यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं
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शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

महंगाई हो या नक्सल समस्या जिम्मेदारी से केंद्र सरकार बच नहीं सकती

महंगाई और हिंसा ये ही दो बड़े मुद्दे देश के सामने हैं। महंगाई के मामले
में तो एक तरह से केंद्र सरकार ने हाथ खड़े कर दिए हैं और राज्य सरकारों
को इसके लिए जिम्मेदार भी बताया है। केंद्र सरकार कहती है कि राज्य
सरकारें टैक्स कम कर महंगाई कम करें। सब कुछ तय केंद्र सरकार करती है कि
नीतियां क्या हो? सब्सिडी दी जाए या न दी जाए। नियंत्रण रखा जाए या बाजार
के हवाले सब कुछ कर दिया जाए। शेयर मार्केट में शेयरों की कीमत बढ़ रही
है तो आर्थिक विकास हो रहा है। लोक लुभावन नीति आर्थिक विकास के लिए ठीक
नहीं है। जनता के सुख की कीमत पर विकास या जनता को कष्ट देकर विकास। तो
सरकार की सोच स्पष्ट है कि जनता को भले ही कष्ट हो लेकिन आर्थिक विकास
का पहिया तीव्र गति से घुमना चाहिए। समस्त लोक लुभावन योजनाओं को सरकारें
वापस ले ले तो तय है कि आम आदमी को दो समय का भोजन भी नसीब नहीं होगा।

कल ही दिल्ली में एक इलाके में पानी न आने के कारण लोग विरोध करने सड़क
पर उतर आए तो उन्होंने राहगीरों को मारना पीटना एवं रेहड़ी वालों को
लूटना प्रारंभ कर दिया। पानी न आने से इनका कोई लेना देना नहीं लेकिन
जनता की मानसिक स्थिति खराब हो रही है, इससे तो यही पता चलता है। सही और
गलत का भान यदि समाप्त हो जाए तब ही आदमी हिंसक हो जाता है। रायपुर में
ही एक ड्रायवर ने एक दंपत्ति को कुचल दिया। शराब के नशे में धुत्त
ड्राइवर क्रोध के वशीभूत जब हिंसक हो उठे तो इसका क्या अर्थ निकलता है?
युवा स्त्री पुरुष हिंसा पर उतर आएं तभी तो नक्सली समस्या खड़ी होती है।
नक्सलवादियों से प्रभावित होकर आखिर नवजवान क्यों हथियार उठा लेते हैं?
वे मारते हैं, अपने ही लोगों को और मरते भी हैं, सशस्त्र बलों की
गोलियों से। यह स्थिति सामान्य तो नहीं दिखायी पड़ती।

काश्मीर में ही फिर से हिंसा फैल रही है। कितने ही शहरों में कफ्र्यू
लागू है और सशस्त्र बलों पर पत्थरबाजी हो रही हैं। स्त्री पुरुष सभी
शामिल हैं। हिंसा नियंत्रण के बाहर होते देख देखते ही गोली मारने के आदेश
दिए गए हैं। प्रजातांत्रिक ढंग से कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस की सरकार
है, काश्मीर में। कहा जा रहा है कि आतंकवादी नवजवानों को पत्थर सशस्त्र
बल पर फेंकने के लिए धन दे रहे हैं। देश में घुसने के लिए आतंकवादी
पाकिस्तानी सीमा पर इकट्ठा हैं। देश के बड़े हिस्से में रात्रिकालीन
ट्रेनें नहीं चल रही है। डर है कि नक्सली ट्रेनों को न उड़ा दें।
केंद्रीय गृह सचिव कह रहे हैं कि नक्सलियों ने वायदा किया है कि ट्रेनों
पर हमला नहीं करेंगे। ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस के साथ जो हादसा हुआ था,
उसे भी गृहसचिव नक्सलियों का कारनामा नहीं बता रहे हैं।

