दिग्विजय सिंह कह रहे हैं कि भाजपा कांग्रेस की बी टीम बन रही है। वामपंथी तो पहले से ही यह बात कहते थे। अब कौन ए टीम है और कौन बी टीम इससे परे यह बात स्मरणीय है कि कांग्रेस कभी समाजवादी पार्टी हुआ करती थी। उसका झुकाव स्वतंत्रता के बाद सत्ता में आने पर अपने को गरीबों की पार्टी बताने पर ज्यादा जोर था। यहां तक कि इंदिरा गांधी ने तो गरीबी हटाओ का नारा देकर ही एक आम चुनाव जीता। फिर जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तब धीरे धीरे कांग्रेस ने समाजवाद का चोला छोड़कर पूंजीवाद को अपनाना प्रारंभ किया और नरसिंहराव के वित्त मंत्री बनकर मनमोहन सिंह ने तो कांग्रेस को पूरी तरह से पूंजीवादी पार्टी बना दिया। उदारीकरण के नाम पर कांग्रेस ने पूंजीवाद को आश्रय देना प्रारंभ कर दिया। भाजपा और पूर्व में भारतीय जनसंघ तो प्रांरभ से ही दक्षिण पंथी पार्टी मानी जाती थी। कांग्रेसी ही भाजपा को बनियाओं की पार्टी कहा करते थे। बीच में कुछ समय के लिए भाजपा ने अपने को गांधीवादी समाजवाद के नाम पर प्रचारित करना शुरू किया था लेकिन बहुत जल्द भाजपा इस भ्रम से बाहर निकल गयी।
आज केंद्र में कांग्रेस गठबंधन की सरकार है और वह ऊपर-ऊपर पैकिंग के रूप में गरीबों की हितैषी दिखने का प्रयास कुछ कार्यक्रमों को लेकर भले ही करती है लेकिन उसकी नजर हर बजट में इसी बात पर ही लगी रहती है कि जनता के हित में जारी किसी भी तरह की सब्सिडी को कैसे खत्म किया जाए? जैसे जैसे सब्सिडियां खत्म होती गयी, सरकार का खजाना चौड़ा होता गया। जिस तरह से एक पूंजीपति कितना भी धन कमा ले संतुष्ट नहीं होता, उसी तरह से अब सरकार भी कितना ही टैक्स वसूल कर ले, खुश नहीं होती। वह अवसरों की तलाश में रहती है कि कैसे नागरिकों पर और बोझ डाला जाए। नागरिकों को पूरी तरह से बाजार के हवाले कर दिया गया है। पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस जैसी कुछ वस्तुएं सरकार के नियंत्रण में है तो सरकार उससे भी छुटकारा पा लेना चाहती है। जिससे उसे इन मदों में होने वाले घाटे से निजात मिले और जनता स्वयं इस बोझ को उठाए। सरकार भरसक प्रयास कर रही है कि तेरा तू जाने, हमें क्या लेना देना?
कहने का अर्थ यही है कि कांग्रेस अब पूरी तरह से पूंजीवादी हो गयी है। जैसे बड़े-बड़े सेठ करोड़ों, अरबों कमाकर कुछ दान दक्षिणा देते हैं कि इस जन्म में पाप यदि कुछ किए हैं तो उसे पुण्य में बदल लें। उसी तरह से सरकार भी टैक्स वसूली में कोई कृपणता न दिखाते हुए मीठा मीठा गप गप और कड़वा कड़वा थू थू करने में लगी है। सरकार में रहना है तो गरीबों के वोट चाहिए। इसलिए गरीब नवाज होने का एक मुखौटा भी चाहिए। सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली के द्वारा गरीबों की मदद का ढोंग करती है। गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों को 3 रू. किलो में चांवल गेहूं देती है। इसका कोटा भी कम करने का अवसर तलाशती है। शक्कर महंगी हुई तो राज्य सरकार का कोटा काटा जा रहा है। सब्सिडी इसलिए समाप्त की जाती है कि धन सरकार के खजाने में बचेगा तो सरकार देश का विकास करेगी। खाद्यान्न का सट्टा हो तो सरकार इसे रोकने की कोशिश नहीं करती। उसकी सोच है कि खाद्यान्न की कीमत बढ़ेगी तो फायदा किसान को होगा। किसान को कैसे फायदा होगा? किसान सरकार के द्वारा निर्धारित समर्थन मूल्य पर अनाज सरकार को बेच देता है। उसे तो उतना ही धन अपनी फसल का मिलता है जितना सरकार तय करती है।
फिर बाजार में बढ़ती महंगाई का लाभ उसे कैसे मिलेगा ? लाभ तो इस महंगाई का जमाखोर, व्यापारी, खाद्यान्न का सट्टा खेलने वाले उठाते हैं और नुकसान देश की आम जनता को उठाना पड़ता है। भाजपा की नकल में कांग्रेस दक्षिण पंथी तो हो गयी लेकिन परिणाम तो जनता भुगत रही है। अब कोई कैसे माने कि कांग्रेस गरीबों की पार्टी है। कहा जा रहा है कि शक्कर से ही एक लाख करोड़ रूपये व्यापारियों ने कमा लिए। सरकार खुश है कि उसकी आर्थिक नीति सफल है। विकास दर में इजाफा हो रहा है। सरकार की छाती चौड़ी हो रही है। सरकार को और धन चाहिए। अगले वर्ष 1 करोड़ और लोगों को रोजगार देना है। इस बहाने जनता की गर्दन पर महंगाई अपनी पकड़ और सख्त करे। खाद्यान्न के साथ अब दूसरी चीजों पर महंगाई अपनी नकेल कसने वाली है। आखिर जनता चाहती है कि देश विकसित हो तो उसे ही तो इसकी कीमत चुकानी है। यह सब ए टीम कांग्रेस कर रही है।
अब कांग्रेस की बी टीम भाजपा क्या करे ? वह यह सब आंख बंद कर देख तो नहीं सकती। इसलिए उसका कर्तव्य है कि वह कांग्रेस सरकार के विरोध में प्रदर्शन करे। भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में तय हुआ है कि 21 अप्रेल को भाजपा संसद का घेराव करेगी। 15 लाख नागरिको को लाकर दिल्ली में ऐसा प्रदर्शन किया जाएगा कि सरकार की चूल हिल जाए। लालकृष्ण आडवाणी ने तो आह्वïन किया है कि सिर्फ भाजपा के कार्यकर्ता ही इस प्रदर्शन में सम्मिलित नहीं हों बल्कि महंगाई के विरूद्घ जनता भी प्रदर्शन में भाग ले। जिससे जनता को पता चले कि उसकी असली हितैषी भाजपा है। जब कांग्रेस के महामंत्री दिग्विजयसिंह ही कांग्रेस को ए टीम और भाजपा को बी टीम बता रहे हैं तो दोनों के बीच सत्ता के लिए फे्रंडली मैच होना तो जायज है।
यह राजनीति का खेल है। जिस तरह से किसी भी खेल में दो टीम होती है और वे आपस में जीत के लिए खेलती है और दर्शक ताली बजाते हैं। उसी तरह का यह भी खेल है। दिल्ली में कांग्रेस की सरकार है तो भाजपा दिल्ली में प्रदर्शन करती है। छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार है तो कांग्रेस छत्तीसगढ़ में धरना प्रदर्शन करती है। देश भर के भाजपाई महंगाई का कारण केंद्र की कांग्रेस सरकार को बताते हैं तो छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी महंगाई के लिए राज्य की भाजपा सरकार को दोषी बताते हैं। अब यह जनता पर है कि वह तय करे कि कौन सही है? चुनाव में निर्णय का अधिकार जनता के पास ही होता है। जनता के वोट ही निर्णायक होते हैं कि खेल में कौन जीता, कौन हारा? लेकिन कोई जीते कोई हारे, अंतत: हार तो जनता ही जाती है। क्योंकि उसका एक बार किया निर्णय जिसके भी पक्ष में होता है, वही 5 वर्ष के लिए सत्ता का हकदार बन जाता है।
कभी कभी जनता किसी अच्छे व्यक्ति को भी चुन लेती है। वह अपनी क्षमता भर बल्कि उससे बढ़कर जनता की समस्याओं को हल करने का ईमानदारी से प्रयास करता है। तब दूसरी बार भी निर्णय के वक्त जनता दुष्प्रचारों से प्रभावित न होकर पुन: सत्ता उसे ही सौंप देती है। कभी देश में एक छत्र शासन करने वाली कंग्रेस जिसे ए टीम बताया जाता है केंद्र में मिली जुली सरकार चला रही है तो कितने ही राज्यों में उसका सुपड़ा साफ हो गया है। भाजपा जिसे बी टीम बताया जा रहा है वह 9 राज्यों में सत्ता पर है और 100 से अधिक लोकसभा सदस्य उसके पास हैं। वह 6 वर्ष तक केंद्र की सत्ता पर काबिज भी रह चुकी। मतलब साफ है कि जनता ए टीम से नाराज हुई तो सत्ता बी टीम के पास ही जाना है। सत्ता जिसके पास हो वहीं ए टीम है तो आज की ए टीम कल को बी टीम बन जाती है तो यही तो राजनीति का खेल है।
- विष्णु सिन्हा
20-2-2010
रविवार, 21 फ़रवरी 2010
शनिवार, 20 फ़रवरी 2010
नितिन गडकरी के प्रस्ताव पर सभी पक्षों को सद्भावना से विचार करना चाहिए
दरअसल ऐसी ही सोच की जरूरत है। नितिन गडकरी द्वारा भाजपा के राष्ट्रीय अधिवेशन में दिए गए वक्तव्य की जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है। समन्वय, सामंजस्य से ही देश को एक रखा जा सकता है। पहली बार किसी राष्ट्रीय राजनेता ने जोडऩे की बात कही है। यह बहुत पहले हो जाना चाहिए था। मुसलमानों से नितिन गडकरी की यह अपील कि राम मंदिर बनने दें और बनाने में सहयोग करें, वे कहीं और मस्जिद बनाएं, हम पूरा सहयोग देंगे। ऐसी अपील है जिससे हिंदू मुसलमान को बांटकर राजनीति करने वालों को सबक मिलेगा। बाबरी मस्जिद की जगह को पहले ही मुसलमानों से मांगा जाता तो न तो बाबरी मस्जिद विध्वंस की जरूरत पड़ती और न ही कितनों को अपनी जान गंवानी पड़ती। और तो और राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद राजनीति में हथियार की तरह काम नहीं करते। यदि ईमानदारी से, भाईचारे से मुसलमानों से हिंदू कुछ मांगें तो मुसलमान देने से इंकार कर देंगे, यह सोच ही फिजूल है। हिंदू मुसलमान भाईचारे का इतिहास तो पुराना है।
