यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं

शनिवार, 13 नवंबर 2010

बराक ओबामा की भारत यात्रा से मनमोहन सिंह की योग्यता ही साबित हुई है

अपनी पहली भारत यात्रा में ही बराक ओबामा भारतीयों के हृदय में स्थान
बनाने में सफल हो गए। उनसे जो कुछ भारतीय सुनना चाहते थे, वह सब वे संसद
के अपने 36 मिनट के भाषण में कह गए। मेरी याददाश्त में तो वे पहले ऐसे
विदेशी हुक्मरान हैं जिन्होंने जय हिंद का उदघोष किया। सुनने वालों का
हृदय गदगद हो गया। अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बराक ओबामा ने
स्पष्ट कहा कि वे अमेरिका के राष्टपति के रुप में यहां खड़े हैं तो
उसका कारण महात्मा गांधी हैं। आज दुनिया को शांति और अहिंसा की सबसे
ज्यादा जरुरत है और गांधीजी के विचारों के बिना यह संभव नहीं। भारत को
दुनिया की महाशक्ति बताने से न तो उन्होंने परहेज किया और न ही पाकिस्तान
को आतंकवाद के विरुद्ध चेतावनी देने में। आतंकवादी अड्डों को खत्म करने
के विषय में तो उनके विचार एकदम स्पष्ट थे। 21 वीं सदी में भारत और
अमेरिका मिलकर विश्वशांति के लिए सहयोग करें, यह कामना उन्होंने प्रगट
की। राष्टपति बनने के बाद किसी भी देश से सबसे ज्यादा समय उन्होंने
भारत में बिताया और अपने शानदार स्वागत के लिए हिंदी में 'बहुत धन्यवाद'
कहा।

बराक ओबामा और उनकी पत्नी मिशेल ओबामा ने अपने हाव भाव, व्यवहार से कहीं
से भी यह लगने नहीं दिया कि वे कोई विशिष्ट व्यक्ति हैं बल्कि एकदम
सामान्य व्यक्ति की तरह व्यवहार कर सहजता से लोगों के हृदय में स्थान बना
लिया। इसे सुक्ष्मदर्शी बुद्धिजीवी भले ही उनका अभिनय करार दें लेकिन आम
आदमी के लिए तो एक अच्छे अभिनेता का अभिनय, अभिनय न होकर सत्य होता है और
निश्चित रुप से बराक ओबामा ने अमेरिका के लोगों के दिल को जीत कर
राष्टपति की गद्दी पर बैठने का हक प्राप्त किया, यह सिर्फ अभिनय के
कारण ही तो नहीं हो सकता। धारा प्रवाह लोग जो सुनना चाहें, उनकी ही तरह
बोलना बराक ओबामा की योग्यता का ही परिचायक है। गरीब, दलितों के लिए उनके
उदगार और भावनाएं भारतीयों के लिए खास मायने रखती हैं। उन्होंने स्पष्ट
कहा कि 30 लाख भारतीय मूल के राष्ट्रभक्त अमेरिकी भारत के प्रति आशा
जगाते हैं।

