यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं
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शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

उच्च पदों पर बैठे लोगों को अपनी चिंता है, जनता से वास्तव में किसका लेना देना

परमाणु दायित्व विधेयक और सांसदों की वेतन वृद्घि विधेयक को केंद्रीय
मंत्रिमंडल ने स्वीकृति दे दी है। मतलब साफ है कि इसी सत्र में विधेयक को
मंजूरी दिलाने का सरकार इरादा रखती है। परमाणु दायित्व विधेयक पर सरकारी
प्रस्ताव का समर्थन भाजपा ने करने का इरादा व्यक्त किया है। भाजपा के
इरादे पर यादवों सहित वाममोर्चे ने आरोप लगाया है कि कांग्रेस के साथ
भाजपा ने सौदा किया है। सीबीआई नरेंद्र मोदी को सोहाराबुद्दीन मामले में
नहीं फंसाएगी। एक समाचार पत्र में समाचार भी प्रकाशित हुआ है कि सीबीआई
ने नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दिया। यह वैसा ही आरोप है जैसा आरोप महंगाई
के मामले में यादवों ने सरकार के विरूद्घ मतदान कर दिया। तब भाजपा ने
आरोप लगाया था कि सीबीआई के दबाव में इन लोगों ने सरकार की खिलाफत नहीं
की। जबकि सदन के बाहर महंगाई के विरूद्घ ये समवेत स्वर में खिलाफत कर रहे
थे।

कितना सच है या कितना झूठ यह तो सरकार में बैठे लोग ही जानें लेकिन आरोप
प्रत्यारोप ने सीबीआई की छवि को खराब ही किया है। उत्तरप्रदेश की एक सभा
में कांग्रेस के दिग्विजयसिंह ने मायावती को धमकाने के लिए सीबीआई का नाम
लिया था। यह तब की घटना है जब उत्तरप्रदेश की प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष
रीता बहुगुणा को मायावती ने जेल में डाल दिया था। दिग्विजय सिंह ने तो
स्पष्ट कहा था कि मायावती को नहीं भूलना चाहिए कि उनके पास सीबीआई है।
सत्ता में बैठे लोग सत्ता की ताकत का गलत उपयोग करते रहे हैं। इसके लिए
उदाहरण और आरोपों की कमी नहीं है लेकिन आजकल जिस तरह का उपयोग या
दुरूपयोग की बात नित्य सामने आती है, यह स्थिति स्वस्थ लोकतंत्र के लिए
अच्छी बात नहीं है। हमाम में तो सभी नंगे होते हैं लेकिन सार्वजनिक रूप
से नग्रता प्रदर्शित होने लगे तो इसे अच्छी स्थिति नहीं कहा जा सकता।
संसद तक में समर्थन स्वार्थ के आधार पर होने लगे तो फिर वह जगह कौन सी
बचती है, जहां से आदमी न्याय की उम्मीद करे।

उच्चतम न्यायालय कहता है कि अनाज को सड़ाने से अच्छा है कि गरीबों को
मुफत बांट दिया जाए तो कृषि मंत्री शरद पवार इससे सहमत नहीं हैं। वे तो
स्पष्ट कहते हैं कि ऐसा संभव नहीं। जब सरकार उच्चतम न्यायालय की ही सलाह
को मानने के लिए तैयार नहीं तो फिर किसकी बात मानेगी। उचित अनुचित के
फैसले के लिए अंतिम स्थान तो उच्चतम न्यायालय ही है। आज जो सरकार,
प्रजातंत्र, संविधान पर जनता का विश्वास है तो उसका कारण न्यायालय ही है।
उम्मीद की आखिरी किरण न्यायालय की बात भी जब सरकार मानने से इंकार कर
देगी तो फिर आदमी किससे उम्मीद करेगा। जनता ने तो सरकार चलाने के लिए
पूर्ण बहुमत किसी को नहीं दिया। चुने गए लोगों ने अपना बहुमत बना लिया और
शासन कर रहे हैं। संवैधानिक रूप से यह गलत नहीं है लेकिन सबको खुश रखना
बहुमत को कायम रखने के लिए सरकार को कई गैरवाजिब समझौता करने के लिए भी
बाध्य करता है।