भारतीय मुसलमान वे लोग हैं जिन्होंने बंटवारे को स्वीकार नहीं किया। पाकिस्तान जाकर रहने के बदले भारत में ही अपने हिंदू भाइयों के साथ रहना स्वीकार किया। उनका अपने हिंन्दू भाइयों पर विश्वास नहीं होता तो वे यहां रहते ही क्यों? भारत ने भी धार्मिक राष्ट्र बनने के बदले धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनना स्वीकार किया। आज दुनिया आश्चर्य से भारत की तरफ देखती है कि धर्म ही नहीं और कितनी तरह की विभिन्नताओं के बावजूद भारतीय मेल जोल, भाईचारे से रहते हैं। देश के नागरिकों को आपस में लड़ाने का षडय़ंत्र कम नहीं किया जाता लेकिन फिर भी षडय़ंत्रकारी सफल नहीं होते। यह हर मुसलमान जानता है कि उनके हिंदू भाइयों की श्रद्घा भगवान राम पर कितनी है। यदि हिंदुओं की आस्था जहां बाबरी मस्जिद थी उस स्थान को राम जन्मभूमि मानता है तो उसके लिए कानून कायदों से निर्णय होना चाहिए। किसी जोर जबरदस्ती से नहीं। जहां कानून का शासन हो, वहां निर्णय भी कानून के अनुसार होना चाहिए।
कानून का यही तो प्रभाव है कि 6 वर्ष तक केंद्र की सत्ता में रहने के बावजूद भाजपा भी विवादित स्थल पर मंदिर का निर्माण नहीं करा सकी। न्यायालय में वर्षों से मामला विचाराधीन है। पता नहीं कब फैसला आएगा। फिर फैसला भी आएगा तो जिसके पक्ष में नहीं आएगा, उसे अच्छा थोड़े ही लगेगा। कोई हारे कोई जीते, किसी न किसी के स्वाभिमान को ठेस लगेगी। अच्छा तरीका तो यही है कि हिंदू मुसलमान मिलकर न्यायालय के बाहर कोई सम्मानजनक फैसला करें। जिससे हमारे भाईचारे को और ताकत मिले। उन संकीर्ण लोगों को करारा जवाब मिले जो राम जन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद के बहाने अपना उल्लू सीधा करने का प्रयास करते हैं। भाजपा के नए युवा अध्यक्ष की पहल से हो सकता है कि भाजपा के समर्थक कुछ संगठन सहमत न हों। उन्हें लगे कि विवाद समाप्त हो गया तो फिर हमारी अहमियत क्या रह जाएगी? ऐसी ही सोच दूसरे पक्ष के कुछ लोगों में भी हो सकती है लेकिन यदि यह मामला न्यायालय से बाहर निपट जाए तो यह देश के दीर्घकालीन हित के अनुरूप होगा।
आज बड़ा भाई छोटे भाई से मांग रहा है कि उसे जमीन का यह टुकड़ा दे दो तो छोटे भाई को भी पूरी संवेदनशीलता से शांतिपूर्वक विचार करना चाहिए। हमारी संस्कृति, सभ्यता में यह कोई अच्छी स्थिति तो नहीं है कि बड़ा भाई छोटे भाई से मांगे। होना तो यह चाहिए कि छोटा भाई मांगे और बड़ा भाई दे। छोटे भाई का हक है कि वह बड़े भाई से मांगे और बड़े भाई का कर्तव्य है कि वह छोटे भाई को दे लेकिन परिस्थिति विशेष है। बड़ा भाई अपने किसी निजी स्वार्थ के लिए जमीन मांग नहीं रहा है बल्कि वह उस जमीन पर अपने भगवान का मंदिर बनाना चाहता है। जिससे कोटि कोटि लोग भगवान के दर्शन, पूजा, अर्चना कर अपने लिए और सबके लिए सुख, समृद्घि, अमन, चैन की प्रार्थना कर सके। वैसे भी यह व्यक्तिगत स्वार्थ का मामला नहीं है। जिनकी उपासना पद्घति अलग है उनके लिए भी अन्यत्र पूजा स्थल का निर्माण करने में पूरा सहयोग देने का वायदा किया जा रहा है।
दुनिया में सब कुछ बदल रहा है। विज्ञान की तरक्की ने बहुत कुछ बदल दिया है। सभी को तरक्की करने का अवसर मिलना चाहिए। आर्थिक स्थिति बदलने का अवसर आ गया है। भारत की युवा पीढ़ी को भी नई दुनिया में जीना है। कठिन प्रतियोगिता में अपने लिए स्थान बनाना है। संकीर्णता से अब काम चलने वाला नहीं है। खुले दिमाग से भविष्य का आंकलन कर अपने बच्चों को आगे बढऩे का अवसर देना है। इसके लिए सबसे जरूरी जो बात है, वह यही है कि विवादों का निपटारा किया जाए। विवादों में हमारी शक्ति नष्ट होने के बदले निर्माण में लगे। दुनिया हमारी तरफ देख रही है। अमेरिका तक की सोच है कि आने वाले कल में भारत एक महाशक्ति का रूप ले लेगा। तब हम मंदिर मस्जिद के विवाद में उलझते रहे तो दुश्मन फायदा उठाने से बाज नहीं आएगा। मंदिर मस्जिद विवाद को निपटाकर हम उन लोगों को स्पष्ट संदेश दे देंगे जो हमारे बीच फूट का बीज बोकर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं ।
हिंदू हो, मुसलमान हो, हम सबको और हमारी आने वाली पीढ़ी को इसी भूमि में जीना रहना है। हम क्या बीजारोपण करते है और अपने आने वाली पीढ़ी के लिए किस तरह की समस्याओं को छोड़ते है, यह तो हमीं पर निर्भर करता है। बड़े भाई की हैसियत से हिंदुओं की जिम्मेदारी किसी से भी कम नहीं है लेकिन छोटे भाई होने के कारण मुसलमानों की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। नितिन गडकरी के प्रस्ताव पर गंभीरता से, शांति से विचार करने की जरूरत है। यह ऐसा प्रस्ताव है कि मिल बैठकर कोई रास्ता निकालने की कोशिश करेंगे तो रास्ता अवश्य निकलेगा। पुराने चश्मे से समस्या को न देखकर युवा आंखों से देखने की जरूरत है। हर वह काम जरूरी है जिससे लोगों के बीच संदेह का नहीं विश्वास का माहौल बने। हमारी भावी पीढ़ी गर्व से कह सके कि हमारे बुजुर्ग इतने समझदार थे कि उन्होंने किसी तरह की समस्या हमारे लिए नहीं छोड़ी और हमें उस स्थिति में वारिसाना हक दिया है जहां हम सुख चैन से रह रहे हैं। कौन मां बाप होगा जो चाहेगा कि उसके बच्चों में आपस में प्रेम न पनपे। प्रेम, मुहब्बत से बड़ी कोई चीज भी नहीं है। प्रेम का पौधा पुष्पित पल्लवित हो, इस दृष्टि को रखकर ही समस्याओं का निपटारा करना चाहिए। यह अच्छी तरह से समझना होगा कि किसी के भी स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने का मतलब अपने ही स्वाभिमान को ठेस पहुंचाना है। पूजा पद्घति अलग अलग होने से सब कुछ अलग नहीं हो जाता। ईश्वर को कौन किस तरह से याद करता है या किस तरह से उससे प्रार्थना करता है, इसकी स्वतंत्रता तो हमारा संविधान ही देता है। इसका सम्मान करना हमारा परम कर्तव्य है। इसलिए अवसर हो तो समस्या का समाधान कर लेना चाहिए।
विष्णु सिन्हा
19-2-2010
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भारतीय मुसलमान वे लोग हैं जिन्होंने बंटवारे को स्वीकार नहीं किया। पाकिस्तान जाकर रहने के बदले भारत में ही अपने हिंदू भाइयों के साथ रहना स्वीकार किया। उनका अपने हिंन्दू भाइयों पर विश्वास नहीं होता तो वे यहां रहते ही क्यों? भारत ने भी धार्मिक राष्ट्र बनने के बदले धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनना स्वीकार किया। आज दुनिया आश्चर्य से भारत की तरफ देखती है कि धर्म ही नहीं और कितनी तरह की विभिन्नताओं के बावजूद भारतीय मेल जोल, भाईचारे से रहते हैं। देश के नागरिकों को आपस में लड़ाने का षडय़ंत्र कम नहीं किया जाता लेकिन फिर भी षडय़ंत्रकारी सफल नहीं होते। यह हर मुसलमान जानता है कि उनके हिंदू भाइयों की श्रद्घा भगवान राम पर कितनी है। यदि हिंदुओं की आस्था जहां बाबरी मस्जिद थी उस स्थान को राम जन्मभूमि मानता है तो उसके लिए कानून कायदों से निर्णय होना चाहिए। किसी जोर जबरदस्ती से नहीं। जहां कानून का शासन हो, वहां निर्णय भी कानून के अनुसार होना चाहिए।
कानून का यही तो प्रभाव है कि 6 वर्ष तक केंद्र की सत्ता में रहने के बावजूद भाजपा भी विवादित स्थल पर मंदिर का निर्माण नहीं करा सकी। न्यायालय में वर्षों से मामला विचाराधीन है। पता नहीं कब फैसला आएगा। फिर फैसला भी आएगा तो जिसके पक्ष में नहीं आएगा, उसे अच्छा थोड़े ही लगेगा। कोई हारे कोई जीते, किसी न किसी के स्वाभिमान को ठेस लगेगी। अच्छा तरीका तो यही है कि हिंदू मुसलमान मिलकर न्यायालय के बाहर कोई सम्मानजनक फैसला करें। जिससे हमारे भाईचारे को और ताकत मिले। उन संकीर्ण लोगों को करारा जवाब मिले जो राम जन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद के बहाने अपना उल्लू सीधा करने का प्रयास करते हैं। भाजपा के नए युवा अध्यक्ष की पहल से हो सकता है कि भाजपा के समर्थक कुछ संगठन सहमत न हों। उन्हें लगे कि विवाद समाप्त हो गया तो फिर हमारी अहमियत क्या रह जाएगी? ऐसी ही सोच दूसरे पक्ष के कुछ लोगों में भी हो सकती है लेकिन यदि यह मामला न्यायालय से बाहर निपट जाए तो यह देश के दीर्घकालीन हित के अनुरूप होगा।
