंबई पर व्यक्ति विशेष या समाज के एकाधिकार को कैसे स्वीकार कर सकती है? आश्चर्य तो तब होता है जब एक से एक मराठा वीरों की जननी महाराष्ट्र जिसने राष्ट्र भक्ति का संदेश पूरे भारत को दिया, वहां संकीर्ण विचारों को पुष्पित पल्लवित किया जाता है और मराठी के नाम पर बेकसूरों के साथ अन्याय को न्याय की संज्ञा दी जाती है। छत्रपति शिवाजी को अपना नायक मानने वाले लोग अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए नफरत के बीज बोते हैं। वीरांगना लक्ष्मी बाई झांसी की रानी भी महाराष्ट्र की ही पुत्री थी और उन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजों से लोहा लिया। लोक मान्य बाल गंगाधर तिलक को क्या देश भूल सकता है? मराठियों का तो लंबा इतिहास है।
आज जो मुंबई को मराठियों की बता रहे है, उन्हें इतिहास का भी अध्ययन कर लेना चाहिए। तुगलकी फरमानों का इतिहास में क्या हश्र हुआ है, इसे भी समझ लेना चाहिए। चमड़े के सिक्के इस देश में नहीं चलने वाले हैं तो गलत विचारों की यात्रा भी बहुत दूर तक नहीं हो सकती। दूर तक क्यों जाएं? पिछले चुनाव में ही दोनों भाइयों की पार्टियों को मिले मत ही स्पष्ट करते हैं कि 80 प्रतिशत से ज्यादा जनता उनके साथ नहीं है। बाल ठाकरे दाऊद इब्राहिम माफिया सरगना के समधी जावेद मियांदाद को तो घर बुलाकर दावत देते हैं और शाहरुख से कहते हैं कि पाकिस्तानी खिलाडिय़ों के साथ खेलना है तो पाकिस्तान में जाकर खेलें। कब किधर पलटी मार जाए, कुछ पता नहीं चलता। सत्ता में काबिज होने के लिए जो विचार हित कर दिखायी दें, अपनी सोच से, उसके बाहर सोच जाती ही नहीं। सहिष्णु भारत को संकीर्णता के दलदल में घसीटने की कोशिश पहले भी सफल नहीं हुई तो अब क्या सफल होगी?
- विष्णु सिन्हा
दिनांक 02.02.2010
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सोमवार, 1 फ़रवरी 2010
पेट्रोल, डीजल भी अब खुले बाजार में जाने की तैयारी में
केंद्र सरकार पेट्रोल, डीजल से अपना नियंत्रण समाप्त करने के मामले में विचार कर रही है। नियंत्रण हटते ही यह दोनों अतिआवश्यक वस्तु बाजार के हवाले हो जाएंगे। डीजल परिवहन का ऐसा आवश्यक साधन है कि जिसकी कीमत में बढ़ोतरी का मतलब होता हैं, बाजार में तमाम वस्तुओं के मूल्य में वृद्घि लेकिन एक बार परिवहन भाड़ा बढ़ जाता है तो फिर डीजल की कीमत कम होने पर भी परिवहन भाड़ा कम नहीं होता। इसके साथ भावों के उतार-चढ़ाव के सट्टे की इजाजत भी सरकार देती है। कल को डीजल, पेट्रोल भी इस सट्टे की जद में आ जाएं तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। पेट्रोल डीजल पर से नियंत्रण हटने का मतलब है कि इनकी कीमतों का बढऩा रोजमर्रा का काम हो जाएगा। पूंजीवाद की पोषक सरकार वैसे भी सब्सिडी के विरूद्घ है। भविष्य में रसोई गैस को भी सरकार बाजार के हवाले कर दे तो उसके लिए तैयार रहने की जरूरत है। वैसे ही महंगाई से जनता त्रस्त है और सरकार ने कानों में रूई ठूंसकर कान बंद कर लिया है।