साम, दाम, दंड, भेद सभी का उपयोग करती तो सरकार दिखायी पड़ती है। राज्य
में अपनी सरकार को सुरक्षित रखना है तो केंद्र में सहयोग करो। लेनदेन के
लिए पूरे अवसर सुलभ हैं। परमाणु दायित्व विधेयक में ही केंद्र सरकार ने
कुछ बातें भाजपा की मान ली तो वह सरकार के विधेयक को समर्थन देने के लिए
तैयार है। बदले में नरेंद्र मोदी को सीबीआई क्लीन चिट दे तो क्या चाहिए?
वह तो अदालत की अवमानना का प्रश्र नही होता तो न्यायाधीश के आदेशों पर
भी आरोप लगाया जा सकता है। राम जेठमलानी ने उच्चतम न्यायालय में कह ही
दिया है कि रिटायर्ड होने के एक दिन पहले न्यायाधीश ने सोहराबुद्दीन
मामले की जांच सीबीआई को सौंपकर उचित नहीं किया। जबकि रिटायर्ड होने पर
सरकार ने उन्हें पुन: सरकारी पद से नवाजा। साफ मतलब है कि न्यायाधीश ने
पद के लालच में गलत आदेश दिया और इस तरह से सीबीआई को नरेंद्र मोदी को
कठघरे में खड़े करने का अवसर दिया। जिसका अर्थ होता है कि केंद्र सरकार
ने राजनैतिक उपयोगिता के लिए न्यायालय का दुरूपयोग किया। अब इसमें कितना
सच है या कितना झूठ यह अलग बात है लेकिन जनता को तो  संदेश मिल ही गया कि
विश्वसनीय कोई नहीं है। ऐसी स्थिति निर्मित करना राजनीति के लिए भले ही
फायदेमंद हो लेकिन विश्वास के लिए तो नुकसानदेय है।

जनता तो यह भी जानती है कि सभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। बाहर
बाहर जो झगड़ा जनता के हित के नाम पर दिखायी देता है, वह जनता को ही
बेवकूफ बनाने का तरीका है। जो जनता को अच्छी तरह से मूर्ख बना सकता है,
वह सत्ता का हकदार हो जाता है। अब तो देश में कोई भी ऐसी राजनैतिक पार्टी
शायद ही हो जिसने किसी न किसी रूप में सत्ता का स्वाद न चखा हो। सभी की
सत्ता से जनता अच्छी तरह से परिचित है। जनता को भी चुनाव अच्छे बुरे में
नहीं, कम बुरे या ज्यादा बुरे में करना पड़ता है। उसकी स्थिति तो ऐसी है
कि उसके हित के नाम पर छुरी मुर्गी पर गिरे या मुर्गी छुरी पर नुकसान
मुर्गी का ही होना है। जनता महंगाई से पीडि़त है। यह सर्वविदित सत्य है
लेकिन सरकार अनाज को सड़ते तो देख सकती है लेकिन उच्चतम न्यायालय के
सुझाव पर कि मुफत बांट दो अमल करने को तैयार नहीं है। नेता जनता की तकलीफ
महंगाई पर घडिय़ाली आंसू बहा सकते हैं लेकिन उन्हें भी चिंता अपनी है। वे
लोकसभा की कार्यवाही अपने हंगामे से रोक सकते हैं कि उनका वेतन बढ़ाया
जाए। जो संसद में चुप बैठे हैं, वे भी सहमत है कि सरकार वेतन बढ़ाए।
सरकार भी ढोंग करती है कि वह वेतन वृद्घि के पक्ष में नहीं है लेकिन फिर
वह वेतन वृद्घि के लिए तैयार हो जाती है। 16 हजार से बढ़कर वेतन 80 हजार
रूपये तो नहीं हो रहा है लेकिन 50 हजार रूपये करने के लिए सरकार तैयार
है। मतलब वर्तमान वेतन का तीन गुणा। जनप्रतिनिधियों का वेतन बढ़ गया।
नौकरशाहों का वेतन बढ़ गया। न्यायाधीशों का वेतन बढ़ गया। अब उनके अवकाश
प्राप्त करने की आयु भी बढ़ाने का सरकार इरादा रखती है। कुल जमा आबादी का
ये कितने प्रतिशत है। इनके लिए तो महंगाई वरदान बनकर आयी लेकिन आम जनता
की आय वृद्घि के विषय में जनता स्वयं ही सोचें। स्वयं ही प्रयास करे। उसे
महंगाई से स्वयं ही निपटना है। महंगाई के विरूद्घ प्रदर्शन कर नेताओं ने
अपने कर्तव्य की इतिश्री तो कर ली।

सरकार की प्राथमिकता है कि कामनवेल्थ गेम्स अच्छी तरह से हो जाएं।
क्योंकि ये राष्ट्र   की प्रतिष्ठï का प्रश्र है। इसके लिए 11 उच्च पदस्थ
नौकरशाहों को जिम्मेदारी सौंप दी गई है। दुनिया को दिखाना है कि हम किसी
से कम नहीं हैं। भ्रष्टïचार है। सारी दुनिया देख रही है कि भ्रष्टïचार
की भारत में क्या स्थिति है? राष्टमंडल खेलों की व्यवस्था तक में
भ्रष्टïचार का समुद्र बह रहा है लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सोनिया
गांधी कह रही हैं कि भ्रष्टïचारियों को बख्शा नहीं जाएगा लेकिन
राष्टमंडल खेलों के संपन्न होने के बाद। बाद में क्या होता है, यह
सबको पता है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दुनिया के नजर में श्रेष्ठ
हुक्मरान हैं लेकिन भारतीयों की नजर में पत्रिकाओं के आंकलन कहते हैं कि
देश में मनमोहन सिंह की लोकप्रियता सबसे नीचे हैं, लेकिन विश्व में सबसे
ऊपर। अब जयपाल रेड्डी रक्षा मंत्री से कह रहे हैं कि फौज  राष्ट्रमंडल 
खेलों मे बिना कुछ लिए सहयोग करे। आगे आगे देखिए, होता है क्या?