आज बड़ा भाई छोटे भाई से मांग रहा है कि उसे जमीन का यह टुकड़ा दे दो तो छोटे भाई को भी पूरी संवेदनशीलता से शांतिपूर्वक विचार करना चाहिए। हमारी संस्कृति, सभ्यता में यह कोई अच्छी स्थिति तो नहीं है कि बड़ा भाई छोटे भाई से मांगे। होना तो यह चाहिए कि छोटा भाई मांगे और बड़ा भाई दे। छोटे भाई का हक है कि वह बड़े भाई से मांगे और बड़े भाई का कर्तव्य है कि वह छोटे भाई को दे लेकिन परिस्थिति विशेष है। बड़ा भाई अपने किसी निजी स्वार्थ के लिए जमीन मांग नहीं रहा है बल्कि वह उस जमीन पर अपने भगवान का मंदिर बनाना चाहता है। जिससे कोटि कोटि लोग भगवान के दर्शन, पूजा, अर्चना कर अपने लिए और सबके लिए सुख, समृद्घि, अमन, चैन की प्रार्थना कर सके। वैसे भी यह व्यक्तिगत स्वार्थ का मामला नहीं है। जिनकी उपासना पद्घति अलग है उनके लिए भी अन्यत्र पूजा स्थल का निर्माण करने में पूरा सहयोग देने का वायदा किया जा रहा है।
दुनिया में सब कुछ बदल रहा है। विज्ञान की तरक्की ने बहुत कुछ बदल दिया है। सभी को तरक्की करने का अवसर मिलना चाहिए। आर्थिक स्थिति बदलने का अवसर आ गया है। भारत की युवा पीढ़ी को भी नई दुनिया में जीना है। कठिन प्रतियोगिता में अपने लिए स्थान बनाना है। संकीर्णता से अब काम चलने वाला नहीं है। खुले दिमाग से भविष्य का आंकलन कर अपने बच्चों को आगे बढऩे का अवसर देना है। इसके लिए सबसे जरूरी जो बात है, वह यही है कि विवादों का निपटारा किया जाए। विवादों में हमारी शक्ति नष्ट होने के बदले निर्माण में लगे। दुनिया हमारी तरफ देख रही है। अमेरिका तक की सोच है कि आने वाले कल में भारत एक महाशक्ति का रूप ले लेगा। तब हम मंदिर मस्जिद के विवाद में उलझते रहे तो दुश्मन फायदा उठाने से बाज नहीं आएगा। मंदिर मस्जिद विवाद को निपटाकर हम उन लोगों को स्पष्ट संदेश दे देंगे जो हमारे बीच फूट का बीज बोकर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं ।
हिंदू हो, मुसलमान हो, हम सबको और हमारी आने वाली पीढ़ी को इसी भूमि में जीना रहना है। हम क्या बीजारोपण करते है और अपने आने वाली पीढ़ी के लिए किस तरह की समस्याओं को छोड़ते है, यह तो हमीं पर निर्भर करता है। बड़े भाई की हैसियत से हिंदुओं की जिम्मेदारी किसी से भी कम नहीं है लेकिन छोटे भाई होने के कारण मुसलमानों की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। नितिन गडकरी के प्रस्ताव पर गंभीरता से, शांति से विचार करने की जरूरत है। यह ऐसा प्रस्ताव है कि मिल बैठकर कोई रास्ता निकालने की कोशिश करेंगे तो रास्ता अवश्य निकलेगा। पुराने चश्मे से समस्या को न देखकर युवा आंखों से देखने की जरूरत है। हर वह काम जरूरी है जिससे लोगों के बीच संदेह का नहीं विश्वास का माहौल बने। हमारी भावी पीढ़ी गर्व से कह सके कि हमारे बुजुर्ग इतने समझदार थे कि उन्होंने किसी तरह की समस्या हमारे लिए नहीं छोड़ी और हमें उस स्थिति में वारिसाना हक दिया है जहां हम सुख चैन से रह रहे हैं। कौन मां बाप होगा जो चाहेगा कि उसके बच्चों में आपस में प्रेम न पनपे। प्रेम, मुहब्बत से बड़ी कोई चीज भी नहीं है। प्रेम का पौधा पुष्पित पल्लवित हो, इस दृष्टि को रखकर ही समस्याओं का निपटारा करना चाहिए। यह अच्छी तरह से समझना होगा कि किसी के भी स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने का मतलब अपने ही स्वाभिमान को ठेस पहुंचाना है। पूजा पद्घति अलग अलग होने से सब कुछ अलग नहीं हो जाता। ईश्वर को कौन किस तरह से याद करता है या किस तरह से उससे प्रार्थना करता है, इसकी स्वतंत्रता तो हमारा संविधान ही देता है। इसका सम्मान करना हमारा परम कर्तव्य है। इसलिए अवसर हो तो समस्या का समाधान कर लेना चाहिए।
विष्णु सिन्हा
19-2-2010
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शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010
नितिन गडकरी के तेवर चौकड़ी के लिए खतरे की घंटी बजा रहे हैं
भाजपा के राष्ट्रीय अधिवेशन से जो समाचार आ रहे हैं, वे समाचार यदि सिर्फ बातें न रहकर क्रियान्वयन तक पहुंच गए तो भाजपा में सब कुछ बदला बदला सा दिखायी पड़ेगा। जब नितिन गडकरी को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया तब किसी को भी उम्मीद नहीं थी कि दिल्ली में बैठी चौकड़ी नितिन गडकरी को अध्यक्ष के रूप में सफल होते देखना पसंद करेगी और वे लोग वह सब करेंगे जिससे गडकरी उनकी हाथ की कठपुतली बन जाएं। खाने के शौकीन मोटे से या कहें बेडौल नितिन गडकरी अपने व्यक्तित्व से भी ऐसा संदेश नहीं देते थे कि इतने स्मार्ट भी हो सकते हैं कि दिग्गजों की खाट खड़ी कर दें। जब उन्होंने कहा कि दूसरों की बड़ी लकीर को छोटा करने के बदले अपनी लकीर को बड़ा करना उद्देश्य होना चाहिए तब वह यह बात दूसरों के लिए कम और अपने लिए ज्यादा कह रहे थे। उन्होंने यह भी कहा कि छोटे दिल से बड़े काम नहीं हो सकते। मतलब पार्टी में काम दिल बड़ा रखकर करें।
नितिन गडकरी ने यह भी अच्छी तरह से समझ लिया है कि पार्टी का वोट बैंक यदि 10 प्रतिशत बढा लिया जाए तो भाजपा कांग्रेस के बराबर खड़ी हो सकती है और इसके लिए सबसे पहले उन्होंने दलितों पर अपनी दृष्टि केंद्रित की है। दलित के घर भोजन कर और बाबा साहेब आम्बेडकर की प्रतिमा पर पुष्प माला चढ़ाकर उन्होंने इशारा भी पार्टी के कार्यकर्ताओं को कर दिया है कि कार्यकर्ता अपना ध्यान किस तरफ केंद्रित करें। कहने वाले तो यह भी कह रहे हैं कि अब जयश्री राम के बदले भाजपा जय भीम का नारा लगाते दिखायी पड़े तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। पार्टी की मुख्यधारा को किस तरफ ले जाना है यह नितिन गडकरी अच्छी तरह से समझते हैं। मुसलमान कितना भाजपा पर विश्वास करेंगे, यह अलग बात है लेकिन नितिन गडकरी मुसलमानों को भी अपने पाले में लाने का चिंतन तो कर रहे हैं और उम्मीद की जा रही है कि इस तरफ भी पार्टी कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया जायेगा।
ब्राह्मण, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक कभी कांग्रेस का वोट बैंक हुआ करता था। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद मुसलमानों को जहां विकल्प मिला, उन्होंने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया। जहां तक दलितों का प्रश्र है तो कांग्रेस का यह वोट बैंक बसपा ने अपनी तरफ कर लिया। छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेशों का आदिवासी आज भाजपा के पाले में है। बाबरी मस्जिद बनाम राम जन्मभूमि के कारण ब्राह्मण भाजपा की तरफ आकर्षित हुआ लेकिन भाजपा उसे संभाल नहीं सकी तो उत्तरप्रदेश जैसे प्रदेश में ब्राह्मण भी मायावती के साथ चला गया। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत जाति तोड़ो की बात कह रहे हैं लेकिन यह हिंन्दू समाज में आसान काम नहीं है। शहरों में तो वैसे भी जाति का महत्व कम होता जा रहा है लेकिन ग्रामीण पृष्ठभूमि में अभी भी जातियों की पकड़ मौजूद है
यही कारण है कि हिंदुओं को एक करने की कोशिश में भाजपा को सफलता नहीं मिली। भाजपा को पहली बार हिंदुओं के एक बड़े वर्ग का समर्थन मिला तो उसका कारण राम जन्मभूमि आंदोलन रहा लेकिन अब वह बात तो रही नहीं। सरकार में आने के बाद जब भाजपा राम जन्मभूमि पर मंदिर नहीं बना सकी तो फिर उत्तरप्रदेश में ही उसकी हालत खराब हो गयी। यहां तक कि उत्तरप्रदेश में कांग्रेस मृतशैय्या से उठ खड़ी हुई लेकिन भाजपा का हाल आज सबसे खराब है। यह दूसरी बात है कि आज भाजपा देश के 9 राज्यों में सत्ता पर है लेकिन कुछ राज्यों में उसके पास संपूर्ण सत्ता नहीं है। भाजपा ने जिन दलों के साथ मिलकर राजग बनाया था उनमें से जनता दल यू जैसे कुछ दलों को छोड़कर अधिकांश उससे अलग हो चुके हैं। इसके साथ यह भी सच है कि छत्तीसगढ़ , मध्यप्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, हिमाचल, उत्तराखंड राज्य में संपूर्ण सत्ता भाजपा के पास है तो कई राज्यों में वह पुन: सत्तारूढ़ हुई है तो उसका कारण वहां के मुख्यमंत्रियों के क्रियाकलाप हैं। इन राज्यों में भी भाजपा सरकार को प्रतिपक्ष के कारण कोई नुकसान नहीं है लेकिन पार्टी के ही दिग्गज सत्ता के लालच में तरह तरह के उद्यम कर पार्टी को कमजोर करने का प्रयास तो कर ही रहे हैं।
इनके विरूद्घ सख्त कार्यवाही की जरूरत है लेकिन पार्टी इनके विरूद्घ कुछ कर नहीं पा रही है। यह निर्णय तो पार्टी का उचित है कि पार्टी से निष्कासित नेताओं को पार्टी में नहीं लिया जाएगा। इस मामले में पार्टी गुण दोष के आधार पर विचार करे तो ज्यादा अच्छा रहेगा। यह अवश्य देखा जाना चाहिए कि नेता या कार्यकर्ता पार्टी के विरूद्घ चुनाव लडऩे के लिए तैयार होते हैं तो असल में वे दोषी हैं या पार्टी के नेता ही उन्हें उकसाते हैं और उनका उद्देश्य भी स्पष्ट होता है कि वे बागी होने के लिए उकसा कर पार्टी को नुकसान पहुंचाएं। यदि किसी कार्यकर्ता के साथ पार्टी का कोई नेता अन्याय करता है तब उस पर भी तो कार्यवाही होना चाहिए।