कभी अमेरिकी राष्टपति जॉन एफ केनेडी और भारत के प्रधानमंत्री पंडित
जवाहर लाल नेहरु की दोस्ती भी विश्व राजनीति में चर्चित रही है तो
भारतीयों के लिए भी बड़ी अहमियत रखती थी। भारत में जगह-जगह इनके चित्र,
यहां तक कि घरों में भी दिखायी देते थे। फिर वक्त बदला और अमेरिका और
भारत के बीच वैसे संबंध नहीं रहे। अब लगता है कि वह युग पुन: लौट रहा है।
उस समय तो ताजा-ताजा स्वतंत्र हुआ भारत एक निर्धन देश था जिसका वर्षों से
शोषण विभिन्न शक्तियां कर रही थी। अपनी 36 करोड़ जनता का ही उदर पोषण
करने में भारत समर्थ नहीं था। यह अमेरिका ही था जो पीएल 480 के तहत हमें
गेहूं देता था तो पेट की भूख मिटायी जाती थी। आज 120 करोड़ भारतीय हैं और
भारत सक्षम है अपने देशवासियों का पेट भरने में। इतना ही नहीं भारत
विभिन्न खाद्यान्न सामग्री निर्यात भी करता है।वक्त बदला है। विश्व मंदी की चपेट में अमेरिका है। सैकड़ों बैंकों पर ताला लग गया है। गिरती आर्थिक व्यवस्था के समय बराक ओबामा को अमेरिकियों
ने अपना राष्टपति चुना है। मनमोहन सिंह आज भारत के प्रधानमंत्री हैं
और भारत फल फूल रहा है लेकिन 1992 में जब वित्त मंत्री के रुप में मनमोहन
सिंह ने सरकार में प्रवेश किया था तब भारत की आर्थिक स्थिति संकट में थी।
उनकी पूर्ववर्ती चंद्रशेखर सरकार ने सोना गिरवी रखकर देश का काम चलाया
था। नरसिंह राव सरकार के वित्त मंत्री की हैसियत से मनमोहन सिंह ने
उदारीकरण के नए युग में भारत को प्रवेश कराया था। 1992 में कोई सोच भी
नहीं सकता था कि आर्थिक रुप से जर्जर भारत मात्र 18 वर्ष में ही दुनिया
को अर्थशास्त्र की शिक्षा दीक्षा दे रहा होगा। अमेरिका जैसी महाशक्ति का
राष्टपति भारत आकर भारत को महाशक्ति घोषित कर रहा होगा। भारतीय
कंपनियां अमेरिका में निवेश करें, इसकी पुरजोर कोशिश करने के लिए अमेरिकी
राष्ट्रपति तीन दिन तक भारत में रुकेगा। अमेरिका की बेरोजगारी दूर करने
के लिए भारतीय निवेश से 50 हजार से अधिक नौकरियां अमेरिका में बढ़ेंगी,
यह घोषणा करने में बराक ओबामा को गर्व की अनुभूति  होगी।
कितनी जल्दी सब कुछ बदल गया। आज भारतीय कंपनियां विदेशी कंपनियों को
अधिग्रहित कर रही हैं। भारतीय इंजीनियर, डॉक्टर भारत के लिए ही जरुरी
नहीं दुनिया के लिए जरुरी हो गए हैं। 80 हजार नौकरियां बैंक ही भारत में
देने के लिए तैयार बैठे हैं। बराक ओबामा ने कहा कि दुनिया का सबसे बड़ा
मध्यम वर्ग आज भारत में ही है। गरीबी है, गरीब हैं, इससे कोई इंकार नहीं
कर रहा है लेकिन समृद्धि भी तो बढ़ी है। भारत चंद्रमा में अपना चंद्रयान
भेज सकता है, सफलतापूर्वक यह भी संभव नहीं था लेकिन संभव हुआ। आज अमेरिका
में 30 प्रतिशत चिकित्सक भारतीय हैं तो नासा में भी भारत की भागीदारी
अच्छी खासी है। कल ही इंग्लैंड ने निवेश आमंत्रित करने के लिए भारी
सुविधाएं देने की घोषणा की है। दुनिया के धनपतियों में भारतीय धनपतियों
की भी अच्छी खासी संख्या है। अमेरिका के राष्टपति कहते हैं कि जब भारत
के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते हैं, दुनिया बड़े ध्यान से सुनती है।
विश्व मंदी में प्रजातांत्रिक भारत में जहां सब कुछ खुला हुआ है 9-10
प्रतिशत विकास दर बहुत मायने रखती है। यह विकास दर दस बीस वर्षों तक कायम
रही तो निश्चित रुप से भारत दुनिया का सबसे धनी राष्ट्र  बन जाएगा और
विश्व की आर्थिक व्यवस्था को नियंत्रित करने की क्षमता उसके पास होगी।
कभी भविष्य वक्ता 2010 में भारत के विश्व शक्ति बनने की भविष्यवाणी करते
थे तो हंसी के पात्र लगते थे। समस्याओं से ग्रस्त भारत, निर्धन भारत
विश्व शक्ति बन जाएगा, यह किसी कपोल कल्पना से कम नहीं लगता था लेकिन आज
तो तथ्य हैं। भारत के महाशक्ति होने की घोषणा अमेरिका का राष्टपति कर
रहा है। यह किसी चमत्कार से कम नहीं लेकिन असल में तो यह मनमोहन सिंह की
ही देन है। उनकी ही आर्थिक नीतियों का परिणाम है। अमेरिका के राष्टपति
बराक ओबामा, मनमोहन सिंह से आर्थिक सलाह र्भी लेते  हों तो कोई आश्चर्य की
बात नहीं। बराक ओबामा की भारत यात्रा से मनमोहन सिंह का कद जो
अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ा है  है, वह भारत  में भी और ऊंचा हो गया है।
भारत की वर्तमान आर्थिक स्थिति के लिए कोई एक व्यक्ति श्रेय का हकदार है
तो वे निश्चित रुप से डॉ. मनमोहन सिंह ही है। हमेशा लो प्रोफाइल में रहने
वाले मनमोहन सिंह ने सभी दिग्गज राजनीतिज्ञों को बौना साबित कर दिया है।
अब कांग्रेसियों की ही नजर में मनमोहन सिंह खटकने लगें तो कोई आश्चर्य की
बात नहीं लेकिन वक्त अपना करतब दिखाता है और जिससे जो काम लेना चाहता है,
उसे चुनता भी वही है। पता नहीं सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को
प्रधानमंत्री के रुप में क्या सोच कर चुना था लेकिन एक बात तो स्पष्ट है
कि स्वयं सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री न बन कर मनमोहन सिंह को
प्रधानमंत्री बना कर देश का हित किया। दूसरे शब्दों में कहें तो यह प्रभु
की ही देन है। क्योंकि देश का भाग्यविधाता तो वही है।