- विष्णु सिन्हा
20-8-2010


शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

महंगाई हो या नक्सल समस्या जिम्मेदारी से केंद्र सरकार बच नहीं सकती

महंगाई और हिंसा ये ही दो बड़े मुद्दे देश के सामने हैं। महंगाई के मामले
में तो एक तरह से केंद्र सरकार ने हाथ खड़े कर दिए हैं और राज्य सरकारों
को इसके लिए जिम्मेदार भी बताया है। केंद्र सरकार कहती है कि राज्य
सरकारें टैक्स कम कर महंगाई कम करें। सब कुछ तय केंद्र सरकार करती है कि
नीतियां क्या हो? सब्सिडी दी जाए या न दी जाए। नियंत्रण रखा जाए या बाजार
के हवाले सब कुछ कर दिया जाए। शेयर मार्केट में शेयरों की कीमत बढ़ रही
है तो आर्थिक विकास हो रहा है। लोक लुभावन नीति आर्थिक विकास के लिए ठीक
नहीं है। जनता के सुख की कीमत पर विकास या जनता को कष्ट देकर विकास। तो
सरकार की सोच स्पष्ट है कि जनता को भले ही कष्ट हो लेकिन आर्थिक विकास
का पहिया तीव्र गति से घुमना चाहिए। समस्त लोक लुभावन योजनाओं को सरकारें
वापस ले ले तो तय है कि आम आदमी को दो समय का भोजन भी नसीब नहीं होगा।

कल ही दिल्ली में एक इलाके में पानी न आने के कारण लोग विरोध करने सड़क
पर उतर आए तो उन्होंने राहगीरों को मारना पीटना एवं रेहड़ी वालों को
लूटना प्रारंभ कर दिया। पानी न आने से इनका कोई लेना देना नहीं लेकिन
जनता की मानसिक स्थिति खराब हो रही है, इससे तो यही पता चलता है। सही और
गलत का भान यदि समाप्त हो जाए तब ही आदमी हिंसक हो जाता है। रायपुर में
ही एक ड्रायवर ने एक दंपत्ति को कुचल दिया। शराब के नशे में धुत्त
ड्राइवर क्रोध के वशीभूत जब हिंसक हो उठे तो इसका क्या अर्थ निकलता है?
युवा स्त्री पुरुष हिंसा पर उतर आएं तभी तो नक्सली समस्या खड़ी होती है।
नक्सलवादियों से प्रभावित होकर आखिर नवजवान क्यों हथियार उठा लेते हैं?
वे मारते हैं, अपने ही लोगों को और मरते भी हैं, सशस्त्र बलों की
गोलियों से। यह स्थिति सामान्य तो नहीं दिखायी पड़ती।

काश्मीर में ही फिर से हिंसा फैल रही है। कितने ही शहरों में कफ्र्यू
लागू है और सशस्त्र बलों पर पत्थरबाजी हो रही हैं। स्त्री पुरुष सभी
शामिल हैं। हिंसा नियंत्रण के बाहर होते देख देखते ही गोली मारने के आदेश
दिए गए हैं। प्रजातांत्रिक ढंग से कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस की सरकार
है, काश्मीर में। कहा जा रहा है कि आतंकवादी नवजवानों को पत्थर सशस्त्र
बल पर फेंकने के लिए धन दे रहे हैं। देश में घुसने के लिए आतंकवादी
पाकिस्तानी सीमा पर इकट्ठा हैं। देश के बड़े हिस्से में रात्रिकालीन
ट्रेनें नहीं चल रही है। डर है कि नक्सली ट्रेनों को न उड़ा दें।
केंद्रीय गृह सचिव कह रहे हैं कि नक्सलियों ने वायदा किया है कि ट्रेनों
पर हमला नहीं करेंगे। ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस के साथ जो हादसा हुआ था,
उसे भी गृहसचिव नक्सलियों का कारनामा नहीं बता रहे हैं।