एक बात तो स्पष्ट दिखायी दे रही है कि नितिन गडकरी को वरिष्ठ नेता उस तरह से दबा नहीं पाएंगे जिस तरह का खेल उन्होंने राजनाथ सिंह के साथ खेला। लालकृष्ण आडवाणी कह रहे हैं कि कमियों को दूर करने की जरूरत है। यह कोई ऐसी बात नहीं है कि जिसे गडकरी नहीं समझते। बड़े नेताओं को तो वैसे भी खटका दिखायी दे रहा है। गडकरी सुनने वाले सबकी है लेकिन कार्यकारिणी के गठन से ही स्पष्ट हो जाएगा कि गडकरी अपने मन की करने वाले हैं। गडकरी के हाव-भाव से तो यही लगता है कि वे आमूल चूल परिवर्तन के मूड में हैं और निष्ठïवान, सक्रिय कार्यकर्ता को पार्टी तवज्जो देने वाली है। संगठन में दिग्गजों को लूप लाईन में डाल दें गडकरी तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। उनके पक्ष में सबसे बड़ी बात तो यही है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पूरा वरदहस्त उन पर है।
और मोहन भागवत ने पहले ही कह दिया है कि राख से उठ खड़े होने का दम भाजपा में है। संघ की सक्रियता भी मोहन भागवत के सरसंघचालक बनने के बाद बढ़ी है। भाजपा को चुस्त दुरूस्त और विस्तारित करने का दायित्व नितिन गडकरी पर है तो संघ को चारों दिशाओं में फैलाने और सशक्त करने का काम मोहन भागवत के पास है। मतलब दोनों संगठन को मजबूत करने का काम करने वाले हैं। प्रतिपक्ष की सत्ता पर भले ही आडवाणी और उनके अनुयायी काबिज रहें लेकिन असली ताकत तो संगठन ही है और संगठन पर जिस तरह से नितिन गडकरी का शिकंजा कसता जा रहा है, उसके बाद दर्शनीय हुंडियों का क्या महत्व रह जाएगा, यह भी स्पष्ट दिखायी दे रहा है। अब जोड़ तोड़ की राजनीति से उच्च पदस्थ होने का वक्त बीत रहा हैै। चापलूसी के बदले कार्यकुशलता काम आने वाली है तो भाजपा चौकड़ी से या तो मुक्त हो जाएगी या फिर चौकड़ी को ही अपने रंग ढंग बदलने पड़ेंगे।
- विष्णु सिन्हा
18-2-2010
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नितिन गडकरी ने यह भी अच्छी तरह से समझ लिया है कि पार्टी का वोट बैंक यदि 10 प्रतिशत बढा लिया जाए तो भाजपा कांग्रेस के बराबर खड़ी हो सकती है और इसके लिए सबसे पहले उन्होंने दलितों पर अपनी दृष्टि केंद्रित की है। दलित के घर भोजन कर और बाबा साहेब आम्बेडकर की प्रतिमा पर पुष्प माला चढ़ाकर उन्होंने इशारा भी पार्टी के कार्यकर्ताओं को कर दिया है कि कार्यकर्ता अपना ध्यान किस तरफ केंद्रित करें। कहने वाले तो यह भी कह रहे हैं कि अब जयश्री राम के बदले भाजपा जय भीम का नारा लगाते दिखायी पड़े तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। पार्टी की मुख्यधारा को किस तरफ ले जाना है यह नितिन गडकरी अच्छी तरह से समझते हैं। मुसलमान कितना भाजपा पर विश्वास करेंगे, यह अलग बात है लेकिन नितिन गडकरी मुसलमानों को भी अपने पाले में लाने का चिंतन तो कर रहे हैं और उम्मीद की जा रही है कि इस तरफ भी पार्टी कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया जायेगा।
ब्राह्मण, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक कभी कांग्रेस का वोट बैंक हुआ करता था। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद मुसलमानों को जहां विकल्प मिला, उन्होंने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया। जहां तक दलितों का प्रश्र है तो कांग्रेस का यह वोट बैंक बसपा ने अपनी तरफ कर लिया। छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेशों का आदिवासी आज भाजपा के पाले में है। बाबरी मस्जिद बनाम राम जन्मभूमि के कारण ब्राह्मण भाजपा की तरफ आकर्षित हुआ लेकिन भाजपा उसे संभाल नहीं सकी तो उत्तरप्रदेश जैसे प्रदेश में ब्राह्मण भी मायावती के साथ चला गया। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत जाति तोड़ो की बात कह रहे हैं लेकिन यह हिंन्दू समाज में आसान काम नहीं है। शहरों में तो वैसे भी जाति का महत्व कम होता जा रहा है लेकिन ग्रामीण पृष्ठभूमि में अभी भी जातियों की पकड़ मौजूद है
यही कारण है कि हिंदुओं को एक करने की कोशिश में भाजपा को सफलता नहीं मिली। भाजपा को पहली बार हिंदुओं के एक बड़े वर्ग का समर्थन मिला तो उसका कारण राम जन्मभूमि आंदोलन रहा लेकिन अब वह बात तो रही नहीं। सरकार में आने के बाद जब भाजपा राम जन्मभूमि पर मंदिर नहीं बना सकी तो फिर उत्तरप्रदेश में ही उसकी हालत खराब हो गयी। यहां तक कि उत्तरप्रदेश में कांग्रेस मृतशैय्या से उठ खड़ी हुई लेकिन भाजपा का हाल आज सबसे खराब है। यह दूसरी बात है कि आज भाजपा देश के 9 राज्यों में सत्ता पर है लेकिन कुछ राज्यों में उसके पास संपूर्ण सत्ता नहीं है। भाजपा ने जिन दलों के साथ मिलकर राजग बनाया था उनमें से जनता दल यू जैसे कुछ दलों को छोड़कर अधिकांश उससे अलग हो चुके हैं। इसके साथ यह भी सच है कि छत्तीसगढ़ , मध्यप्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, हिमाचल, उत्तराखंड राज्य में संपूर्ण सत्ता भाजपा के पास है तो कई राज्यों में वह पुन: सत्तारूढ़ हुई है तो उसका कारण वहां के मुख्यमंत्रियों के क्रियाकलाप हैं। इन राज्यों में भी भाजपा सरकार को प्रतिपक्ष के कारण कोई नुकसान नहीं है लेकिन पार्टी के ही दिग्गज सत्ता के लालच में तरह तरह के उद्यम कर पार्टी को कमजोर करने का प्रयास तो कर ही रहे हैं।
इनके विरूद्घ सख्त कार्यवाही की जरूरत है लेकिन पार्टी इनके विरूद्घ कुछ कर नहीं पा रही है। यह निर्णय तो पार्टी का उचित है कि पार्टी से निष्कासित नेताओं को पार्टी में नहीं लिया जाएगा। इस मामले में पार्टी गुण दोष के आधार पर विचार करे तो ज्यादा अच्छा रहेगा। यह अवश्य देखा जाना चाहिए कि नेता या कार्यकर्ता पार्टी के विरूद्घ चुनाव लडऩे के लिए तैयार होते हैं तो असल में वे दोषी हैं या पार्टी के नेता ही उन्हें उकसाते हैं और उनका उद्देश्य भी स्पष्ट होता है कि वे बागी होने के लिए उकसा कर पार्टी को नुकसान पहुंचाएं। यदि किसी कार्यकर्ता के साथ पार्टी का कोई नेता अन्याय करता है तब उस पर भी तो कार्यवाही होना चाहिए।
एक बात तो स्पष्ट दिखायी दे रही है कि नितिन गडकरी को वरिष्ठ नेता उस तरह से दबा नहीं पाएंगे जिस तरह का खेल उन्होंने राजनाथ सिंह के साथ खेला। लालकृष्ण आडवाणी कह रहे हैं कि कमियों को दूर करने की जरूरत है। यह कोई ऐसी बात नहीं है कि जिसे गडकरी नहीं समझते। बड़े नेताओं को तो वैसे भी खटका दिखायी दे रहा है। गडकरी सुनने वाले सबकी है लेकिन कार्यकारिणी के गठन से ही स्पष्ट हो जाएगा कि गडकरी अपने मन की करने वाले हैं। गडकरी के हाव-भाव से तो यही लगता है कि वे आमूल चूल परिवर्तन के मूड में हैं और निष्ठïवान, सक्रिय कार्यकर्ता को पार्टी तवज्जो देने वाली है। संगठन में दिग्गजों को लूप लाईन में डाल दें गडकरी तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। उनके पक्ष में सबसे बड़ी बात तो यही है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पूरा वरदहस्त उन पर है।
और मोहन भागवत ने पहले ही कह दिया है कि राख से उठ खड़े होने का दम भाजपा में है। संघ की सक्रियता भी मोहन भागवत के सरसंघचालक बनने के बाद बढ़ी है। भाजपा को चुस्त दुरूस्त और विस्तारित करने का दायित्व नितिन गडकरी पर है तो संघ को चारों दिशाओं में फैलाने और सशक्त करने का काम मोहन भागवत के पास है। मतलब दोनों संगठन को मजबूत करने का काम करने वाले हैं। प्रतिपक्ष की सत्ता पर भले ही आडवाणी और उनके अनुयायी काबिज रहें लेकिन असली ताकत तो संगठन ही है और संगठन पर जिस तरह से नितिन गडकरी का शिकंजा कसता जा रहा है, उसके बाद दर्शनीय हुंडियों का क्या महत्व रह जाएगा, यह भी स्पष्ट दिखायी दे रहा है। अब जोड़ तोड़ की राजनीति से उच्च पदस्थ होने का वक्त बीत रहा हैै। चापलूसी के बदले कार्यकुशलता काम आने वाली है तो भाजपा चौकड़ी से या तो मुक्त हो जाएगी या फिर चौकड़ी को ही अपने रंग ढंग बदलने पड़ेंगे।
- विष्णु सिन्हा
18-2-2010
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अलकायदा की चेतावनी से क्या कोई देश डर जाएगा?