वैसे भी केंद्र सरकार की नजर में नक्सलियों का मामला राज्य सरकारों का
मामला है। केंद्र सरकार तो राज्य सरकारों को नक्सली समस्या से निपटने के
लिए सहयोग कर रही है। मतलब महंगाई हो या हिंसात्मक गतिविधियां सब
जिम्मेदारी राज्य सरकार की है। केंद्रीय बल एवं राज्य पुलिस बल में मतभेद
है। यह बात केंद्रीय गृह सचिव खुलेआम स्वीकार करते है। नक्सल समस्या से
निपटने की जिन पर जिम्मेदारी है, जब उन्हीं मे मतभेद है तो वे किस तरह
से नक्सलियों से लड़ेंगे। गृह सचिव कहते हैं, रक्षा मंत्री कहते हैं कि
नक्सलियों से लडऩे के लिए फौज की जरुरत नहीं हैं। काश्मीर से भी फौज
हटायी गयी। अब मामला नियंत्रण से बाहर हो रहा है तो फिर फौज को बुलाया जा
रहा है। इतना ही नहीं पंजाब में बरसात ने हालात खराब कर दिए हैं। एक नहर
में दरार आ जाने से आसपास के शहर और गांव पर पानी कहर ढा रहा है तो दरार
को पाटने के लिए फौज को बुलाया गया है। मतलब साफ है कि दरार के पाटने की
क्षमता पुलिस और सशस्त्र बलों की नहीं है और न राज्य स्तर पर ऐसे आपातकाल
से लडऩे की क्षमता है.

7 प्रदेशों में नक्सल समस्या विकराल रुप से खड़ी है। सशस्त्र बलों के
जवान नक्सलियों के हमले में शहीद हो रहे हैं। दरअसल मारे जा रहे हैं,
कहना उचित नहीं हैं। सम्मानजनक भी नहीं है। इसलिए शहीद हो रहे हैं, कहा
जाता है। नक्सली भारतीय है और वे सशस्त्र बल के जवानों को घेर कर मारते
हैं तो लड़ाई भारतीय सशस्त्र बल और भारतीयों के ही बीच हो रही है।
नक्सलियों के विरुद्ध फौज के इस्तेमाल पर यह तर्क दिया जाता है कि
भारतीयों को भारतीय फौज मारे यह उचित नहीं है। अब फौज मारे या पुलिस मारे
या सशस्त्र बल मारे, बात तो एक ही है। नक्सलियों को पकडऩा है या मारना
है। यह तो निश्चित है। फिर अभी निर्णय लिया गया है कि अब नक्सलियों के
साथ कोई मुरव्वत नहीं दिखाना है। अपने नेता आजाद के मारे जाने का बदला
लेने की धमकी भी तो नक्सली दे रहे हैं और समाचार पत्रों में छप भी रहा है
कि नक्सली बड़े हमले की तैयारी कर रहे हैं। पुलिस और सशस्त्र बलों में
मतभेद है तो फिर नक्सली हमले का जवाब कैसे देंगे?