वैसे भी केंद्र सरकार की नजर में नक्सलियों का मामला राज्य सरकारों का
मामला है। केंद्र सरकार तो राज्य सरकारों को नक्सली समस्या से निपटने के
लिए सहयोग कर रही है। मतलब महंगाई हो या हिंसात्मक गतिविधियां सब
जिम्मेदारी राज्य सरकार की है। केंद्रीय बल एवं राज्य पुलिस बल में मतभेद
है। यह बात केंद्रीय गृह सचिव खुलेआम स्वीकार करते है। नक्सल समस्या से
निपटने की जिन पर जिम्मेदारी है, जब उन्हीं मे मतभेद है तो वे किस तरह
से नक्सलियों से लड़ेंगे। गृह सचिव कहते हैं, रक्षा मंत्री कहते हैं कि
नक्सलियों से लडऩे के लिए फौज की जरुरत नहीं हैं। काश्मीर से भी फौज
हटायी गयी। अब मामला नियंत्रण से बाहर हो रहा है तो फिर फौज को बुलाया जा
रहा है। इतना ही नहीं पंजाब में बरसात ने हालात खराब कर दिए हैं। एक नहर
में दरार आ जाने से आसपास के शहर और गांव पर पानी कहर ढा रहा है तो दरार
को पाटने के लिए फौज को बुलाया गया है। मतलब साफ है कि दरार के पाटने की
क्षमता पुलिस और सशस्त्र बलों की नहीं है और न राज्य स्तर पर ऐसे आपातकाल
से लडऩे की क्षमता है.

7 प्रदेशों में नक्सल समस्या विकराल रुप से खड़ी है। सशस्त्र बलों के
जवान नक्सलियों के हमले में शहीद हो रहे हैं। दरअसल मारे जा रहे हैं,
कहना उचित नहीं हैं। सम्मानजनक भी नहीं है। इसलिए शहीद हो रहे हैं, कहा
जाता है। नक्सली भारतीय है और वे सशस्त्र बल के जवानों को घेर कर मारते
हैं तो लड़ाई भारतीय सशस्त्र बल और भारतीयों के ही बीच हो रही है।
नक्सलियों के विरुद्ध फौज के इस्तेमाल पर यह तर्क दिया जाता है कि
भारतीयों को भारतीय फौज मारे यह उचित नहीं है। अब फौज मारे या पुलिस मारे
या सशस्त्र बल मारे, बात तो एक ही है। नक्सलियों को पकडऩा है या मारना
है। यह तो निश्चित है। फिर अभी निर्णय लिया गया है कि अब नक्सलियों के
साथ कोई मुरव्वत नहीं दिखाना है। अपने नेता आजाद के मारे जाने का बदला
लेने की धमकी भी तो नक्सली दे रहे हैं और समाचार पत्रों में छप भी रहा है
कि नक्सली बड़े हमले की तैयारी कर रहे हैं। पुलिस और सशस्त्र बलों में
मतभेद है तो फिर नक्सली हमले का जवाब कैसे देंगे?

14 जुलाई को मुख्यमंत्रियों के साथ गृहमंत्री बैठक कर आगे की रणनीति
बनाने के विषय में विचार करेंगे। प्रधानमंत्री भी इस बैठक में सम्मिलित
होंगे। ऐसी बैठकें पहले भी हो चुकी। गृह मंत्रालय निर्देश देता है कि
नक्सलियों से निपटने की हर मुमकिन तैयारी की जाए। नक्सल प्रभावित
क्षेत्रों में विकास के काम किए जाएं। दूसरी तरफ कल ही एक स्कूल भवन को
नक्सलियों ने उड़ा दिया। एक गांव के लोगों को जो नक्सल समर्थक नहीं थे,
नक्सलियों ने गांव छोडऩे का आदेश दे दिया। अब विकास के काम करेंगे तो
कैसे? नक्सली गांव से जिन्हें निकाल रहे है, उन्हें गांव में ही रहने पर
सुरक्षा क्यों नहीं दी जा रही है? पलायन तो बहुत पुरानी बात है। गांव में
रहना है तो नक्सलियों के अनुसार चलना पड़ेगा। काश्मीर हो या नक्सल
प्रभावित क्षेत्र सरकार की चलती कितनी है? फिर भी चिदंबरम की तारीफ की
जानी चाहिए कि अलोकप्रियता की परवाह न करते हुए भी उन्होंने नक्सल समस्या
को समाप्त करने का बीड़ा उठाया। आज उन्हीं की कोशिशों का परिणाम है कि
नक्सलियों से लडऩे का माद्दा राज्य सरकारों में पैदा हुआ है। नहीं तो
पहले राज्य सरकार का मामला कह कर केंद्र सरकार बुचक लेता था।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी माना है कि देश के लिए नक्सल समस्या
खतरनाक है। नक्सल समस्या के प्रति केंद्र को जागरुक करने में छत्तीसगढ़
के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की भूमिका भी बड़ी महत्वपूर्ण है।
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का एक वर्ग तो प्रारंभ से ही नक्सल समस्या को हल
करने के मामले में रोड़े अटकाने का ही काम करता रहा है। समस्या को समस्या
की तरह देखने के बदले उसे राजनैतिक चश्मे से ही देखा गया। आज भी दिग्विजय
सिंह कह रहे हैं कि भाजपा की नक्सलियों से सांठगांठ है। चिदंबरम की राह
में भी रोड़े अटकाने का काम दिग्विजय सिंह ने ही किया। दरअसल जिस शांति
से दिग्विजय सिंह के शासनकाल में नक्सली फले फूले उसी का परिणाम तो है कि
नक्सली आज इतने ताकतवर हो गए। राज्य और केंद्र कार्य के मामले में भले ही
अलग-अलग दिखायी पड़े लेकिन हैं तो वे एक ही संविधान से बंधे हुए और नक्सल
समस्या हो महंगाई की समस्या केंद्र अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़
सकता।
- विष्णु सिन्हा