अब अलकायदा ने विश्व समुदाय को चेतावनी दी है कि वह अपने खिलाडिय़ों को विश्व कप हॉकी, आईपीएल तथा राष्ट्र्रमंडल खेलों के लिए भारत न भेजे। अन्यथा परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहे। यह चेतावनी अलकायदा के कमांडर इलियास काश्मीरी ने दिया है। यह वही शख्स है जिसके साथ डेविड हेडली के संबंध चर्चित है और मुंबई हमले में भी जिसका हाथ था। एक तरफ भारत जैसा धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है और दूसरी तरफ चंद आतंकवादी। भारत सरकार सुरक्षा की पूरी गारंटी दे रही है लेकिन फिर भी खेल के नाम पर अपने देश के खिलाडिय़ों की जान जोखिम डालने के लिए कुछ देश तैयार न हों तो कोई आश्चर्य की बात नहीं और यही अलकायदा जैसे आतंकवादी संगठन चाहते भी हैं कि उनकी धमकी से लोग डर कर यदि खेल में भाग लेने से कतराते हैं तो यह उनकी बड़ी जीत होगी।
यह तो भारत के लिए ही नहीं विश्व समुदाय के सोच का विषय है कि वह इन आतंकवादी धमकियों से प्रभावित होता है या उनका मुंहतोड़ जवाब देता है। स्वाभाविक है कि भारत पर इस धमकी के बाद सुरक्षा की अहम जिम्मेदारी है। इन खेलों को आतंकवाद से बचा कर सफलतापूर्वक संपन्न कराने की भी जिम्मेदारी भारत पर है। भारत तो अपनी तरफ से हर संभव प्रयास करेगा कि खेल में किसी भी तरह का विघ्न न पड़े लेकिन विश्व समुदाय की भी अपनी जिम्मेदारी है। जो देश आतंकवादी धमकी से घबराएगा, वह सहज ही आतंकवादियों की दृष्टि में सरल निशाना होगा। यही समय है, अलकायदा को जवाब दिया जाए कि उसकी धमकी से दुनिया का कोई देश नहीं घबराता। राष्ट्रों की सत्ता इतनी कमजोर नहीं है कि वह चंद आतंकवादियों की धमकी के सामने घुटने टेक दे।
शांतिप्रिय देशों का हिंसा पर कोई विश्वास नहीं होता लेकिन यदि उन्हें कमजोर समझ कर कोई हिंसा के बल पर आतंक फैलाना चाहे और अपने मनमाफिक चलने के लिए बाध्य करने की कोशिश करे तो उसका मुहतोड़ जवाब देना राष्ट्रों का कर्तव्य है। अमेरिका का ही उदाहरण पर्याप्त है। जब उस पर आतंकवादी हमला हआ तब उसने उसका मुहतोड़ जवाब देने के लिए अलकायदा के विरुद्ध अफगानिस्तान में जाकर सैन्य कार्यवाही करने से भी परहेज नहीं किया। सुरक्षा का ऐसा कवच अपने देश में बनाया कि दूसरी आतंकवादी घटना करने की धमकी तो अलकायदा देता रहा लेकिन आज तक वह ऐसा कर नहीं पाया। अमेरिका का खौफ तो इतना है कि वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद ओसामा बिन लादेन ऐसा गायब हुआ कि ढूंढने पर भी नहीं मिल रहा है और बीच बीच में उसकी मृत्यु की खबर अवश्य आती है।
आज की तारीख में आतंकवाद को कड़ा जवाब देना विश्व बिरादरी का पहला कर्तव्य है। क्योंकि हर कोई शांति और अहिंसा चाहता है। कौन अपने शांतिप्रिय नागरिकों की जान को आतंकवादियों के खौफ के साये में में देखना चाहता है। फिर जहां तक भारत का प्रश्र है तो उसने आतंकवाद का सबसे ज्यादा स्वाद चखा है। 1 लाख से अधिक भारतीय आतंकवाद के शिकार हो चुके हैं लेकिन अहिंसा और शांति के देश भारत ने आतंकवादियों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है, ऐसा तो किसी भी कोण से परिलक्षित नहीं होता। कल की तुलना में भारत आज आतंकवादियों का मुकाबला करने में अधिक सक्षम हुआ है। मुंबई हमले के बाद तो कहा जा रहा है कि यदि फिर से भारत पर आतंकवादी हमला हुआ तो भारत अपने आपको युद्ध करने से रोक नहीं पाएगा। स्थिति तो ऐसी निर्मित होती है लेकिन युद्धों का भारत के पास लंबा इतिहास है। वह जानता है कि युद्ध अधैर्य का परिणाम नहीं होना चाहिए लेकिन जब युद्ध जरुरी हो जाए तब भारत ने उसका कड़ा जवाब भी दिया है।
दुनिया के देश और आतंकवादी यह समझ ही नहीं पाते कि भारतीय आखिर किस मिट्टी के बने हैं? मुंबई पर हमला होता है और दूसरे ही दिन से मुंबई अपनी पुरानी रफ्तार में भागता दिखायी देता है। न तो कोई आतंकवाद के डर से घर से निकलना छोड़ता है और न ही इस बात की परवाह करता है कि उसे आतंकवादियों का कोई खौफ है। पुणे में जर्मन बेकरी पर हुए विस्फोट से भी देश के मिजाज पर कोई फर्क नहीं आया बल्कि एक बात समझ में आयी कि भारत की सुरक्षा व्यवस्था इतनी तो है कि आतंकवादी तक डरे हुए हैं। वे पूरी तरह से कायराना हमला करते हैं और तब भी जांच एजेंसियों की नजरों से बच नहीं पाते। केंद्रीय गृहमंत्री पी.चिदम्बरम ने वर्ष भर में ही खुफिया एजेंसियों के मृत शरीर में प्राण संचार कर दिया है और प्रशिक्षण की रफ्तार भी तेज है। वे देश में होने वाले विश्व खेलों को आतंकवादियों के कृत्यों से बचा ले जाएं तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। पहले घटनाएं होती थी तो दो चार दिन हल्ला गुल्ला होने के बाद सब शांत हो जाता था लेकिन अब वह स्थिति नहीं है। हर घटना की न केवल सुक्ष्मता से जांच की जाती है बल्कि आतंकवादियों को पकडऩे में भी सफलता मिलती है।
जहां भी सुरक्षा बलों की, खुफिया एजेंसियों की कमजोरी समझ में आती है, उसे दूर करने का पूरा प्रयास किया जाता है। इसी कारण से नक्सलियों पर भी लगाम लग रही है। न केवल नक्सली पकड़े जा रहे हैं बल्कि मुठभेड़ों में मारे भी जा रहे है। यह भ्रम भी टूट गया है कि नक्सली कोई राजनैतिक समस्या है। पश्चिम बंगाल में जो 20 पुलिस के सिपाही नक्सली हमले में मारे गए तो उसका कारण नक्सलियों की वीरता नहीं थी बल्कि सुरक्षा कर्मियों की लापरवाही थी। यह बात नक्सलियों को भी समझ में आ रही है कि सरकार निरंतर इसी तरह से सख्ती से शिकंजा कसती रही तो वह दिन दूर नहीं जब नक्सली समस्या से ग्रस्त क्षेत्र मुख्य धारा में आ जाएंगे। उच्चतम न्यायालय ने भी माना है कि नक्सलवाद नाम की कोई राजनैतिक बात नहीं है। विकास का न होना असल में नक्सलियों के पनपने का कारण है। यह बात भी सामने आ चुकी है कि नक्सली विकास विरोधी हैं वे सड़कें तोड़ते है, स्कूल और पंचायत भवनों को बमों से उड़ा देते हैं। सरकार विकास के काम करती है तो होने नहीं देते लेकिन अब नक्सल समस्या से ग्रस्त इलाकों को मुक्त ही नहीं कराया जा रहा है बल्कि विकास के काम भी प्राथमिकता के आधार पर कराए जा रहे हैं।
जहां तक विदेशों से आयातित आतंकवाद की बात है तो चंद लोग उसके बहकावे में भले ही आ जाएं लेकिन बहुसंख्यक भारतीय आतंकवाद के विरुद्ध अपना गुस्सा बार-बार प्रगट कर चुका है। आतंकवाद के आरोप में पकड़े गए एक युवक की मां जब यह कहती है कि यदि उसके बेटे ने गलत काम किया है तो उसे सजा होनी चाहिए तो इसी से समझ में आता है कि यह मदर इंडिया का देश है। देश के नागरिकों के सपड़ में आतंकवादी आए तो उनकी खैर नहीं है। क्योंकि यह तो तय है कि आतंकवाद को प्रश्रय देने के लिए देश में कोई तैयार नहीं है। भारतीयों को पूरी उम्मीद है कि खेल भारत में होंगे और शांतिपूर्वक होंगे। कोई आतंकवादी खेल में विघ्र नहीं डाल सकेगा ।
विष्णु सिन्हा
दिनांक 17.02.2010
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यह तो भारत के लिए ही नहीं विश्व समुदाय के सोच का विषय है कि वह इन आतंकवादी धमकियों से प्रभावित होता है या उनका मुंहतोड़ जवाब देता है। स्वाभाविक है कि भारत पर इस धमकी के बाद सुरक्षा की अहम जिम्मेदारी है। इन खेलों को आतंकवाद से बचा कर सफलतापूर्वक संपन्न कराने की भी जिम्मेदारी भारत पर है। भारत तो अपनी तरफ से हर संभव प्रयास करेगा कि खेल में किसी भी तरह का विघ्न न पड़े लेकिन विश्व समुदाय की भी अपनी जिम्मेदारी है। जो देश आतंकवादी धमकी से घबराएगा, वह सहज ही आतंकवादियों की दृष्टि में सरल निशाना होगा। यही समय है, अलकायदा को जवाब दिया जाए कि उसकी धमकी से दुनिया का कोई देश नहीं घबराता। राष्ट्रों की सत्ता इतनी कमजोर नहीं है कि वह चंद आतंकवादियों की धमकी के सामने घुटने टेक दे।
शांतिप्रिय देशों का हिंसा पर कोई विश्वास नहीं होता लेकिन यदि उन्हें कमजोर समझ कर कोई हिंसा के बल पर आतंक फैलाना चाहे और अपने मनमाफिक चलने के लिए बाध्य करने की कोशिश करे तो उसका मुहतोड़ जवाब देना राष्ट्रों का कर्तव्य है। अमेरिका का ही उदाहरण पर्याप्त है। जब उस पर आतंकवादी हमला हआ तब उसने उसका मुहतोड़ जवाब देने के लिए अलकायदा के विरुद्ध अफगानिस्तान में जाकर सैन्य कार्यवाही करने से भी परहेज नहीं किया। सुरक्षा का ऐसा कवच अपने देश में बनाया कि दूसरी आतंकवादी घटना करने की धमकी तो अलकायदा देता रहा लेकिन आज तक वह ऐसा कर नहीं पाया। अमेरिका का खौफ तो इतना है कि वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद ओसामा बिन लादेन ऐसा गायब हुआ कि ढूंढने पर भी नहीं मिल रहा है और बीच बीच में उसकी मृत्यु की खबर अवश्य आती है।
