यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं
naksalite लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
naksalite लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

महंगाई हो या नक्सल समस्या जिम्मेदारी से केंद्र सरकार बच नहीं सकती

महंगाई और हिंसा ये ही दो बड़े मुद्दे देश के सामने हैं। महंगाई के मामले
में तो एक तरह से केंद्र सरकार ने हाथ खड़े कर दिए हैं और राज्य सरकारों
को इसके लिए जिम्मेदार भी बताया है। केंद्र सरकार कहती है कि राज्य
सरकारें टैक्स कम कर महंगाई कम करें। सब कुछ तय केंद्र सरकार करती है कि
नीतियां क्या हो? सब्सिडी दी जाए या न दी जाए। नियंत्रण रखा जाए या बाजार
के हवाले सब कुछ कर दिया जाए। शेयर मार्केट में शेयरों की कीमत बढ़ रही
है तो आर्थिक विकास हो रहा है। लोक लुभावन नीति आर्थिक विकास के लिए ठीक
नहीं है। जनता के सुख की कीमत पर विकास या जनता को कष्ट देकर विकास। तो
सरकार की सोच स्पष्ट है कि जनता को भले ही कष्ट हो लेकिन आर्थिक विकास
का पहिया तीव्र गति से घुमना चाहिए। समस्त लोक लुभावन योजनाओं को सरकारें
वापस ले ले तो तय है कि आम आदमी को दो समय का भोजन भी नसीब नहीं होगा।

कल ही दिल्ली में एक इलाके में पानी न आने के कारण लोग विरोध करने सड़क
पर उतर आए तो उन्होंने राहगीरों को मारना पीटना एवं रेहड़ी वालों को
लूटना प्रारंभ कर दिया। पानी न आने से इनका कोई लेना देना नहीं लेकिन
जनता की मानसिक स्थिति खराब हो रही है, इससे तो यही पता चलता है। सही और
गलत का भान यदि समाप्त हो जाए तब ही आदमी हिंसक हो जाता है। रायपुर में
ही एक ड्रायवर ने एक दंपत्ति को कुचल दिया। शराब के नशे में धुत्त
ड्राइवर क्रोध के वशीभूत जब हिंसक हो उठे तो इसका क्या अर्थ निकलता है?
युवा स्त्री पुरुष हिंसा पर उतर आएं तभी तो नक्सली समस्या खड़ी होती है।
नक्सलवादियों से प्रभावित होकर आखिर नवजवान क्यों हथियार उठा लेते हैं?
वे मारते हैं, अपने ही लोगों को और मरते भी हैं, सशस्त्र बलों की
गोलियों से। यह स्थिति सामान्य तो नहीं दिखायी पड़ती।

काश्मीर में ही फिर से हिंसा फैल रही है। कितने ही शहरों में कफ्र्यू
लागू है और सशस्त्र बलों पर पत्थरबाजी हो रही हैं। स्त्री पुरुष सभी
शामिल हैं। हिंसा नियंत्रण के बाहर होते देख देखते ही गोली मारने के आदेश
दिए गए हैं। प्रजातांत्रिक ढंग से कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस की सरकार
है, काश्मीर में। कहा जा रहा है कि आतंकवादी नवजवानों को पत्थर सशस्त्र
बल पर फेंकने के लिए धन दे रहे हैं। देश में घुसने के लिए आतंकवादी
पाकिस्तानी सीमा पर इकट्ठा हैं। देश के बड़े हिस्से में रात्रिकालीन
ट्रेनें नहीं चल रही है। डर है कि नक्सली ट्रेनों को न उड़ा दें।
केंद्रीय गृह सचिव कह रहे हैं कि नक्सलियों ने वायदा किया है कि ट्रेनों
पर हमला नहीं करेंगे। ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस के साथ जो हादसा हुआ था,
उसे भी गृहसचिव नक्सलियों का कारनामा नहीं बता रहे हैं।