14 जुलाई को मुख्यमंत्रियों के साथ गृहमंत्री बैठक कर आगे की रणनीति
बनाने के विषय में विचार करेंगे। प्रधानमंत्री भी इस बैठक में सम्मिलित
होंगे। ऐसी बैठकें पहले भी हो चुकी। गृह मंत्रालय निर्देश देता है कि
नक्सलियों से निपटने की हर मुमकिन तैयारी की जाए। नक्सल प्रभावित
क्षेत्रों में विकास के काम किए जाएं। दूसरी तरफ कल ही एक स्कूल भवन को
नक्सलियों ने उड़ा दिया। एक गांव के लोगों को जो नक्सल समर्थक नहीं थे,
नक्सलियों ने गांव छोडऩे का आदेश दे दिया। अब विकास के काम करेंगे तो
कैसे? नक्सली गांव से जिन्हें निकाल रहे है, उन्हें गांव में ही रहने पर
सुरक्षा क्यों नहीं दी जा रही है? पलायन तो बहुत पुरानी बात है। गांव में
रहना है तो नक्सलियों के अनुसार चलना पड़ेगा। काश्मीर हो या नक्सल
प्रभावित क्षेत्र सरकार की चलती कितनी है? फिर भी चिदंबरम की तारीफ की
जानी चाहिए कि अलोकप्रियता की परवाह न करते हुए भी उन्होंने नक्सल समस्या
को समाप्त करने का बीड़ा उठाया। आज उन्हीं की कोशिशों का परिणाम है कि
नक्सलियों से लडऩे का माद्दा राज्य सरकारों में पैदा हुआ है। नहीं तो
पहले राज्य सरकार का मामला कह कर केंद्र सरकार बुचक लेता था।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी माना है कि देश के लिए नक्सल समस्या
खतरनाक है। नक्सल समस्या के प्रति केंद्र को जागरुक करने में छत्तीसगढ़
के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की भूमिका भी बड़ी महत्वपूर्ण है।
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का एक वर्ग तो प्रारंभ से ही नक्सल समस्या को हल
करने के मामले में रोड़े अटकाने का ही काम करता रहा है। समस्या को समस्या
की तरह देखने के बदले उसे राजनैतिक चश्मे से ही देखा गया। आज भी दिग्विजय
सिंह कह रहे हैं कि भाजपा की नक्सलियों से सांठगांठ है। चिदंबरम की राह
में भी रोड़े अटकाने का काम दिग्विजय सिंह ने ही किया। दरअसल जिस शांति
से दिग्विजय सिंह के शासनकाल में नक्सली फले फूले उसी का परिणाम तो है कि
नक्सली आज इतने ताकतवर हो गए। राज्य और केंद्र कार्य के मामले में भले ही
अलग-अलग दिखायी पड़े लेकिन हैं तो वे एक ही संविधान से बंधे हुए और नक्सल
समस्या हो महंगाई की समस्या केंद्र अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़
सकता।
- विष्णु सिन्हा

बुधवार, 7 अप्रैल 2010

नक्सलियों के सबसे बड़े हमले का मतलब होता है कि नक्सली घबरा गए हैं

कल की सुबह सीआरपीएफ के 76 जवानों के लिए नक्सली मौत का पैगाम लेकर आए । 3 घंटे तक चली मुठभेड़ में नक्सलियों ने मौत का खेल खेला लेकिन क्या वे सफल हो गए ? 76 जवानों के शहीद होने और 5 जवानों के घायल होने के बावजूद क्या सरकार अपनी मुहिम बंद कर देगी? ग्रीन हंट को जब नक्सलियों ने रेड हंट बना दिया तो सरकारों के लिए और चुनौती खड़ी कर दी। अभी तक तो सरकार भी हिंसा के मामले में नम्र थी और हिंसा बंद कर बातचीत के लिए प्रोत्साहित भी करती थी लेकिन अब शायद यह आसान नहीं होगा। नक्सलियों की हिंसा से सशस्त्र बल का मनोबल गिर गया है, ऐसा नक्सली समझते हैं तो यह उनकी गलतफहमी है बल्कि अपने साथियों के मारे जाने का गुस्सा और बढ़ गया है और ट्रीगर पर ऊंगली दबाते हुए यह गुस्सा अब रहम करना शायद न जाने।

हर तरफ से नक्सली हिंसा की निंदा ही हो रही है। केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम हों या छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह दोनों ने ही नक्सली हिंसा को कायरतापूर्ण करार दिया है। प्रधानमंत्री ने भी सुरक्षा सलाहकारों के साथ बैठक कर ठोस कार्यवाही की सिफारिश की है। अभी भी नक्सलियों के विरूद्घ फौज की कार्यवाही से इंकार किया गया है लेकिन भविष्य में भी ऐसा ही होगा, यह नहीं कहा जा सकता। केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम और मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने भरोसा दिलाया है कि 3 वर्ष में नक्सल समस्या समाप्त कर देंगे। नक्सली भी समझ तो रहे हैं कि अब केंद्र और राज्य सरकार उनके मामले में गंभीर है लेकिन वे यह नहीं समझ रहे हैं कि इस तरह से जवानों की हत्या कर वे सरकार को पीछे हटने के लिए बाध्य नहीं कर सकते। इस बार जवान अधिक संख्या में मारे गए है लेकिन नक्सली सशस्त्र बलों के जवानों को टारगेट तो विभिन्न राज्यों में पहले से ही बना रहे हैं। इससे सरकार पीछे तो नहीं हटी बल्कि सरकार ने दबाव और बढ़ा दिया।