सोमवार, 5 जुलाई 2010

पेट्रोलियम पदार्थों की मूल्यवृद्घि के विरोध में भारत बंद घडिय़ाली आंसू तो नहीं

कल भारत बंद है। विपक्षी पार्टियों का आव्हान है। जो दल सत्ता में
केंद्र में नहीं है, वे सभी भारत बंद के पक्ष में हैं। मुद्दा पेट्रोलियम
पदार्थों की कीमत में वृद्घि है। सत्तारूढ़ कांग्रेस ने पेट्रोलियम
पदार्थों के मूल्य में वृद्घि कर विपक्ष को एक मंच पर आने का अवसर दिया
है । विभिन्न मुद्दों को लेकर आपस में उलझती पार्टियों को जब भी ऐसा
मुद्दा मिल जाता है कि वे एक हों और इसी में सबका हित दिखायी देता है,
तब वे अलग अलग अपनी ढपली नहीं बजा सकती। बिना किसी भेदभाव के अधिकांश
भारतीय महंगाई की जिस पीड़ा को भोग रहे हैं, उसके लिए अलगाव की राजनीति
काम नहीं करती। मनमेहन सिंह और उनकी सरकार भले ही कहे कि पेट्रोलियम
पदार्थों की मूल्यवृद्घि आवश्यक है लेकिन जो इस मूल्यवृद्घि की पीड़ा को
भोग रहे हैं, वे सरकार से सहमत नहीं हो सकते।
बड़ी बेशर्मी से कहा जा रहा है कि केरोसिन की कीमत में वृद्घि का असर 50
पैसे प्रतिदिन से ज्यादा नहीं है। वे समझ नहीं रहे हैं कि 20 रूपये
प्रतिदिन पर गुजारा करने वालों के लिए 50 पैसे की क्या अहमियत है? जो यह
तर्क दे रहे हैं, उनके लिए न तो केरोसिन की कोई महत्ता है और न ही 50
पैसे की। जिनका वेतन हजारों में नहीं अब लाखों में हो गया, उनके लिए 50
पैसे की निश्चित रूप से कोई महत्ता नहीं है। उनके बच्चों ने तो शायद देखा
भी नहीं होगा कि 50 पैसे का सिक्का भी होता है। हालांकि आज बाजार की जो
स्थिति है, उसमें 50 पैसे मे कुछ मिलता नहीं। एक और दो रूपये के नोट और
सिक्के की ही जब बाजार में कोई अहमियत नहीं रह गयी है तो 50 पैसे के
सिक्के की क्या अहमियत है? फिर भी 20 रूपये में अपना गुजारा करने वालों
के लिए तो महत्व है। सरकार ही जब पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों के घाटे
को बर्दाश्त नहीं कर पा रही है तब यह सोचना कि आम जनता इसे बर्दाश्त कर
लेगी, जनता के साथ अन्याय के  सिवाय कुछ नहीं है।
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सत्ता में नहीं है। वह भी महंगाई के विरूद्घ
आन्दोलन करने का इरादा रखती है। उसकी मांग है कि राज्य सरकार वेट में
कटौती करे और पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत कम हो। केंद्र सरकार जो कि
कांग्रेस की है, वह कीमत बढ़ाए और राज्य सरकार कीमत कम करे। केंद्र
सरकार तो कीमतों का बोझ उठा नहीं सक रही है। जिसके पास आय के साधन ही
साधन हैं और राज्य सरकार जिसके पास आय के साधन सीमित हैं, वह टैक्स कम कर
अपना राजस्व घटाए। जिससे विकास  के काम जो चल रहे हैं, उसमें भी रूकावट
आए। आज कांग्रेस के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हैं। कभी ये नरसिंहराव
सरकार में वित्त मंत्री हुआ करते थे। तब इन्होंने संसद में कहा था कि
जनता से वायदा करना चुनाव के समय और बात है और पूरा करना और बात। 100
दिन में महंगाई कम करने क नाम पर जो सरकार जनता का समर्थन प्राप्त करती
है और उसे सत्ता में आते ही भूला देती है तब महंगाई बेहिसाब बढ़ती है तो
अपने हाथ खड़ा कर देती है। वह क्या सोचती है कि जनता पूरी तरह से मूर्ख
है और उसे कुछ समझ में नहीं आता।
1 रू. और 2 रू. किलो चांवल देकर छत्तीसगढ़ की डा. रमन सिंह सरकार ने तो