वैसे भी केंद्र सरकार की नजर में नक्सलियों का मामला राज्य सरकारों का
मामला है। केंद्र सरकार तो राज्य सरकारों को नक्सली समस्या से निपटने के
लिए सहयोग कर रही है। मतलब महंगाई हो या हिंसात्मक गतिविधियां सब
जिम्मेदारी राज्य सरकार की है। केंद्रीय बल एवं राज्य पुलिस बल में मतभेद
है। यह बात केंद्रीय गृह सचिव खुलेआम स्वीकार करते है। नक्सल समस्या से
निपटने की जिन पर जिम्मेदारी है, जब उन्हीं मे मतभेद है तो वे किस तरह
से नक्सलियों से लड़ेंगे। गृह सचिव कहते हैं, रक्षा मंत्री कहते हैं कि
नक्सलियों से लडऩे के लिए फौज की जरुरत नहीं हैं। काश्मीर से भी फौज
हटायी गयी। अब मामला नियंत्रण से बाहर हो रहा है तो फिर फौज को बुलाया जा
रहा है। इतना ही नहीं पंजाब में बरसात ने हालात खराब कर दिए हैं। एक नहर
में दरार आ जाने से आसपास के शहर और गांव पर पानी कहर ढा रहा है तो दरार
को पाटने के लिए फौज को बुलाया गया है। मतलब साफ है कि दरार के पाटने की
क्षमता पुलिस और सशस्त्र बलों की नहीं है और न राज्य स्तर पर ऐसे आपातकाल
से लडऩे की क्षमता है.

7 प्रदेशों में नक्सल समस्या विकराल रुप से खड़ी है। सशस्त्र बलों के
जवान नक्सलियों के हमले में शहीद हो रहे हैं। दरअसल मारे जा रहे हैं,
कहना उचित नहीं हैं। सम्मानजनक भी नहीं है। इसलिए शहीद हो रहे हैं, कहा
जाता है। नक्सली भारतीय है और वे सशस्त्र बल के जवानों को घेर कर मारते
हैं तो लड़ाई भारतीय सशस्त्र बल और भारतीयों के ही बीच हो रही है।
नक्सलियों के विरुद्ध फौज के इस्तेमाल पर यह तर्क दिया जाता है कि
भारतीयों को भारतीय फौज मारे यह उचित नहीं है। अब फौज मारे या पुलिस मारे
या सशस्त्र बल मारे, बात तो एक ही है। नक्सलियों को पकडऩा है या मारना
है। यह तो निश्चित है। फिर अभी निर्णय लिया गया है कि अब नक्सलियों के
साथ कोई मुरव्वत नहीं दिखाना है। अपने नेता आजाद के मारे जाने का बदला
लेने की धमकी भी तो नक्सली दे रहे हैं और समाचार पत्रों में छप भी रहा है
कि नक्सली बड़े हमले की तैयारी कर रहे हैं। पुलिस और सशस्त्र बलों में
मतभेद है तो फिर नक्सली हमले का जवाब कैसे देंगे?