कृषि एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री शरद पवार पहले तो रोज भावों के बढऩे की ही बात किया करते थे। फिर जब महंगाई के लिए उन पर दोषारोपण होने लगा तो उन्होंने जिम्मेदारी प्रधानमंत्री पर डाल दी। मंत्रिमंडल के सामूहिक निर्णय के बहाने बचने का प्रयास किया। फिर अचानक शक्कर के भाव थोक में कम भी हुए तो चिल्हर में घटने का नाम भी नहीं ले रहे। बंदरगाहों पर पड़ी कच्ची चीनी के बहाने मायावती सरकार को निशाने पर लिया गया। मायावती ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर शरद पवार को मंत्रिमंडल से हटाने का अनुरोध किया और ऐसी किसी भी बैठक में सम्मिलित होने से इंकार किया जिसमे शरद पवार हों। जब शरद पवार चारों तरफ से घिरने लगे तब उन्होंने कहा कि 10 दिन में महंगाई कम हो जाएगी। 10 दिन में महंगाई कम नहीं हुई लेकिन उसके बाद अचानक दालों की कीमत में 25 प्रतिशत की कमी हो गयी। न तो दाल की आवक बढ़ी और न ही मांग और पूर्ति में कमी हुई लेकिन दाल की कीमतें गिर गयी। अब इसे लोग क्या समझें ?
व्यापारियों का हृदय परिवर्तन हो गया। वे घाटा खाकर माल बेचने के लिए तैयार हो गए या सरकारों का दबाव काम कर गया। खुले बाजार के हवाले कर भारतीयों को जिस तरह से व्यापारियों के हवाले कर दिया गया, वह किस तरह से एक जिम्मेदार सरकार का सही कृत्य कहा जा सकता है। कभी कहा जाता था कि दाल रोटी खाओ प्रभु के गुण गाओ? रोटी तो रोटी दाल ही इतनी महंगी हो गयी कि अब भूखे पेट ही भजन गोपाला करना पड़ रहा है। क्योंकि भूखे पेट न होए भजन गोपाला की बात भी तो अब सार्थक नहीं दिखायी देती। महंगाई को लेकर अब सरकारें भी आंदोलन कर रही हैं। छत्तीसगढ़ की भाजपा ने 13 फरवरी को छत्तीसगढ़ बंद का आह्वान महंगाई को लेकर करने का निश्चय किया है। छत्तीसगढ़ की कांग्रेस इसके विरोध की योजना बना रही है।
डा. रमन सिंह छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने 3 रू . किलो में 35 किलो चांवल गरीबों को देने की शुरूआत की। अब वह 2 रू. और 1 रू. में दे रही है। स्कूली छात्रों को वह मुफत में शिक्षा, यूनिफार्म, पुस्तकें, कापियां दे ही रही है। लड़कियों को साइकल दे रही है। यह एक तरह का शाक आब्र्जवर है। गरीब भी जी सकें। उनके बच्चे भी पढ़ लिखकर आगे बढ़ सकें। अब यही योजना केंद्र सरकार भी लाने जा रही है। गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने कहा है कि गरीबों को 25 किलो गेहूं या चांवल मुफत मिलेगा। स्कूली छात्रों को शिक्षा के लिए सब कुछ मुफत मिलेगा। रोजगार गारंटी योजना के तहत जिस तरह से 100 दिन का रोजगार दिया जा रहा है, उसी तरह की यह योजना है। अच्छी योजना है। गरीबों के लिए ऐसी योजना एक संवेदनशील सरकार की होनी भी चाहिए लेकिन बहुत से ऐसे लोग भी हैं जो न तो गरीब हैं और न ही अमीर। उन्हें बाजार की व्यवस्था से बचाने के लिए सरकार के पास कोई योजना है या उन्हें बाजार के हवाले छोड़कर नित्य तनावपूर्ण जीवन जीने के लिए छोड़ दिया है।