गरीबों का वह हित किया है जिसके  पक्ष में कांग्रेस भी नहीं थी। जब डा.
रमन सिंह ने यह योजना लागू की थी तब कांग्रेस ने जमकर इसका विरोध किया
था। आज डीजल की कीमत बढऩे से राज्य सरकार पर परिवहन का अतिरिक्त व्यय आया
है। आम जनता को जहां दैनंदिन उपयोग की वस्तुओं की कीमतों में इजाफा का
कष्ट झेलना पड़ रहा है, वहीं सरकार का विकास कार्य भी और महंगा हो गया
है। जो सरकार केंद्र में बैठकर सिर्फ इस बात के लिए प्रयत्नशील हो कि
विश्व में उसकी छवि कैसे चमके और अमेरिका के  राष्ट्रपति उसकी तारीफ
करें, वह गरीबों का दुख दर्द नहीं समझ सकती। उदारवाद अर्थात पूंजीवाद की
तरफ देश को तीव्र गति से ले जाने वाली सरकार सिर्फ विकास के आंकड़ों पर
कायम है। विकास दर कैसे 10 प्रतिशत हो? इसी की जिसको चिंता है, वह सिर्फ
चुनाव के समय झूठी बात कह सकती है।
120 करोड़ के आबादी के देश को सिर्फ विकास दर वृद्घि से संतुष्ट नहीं
किया जा सकता। जहां तक विद्रोह और क्रांति का संबंध है तो वह न तो
पूंजीपति करता है और न ही गरीब बल्कि यह मध्यम वर्ग का बुद्घिजीवी करता
है। आज उपभोक्ता सामग्री के जिस मकडज़ाल में मध्यम वर्ग उलझा हुआ है, उसे
धन चाहिए और बढ़ती महंगाई और धन की मांग करती है। मध्यम वर्ग तेजी से बढ़
रहा है। सर्विस टैक्स के नाम पर आज जिस तरह से हर क्षेत्र को घेरा जा
रहा है उसका बोझ भी तो उसी पर सबसे ज्यादा पड़ रहा है। सरकार हर बजट में
यही खोजती है कि और कौन सा क्षेत्र बच गया है जिस पर सर्विस टैक्स
लगाया जाए। मकान पर भी तो सर्विस टैक्स लगा दिया गया है। पहले राज्य
सरकार  रजिस्ट्री पर शुल्क लिया करती थी। अब केंद्र सरकार भी सर्विस
टैक्स लेगी। हवा को छोड़कर कर ऐसा कुछ नहीं है जिस पर सरकार टैक्स न ले
रही हो।
अभी कृषि पर आयकर नहीं है लेकिन कितने दिन यह भी बची रहेगी। सरकार की
दृष्टि नहीं है ऐसा भी नहीं है लेकिन सरकार जानती है कि उसने ऐसा कदम
उठाया तो उसके हाथ से सत्ता निकल जाएगी। यही डर किसानो को आयकर से बचाए
हुए है। बैंकों में फिक्स्ड डिपाजिट पर भी तो सरकार टीडीएस ले रही है।
बैंकों से भी कह दिया गया है कि जिनके पेन नंबर आयकर के  नहीं हैं उनका
खाता बंद कर दिया जाए। मतलब साफ है कि आपके पास धन है तो वह सरकार की
जानकारी में होना चाहिए। आप आयकर के दायरे में नहीं आते हैं तो बैंकों के
द्वारा काटे गए टीडीएस की वापसी के लिए आयकर के दफतर के चक्कर लगाएं या
किसी आयकर  प्रेक्टीशनर की सेवाएं लें और उसकी फीस पटाएं।
भ्रष्टाचार और काले धन का इतना बड़ा साम्राज्य खड़ा है कि आयकर विभाग
बड़ों को तो फांस नहीं पाता। छुटभैय्यों को ही पकड़कर आत्मसंतुस्टि
करता है। बाबा रामदेव ने मनमोहन सिंह से कहा था कि बड़े नोट बंद कर
दीजिए। सारा काला धन बाहर आ जाएगा लेकिन वे इसके  लिए तैयार नहीं हुए।
आयकर विभाग भी जहां छापा मारता है 5 सौ और हजार के नोट ही पकड़ में आते
हैं? सरकार की ईमानदार मंशा काला धन पकडऩे और भ्रष्टïचार समाप्त करने की
दिखायी नहीं देती। पेट्रोलियम पदार्थों के  मूल्यवृद्घि को लेकर विपक्ष
जो भारत बंद कर रहा है, इससे सरकार झुकने वाली तो नहीं दिखायी पड़ती।
फिर यह भी जनता की भावनाओं को भड़काकर अपना राजनैतिक उल्लू सीधा करने के
सिवाय तो कुछ नहीं दिखायी पड़ता।
- विष्णु सिन्हा
4-7-2010