आज की तारीख में आतंकवाद को कड़ा जवाब देना विश्व बिरादरी का पहला कर्तव्य है। क्योंकि हर कोई शांति और अहिंसा चाहता है। कौन अपने शांतिप्रिय नागरिकों की जान को आतंकवादियों के खौफ के साये में में देखना चाहता है। फिर जहां तक भारत का प्रश्र है तो उसने आतंकवाद का सबसे ज्यादा स्वाद चखा है। 1 लाख से अधिक भारतीय आतंकवाद के शिकार हो चुके हैं लेकिन अहिंसा और शांति के देश भारत ने आतंकवादियों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है, ऐसा तो किसी भी कोण से परिलक्षित नहीं होता। कल की तुलना में भारत आज आतंकवादियों का मुकाबला करने में अधिक सक्षम हुआ है। मुंबई हमले के बाद तो कहा जा रहा है कि यदि फिर से भारत पर आतंकवादी हमला हुआ तो भारत अपने आपको युद्ध करने से रोक नहीं पाएगा। स्थिति तो ऐसी निर्मित होती है लेकिन युद्धों का भारत के पास लंबा इतिहास है। वह जानता है कि युद्ध अधैर्य का परिणाम नहीं होना चाहिए लेकिन जब युद्ध जरुरी हो जाए तब भारत ने उसका कड़ा जवाब भी दिया है।
दुनिया के देश और आतंकवादी यह समझ ही नहीं पाते कि भारतीय आखिर किस मिट्टी के बने हैं? मुंबई पर हमला होता है और दूसरे ही दिन से मुंबई अपनी पुरानी रफ्तार में भागता दिखायी देता है। न तो कोई आतंकवाद के डर से घर से निकलना छोड़ता है और न ही इस बात की परवाह करता है कि उसे आतंकवादियों का कोई खौफ है। पुणे में जर्मन बेकरी पर हुए विस्फोट से भी देश के मिजाज पर कोई फर्क नहीं आया बल्कि एक बात समझ में आयी कि भारत की सुरक्षा व्यवस्था इतनी तो है कि आतंकवादी तक डरे हुए हैं। वे पूरी तरह से कायराना हमला करते हैं और तब भी जांच एजेंसियों की नजरों से बच नहीं पाते। केंद्रीय गृहमंत्री पी.चिदम्बरम ने वर्ष भर में ही खुफिया एजेंसियों के मृत शरीर में प्राण संचार कर दिया है और प्रशिक्षण की रफ्तार भी तेज है। वे देश में होने वाले विश्व खेलों को आतंकवादियों के कृत्यों से बचा ले जाएं तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। पहले घटनाएं होती थी तो दो चार दिन हल्ला गुल्ला होने के बाद सब शांत हो जाता था लेकिन अब वह स्थिति नहीं है। हर घटना की न केवल सुक्ष्मता से जांच की जाती है बल्कि आतंकवादियों को पकडऩे में भी सफलता मिलती है।
जहां भी सुरक्षा बलों की, खुफिया एजेंसियों की कमजोरी समझ में आती है, उसे दूर करने का पूरा प्रयास किया जाता है। इसी कारण से नक्सलियों पर भी लगाम लग रही है। न केवल नक्सली पकड़े जा रहे हैं बल्कि मुठभेड़ों में मारे भी जा रहे है। यह भ्रम भी टूट गया है कि नक्सली कोई राजनैतिक समस्या है। पश्चिम बंगाल में जो 20 पुलिस के सिपाही नक्सली हमले में मारे गए तो उसका कारण नक्सलियों की वीरता नहीं थी बल्कि सुरक्षा कर्मियों की लापरवाही थी। यह बात नक्सलियों को भी समझ में आ रही है कि सरकार निरंतर इसी तरह से सख्ती से शिकंजा कसती रही तो वह दिन दूर नहीं जब नक्सली समस्या से ग्रस्त क्षेत्र मुख्य धारा में आ जाएंगे। उच्चतम न्यायालय ने भी माना है कि नक्सलवाद नाम की कोई राजनैतिक बात नहीं है। विकास का न होना असल में नक्सलियों के पनपने का कारण है। यह बात भी सामने आ चुकी है कि नक्सली विकास विरोधी हैं वे सड़कें तोड़ते है, स्कूल और पंचायत भवनों को बमों से उड़ा देते हैं। सरकार विकास के काम करती है तो होने नहीं देते लेकिन अब नक्सल समस्या से ग्रस्त इलाकों को मुक्त ही नहीं कराया जा रहा है बल्कि विकास के काम भी प्राथमिकता के आधार पर कराए जा रहे हैं।
जहां तक विदेशों से आयातित आतंकवाद की बात है तो चंद लोग उसके बहकावे में भले ही आ जाएं लेकिन बहुसंख्यक भारतीय आतंकवाद के विरुद्ध अपना गुस्सा बार-बार प्रगट कर चुका है। आतंकवाद के आरोप में पकड़े गए एक युवक की मां जब यह कहती है कि यदि उसके बेटे ने गलत काम किया है तो उसे सजा होनी चाहिए तो इसी से समझ में आता है कि यह मदर इंडिया का देश है। देश के नागरिकों के सपड़ में आतंकवादी आए तो उनकी खैर नहीं है। क्योंकि यह तो तय है कि आतंकवाद को प्रश्रय देने के लिए देश में कोई तैयार नहीं है। भारतीयों को पूरी उम्मीद है कि खेल भारत में होंगे और शांतिपूर्वक होंगे। कोई आतंकवादी खेल में विघ्र नहीं डाल सकेगा ।
विष्णु सिन्हा
दिनांक 17.02.2010
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महंगाई कम करना डॉ. रमन सिंह के हाथ में होता तो महंगाई बढ़ती ही क्यों ?
स्वाभाविक है, नौटंकी लगना। राज्य सरकार साइकिल पर सवार होकर महंगाई के प्रति विरोध प्रदर्शित करती है तो कांग्रेस के पास इसके सिवाय कहने को और क्या है कि यह नौटंकी है। केंद्र सरकार मंत्रिमंडल की बैठक कर महंगाई पर चिंता प्रगट करती है और महंगाई कम करने के लिए कड़े कदम उठाने की बात करती है तो कृषि मंत्री शरद पवार महंगाई कम होने के लिए अगली फसल का इंतजार करने को कहते हैं। शक्कर की बढ़ती कीमत के लिए उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को दोषी बताते हैं। केद्र सरकार पूरी बेशर्मी से राज्य सरकारों को महंगाई के लिए दोषी बताती है। इसका तो अर्थ होता है कि राज्यों में स्थित विभिन्न पार्टियों की सरकारों में महंगाई बढ़ाने को लेकर एकता है। क्या यह संभव है? साफ पता चलता है कि केंद्र सरकार के बस में नहीं है महंगाई कम करना तो स्वयं को दोषी भी तो वह नहीं मान सकती। इसलिए राज्य सरकारें दोषी हैं। राज्य सरकारें व्यापारियों पर डंडा चलाएं। उन्हें परेशान करें और अलोकप्रिय बनें।
डा. रमन सिंह सरकार के मंत्री साइकिल पर सवार होकर विधानसभा जाते हैं तो वे जनता को संदेश देते हैं कि महंगाई के लिए वे नहीं, केंद्र सरकार दोषी है।केंद्र सरकार 17 रू. किलो में शक्कर विदेशों में बेचती है और फिर 34 रूपये किलो में शक्कर विदेशों से खरीदती है तो दोषी कौन है? अपनी शक्कर सस्ते में विदेशियों के लिए और विदेश की महंगी शक्कर अपने देशवासियों के लिए तो महंगाई कम होगी या बढ़ेगी ? छत्तीसगढ़ के बीपीएल परिवारों के लिए ही जब केंद्र सरकार शक्कर पूरा नहीं देती तो उसे गरीबों की कितनी चिंता है, यह आसानी से समझ में आ जाता है। बाकी निम्र मध्यम श्रेणी के लोगों के लिए तो सोचने विचारने की जरूरत ही केंद्र सरकार नहीं समझती।
मनमोहन सिंह जैसे पूर्व नौकरशाह को प्रधानमंत्री बनाकर कांग्रेस ने तो पहले ही कांग्रेसियों को बता दिया है कि कोई भी पूरी तरह से राजनीतिज्ञ कांग्रेसी इस योग्य उसकी दृष्टि में नहीं है कि जिसे वह प्रधानमंत्री बना सके। सेवानिवृत्त होने के बाद करीब 5 दर्जन नौकरशाह मनमोहन सिंह की सरकार का कामकाज देख रहे हैं। इसका अर्थ भी स्पष्टï है कि पूर्व नौकरशाह प्रधानमंत्री के लिए नौकरशाहों से काम लेना ही सरल है। छत्तीसगढ़ राज्य बना तब भी एक पूर्व नौकरशाह अजीत जोगी को ही छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के लिए सोनिया गांधी ने चुना था। परिणाम क्या हुआ? कभी कांग्रेस का गढ़ रहा छत्तीसगढ़ कांग्रेस के हाथ से निकल गया। विद्याचरण शुक्ल, श्यामाचरण शुक्ल जैसे दिग्गज राजनीतिज्ञों के रहते नौकरशाह को तरजीह देकर कांग्रेस ने आम लोगों से अपने को काट लिया।
महंगाई के लिए जब कांग्रेस ने शरद पवार को टारगेट बनाया तब शरद पवार ने पूरी सरकार को इसके लिए जवाबदार बताया। क्योंकि निर्णय किसी का व्यक्तिगत न होकर सामूहिक रूप से मंत्रिमंडल का है। शरद पवार की एक ही घुड़की से कांग्रेस ने फिर दोबारा महंगाई के लिए शरद पवार को दोषी ठहराना बंद कर दिया । जिस सरकार का मुखिया पूर्व नौकरशाह हो और वह एक पूर्व दिग्गज राजनीतिज्ञ अर्जुनसिंह को मंत्रिमंडल में लेने से इसलिए इंकार कर दे, क्योंकि अर्जुनसिंह ने कभी राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनने के लिए योग्य बताया था और इसमें आलाकमान हस्तक्षेप न कर सके तो इसी से समझ में आता है कि सरकार कौन और किस तरह से चला रहा है। नौकरशाहों पर पूरी तरह से आश्रित सरकार के निर्णयों पर नौकरशाहों का ही नियंत्रण है। यहां तक कि राज्यों में राज्यपाल के रूप में भी अधिकांश नियुक्ति नौकरशाहों की ही की गई है। कल तक जो राजनीतिज्ञों को सर कहा करते थे, अब राजनीतिज्ञ उन्हें सर कहकर संबोधित कर रहे हैं। संवैधानिक प्रक्रिया ऐसी है कि दोषारोपण भी जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों पर होता है जो सरकार में है। नौकरशाहों को दोषी तो बताया नहीं जाता.