दंतेवाडा के चिंतलवार में हुई इस मुठभेड़ में पहली बार चीनी हथियारों का प्रयोग किया गया। अभी तक इस बात के प्रमाण नहीं मिले थे कि नक्सलियों के पास किसी अन्य देश के हथियार भी हैं। संदेह हालांकि पहले से ही व्यक्त किया जाता था कि नेपाल के माओवादियों के साथ भारतीय माओवादियों का गठजोड़ है लेकिन नेपाल के ही माओवादी इसका खंडन करते थे। अब यह बात तो स्पष्ट होती जा रही है कि पशुपति से तिरूपति तक लाल गलियारा की जो बात कही जाती थी, उसमें पर्याप्त सत्यता है। नहीं तो चीनी हेंडग्रेनेड चिंतलवार की मुठभेड़ में कहां से आए? गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने भी माना है कि इस समस्या को पिछले वर्षों में गंभीरता से नहीं लिया गया। पिछली सरकारों ने गंभीरता से लिया होता तो नक्सलियों की ताकत इतनी बढ़ी नहीं होती।
अब तो बाकायदा अच्छे वेतन के लालच में नक्सली भर्ती किए जा रहे हैं। करीब चौदह सौ करोड़ रूपयों की वार्षिक उगाही नक्सली कर रहे हैं। मतलब नीति सिद्घांत एक तरफ है और धंधा बड़ा है। जब पेड वर्कर रखकर नक्सली नेता अपना संगठन चला रहे हैं तो उन्हे मालूम है कि यह सारा कारोबार भय पर आधारित है और आदमी की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि वह मौत से डरता है। जब सशस्त्र बलों के जवान को मारोगे तो सामान्य आदमी तो भय खाएगा ही। सामान्य आदमी जब तक नक्सलियों से भयभीत है तब तक ही नक्सलियों का कारोबार चल सकता है। इसीलिए जब सलवा जुडूम आंदोलन जोर पकड़ रहा था तब नक्सली घबरा गए थे और हर तरह से कोशिश कर रहे थे कि यह आंदोलन समाप्त हो। बड़े बड़े नेता, बुद्घिजीवी, मानवाधिकार संगठन तक सलवा जुडूम के विरूद्घ दिखायी पड़ रहे थे।

कल ही 76 जवान नक्सलियों के हाथों मारे गए लेकिन कांग्रेस के स्थानीय नेता छत्तीसगढ़ सरकार को बर्खास्त करने की मांग कर रहे हैं। जबकि नक्सलियों के विरूद्घ मुहिम केंद्र सरकार और राज्य सरकार मिलकर चला रही है। यह स्मरणीय तथ्य है कि नक्सली छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकारों के दौर में ही फले फूले। पहली बार किसी सरकार ने नक्सलियों के विरूद्घ कार्यवाही की है तो वह डा. रमन सिंह की सरकार है। डा. रमन सिंह को भी केंद्रीय गृहमंत्री को समझाने में वर्षों लगे कि नक्सली समस्या असल में क्या है? पहली बार किसी गृहमंत्री ने गंभीरता से समस्या को समझा तो वे कांग्रेस के ही गृहमंत्री पी. चिदंबरम हैं? चिदंबरम के गृहमंत्री बनने के बाद ही असल में सभी राज्यों में एक साथ नक्सलियों के विरूद्घ मुहिम प्रारंभ की गई। नक्सलियों के बड़े नेता पुलिस की पकड़ में आए और पता चला कि नेटवर्क तो दिल्ली तक फैला हुआ है। खुफिया विभाग की सूचनाओं को एक जगह इकट्ठा करना और सबको सूचित करने का काम भी प्रारंभ हुआ। राज्य की सीमाओं में सशस्त्र बल मिलकर नक्सलियों के विरूद्घ कार्यवाही करने लगे। नक्सली पकड़े जाने लगे या मारे जाने लगे। कल हुई घटना की भी सूचना आंध्र पुलिस ने दी थी कि नक्सली इकट्ठा हो रहे हैं लेकिन लापरवाही के कारण यह घटना घटी। यदि चूक नहीं होती तो इतनी संख्या में जवान नहीं मारे जाते।