जनता को महंगाई रुपी कसाई के सामने सरकार ने निहत्था छोड़ दिया है

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने अर्थशास्त्र के ज्ञान से दुनिया भर को
प्रभावित कर रहे हैं। पिछले दिनों दुनिया के गिने-चुने देशों के सम्मेलन
को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि सरकारों को लोक लुभावन कार्यक्रमों
से बचना चाहिए। जिसका सीधा अर्थ है कि जनता को बाजार के भरोसे छोड़ देना
चाहिए। देश में पेट्रोल को उन्होंने बाजार के भरोसे छोड़ दिया और डीजल को
भी शीघ्र ही बाजार के भरोसे छोड़ देने की बात पत्रकारों से हवाई जहाज पर
मनमोहन सिंह ने किया। महंगाई की मार से बेहाल देश की जनता को स्पष्ट
संदेश है केंद्र सरकार का कि वह महंगाई के मामले में राहत देने का कोई
इरादा नहीं रखती। जिन जिन आवश्यक वस्तुओं में अभी तक सब्सिडी दी जाती
रही, वह भी भविष्य में खत्म कर दी जाएगी। दरअसल महंगाई के बावजूद जिस तरह
से मनमोहन सिंह और कांग्रेस को पिछले चुनाव में सफलता मिली और कांग्रेस
की सीटों में इजाफा हुआ, उससे सरकार ने नतीजा निकाल लिया है कि वह जो भी
कष्ट जनता को दे, जनता उसे ही समर्थन देने वाली है।
दिल्ली में भव्य हवाई अड्डे का उद्घाटन आज मनमोहन सिंह ने किया।
कामनवेल्थ गेम भी होने जा रहा है। यह सब सूचक है, देश के विकास का। आखिर
दुनिया भर से लोग आएंगे तो भारत की तरक्की देख कर चकाचौंध तो होंगे ही।
स्वाभाविक है कि मनमोहन सिंह और उनकी सरकार की वाहवाही होगी। कोई यह
देखने थोड़े ही आ रहा है कि इस चकाचौंध की कीमत भारत की जनता किस तरह से
चुका रही है। शांत, धैर्यवान भारतीय जनता की राजनीति परीक्षा ले रही है।
शायद कहीं न कहीं यह सोच भी काम करती है कि जो जनता वर्षों गुलाम रह सकती
है, वह प्रजातंत्र के नाम पर भी हर तरह का अन्याय बर्दाश्त कर सकती है।
सरकारी अधिकारियों,कर्मचारियों की वेतन वृद्धि और साथ में महंगाई भत्ता,
व्यापारियों का बढ़ता कारोबार इन्हें तो महंगाई से कोई नुकसान नहीं बल्कि
इनकी आय में ही इजाफा होता है। जहां तक जनप्रतिनिधियों का प्रश्र है तो
अपना वेतन भत्ता वे स्वयं बढ़ा लेते हैं। कभी सांसदों को ढाई सौ रुपए
मासिक वेतन मिलता था। आज 16 हजार रुपए मिल रहा है। जिसे अस्सी हजार रुपए
करने की तैयारी है। एक बार सांसद या विधायक बन गए तो जीवन भर पेंशन मिलना
भी निश्चित है। जब वेतन बढ़ेगा तो पेंशन भी बढ़ेगा।
यह धन दिया तो आखिर सरकारी खजाने से ही जाएगा। सरकारी खजाने में धन आता
है जनता की जेब से। कभी इंदिरा गांधी ने प्रीविपर्स राजा महाराजाओं के
बंद किए थे। 14 बैंकों का राष्टरीयकरण किया था। नारा था गरीबी हटाओ।
पुराने राजे महाराजे तो समाप्त हो गए लेकिन वर्तमान में जो प्रजातंत्र की
कोख से राजे महाराजे पैदा हो गए हैं, इनको वेतन और पेंशन के रुप में दी
जाने वाली रकम तो उस रकम से कई गुणा ज्यादा है जो राजे  महाराजाओं को
दिया जाता था। आश्चर्य की बात तो यह है कि तमाम तरह के सिद्धांतों के नाम
पर बनी अलग-अलग राजनैतिक पार्टियां भी इस मामले में एक हैं। वामपंथी
अवश्य विरोध करते हैं लेकिन बढ़ा वेतन और पेंशन लेने से इंकार कौन करता
है? कभी कांग्रेस इंदिरा गांधी के शासन काल में गरीबी हटाओ का नारा लगाया
करती थी। उसने 21 सूत्रीय कार्यक्रम भी दिया था लेकिन गरीबी हट गयी क्या?