- विष्णु सिन्हा
दिनांक : 09.10.2010
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कमल विहार योजना का विवाद सरकार की लोकप्रियता के लिए अच्छी बात नहीं है

मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह कह रहे हैं कि कमल विहार योजना पर मंत्रियों
में मतभिन्नता है लेकिन किसी प्रकार का मनभेद नहीं है। यदि यह सत्य 
है तो मतभिन्नता क्यों है ? कोई भी योजना जब किसी क्षेत्र में
क्रियान्वित हो तब उस क्षेत्र के विधायक की सहमति तो आवश्यक समझी जानी
चाहिए। तब तो और जब विधायक भी सत्तारूढ़ पार्टी का हो। वैसे तो विपक्ष का
भी विधायक हो तब उसकी सहमति भी आवश्यक समझी जानी चाहिए। बहुमत के आधार पर
सरकार चलाने का अधिकार मिल जाने का प्रजातंत्र में यह अर्थ नहीं होता कि
सरकार की पार्टी का विधायक नहीं है तो उसके क्षेत्र के शासकीय कार्यों
में उसकी पूछपरख की आवश्यकता नहीं। जनता का यह विशेषाधिकार है और इसे
चुनौती देने का किसी को कोई अधिकार नहीं है कि वह किसे अपना प्रतिनिधि
चुने। जनता ने जिसे अपना विधायक चुना है, उसे अधिकार भी दिया है कि वह
अपने क्षेत्र के विकास का मुख्य सहभागी बने।

कमल विहार योजना जब रायपुर दक्षिण विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत
क्रियान्वित की जा रही है तो विधायक बृजमोहन अग्रवाल की सहमति तो सबसे
पहले ली जानी चाहिए थी। योजना की संपूर्ण जानकारी उन्हें देकर उनकी राय
ली जानी चाहिए थी। ऐसा किया जाता तो आज यह स्थिति नहीं बनती। बृजमोहन
अग्रवाल जब कहते हैं कि नगर निगम चुनाव में  भाजपा की हार का कारण कमल
विहार योजना है तो वे यह सब कुछ जानकर सोच समझकर ही कह रहे हैं। जब वे
कहते हैं कि देवेंद्र नगर और शैलेन्द्र नगर का उदाहरण इस मामले में अच्छा
नहीं है तब वे जनता के मन की ही बात कह रहे हैं। बृजमोहन अग्रवाल न केवल
पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं बल्कि उनकी पकड़ मतदाताओं की नब्ज पर किसी से
भी कम नहीं है। वे चुनाव जितवाने के धुरंधर खिलाड़ी हैं। इस कारण भी जनता
पर योजना का क्या प्रभाव पड़ेगा, यह जानना उनसे सरकार के लिए जरूरी है
जाता है। तब तो और जब योजना उनके विधानसभा क्षेत्र में लागू की जा रही
है।