एक हजार के करीब नक्सली हमला करने आए थे। 81 जवानों पर एक हजार नक्सली। जवान खुले में और नक्सली आड़ में। मतलब नक्सलियों ने बड़ी तैयारी से हमला किया। इनका कमांडर सुदर्शन उर्फ आनंद दूर बैठा हमले के लिए निर्देश दे रहा था। वह जमाना गया जब चंद नक्सली ही सशस्त्र बलों को अपना शिकार बना लेते थे। कल की घटना में हुई लापरवाही से यदि ऊपर से नीचे तक बैठे लोगों ने सबक लिया तो नक्सलियों को खदेडऩा कठिन काम नहीं है। सब मिलकर लड़ेंगे तो नक्सलियों के गढ़ों को उखाड़ फेंकना वक्त की बात है। सबसे जरूरी तो यही है कि नक्सलियों को स्पष्ट पता चले कि उनकी नृशंस हत्याओं के बावजूद सशस्त्र बलों का मनोबल ऊंचा है। सरकारें अपने कर्तव्य के प्रति दृढ़प्रतिज्ञ हैं। कांग्रेसियों की राज्य सरकार को बर्खास्त करने की मांग से केंद्र सरकार सहमत नहीं है। कांग्रेस आलाकमान अपने कार्यकर्ताओं को लताड़े कि हर बात को राजनीति न बनाया जाए। समस्याएं सत्ता प्राप्त करने का साधन न बने। नहीं तो इससे बल तो नक्सलियों को ही मिलता है।

जनता तो इस तरह के विरोध से सहमत होती नहीं। यहां तक कि आदिवासी नक्सल प्रभावित क्षेत्र के ही कांग्रेसियों की राय से सहमत नहीं हैं। वे सरकार के साथ खड़े हैं। यह उन्होंने विभिन्न चुनावों में मत देकर भी बता दिया है। प्रदेश से नक्सली हिंसा समाप्त हो जब यह बात केंद्र सरकार ने मान ली है तो कांग्रेसियों के विरोध का औचित्य क्या है? नक्सली हमले में शहीद हुए जवानों के प्रति श्रद्घांजलि तो सभी व्यक्त कर रहे हैं। देश के नागरिक शांति से रह सके और उनका हिंसक लोगों से छुटकारा हो, इसके लिए जिन्होंने अपने प्राणों का बलिदान दिया, उनके प्रति नमन में किसके हाथ नहीं उठेंगे।

- विष्णु सिन्हा
7.4.2010

सोमवार, 15 फ़रवरी 2010

आतंकवादी हमला करते रहें और हम वार्ता, यह कितनी उचित नीति है?

केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम का यह कहना कि खुफिया एजेंसियों की नाकामी के कारण जर्मन बेकरी में विस्फोट नहीं हुआ, से कुछ लोग भले ही असहमत हों लेकिन चिदंबरम सही कहते लगते हैं। क्योंकि जर्मन बेकरी में हुए विस्फोट से बचा जा सकता था। जर्मन बेकरी के स्टॉफ ने सतर्कता बरती होती और टेबल के नीचे रखे बैग को खोलने के बदले पुलिस को सूचना दी होती तो विस्फोट को रोका जा सकता था। दरअसल जर्मन बेकरी में बम का रखना आतंकवादियों की हताशा का प्रतीक है। अभी जो खबरें आ रही हैं, उसके अनुसार टारगेट तो ओशो आश्रम और यहुदियों का उपासना स्थल खबाद हाउस था। समय से पहले खबाद हाउस में प्रार्थना प्रारंभ हो गयी और सुरक्षा बढ़ गयी, इसलिए आतंकवादी उसे टारगेट नहीं बना सके। यही हाल ओशो आश्रम का भी हुआ। पहले खुले मैदान में कार्यक्रम होना था लेकिन भीड़ अधिक होने के कारण स्थान परिवर्तन कर दिया गया और सुरक्षा वहां भी बढ़ गयी। इसलिए आतंकवादी ओशो आश्रम को भी टारगेट नहीं बना सके। तब उन्होंने जर्मन बेकरी जैसे आसान निशाने को चुना। यहां भी वे असफल हो जाते, लेकिन बेकरी के स्टाफ की मूर्खता के कारण विस्फोट हो गया। 