अधिक से अधिक 20 प्रतिशत लोगों को अमीर, कम अमीर माना जा सकता है। 50 प्रतिशत लोगों को गरीब माना जा सकता है। लेकिन सरकार जिन्हें मुफत में चांवल गेहूं देने की बात कह रही है, वे ये पूरे के पूरे 50 प्रतिशत लोग नहीं हैं। गरीबी रेखा से जो थोडा ही ऊपर हैं, उन्हें बाजार के भरोसे छोडऩा तो उनके साथ पूरी तरह से अन्याय है। जिनकी दृष्टि में महंगाई का बढऩा आर्थिक विकास है, वे नहीं समझ सकते कि आज निम्र मध्यम श्रेणी के परिवार किस हाल में गुजारा कर रहे है। युवा पीढ़ी का आकर्षण ग्लैमर में है। कितने पालक हैं जो अपने बच्चों के स्वप्नों को पूरा करने की क्षमता रखते हैं। जब परिवार के लिए दो वक्त का भोजन ही भारी पड़ रहा है तब युवा पीढ़ी की आवश्यकताओं, इच्छाओं को पूरा करना एक पालक के लिए कितना कठिन काम है, इसे समझने के लिए कौन तैयार हैं ? शिक्षा इतनी महंगी हो चुकी है कि सबके बस की तो बात रही नहीं कि वह अपने बच्चों को उनकी इच्छानुरूप उच्च शिक्षा दिला सकें।
इससे युवा पीढ़ी के मन में जो अवसाद पैदा हो रहा है, उसे दूर करने का उपाय तो दिखायी नहीं पड़ता। फिर युवा पीढ़ी ही क्यों उनके पालकों के मन में भी अवसाद घर बना रहा है। इन अवसादों के कारण घातक बीमारियों से ग्रस्त हो रही पीढ़ी को भी महंगा उपचार चाहिए। हृदय, किडनी, मधुमेह जैसी बीमारियों का उपचार हर किसी के बस की बात नहीं। क्या सरकार में बैठे लोग जानते हैं कि इन बीमारियों के पीछे बाजार भी एक बड़ा कारण हैै ? बुद्घिजीवी सलाह देते हैं कि बुढ़ापे के लिए जवानी में ही योजना बनाना चाहिए। आज से 20 वर्ष पूर्व किसी ने अपने बुढ़ापे के लिए 5 लाख का भी बीमा करवाया तो उस समय 5 लाख रूपये बड़ी रकम होती थी लेकिन आज 5 लाख रूपये मिलने पर भी वह एक छोटा सा आशियाना अपने लिए नहीं बना सकता। जबकि इस 5 लाख के लिए किश्तें जमा करने में उसने अपनी कितनी इच्छाओं को मारा, यह तो वह स्वयं ही जानता है।
सुरक्षा के साधन जितने बढ़े, आदमी उतना ही असुरक्षित होता गया। विकास का अर्थ तो होता सुरक्षा लेकिन विकास ने सुरक्षा को भी असुरक्षा में बदल दिया। आज हम पूरी तरह से बाजार के हवाले हैं। वह जैसा चाहे हमारा शोषण करें। एक मात्र आशा जनता की सरकार से होती है तो सरकार का यह हाल है कि वह खोज में लगी है कि और क्या बच गया है जो बाजार के हवाले नहीं है। अब पेट्रोल, डीजल की बारी है। सरकार को भी धन चाहिए। देश के नागरिक हो तो बिना ना नुकुर किए टैक्स भरो। सरकार के नाम पर दिया गया टैक्स भी पूरा का पूरा कहां सरकार के पास पहुंचता है। बीच में बिचौलिये हैं। वे वसूल तो पूरा करते है लेकिन जितना अपने पास रख सकते हैं, वह अपने पास ही रख लेते हैं। पिसता तो आम आदमी है। जिसका चुनाव में मत देने के सिवाय अन्य कोई उपयोग नहीं है। इस एकमात्र उपयोगिता के कारण ही सरकार उसकी परवाह का ढोंग रचती है।
- विष्णु सिन्हा
1-2-2010