राजनैतिक रूप से बृजमोहन अग्रवाल की कद काठी को बौना करने का मन में कोई
भाव हो तो उसे जितना जल्द संभव हो मन से निकाल देना चाहिए। बृजमोहन अपनी
चुप्पी तोडऩे के लिए बाध्य हुए हैं तो इसका कारण भी स्पष्ट है। जब सिर
से ऊपर पानी बह रहा हो तो फिर चुप नहीं रहा जा सकता। वे पूछते भी हैं कि
भू-माफिया कौन है? कोई भी कितना भी बड़ा जमीन का कारोबारी हो वह जमीन का
अधिग्रहण उस तरह से नहीं करता जिस तरह से सरकार करती है। सरकार जनहित के
नाम पर किसी की भी जमीन हस्तगत करने का अधिकार रखती है। फिर नौकरशाही से
निपटना आम आदमी के बस की बात नहीं होती और हर कोई तो कोर्ट कचहरी के
दरवाजे खटखटाने की न तो हिम्मत रखता है और न ही आर्थिक क्षमता ही इसकी
इजाजत देती है। अपनी पारिवारिक जमीन अपने हाथ से निकलता देखने में जो
मर्मांतक पीड़ा होती है, वह बिना भुक्तभोगी हुए कोई समझ ही नहीं सकता।
मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित दो बीघा जमीन यदि पढ़ नहीं सकते तो इस पर
बनी फिल्म ही हुक्मरानों को देख लेना चाहिए। शायद तब उनकी संवेदनशीलता पर
कोई असर हो और वे समझ सकें कि जमीन की कीमत नोटों में नहीं तौली जा सकती।
भूमि को तो मां का दर्जा भारतीय संस्कार देते हैं और मां का हाथ से निकल
जाना क्या अर्थ रखता है, इसकी समझ हो तो ही जमीन के अधिग्रहण के विषय में
सोचा जाना चाहिए।

कोई भी अपनी जमीन खुशी खुशी किसी योजना के लिए सरकार को देगा, यह सोच ही
फिजूल है। बृजमोहन अग्रवाल जब कहते हैं कि दस लोगों को बुलाकर पूछ लिया
जाए तो वे हकीकत बयान करते हैं। अपनी जमीन से कटा हुआ व्यक्ति कटी पतंग
की तरह होता है। आज छत्तीसगढ़ का विकास बहुतों के लिए प्रेरणास्पद हो
लेकिन विकास की भेंट जिनकी जमीनें चढ़ गयी हैं, उनके दिल का हाल सुनने
वाला कौन है? कीचड़ में नंगे पैर चलने वाला किसान और अपने घर के फर्श पर
भी चप्पल पहनकर चलने वाले इंसान की सोच में जमीन आसमान का अंतर होता है।
जिनके हाथ की हथेली और पैर के तलवे में कोई भेद नही  रह गया है, उनके
विकास की परिकल्पना और खेती में अपना जांगर खपाते इंसान की परिकल्पना में
अंतर होता है। यह सिर्फ मतभेद ही नहीं है बल्कि मनभेद भी है।

सत्ता सुख के लिए कितनी भी  लीपापोती शब्दों की कर ली जाए लेकिन इससे
असलियत नहीं बदलती। क्योंकि जहां भी जमीन अधिग्रहित की जाती है, वहां के
लोग उग्र हो जाते हैं? जमीन की कीमत प्राप्त कर कहीं भी बस सकते हैं।
लाखों रूपये मुआवजे के रूप में मिलते हैं। फिर एक दिन वह भी आता है जब
रूपया समाप्त हो जाता है। धन की व्यवस्था कैसे करना यह हर किसी के समझ से
बाहर की बात है। जमीन मालिक मजदूर बन जाता है। जमीन के मालिक को अपनी जमीन
का 35 प्रतिशत भी देते हैं तो उसे मालिक से पट्टïधारी बना देते हैं।
उससे भू-भाटक लेते हैं। मतलब वह अपनी ही जमीन के कुछ हिस्से का किरायेदार
हो जाता है। सरकार सोचे यह तो तथाकथित भू-माफिया भी नहीं करते। वे भी
जमीन बेचते हैं तो मालिकाना हक देते हैं। फिर जमीन या उस पर बना मकान
बेचने के लिए किसी अनुमति की जरूरत नहीं पड़ती और न ही अनुमति प्रमाण
पत्र के लिए शुल्क देना पड़ता है। सरकारी और सहकारी एजेंसियां तो निरंतर
शोषण का प्रतीक बन गयी है।