सुरक्षा एजेंसियों की कड़ी चौकसी के कारण ओशो आश्रम और खबाद हाउस तो बच गए लेकिन जर्मन बेकरी निशाना बन गया। कहा जा रहा है कि हेडली ने इस क्षेत्र के एक होटल में रुक कर रेकी की थी। हेडली इस समय अमेरिका की पुलिस के  कब्जे में है लेकिन इसके साथ-साथ यह भी कहा जा रहा है कि पाकिस्तान के एक आतंकवादी संगठन के नेता ने पिछले दिनों पाकिस्तान में पुणे पर हमला करने की घोषणा की थी। इन तमाम बातों पर गौर करें तो यह बात स्पष्ट दिखायी देती है कि आतंकवादियों का यह हमला जिसमें 9 लोग 2 विदेशी नागरिकों सहित मारे गए और 50 लोग घायल हुए, पूरी तरह से कायराना हमला था। अभी तक किसी ने भी इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है लेकिन इंडियन मुजाहिदीन या पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन पर संदेह किया जा रहा है। नाम भले ही अलग-अलग हों लेकिन उद्देश्य तो उनका एक ही है। भारत को उकसाना कि वह पाकिस्तान से लड़े। जब भारत के हुक्मरान मुंबई हमले के बाद पाकिस्तान से लडऩे के लिए तैयार नहीं हुए, तब वे पुणे विस्फोट के बाद क्या पाकिस्तान से लड़ेंगे?


भारत के हुक्मरान तो 25 फरवरी को विदेश सचिव स्तर की पाकिस्तान से चर्चा करने के लिए तैयार हो गए हैं। दक्षेस सम्मेलन में गृहमंत्री स्तर की वार्ता भी होने की उम्मीद की जा रही है। वह सब बातें अब कोई मायने नहीं रखती जो मुंबई हमले के बाद कही गयी थी कि जब तक दोषियों के विरुद्ध पाकिस्तान कार्यवाही नहीं करता तब तक उससे कोई बातचीत नहीं की जाएगी। पाकिस्तान के हुक्मरान इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि भारत की इस तरह की बात का कोई विशेष औचित्य नहीं है। वे तो इन बातों को एक तरह की गीदड़ भभकी ही समझते हैं और मजाक उड़ाते हैं। 6 माह, साल भर व्यतीत होने दो भारत फिर बातचीत करेगा। यह पाकिस्तानी हुक्मरानों की सोच है और वे गलत भी नहीं सोचते, यह भारतीय हुक्मरान ही सिद्ध करते हैं ?


विनम्रता अच्छी बात है। गल्तियों को माफ करने की ताकत भी बड़ी बात है लेकिन यह उनके संबंध में उचित है जो गल्तियों को महसूस करते हैं लेकिन जो इस तरह की अच्छी भावनाओं को कायरता समझते हैं, उनके साथ भलमनसाहत का क्या अर्थ है? जो अपनी आदतों से बाज आने को तैयार नहीं। तीन-तीन बार युद्ध में हार जाने के बावजूद जिनकी अक्ल ठिकाने नहीं आयी, उनसे बातचीत से मामला निपटाया जा सकता है, यह सोच ही अव्यवहारिक है। एक तरफ आतंकवादियों से निपटने के नाम पर अमेरिका पाकिस्तान को अरबों रुपए की सहायता करता है और दूसरी तरफ हमें शांति का पाठ पढ़ाता है। पाकिस्तान तो खुल कर कह रहा है कि काश्मीर का मामला फिलीस्तीन की तरह का है। काश्मीर को आतंक की आग में झुलसाने का पाकिस्तान ने कम प्रयास नहीं किया और आज भी कर रहा है। घुसपैठ जारी है। युद्ध विराम के बावजूद पाकिस्तानी सीमा से भारतीय सीमा पर गोलीबारी होती ही रहती है। पाकिस्तान ने तो एक भी उदाहरण आज तक प्रस्तुत नहीं किया कि वह वास्तव में भारत के साथ मैत्री चाहता है। दुनिया को दिखाने के लिए वह इस तरह के ढोंग अवश्य करता है।