कृषि एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री शरद पवार पहले तो रोज भावों के बढऩे की ही बात किया करते थे। फिर जब महंगाई के लिए उन पर दोषारोपण होने लगा तो उन्होंने जिम्मेदारी प्रधानमंत्री पर डाल दी। मंत्रिमंडल के सामूहिक निर्णय के बहाने बचने का प्रयास किया। फिर अचानक शक्कर के भाव थोक में कम भी हुए तो चिल्हर में घटने का नाम भी नहीं ले रहे। बंदरगाहों पर पड़ी कच्ची चीनी के बहाने मायावती सरकार को निशाने पर लिया गया। मायावती ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर शरद पवार को मंत्रिमंडल से हटाने का अनुरोध किया और ऐसी किसी भी बैठक में सम्मिलित होने से इंकार किया जिसमे शरद पवार हों। जब शरद पवार चारों तरफ से घिरने लगे तब उन्होंने कहा कि 10 दिन में महंगाई कम हो जाएगी। 10 दिन में महंगाई कम नहीं हुई लेकिन उसके बाद अचानक दालों की कीमत में 25 प्रतिशत की कमी हो गयी। न तो दाल की आवक बढ़ी और न ही मांग और पूर्ति में कमी हुई लेकिन दाल की कीमतें गिर गयी। अब इसे लोग क्या समझें ?
व्यापारियों का हृदय परिवर्तन हो गया। वे घाटा खाकर माल बेचने के लिए तैयार हो गए या सरकारों का दबाव काम कर गया। खुले बाजार के हवाले कर भारतीयों को जिस तरह से व्यापारियों के हवाले कर दिया गया, वह किस तरह से एक जिम्मेदार सरकार का सही कृत्य कहा जा सकता है। कभी कहा जाता था कि दाल रोटी खाओ प्रभु के गुण गाओ? रोटी तो रोटी दाल ही इतनी महंगी हो गयी कि अब भूखे पेट ही भजन गोपाला करना पड़ रहा है। क्योंकि भूखे पेट न होए भजन गोपाला की बात भी तो अब सार्थक नहीं दिखायी देती। महंगाई को लेकर अब सरकारें भी आंदोलन कर रही हैं। छत्तीसगढ़ की भाजपा ने 13 फरवरी को छत्तीसगढ़ बंद का आह्वान महंगाई को लेकर करने का निश्चय किया है। छत्तीसगढ़ की कांग्रेस इसके विरोध की योजना बना रही है।
डा. रमन सिंह छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने 3 रू . किलो में 35 किलो चांवल गरीबों को देने की शुरूआत की। अब वह 2 रू. और 1 रू. में दे रही है। स्कूली छात्रों को वह मुफत में शिक्षा, यूनिफार्म, पुस्तकें, कापियां दे ही रही है। लड़कियों को साइकल दे रही है। यह एक तरह का शाक आब्र्जवर है। गरीब भी जी सकें। उनके बच्चे भी पढ़ लिखकर आगे बढ़ सकें। अब यही योजना केंद्र सरकार भी लाने जा रही है। गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने कहा है कि गरीबों को 25 किलो गेहूं या चांवल मुफत मिलेगा। स्कूली छात्रों को शिक्षा के लिए सब कुछ मुफत मिलेगा। रोजगार गारंटी योजना के तहत जिस तरह से 100 दिन का रोजगार दिया जा रहा है, उसी तरह की यह योजना है। अच्छी योजना है। गरीबों के लिए ऐसी योजना एक संवेदनशील सरकार की होनी भी चाहिए लेकिन बहुत से ऐसे लोग भी हैं जो न तो गरीब हैं और न ही अमीर। उन्हें बाजार की व्यवस्था से बचाने के लिए सरकार के पास कोई योजना है या उन्हें बाजार के हवाले छोड़कर नित्य तनावपूर्ण जीवन जीने के लिए छोड़ दिया है।