14 जुलाई को मुख्यमंत्रियों के साथ गृहमंत्री बैठक कर आगे की रणनीति
बनाने के विषय में विचार करेंगे। प्रधानमंत्री भी इस बैठक में सम्मिलित
होंगे। ऐसी बैठकें पहले भी हो चुकी। गृह मंत्रालय निर्देश देता है कि
नक्सलियों से निपटने की हर मुमकिन तैयारी की जाए। नक्सल प्रभावित
क्षेत्रों में विकास के काम किए जाएं। दूसरी तरफ कल ही एक स्कूल भवन को
नक्सलियों ने उड़ा दिया। एक गांव के लोगों को जो नक्सल समर्थक नहीं थे,
नक्सलियों ने गांव छोडऩे का आदेश दे दिया। अब विकास के काम करेंगे तो
कैसे? नक्सली गांव से जिन्हें निकाल रहे है, उन्हें गांव में ही रहने पर
सुरक्षा क्यों नहीं दी जा रही है? पलायन तो बहुत पुरानी बात है। गांव में
रहना है तो नक्सलियों के अनुसार चलना पड़ेगा। काश्मीर हो या नक्सल
प्रभावित क्षेत्र सरकार की चलती कितनी है? फिर भी चिदंबरम की तारीफ की
जानी चाहिए कि अलोकप्रियता की परवाह न करते हुए भी उन्होंने नक्सल समस्या
को समाप्त करने का बीड़ा उठाया। आज उन्हीं की कोशिशों का परिणाम है कि
नक्सलियों से लडऩे का माद्दा राज्य सरकारों में पैदा हुआ है। नहीं तो
पहले राज्य सरकार का मामला कह कर केंद्र सरकार बुचक लेता था।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी माना है कि देश के लिए नक्सल समस्या
खतरनाक है। नक्सल समस्या के प्रति केंद्र को जागरुक करने में छत्तीसगढ़
के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की भूमिका भी बड़ी महत्वपूर्ण है।
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का एक वर्ग तो प्रारंभ से ही नक्सल समस्या को हल
करने के मामले में रोड़े अटकाने का ही काम करता रहा है। समस्या को समस्या
की तरह देखने के बदले उसे राजनैतिक चश्मे से ही देखा गया। आज भी दिग्विजय
सिंह कह रहे हैं कि भाजपा की नक्सलियों से सांठगांठ है। चिदंबरम की राह
में भी रोड़े अटकाने का काम दिग्विजय सिंह ने ही किया। दरअसल जिस शांति
से दिग्विजय सिंह के शासनकाल में नक्सली फले फूले उसी का परिणाम तो है कि
नक्सली आज इतने ताकतवर हो गए। राज्य और केंद्र कार्य के मामले में भले ही
अलग-अलग दिखायी पड़े लेकिन हैं तो वे एक ही संविधान से बंधे हुए और नक्सल
समस्या हो महंगाई की समस्या केंद्र अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़
सकता।
- विष्णु सिन्हा

बुधवार, 24 मार्च 2010

कनू सान्याल की आत्महत्या नक्सलियों को इशारा है कि उनका रास्ता गलत है

नक्सली आंदोलन के जनक कनू सान्याल ने फांसी के फंदे पर लटकर अपनी इहलीला समाप्त कर ली। 78 वर्षीय कनू सान्याल वैसे तो बुढ़ापे के रोगों से पीडि़त थे लेकिन आत्महत्या उनके सिद्घांतों पर प्रश्रचिन्ह तो लगाता ही है। वे यदि अपनी हिंसक क्रांति से संतुष्ट होते तो उन्हें प्रसन्न होना चाहिए था कि आज देश के बहुत बड़े इलाके में नक्सली फैल चुके हैं लेकिन प्रश्र यही खड़ा होता है कि वे इस स्थिति से प्रसन्न होते तो आत्महत्या क्यों करते ? कोई भी अपने कृत्य के परिणामों को फलता फूलता देखता है तो प्रसन्न ही होता है। उनके द्वारा की गई आत्महत्या इस बात की निशानी है कि वे प्रसन्न नहीं थे। उन्होंने कभी सोचा भी नहीं होगा कि उनका रोपित पौधा इस तरह से निर्दोषों की हत्या का कारण बनेगा और मुख्य उद्देश्य से भटक कर आतंक का पर्यायवाची बन जाएगा। आत्महत्या सीधे सीधे हताशा, निराशा और अवसाद का ही कारण दिखायी पड़ता है।