रायपुर विकास प्राधिकरण को ही एक समय लोग होरा विकास प्राधिकरण कहते थे।
अजीत जोगी ने तो इसे समाप्त कर दिया था। गृह निर्माण मंडल का भी
छत्तीसगढ़ में गठन नहीं किया था। आज तो उदारीकरण का युग है। तब सरकार
विकास के नाम पर व्यवसाय को सरकारी एजेंसियों के द्वारा क्यों कर रही है?
डा. रमन सिंह ने ही घोषणा की थी कि भू-भाटक समाप्त कर दिया जाएगा।
मंत्रिपरिषद का यह निर्णय है। मंत्रिपरिषद की बैठक में यह मुद्दा राजेश
मूणत ने उठाया था। लोग अभी तक उम्मीद ही कर रहे हैं कि अब भू-भाटक से
निजात मिली कि तब। निश्चित रूप से सरकार बहुत से क्षेत्रों में अच्छा काम
कर रही है। उसकी घोषणाएं भी जनता का मन मोह लेती हैं लेकिन यथार्थ के
धरातल पर नौकरशाही ऐसा कबाड़ा करती है कि जनता को सिवाय क्षोभ के और कुछ
हाथ नहीं लगता।

छत्तीसगढ़ राज्य गठन के दस वर्ष पूरे होने पर राज्योत्सव मनाया गया लेकिन
सब कुछ ठीक ठाक चल रहा है, ऐसा तो नहीं लगता। बिजली सलाहकार शिवराज सिंह
को ही बर्खास्त करना पड़ा है। कमल विहार योजना के क्रियान्वयन के पूर्व
सरकार को अच्छी तरह से विचार कर लेना चाहिए। कहीं यह एक अकेली योजना ही
सरकार के गले की हड्डी  न बन जाए। अक्लमंद वही होता है जो बढ़े हुए कदमों
को वापस लेने का भी माद्दा रखता है। राजहठ से जनता को नुकसान होता है तो
अंतत: प्रजातंत्र में नुकसान राजा को ही होता है। अक्लमंद को तो इशारा ही
काफी होता है।