मधु कौड़ा 4 हजार करोड़ का भ्रष्टाचार करते हैं तो नौकरशाह भी इस जमात में शामिल हैं। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में ही अरबपति नौकरशाह पकड़ में आए हैं। कांग्रेसी कह रहे हैं कि यह राज्य सरकार का सबूत है कि कितना भ्रष्टïचार है। मधु कौड़ा की सरकार को तो कांग्रेस का समर्थन था। उस विषय में कांग्रेसी क्या कहेंगे ? दरअसल भ्रष्ट राजनीतिज्ञ और भ्रष्ट नौकरशाह के आपसी सामंजस्य के बिना भ्रष्टचार हो ही नहीं सकता। भ्रष्टाचार की बहती गंगा में थोड़ा बहुत प्रसाद तो संबंधित सभी लोगों को मिल जाता है। जो गरीबी रेखा से नीचे जीने वालों का राशन चुराने में भी पीछे नहीं रहते, उनके विषय में तो सिर्फ यही कहा जा सकता है कि धन के सामने नैतिकता अब छोटी बात हो गयी है। जब भ्रष्टïचार की गटर गंगा में सभी डुबकी लगाने के लिए तैयार हैं तो फिर महंगाई बढऩे ही वाली है। नहीं तो एक संवेदनशील मानवीय सरकार खाद्यान्न पर वायदा कारोबार की इजाजत दे कैसे सकती है? पेट की भूख को सट्टे के हवाले कैसे कर सकती है?
कांग्रेस के प्रवक्ता जब कहते हैं कि सूखा और बाढ़ के लिए सरकार दोषी नहीं तो वे अर्धसत्य ही कहते हैं। क्योंकि सामान्य स्थिति में सरकार की कोई भूमिका न हो यह तो समझ में भी आता है लेकिन विपरीत परिस्थितियों में सरकार जनता के लिए प्रबंध करे, यही तो सरकार की उपयोगिता है। जब सब कुछ बाजार के हवाले होगा और सट्टा कानूनी होगा तो फिर जनता जो भोग रही है, उसके बाद जनता के लिए सरकार का औचित्य ही क्या रह जाता है? एक संवेदनशील, मानवीय सरकार का तो यह पहला कर्तव्य है कि वह अपने नागरिकों को बताए कि महंगाई का कारण कौन है? सामान्य रूप से जनता तक संदेश पहुंचे न पहुंचे लेकिन जब सरकार विधानसभा साइकिल पर बैठकर जाती है और अपना पसीना बहाती है तो जनता को अच्छी तरह से समझ में आता है कि आज जो महंगाई की मार उस पर पड़ रही है, उसके लिए उसकी चुनी हुई राज्य सरकार दोषी नहीं है।
पिछले दिनों ताजमहल के शहर आगरा जाने का अवसर मिला। 4-5 घंटे बिजली का गायब रहना आगरा शहर में आम बात है। जगह जगह लोगों ने जनरेटर लगा रखे हैं। इनवर्टर तो आम बात है लेकिन आगरा जैसी स्थिति तो फिरोजाबाद में नही है। वहां दिन दिन भर बिजली गुल रहती है। कभी कभी तो गर्मी में दिन रात गोल रहती है। उस दृष्टि से तो छत्तीसगढ़ में बिजली एक वरदान की तरह है। जब छत्तीसगढ़ राज्य बना था तब से बिजली की खपत छत्तीसगढ़ में दोगुनी हो चुकी है लेकिन फिर भी डा. रमन सिंह के प्रयासों से छत्तीसगढ़ के लोगों को भरपूर बिजली मिल रही है। यह उस स्थिति में है जब केद्र सरकार ने बिजली के कोटे में कटौती कर रखी है। खाद्यान्न के कोटे में कटौती की गई। फिर भी सरकार गरीबों को और करीब करीब आधे छत्तीसगढ़ को 2 रू. और 1 रू. किलो में चांवल दे रही है। कितने ही राज्यों की तुलना में छत्तीसगढ़ की स्थिति अच्छी है। महंगाई कम करना भी सरकार के बस में होता तो डा. रमन सिंह पीछे रहने वाले नहीं थे। साइकिल पर सवार होकर जनता को असलियत का परिचय देना तो उनका कर्तव्य है और इसे कोई नौटंकी कहे तो कहता रहे। जनता सब कुछ अच्छी तरह से समझती है
- विष्णु सिन्हा
16-2-2010
डा. रमन सिंह सरकार के मंत्री साइकिल पर सवार होकर विधानसभा जाते हैं तो वे जनता को संदेश देते हैं कि महंगाई के लिए वे नहीं, केंद्र सरकार दोषी है।केंद्र सरकार 17 रू. किलो में शक्कर विदेशों में बेचती है और फिर 34 रूपये किलो में शक्कर विदेशों से खरीदती है तो दोषी कौन है? अपनी शक्कर सस्ते में विदेशियों के लिए और विदेश की महंगी शक्कर अपने देशवासियों के लिए तो महंगाई कम होगी या बढ़ेगी ? छत्तीसगढ़ के बीपीएल परिवारों के लिए ही जब केंद्र सरकार शक्कर पूरा नहीं देती तो उसे गरीबों की कितनी चिंता है, यह आसानी से समझ में आ जाता है। बाकी निम्र मध्यम श्रेणी के लोगों के लिए तो सोचने विचारने की जरूरत ही केंद्र सरकार नहीं समझती।
मनमोहन सिंह जैसे पूर्व नौकरशाह को प्रधानमंत्री बनाकर कांग्रेस ने तो पहले ही कांग्रेसियों को बता दिया है कि कोई भी पूरी तरह से राजनीतिज्ञ कांग्रेसी इस योग्य उसकी दृष्टि में नहीं है कि जिसे वह प्रधानमंत्री बना सके। सेवानिवृत्त होने के बाद करीब 5 दर्जन नौकरशाह मनमोहन सिंह की सरकार का कामकाज देख रहे हैं। इसका अर्थ भी स्पष्टï है कि पूर्व नौकरशाह प्रधानमंत्री के लिए नौकरशाहों से काम लेना ही सरल है। छत्तीसगढ़ राज्य बना तब भी एक पूर्व नौकरशाह अजीत जोगी को ही छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के लिए सोनिया गांधी ने चुना था। परिणाम क्या हुआ? कभी कांग्रेस का गढ़ रहा छत्तीसगढ़ कांग्रेस के हाथ से निकल गया। विद्याचरण शुक्ल, श्यामाचरण शुक्ल जैसे दिग्गज राजनीतिज्ञों के रहते नौकरशाह को तरजीह देकर कांग्रेस ने आम लोगों से अपने को काट लिया।
महंगाई के लिए जब कांग्रेस ने शरद पवार को टारगेट बनाया तब शरद पवार ने पूरी सरकार को इसके लिए जवाबदार बताया। क्योंकि निर्णय किसी का व्यक्तिगत न होकर सामूहिक रूप से मंत्रिमंडल का है। शरद पवार की एक ही घुड़की से कांग्रेस ने फिर दोबारा महंगाई के लिए शरद पवार को दोषी ठहराना बंद कर दिया । जिस सरकार का मुखिया पूर्व नौकरशाह हो और वह एक पूर्व दिग्गज राजनीतिज्ञ अर्जुनसिंह को मंत्रिमंडल में लेने से इसलिए इंकार कर दे, क्योंकि अर्जुनसिंह ने कभी राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनने के लिए योग्य बताया था और इसमें आलाकमान हस्तक्षेप न कर सके तो इसी से समझ में आता है कि सरकार कौन और किस तरह से चला रहा है। नौकरशाहों पर पूरी तरह से आश्रित सरकार के निर्णयों पर नौकरशाहों का ही नियंत्रण है। यहां तक कि राज्यों में राज्यपाल के रूप में भी अधिकांश नियुक्ति नौकरशाहों की ही की गई है। कल तक जो राजनीतिज्ञों को सर कहा करते थे, अब राजनीतिज्ञ उन्हें सर कहकर संबोधित कर रहे हैं। संवैधानिक प्रक्रिया ऐसी है कि दोषारोपण भी जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों पर होता है जो सरकार में है। नौकरशाहों को दोषी तो बताया नहीं जाता.
मधु कौड़ा 4 हजार करोड़ का भ्रष्टाचार करते हैं तो नौकरशाह भी इस जमात में शामिल हैं। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में ही अरबपति नौकरशाह पकड़ में आए हैं। कांग्रेसी कह रहे हैं कि यह राज्य सरकार का सबूत है कि कितना भ्रष्टïचार है। मधु कौड़ा की सरकार को तो कांग्रेस का समर्थन था। उस विषय में कांग्रेसी क्या कहेंगे ? दरअसल भ्रष्ट राजनीतिज्ञ और भ्रष्ट नौकरशाह के आपसी सामंजस्य के बिना भ्रष्टचार हो ही नहीं सकता। भ्रष्टाचार की बहती गंगा में थोड़ा बहुत प्रसाद तो संबंधित सभी लोगों को मिल जाता है। जो गरीबी रेखा से नीचे जीने वालों का राशन चुराने में भी पीछे नहीं रहते, उनके विषय में तो सिर्फ यही कहा जा सकता है कि धन के सामने नैतिकता अब छोटी बात हो गयी है। जब भ्रष्टïचार की गटर गंगा में सभी डुबकी लगाने के लिए तैयार हैं तो फिर महंगाई बढऩे ही वाली है। नहीं तो एक संवेदनशील मानवीय सरकार खाद्यान्न पर वायदा कारोबार की इजाजत दे कैसे सकती है? पेट की भूख को सट्टे के हवाले कैसे कर सकती है?