इतिहास में सैकड़ों उदाहरण हैं। हिंसा किसी भी समस्या का इलाज नहीं है। बंदूक की गोली किसी की जान तो ले सकती है लेकिन किसी के जीवन की रक्षा नहीं कर सकती। आज तो मनुष्य जीव जंतुओं की रक्षा की बात सोचता ही नहीं है बल्कि इसके लिए कानून भी उसने बनाया है। जानवर पागल हो जाए तब भी उसे पकड़कर उसका उपचार करने के विषय में सोचा जाता है न कि उसे मार डालने के विषय में। जब तक किसी की जान को ही खतरा न पैदा हो जाए तब तक किसी को भी मारना दंडनीय अपराध है। सरकार आज नक्सलियों के विरूद्घ ग्रीन हंट आपरेशन चला रही है तो यह सरकार की मजबूरी है। यह सरकार का शौक नहीं है। अपने निर्दोष शांतिप्रिय नागरिकों की जान माल और स्वतंत्रता की रक्षा करना सरकार का नैतिक कर्तव्य ही नहीं है बल्कि संवैधानिक दायित्व भी है। नक्सली तो हिंसा के लिए हिंसा कर रहे हैं। रेल पटरियों को उखाड़ देना, बम विस्फोट, नागरिकों को अपनी इच्छा के अनुसार चलाने के लिए बंदूक का भय। इन सब कृत्यों को तो पाशविक भी नहीं कहा जा सकता। क्योंकि पशु इस तरह का कृत्य नहीं करते।

जो व्यक्ति दूसरों की स्वतंत्रता का आदर नहीं करता, वह स्वयं की स्वतंत्रता का अधिकार भी खो देता है। कभी जमींदारों के विरूद्घ भूमि के अधिकार को लेकर चारू मजूमदार और कनू सान्याल ने हथियार उठाए थे। नक्सलबाड़ी से प्रारभ हुआ, यह हिंसक आंदोलन तो कब का समाप्त हो गया। चारू मजूमदार के बाद कनू सान्याल भी अब दुनिया छोड़कर चले गए। उनके हिंसक आंदोलन से किसका कितना हित हुआ? हित तो हुआ नहीं बल्कि हिंसा की अशांति ने जीवन दूभर अवश्य कर दिया। शायद कनू सान्याल को समझ में आ गया था कि वे गलत रास्ते पर थे। उनका जो प्रभाव युवा पीढ़ी पर पड़ा, उस कारण आज स्थिति ऐसी है कि मिला तो कुछ नहीं लेकिन बहुत से लोग मुख्य धारा से भटक गए। राजनीतिज्ञ कहते भी थे कि नक्सली हमारे ही भटक हुए भाई, बच्चे हैं और सही मार्ग पर बातचीत के द्वारा लाया जा सकता है लेकिन इस तरह की चर्चाओं ने नक्सलियों का मनोबल ही बढ़ाया। अच्छी बात भी कभी कभी बुरा असर दिखाती है, इसका उदाहरण है, नक्सलियों के प्रति सहानुभूति।

नक्सलियों ने इसका गलत अर्थ निकाला। वे समझने लगे कि सरकार झुक रही है, उनके सामने। वे और अकड़ गए। सरकार के पास इसके सिवाए कोई चारा ही नहीं बचा कि वह गोलियों का जवाब गोलियों से दे। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने सबसे पहले इस बात को समझा कि नक्सली बातों की भाषा नहीं समझने वाले। निरंतर पुलिस जवानों की हत्या करके उनका मनोबल बढ़ा हुआ है। उनका प्रजातांत्रिक मूल्यों पर कोई भरोसा नहीं है। उनकी सोच स्पष्ट है कि वे जो सोचते हैं, वही उचित है। वे अपने प्रभावित क्षेत्र में विकास कार्यो के रास्ते का सबसे बड़ा अड़ंगा। जब आदिवासियों ने नक्सलियों के विरूद्घ सलवा जुडूम आंदोलन चलाया तो और स्पष्ट हो गया कि आदिवासी नक्सलियों से मुक्ति चाहते हैं। तब डा. रमन सिंह ने किसी बात की परवाह न करते हुए नक्सलियों से लडऩे का निश्चय कर लिया। आखिर उनकी नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी भी है कि वे अपने नागरिकों की हिंसा से रक्षा करें। दबाव से मुक्त कराएं। उन्होंने सलवा जुडूम को सरकार का समर्थन दिलाया। नक्सलियों से लडऩे के लिए बल तैयार करने के लिए जंगलवार विद्यालय खोला। केंद्र सरकार के दरवाजे बार बार खटखटाए।