आज भी देश की आधी आबादी 20 रुपए प्रतिदिन से कम में गुजारा करती है।
गुस्सा अंदर ही अंदर उबल रहा है। पेट्र्रोल, डीजल, रसोई गैस, मिट्टी तेल
के दाम बढ़ा कर केंद्र सरकार ने गुस्से को भड़काया ही है। अब कहा जा रहा
है कि किसानों को डीजल रियायती दर पर दिया जाएगा। कुल खपत का करीब 12
प्रतिशत कृषि कार्य में लगता है। यह तो एक सर्वविदित तथ्य है कि जात,
पात, धर्म से परे देश में बहुसंख्यक आबादी किसानों की ही है। राजनैतिक
पार्टियां किसानों का क्रोध वोट बैंक के कारण झेलने में  सक्षम नहीं हैं।
इसीलिए किसानों को राहत देने की बात की जाती है। सरकार जनता के धैर्य की
परीक्षा ले रही है। यदि महंगाई के इस झटके को भी जनता झेल गयी तो फिर
महंगाई कोई यहीं रुक जाने वाली नहीं है। केंद्र सरकार तो महंगाई का
सीधे-सीधे ठिकरा राज्य सरकारों पर फोड़ती है। अभी भी वह कह रही है कि
राज्य सरकारें टैक्स कम करे। जबकि कांग्रेस  की ही दिल्ली सरकार ने टैक्स
कामनवेल्थ गेम के नाम पर 20 प्रतिशत कर दिया है।
कांग्रेस की सोच का एक पहलू यह है कि जनता के सामने उसका विकल्प नहीं है।
विपक्ष बिखरा हुआ है। कांग्रेस के बाद जो सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी है,
भाजपा उसे सांप्रदायिकता के नाम पर विपक्षी दलों के लिए अछूत बताने के
सभी प्रयास किए जाते हैं। विपक्ष की इस फूट का लाभ कांग्रेस पूरी तरह से
उठाती है। यह खेल इसी तरह से चलता रहा तो जनता के सामने यह स्थिति खड़ी
हो सकती है कि या तो  वह कांग्रेस को झेले या फिर भाजपा की तरफ रुख करें।
भाजपा भी गठबंधन की सरकार 6 वर्षों तक इस देश में चला चुकी है। विकल्प
नहीं है, ऐसा नहीं है। महंगाई की मार इसी तरह से पड़ती रही तो विकल्प
बाबा रामदेव भी हो सकते हैं। बाबा रामदेव का भारत स्वाभिमान आंदोलन भी
धीरे-धीरे विकल्प के रुप में तैयार हो रहा है।
राजनैतिक पार्टियों को यह नहीं भूलना चाहिए कि जनता जब क्रोधित होती है
तो जेल में बैठे नेताओं को भी वोट डालकर संसद में पहुंचा देती है।
आपातकाल के बाद जनता ने यह चमत्कार किया था। कांग्रेस की सरकार को हटाने
के लिए यह कई बार प्रयोग कर चुकी हैं। बाबा रामदेव भी एक सशक्त विकल्प हो
सकते हैं। क्योंकि जनता के मन की हताशा नया गुल भी खिला सकती है। बाबा
रामदेव पर विश्वास के कई कारण हैं। उनसे किसी तरह का भ्रष्टचार का खतरा
तो जनता को है, नहीं। फिर जनता की सोच कि एक बार बाबा को भी वोट दे देने
में हर्ज क्या हैं?
सबकी और सब तरह की सरकार तो जनता ने देख ली। विकास के नाम पर देश की आधी
से अधिक आबादी को हासिल क्या हुआ? फिर बाबा से राजकाज न भी संभला तो आज
की स्थिति से ज्यादा क्या बिगड़ जाने वाला है? बाबा के योग और आयुर्वेद
से लाभ ही हुआ है। एक बात तो स्थापित राजनीतिज्ञों को सत्ताच्युत किया ही
जाए। यह हवा लोकसभा चुनाव आते तक जनता के मन में घर कर गयी तो असंभव नहीं
है, कुछ भी। क्योंकि आम आदमी आज जो तकलीफ झेल रहा है और उसे जिस तरह से
सरकार संरक्षण देने के बदले बाजार के हवाले कर रही है, उसमें क्रूरता ही
अधिक दिखायी पड़ती है। महंगाई जनता को किसी कसाई से कम तो नहीं दिखायी दे
रही है। ऐसे में असंभव कुछ नहीं। क्योंकि राजनीति संभावनाओं का ही खेल
है।

- विष्णु सिन्हा
दिनांक 05.07.2010
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