अधिक से अधिक 20 प्रतिशत लोगों को अमीर, कम अमीर माना जा सकता है। 50 प्रतिशत लोगों को गरीब माना जा सकता है। लेकिन सरकार जिन्हें मुफत में चांवल गेहूं देने की बात कह रही है, वे ये पूरे के पूरे 50 प्रतिशत लोग नहीं हैं। गरीबी रेखा से जो थोडा ही ऊपर हैं, उन्हें बाजार के भरोसे छोडऩा तो उनके साथ पूरी तरह से अन्याय है। जिनकी दृष्टि में महंगाई का बढऩा आर्थिक विकास है, वे नहीं समझ सकते कि आज निम्र मध्यम श्रेणी के परिवार किस हाल में गुजारा कर रहे है। युवा पीढ़ी का आकर्षण ग्लैमर में है। कितने पालक हैं जो अपने बच्चों के स्वप्नों को पूरा करने की क्षमता रखते हैं। जब परिवार के लिए दो वक्त का भोजन ही भारी पड़ रहा है तब युवा पीढ़ी की आवश्यकताओं, इच्छाओं को पूरा करना एक पालक के लिए कितना कठिन काम है, इसे समझने के लिए कौन तैयार हैं ? शिक्षा इतनी महंगी हो चुकी है कि सबके बस की तो बात रही नहीं कि वह अपने बच्चों को उनकी इच्छानुरूप उच्च शिक्षा दिला सकें।
इससे युवा पीढ़ी के मन में जो अवसाद पैदा हो रहा है, उसे दूर करने का उपाय तो दिखायी नहीं पड़ता। फिर युवा पीढ़ी ही क्यों उनके पालकों के मन में भी अवसाद घर बना रहा है। इन अवसादों के कारण घातक बीमारियों से ग्रस्त हो रही पीढ़ी को भी महंगा उपचार चाहिए। हृदय, किडनी, मधुमेह जैसी बीमारियों का उपचार हर किसी के बस की बात नहीं। क्या सरकार में बैठे लोग जानते हैं कि इन बीमारियों के पीछे बाजार भी एक बड़ा कारण हैै ? बुद्घिजीवी सलाह देते हैं कि बुढ़ापे के लिए जवानी में ही योजना बनाना चाहिए। आज से 20 वर्ष पूर्व किसी ने अपने बुढ़ापे के लिए 5 लाख का भी बीमा करवाया तो उस समय 5 लाख रूपये बड़ी रकम होती थी लेकिन आज 5 लाख रूपये मिलने पर भी वह एक छोटा सा आशियाना अपने लिए नहीं बना सकता। जबकि इस 5 लाख के लिए किश्तें जमा करने में उसने अपनी कितनी इच्छाओं को मारा, यह तो वह स्वयं ही जानता है।
सुरक्षा के साधन जितने बढ़े, आदमी उतना ही असुरक्षित होता गया। विकास का अर्थ तो होता सुरक्षा लेकिन विकास ने सुरक्षा को भी असुरक्षा में बदल दिया। आज हम पूरी तरह से बाजार के हवाले हैं। वह जैसा चाहे हमारा शोषण करें। एक मात्र आशा जनता की सरकार से होती है तो सरकार का यह हाल है कि वह खोज में लगी है कि और क्या बच गया है जो बाजार के हवाले नहीं है। अब पेट्रोल, डीजल की बारी है। सरकार को भी धन चाहिए। देश के नागरिक हो तो बिना ना नुकुर किए टैक्स भरो। सरकार के नाम पर दिया गया टैक्स भी पूरा का पूरा कहां सरकार के पास पहुंचता है। बीच में बिचौलिये हैं। वे वसूल तो पूरा करते है लेकिन जितना अपने पास रख सकते हैं, वह अपने पास ही रख लेते हैं। पिसता तो आम आदमी है। जिसका चुनाव में मत देने के सिवाय अन्य कोई उपयोग नहीं है। इस एकमात्र उपयोगिता के कारण ही सरकार उसकी परवाह का ढोंग रचती है।
- विष्णु सिन्हा
1-2-2010
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