- विष्णु सिन्हा
10-11-2010

बराक और मिशेल ओबामा ने भारत यात्रा में भारतीयों के दिल में जगह बनाने की कोशिश की

दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा
हैं। हर समय उनके पास वह बटन होता है जिसे दबाने से दुनिया में
त्राहि-त्राहि मच सकती है और उसे दबाने के लिए किसी से इजाजत लेने की भी
उन्हें जरुरत नहीं है। वह अमेरिका जिसके सामने हमारे हुक्मरान कभी अनाज
के लिए कटोरा लेकर खड़े रहते थे कि हमारी भूख मिटाओ। उसी अमेरिका का
राष्टपति आज हमारे पास आया है कि हमारी मदद करो। इसी को वक्त का बदलना
कहते हैं। मुंबई में जो व्यापारिक समझौते हुए उससे राष्टपति बराक
ओबामा के चेहरे पर प्रसन्नता दिखायी दी। क्योंकि अब इन समझौतों के कारण
अमेरिका में 50 हजार से अधिक बेरोजगारों को नौकरी मिल जाएगी। आर्थिक मंदी
से जूझते अमेरिका को आज इसकी सबसे ज्यादा जरुरत है। भारत में अमेरिका का
आयात बढ़े। महात्मा गांधी के प्रशंसक बराक ओबामा ने यह कहने में हिचक
महसूस नहीं की कि महात्मा गांधी भारत के ही नहीं, दुनिया के महानायक हैं।
किसी के भी हृदय में प्रवेश करने के लिए उसके बच्चे सबसे अच्छा माध्यम
होते हैं। किसी के भी सामने उसके बच्चों को प्रसन्न करें तो उसके माता
पिता प्रसन्न ही होते हैं। इस मर्म को भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित
जवाहर लाल नेहरु ने अच्छी तरह से समझा था और भारतीय बच्चों के लिए वे
चाचा नेहरु थे। वर्षों भारतीयों में उनकी लोकप्रियता का यह भी प्रमुख
कारण रहा। बराक ओबामा भी इस राज को अच्छी तरह से समझते हैं। इसलिए मुंबई
में बच्चों के साथ नृत्य करने में बराक ओबामा और उनकी पत्नी मिशेल ओबामा
को कोई हिचक महसूस नहीं हुई। टीवी के माध्यम से अधिकांश भारतीयों ने
दोनों पति पत्नी को बच्चों के साथ कोली नृत्य में थिरकते देखा। इसके साथ
ही दिल्ली में हुमायूं के मकबरे पर मकबरे की देखरेख करने वाले मजदूरों के
बच्चों के साथ जो हृदय स्पर्शी व्यवहार दोनों ने किया, वह दृश्य भी
संवेदनशीलता का संदेश दे गया। बच्चों के सामने घुटने टेक कर बराक ओबामा
का बैठना उनकी विनम्रता का परिचायक तो था ही, इंसानियत का भी परिचायक था।
दुनिया का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति जिसके रोएं-रोएं से अहंकार ही झलकना
चाहिए था, उसकी विनम्रता मन को मोहने वाली लगी। कहां तो छोटा सा पद पा कर
ही लोग इतने अहंकारी हो जाते हैं कि किसी को कुछ समझते नहीं। झुकने की
बात तो सोच भी नहीं सकते। वहीं जिस सहजता से मिट्टी पर ही घुटने टेक कर
ओबामा बैठ गए यह भारतीय पदाधिकारियों के लिए सीखने की बात है। सबसे बड़ी
बात तो यही थी कि बराक और मिशेल की भाव भंगिमाओं से कहीं से भी बनावट की
झलक नहीं मिल रही थी। सरल, सहज, सामान्य हावभाव, भंगिमाएं उनकी विनम्रता
का ही बोध करा रही थी। आलोचक कुछ भी कहें लेकिन अपनी मुस्कान से ही बराक
ने भारतीयों का दिल जीत लिया है। जिस प्रेम से बराक ओबामा ने भारत के
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को हवाई अड्डे पर गले से लगाया, उससे तो
मनमोहन सिंह ही धन्य-धन्य हो गए। यह उनके चेहरे से ही दिखायी दे रहा था।
शीत युद्ध के समय अमेरिका और रुस दुनिया की दो बड़ी शक्तियां थी। उस समय
भारत की दोस्ती रुस के साथ थी। स्वाभाविक रुप से इसका दूसरा पक्ष  पाकिस्तान अमेरिका
की दोस्ती के रुप में था। रुस के विश्व शक्ति न रहने के बाद अब दुनिया के
हालात बदले हैं। अमेरिका के समानान्तर अब चीन एक शक्ति के रुप में उभर
रहा है। भविष्य का आंकलन करने वाले कह रहे हैं कि अमेरिका के बराबर चीन
जल्द ही खड़ा हो जाएगा। आर्थिक मंदी से वैसे भी अमेरिका तकलीफ में है।
इसके विपरीत भारत और चीन फल  फूल रहे हैं। अमेरिका अफगानिस्तान में फंसा
हुआ है और जुलाई तक उसके अफगानिस्तान से बाहर निकलने की उम्मीद है। अभी
अमेरिका को पाकिस्तान की ज्यादा जरुरत है। इसलिए वह दिल खोलकर उसकी मदद
करने के लिए भी बाध्य है। ऐसे में भारत अमेरिका से दोस्ती की शर्त के रुप
में पाकिस्तान पर अमेरिका का दबाव देखना चाहता है तो यह भारत की मांग कुछ
ज्यादा है। अमेरिका यह भी जानता है कि पाकिस्तान की चीन से दोस्ती भी है
और चीन हर तरह से पाकिस्तान की मदद कर रहा है। पाकिस्तान को परमाणु शक्ति
संपन्न बनाने में भी चीन का हाथ है।