किसी भी तरह की बातचीत का तब तक क्या औचित्य है जब तक बातचीत में ईमानदारी न हो। शिमला समझौता भी तो भारत के साथ पाकिस्तान ने पूर्वी पाकिस्तान गंवाने के बाद किया था। यह भी तथ्य स्पष्ट है कि पाकिस्तानी आतंकवादी बंगला देश से भी भारत में घुसते ही नहीं है बल्कि वहां भी उन्होंने अपने ठिकाने बना रखे है। पाकिस्तान तो अमेरिका और चीन दोनों से दोस्ती का दम भरता है। वह अमेरिका और चीन दोनों से लाभ उठाता है और भारत को चुनौती देता है। यहां तक कि जब लंका की क्रिकेट टीम पर पाकिस्तान में हमला हुआ तब भी उसने तुरंत आरोप लगाया कि यह भारत ने किया है। ब्लूचिस्तान में भी वह भारत के हस्तक्षेप का राग अलापता है। अफगानिस्तान को भारत की मदद भी उसे फूटी आंख नहीं सुहाती। फिर उसकी राजनीति का मूल केंद्र भारत से दोस्ती नहीं, घृणा है। तब भारत कितनी भी दोस्ती की, शांति की बात करें, उसका परिणाम तो वह नहीं निकलता जो भारत चाहता है।
ऐसे में पाकिस्तान के साथ किसी भी स्तर की बातचीत करना सिवाय समय खराब करने के और क्या है? पाकिस्तान सरकार की नीयत और वहां से चलने वाली आतंकवादी गतिविधियों से सतर्क रहने और उसका  मुंह तोड़ जवाब देने के सिवाय भारत के पास दूसरा चारा नहीं है। जो लोग समझते हैं कि वार्ता की कूटनीति से हमारी समस्याओं का हल हो जाएगा, उनके सामने उदाहरणों की कमी नहीं है कि वार्ता में हमने जीत तक को तो गंवाया है। चाहे वह ताशकंद समझौता हो या शिमला समझौता। हमें मिला क्या है? यहां तक कि पाकिस्तान के कब्जे में चला गया काश्मीर तक हम वापस प्राप्त नहीं कर सके। राजनीति का आदर्शवाद भारत के लिए चीन और पाकिस्तान के मामले में ही नहीं नेपाल तक के मामले में भी नुकसानप्रद ही साबित हुआ है। कभी इसकी भी समीक्षा करें, भारत के हुक्मरान। 


चीन के मामले में पंचशील का सिद्धांत काम नहीं आया। चीनी हिन्दी भाई-भाई का अलाप लाखों वर्ग किलोमीटर जमीन गंवा बैठा और आज भी चीन की नजर हमारी भूमि पर लगी हुई है। हमारे हुक्मरान कहते हैं कि चीन हमारा दोस्त है और उससे कोई खतरा नहीं है। भारत के ही एक प्रदेश में भारत के प्रधानमंत्री के जाने पर जो चीन विरोध प्रदर्शित करता है, वह हमारा मित्र कैसे दिखायी पड़ता है? यदि दिखायी पड़ता है तो सिर्फ हमारी कमजोरी ही दिखायी पड़ती है। हम वार्ता करते रहते हैं और चीन हमारी भूमि पर कब्जा करता जाता है। चीन तो पाकिस्तान में फौजी केंद्र भी बनाने वाला है। वे हमारा मजाक उड़ाते हैं तो गलत क्या करते हैं? क्या हमारे कृत्य मजाक के योग्य नहीं है? शुतुरमुर्ग की तरह सोच होगी तो परिणाम भी शुतुरमुर्ग की तरह ही भोगना पड़ेगा।


- विष्णु सिन्हा
दिनांक 15.02.2010