तथाकथित बुद्घिजीवियों और कांग्रेस के एक वर्ग ने डा. रमन सिंह की नक्सल विरोधी गतिविधियों की जमकर आलोचना की। वे येन केन प्रकारेण डा. रमन सिंह को रोकना चाहते थे लेकिन दृढ़ संकल्पित डा. रमन सिंह को वे रोक तो नहीं पाए बल्कि डा. रमन सिंह केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम को समझाने में सफल हो गए कि नक्सली समस्या देश के लिए कितनी खतरनाक है और यह अकेले छत्तीसगढ़ की समस्या नहीं है। केंद्र सरकार के सक्रिय होते ही राज्यों को हर तरह की मदद मिलना प्रारंभ हो गया। आज भले ही नक्सली रेल पटरियों पर विस्फोट कर रहे हैं लेकिन नक्सली नेता न केवल पकड़े जा रहे हैं बल्कि नक्सली अपना अंतिम हथियार आजमा रहे हैं। केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम कह रहे हैं कि भले ही 3-4 वर्ष लगे लेकिन नक्सल समस्या को वे समाप्त करके ही रहेंगे। यही बात डा. रमन सिंह ने कल विधानसभा में कही कि नक्सलियों को छत्तीसगढ़ छोडऩा ही पड़ेगा।

डा. रमन सिंह जो कह रहे हैं, उनकी बात में दम है। क्योंकि छत्तीसगढ़ में तो नक्सल विरोधी अभियान ने नक्सलियों को बैकफुट पर ढकेल दिया है। पहले नक्सली सशस्त्र बल के सिपाहियों को मारते थे। अब उल्टा हो रहा है। सशस्त्र बल के सिपाही नक्सलियों को मार रहे हैं या फिर नक्सली आत्मसमर्पण कर रहे हैं। नक्सलियों के हथियार बनाने के कारखाने को भी सशस्त्र बल ने अबूझमाड़ में नष्ट किया। स्वाभाविक है कि इससे आदिवासियों में खुशी की लहर है और वे कांग्रेसी नेता अब चुप्पी लगा गए हैं जो कल तक सशस्त्र बल की कार्यवाही का विरोध करते थे। आपरेशन ग्रीन हंट में निर्दोष नागरिकों के मारे जाने का राग अलाप रहे थे। मुख्यमंत्री का दिल तो इतना बड़ा है कि वे उपलब्धि को अपनी बताने के बदले पक्ष और विपक्ष की उपलब्धि बता रहे हैं। जबकि वे अच्छी तरह से जानते हैं कि विपक्ष में बैठे कुछ लोगों ने इस मामले में पग पग पर कांटे बिछाने की कोशिश की।

दरअसल विपक्ष की राजनीति से सत्ता में आए डा. रमन सिंह समन्वय की राजनीति भी अच्छी तरह से जानते हैं। वे प्रतिपक्ष के अहंकार को भी फुसलाना अच्छी तरह से जानते हैं। नक्सल समस्या से प्रदेश मुक्तहोता है और जिसकी संभावना अब स्पष्ट दिखायी पड़ रही है तो श्रेय के हकदार सहज रूप से मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ही होंगे लेकिन वे श्रेय लेना जानते हैं तो श्रेय देने में भी कंजूसी नहीं करते। कनू सान्याल का विधानसभा में जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने कहा कि पिछले तीन वर्षों से जो लेख कनू सान्याल ने लिखे वे निराशाजनक थे। इसका सीधा अर्थ तो यही होता है कि नक्सल आंदोलन का जनक स्वयं आंदोलन से निराश था। हिंसा का यही परिणाम होता है। सृजन और विध्वंस का यही मूल अंतर है। डा. रमन सिंह प्रदेश के विकास के लिए सृजन में लगे है तो नक्सली विध्वंस में। सफल तो डा. रमन सिंह ही होंगे और सफलता की पगध्वनि सुनायी भी पड़ रही है।

- विष्णु सिन्हा
24-3-2010