अमेरिका ने जब भारत के साथ परमाणु समझौता किया तब पाकिस्तान ने भी
अमेरिका से इसकी मांग की थी लेकिन अमेरिका ने इंकार कर टका सा जवाब दे
दिया था। व्यापार की दृष्टि से देखें, दोस्ती की दृष्टि से देखें तो
अमेरिका ने पाकिस्तान के बदले भारत को तव्वजो दी। यह ठीक है कि इसमें
अमेरिका का हित निहित था लेकिन अंतर्राष्टरीय राजनीति में अपना हित
देखना तो सभी का कर्तव्य है। भारत की यात्रा पर आए बराक ओबामा को भारत के
साथ पाकिस्तान आने के लिए भी पाकिस्तान ने कम जोर नहीं  लगाया लेकिन बराक
ओबामा ने इंकार कर दिया और कहा कि अगले वर्ष वे पाकिस्तान आएंगे। साफ है
कि पाकिस्तान की तुलना में भारत को बराक ओबामा ने ज्यादा तव्वजो दी।
भविष्य की दृष्टि से देखें तो यह कम बड़ी उपलब्धि नहीं है भारत की। बराक
ओबामा जब सेंट जेवियर स्कूल के बच्चों को कहते हैं कि एक स्थिर पाकिस्तान
भारत के लिए फायदेमंद हैं तो वे गलत क्या कहते हैं?

यह सही है कि यूरोप के देश अब अपने यहां किसी तरह का युद्ध नहीं चाहते
लेकिन एशिया में युद्ध के हालात जिस तरह से बनते हैं, उसमें हथियारों के
लिए एशिया बड़ी मंडी दिखायी देता है। भारत ही सबसे बड़ा खरीददार दिखायी
देता है। भारत खरीदने भी जा रहा है तो भारत के तरफ झुकाव भी स्वाभाविक
है। चीन की बढ़ती ताकत भारत के लिए खतरे से खाली नहीं है। भारत की प्रगति
से चीन को भी खतरा दिखायी देता है। तब चीन का मित्र अमेरिका बने या भारत
का तो लक्षण यही दिखायी देता है कि भारत का मित्र अमेरिका बने। अभी तो
दोस्ती का प्रारंभ हो रहा है और जिस तरह से भारत आर्थिक विकास कर रहा है,
यूरोप के देशों की नजर भारत पर है। प्रजातांत्रिक देश होने के कारण वैसे
भी भारत प्रजातांत्रिक देशों के ज्यादा समीप है। ओबामा ने स्वयं कहा है
कि भारत बढ़ती हुई ताकत नहीं है बल्कि भारत एक महाशक्ति है। हम स्वयं
नहीं मानते इस बात को लेकिन यह जरुर जानते हैं कि विकास का रथ इसी तरह से
सरपट भागता रहा तो वह दिन दूर नहीं है जब भारत वास्तव में महाशक्ति होगा।
दुनिया में यह बात चीन और पाकिस्तान को रास नहीं आने वाली है। हालांकि
किसी को रास आए या नहीं इससे कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन ये दोनों जिस तरह
से तनाव बढ़ाने का काम करते हैं, उसके पीछे कारण भी यही है कि बढ़ते भारत
को रोका जाए। आज अमेरिका को भारत की जरुरत महसूस हो रही है तो यह भारत के
लिए शुभ संदेश है। बराक ओबामा की यात्रा से यह संदेश तो उन लोगों को मिल
ही गया कि भारत और अमेरिका की बढ़ती दोस्ती उनके इरादों को असफल करने में
सक्षम है। वैसे भी भारतीय मूल के अमेरिकियों का प्रभाव अमेरिका में बढ़
रहा है। भारतीय मूल की एक अमेरिकी महिला एक राज्य की गवर्नर ही चुनी गयी
है। भारतीयों ने अमेरिका पर अच्छा प्रभाव डाला है। इस सबका असर भविष्य
में और स्पष्ट दिखायी देगा।

- विष्णु सिन्हा
दिनांक : 08.10.2010
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