कांग्रेस के प्रवक्ता जब कहते हैं कि सूखा और बाढ़ के लिए सरकार दोषी नहीं तो वे अर्धसत्य ही कहते हैं। क्योंकि सामान्य स्थिति में सरकार की कोई भूमिका न हो यह तो समझ में भी आता है लेकिन विपरीत परिस्थितियों में सरकार जनता के लिए प्रबंध करे, यही तो सरकार की उपयोगिता है। जब सब कुछ बाजार के हवाले होगा और सट्टा कानूनी होगा तो फिर जनता जो भोग रही है, उसके बाद जनता के लिए सरकार का औचित्य ही क्या रह जाता है? एक संवेदनशील, मानवीय सरकार का तो यह पहला कर्तव्य है कि वह अपने नागरिकों को बताए कि महंगाई का कारण कौन है? सामान्य रूप से जनता तक संदेश पहुंचे न पहुंचे लेकिन जब सरकार विधानसभा साइकिल पर बैठकर जाती है और अपना पसीना बहाती है तो जनता को अच्छी तरह से समझ में आता है कि आज जो महंगाई की मार उस पर पड़ रही है, उसके लिए उसकी चुनी हुई राज्य सरकार दोषी नहीं है।
पिछले दिनों ताजमहल के शहर आगरा जाने का अवसर मिला। 4-5 घंटे बिजली का गायब रहना आगरा शहर में आम बात है। जगह जगह लोगों ने जनरेटर लगा रखे हैं। इनवर्टर तो आम बात है लेकिन आगरा जैसी स्थिति तो फिरोजाबाद में नही है। वहां दिन दिन भर बिजली गुल रहती है। कभी कभी तो गर्मी में दिन रात गोल रहती है। उस दृष्टि से तो छत्तीसगढ़ में बिजली एक वरदान की तरह है। जब छत्तीसगढ़ राज्य बना था तब से बिजली की खपत छत्तीसगढ़ में दोगुनी हो चुकी है लेकिन फिर भी डा. रमन सिंह के प्रयासों से छत्तीसगढ़ के लोगों को भरपूर बिजली मिल रही है। यह उस स्थिति में है जब केद्र सरकार ने बिजली के कोटे में कटौती कर रखी है। खाद्यान्न के कोटे में कटौती की गई। फिर भी सरकार गरीबों को और करीब करीब आधे छत्तीसगढ़ को 2 रू. और 1 रू. किलो में चांवल दे रही है। कितने ही राज्यों की तुलना में छत्तीसगढ़ की स्थिति अच्छी है। महंगाई कम करना भी सरकार के बस में होता तो डा. रमन सिंह पीछे रहने वाले नहीं थे। साइकिल पर सवार होकर जनता को असलियत का परिचय देना तो उनका कर्तव्य है और इसे कोई नौटंकी कहे तो कहता रहे। जनता सब कुछ अच्छी तरह से समझती है
- विष्णु सिन्हा
16-2-2010
गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010
भाजपा का बंद ही साबित करता है कि महगाई से जनता कितनी परेशान है
महंगाई के विरोध में भारतीय जनता पार्टी का छत्तीसगढ़ बंद पूरी तरह से सफल रहा। कांग्रेस कितना भी प्रचार करे कि महंगाई का कारण राज्य सरकार है लेकिन आम जनता के गले से यह बात नीचे नहीं उतरती। क्योंकि राज्य सरकार के कारण सिर्फ महंगाई होती तो फिर राज्य विशेष में ही होती। अखिल भारतीय स्तर पर उसका प्रभाव नहीं होता। रसोई गैस की कीमत ही अब 100 रुपए अधिक मांगे जा रहे हैं। इसका कारण भी राज्य सरकार है, क्या? केंद्र की कांग्रेस सरकार कुछ करती है तो कुछ दिनों के लिए दालों की कीमत थोक बाजार में कम हो जाती है लेकिन चिल्हर बाजार पर उसका जो असर पडऩा चाहिए वह नहीं पड़ता। दो चार दिन के बाद कीमतें फिर बढऩे लगती हैं। सरकार में बैठे लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि वास्तव में आम जनता का महंगाई ने किस प्रकार जीना मुश्किल कर रखा है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ में शासन करने वाली भाजपा जब महंगाई के नाम पर राज्य बंद का आव्हान करती है, तब स्वस्फूर्त बंद हो जाता है।
बंद को मिलने वाली सफलता से स्थानीय कांग्रेसियों को स्वाभाविक रुप से कष्ट होता है। वे टोकन रुप से राज्य सरकार और महंगाई का पुतला जला कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहते हैं कि वे भी महंगाई के विरुद्ध हैं और महंगाई उनकी केंद्र सरकार के कारण नहीं बल्कि राज्य सरकार के कारण है। यह बात जनता को हजम नहीं होती। प्रधानमंत्री द्वारा आयोजित मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में जब छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह कहते हैं कि वायदा कारोबार खाद्यान्न का बंद किया जाए, तब केंद्र सरकार इस पर ध्यान देने को तैयार नहीं। खाद्यान्न पर जब तक खुले आम सट्ट होगा तब तक बाजार में भाव सटोरियों के अनुसार चलेंगे। जिनका न तो फसल पैदा करने में कोई हाथ है और खरीदी बिक्री में। वे ही जब भाव के उतार चढ़ाव में करोड़ों नहीं अरबों का खेल खेलते हैं तब भाव उनके नियंत्रण में चले जाते हैं। सट्टï शब्द ही समाज की दृष्टि में अच्छा नहीं है। एक संवेदनशील सरकार किस तरह से खाद्यान्न पर सट्टï करने का कानूनी अधिकार देती हैं? पेट के आग से बड़ी आग तो कोई नहीं होती। गरीबों को सस्ते दर पर खाद्यान्न देने का कार्यक्रम यदि सरकार बंद कर दे तब क्या हो सकता है, कुछ कहा नहीं जा सकता
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने प्रधानमंत्री से यह भी कहा कि थोक और चिल्हर में लाभ का प्रतिशत तय कर दिया जाए तो मूल्य पर नियंत्रण किया जा सकता है। या तो केंद्र सरकार इसके लिए कानून बनाए या राज्य सरकार को इसका अधिकार दे। जिससे भाव तो बाजार में इस तरह से छलांग न लगाएं लेकिन केंद्र सरकार इसके लिए भी तैयार नहीं है। विकासशील देश को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए कृतसंकल्पित मनमोहन सिंह बहुत बड़े अर्थशास्त्री हैं लेकिन पेट की भूख किसी शास्त्र के अनुसार नहीं चलती। 115 करोड़ जनसंख्या का देश मांग और पूर्ति के अनुसार कीमत बाजार में निर्धारित कर लोगों को राहत नहीं दे सकता। राज्य की डॉ. रमन सिंह सरकार तो इतनी संवेदनशील है कि उसने महंगाई की मार का पहले ही आकलन कर लिया था। इसीलिए अपनी आधी जनसंख्या की वह 2 रु. किलो एवं 1 रुपए किलो में चांवल दे रही है। इसके लिए बजट का बड़ा हिस्सा जो विकास कार्य में लगना चाहिए, उसे इस काम में लगाया जा रहा है। डॉ. रमन सिंह कहते हैं कि उनके राज्य में कोई भूखा रहे, यह उन्हें बर्दाश्त नहीं।
डॉ. सिंह ने तो दाल भी केंद्र से मांगा हैं। जिससे गरीब आदमी भात के साथ दाल तो खा सके। कभी कहा जाता था कि दाल रोटी खाओ प्रभु के गुन गाओ। आज स्थिति ऐसी है कि रोटी या भात के साथ दाल नसीब में नहीं है, गरीब आदमी के। सबसे महंगा खाद्यान्न दाल ही हो गया है। जहां तक शक्कर का प्रश्र है तो वह अब हर किसी के बस की बात नहीं रही। जो खाते हैं उनका जायका भी मीठा नहीं। बाकी जिन्हें नहीं मिलता, उनके विषय में सोचने की फुरसत किसे है। ऊपर से शरद पवार केंद्रीय कृषि मंत्री का समाचार पत्र तो शक्कर न खाने के लाभ बता रहा है। कोई जल कुकड़ा मधुमेह रोगी शक्कर महंगी होने से भले ही खुश हो, क्योंकि उस पर तो शक्कर खाने क्या चखने का भी प्रतिबंध है लेकिन आम आदमी की जिंदगी में खुशी के पल दो पल शक्कर की मिठास ही ले आती है। जो अब प्राप्त करना कठिन हो गया है।
निम्र मध्यम श्रेणी वर्ग का व्यक्ति अपने परिवार का पालन पोषण किस तरह से करता है, यह बड़े-बड़े पदों पर बैठ विरले ही समझ सकते हैं। विकास के नाम पर भोजन इतना महंगा हो जाएगा, यह तो सोच के भी बाहर की बात है। कहते हैं मंदी से भारत उबर गया। भारतीय कृषि ने भारत को मंदी से उबारने में सबसे बड़ी भूमिका निभायी। देश में भोजन के लिए खाद्यान्न की पर्याप्त व्यवस्था होने के कारण देश को आयात का कम सहारा लेना पड़ा। हालांकि इसके बावजूद भारत ने खाद्यान्न का निर्यात भी किया। जब निर्यात पर कुछ जिन्सों में पाबंदी लगायी गई तब भी व्यापारियों ने बड़ा हल्ला मचाया कि निर्यात की इजाजत दी जाए। क्योंकि विश्व बाजार में अच्छी मांग है और अच्छे भाव पर बिकवाली हो सकती है। सरकार की दूरदर्शिता कहे या बेवकूफी कि उसने शक्कर सस्ते में विदेशों को बेची और फिर महंगी कीमत पर देश की आवश्यकता पूर्ति के लिए खरीदी।
भारत जैसे प्रजातांत्रिक मुल्क में 115 करोड़ देशवासियों को बाजार के हवाले करना सरकार की कितनी बड़ी दूरदर्शिता है, यह अब दिखायी देने लगा है। कृषि पर आधारित जीवन यापन करने वालों की संख्या ही इस समय 60 प्रतिशत से अधिक है। क्या बाजार में बढ़े मूल्यों का लाभ कृषकों को मिल रहा है तो कितना मिल रहा है? कोई भी किसान हर तरह की फसल तो नहीं उगाता। इसलिए बाकी के लिए उसे बाजार का शिकार होना ही पड़ता है। चावल, गेहूं तो सरकार समर्थन मूल्य पर खरीदती है। गन्ने का भी समर्थन मूल्य बढ़ाने के लिए पिछले दिनों किसानों ने दिल्ली में प्रदर्शन किया था लेकिन उत्पादक किसान भी तो बाजार से ही शक्कर खरीद कर उपयोग में लाता है।
60 प्रतिशत किसानों के बाद देश की जो 40 प्रतिशत आबादी है, वह निश्चित आय में ही गुजारा करती है। बहुतों को तो उसकी निश्चितता भी उपलब्ध नहीं है। बाजार में बढ़ती कीमत ने उसका बजट पूरी तरह से बिगाड़ दिया है। शासकीय कर्मचारियों का वेतन सरकार ने बढ़ा दिया लेकिन सबके वेतन तो उस अनुपात में नहीं बढ़े बल्कि कइयों को इस दौर में अपनी नौकरी गंवानी पड़ी। कोई शिकायत करे भी तो किससे? फिर शिकायत करने से महंगाई कम हो जाती तो जनता शिकायत भी कर लेती। इसीलिए जब भाजपा ने महंगाई के विरुद्ध बंद का आव्हान किया तो बंद को व्यापक सफलता मिली। यह सही है कि इससे रोज कमाने खाने वालों को तकलीफ हुई लेकिन रोज की तकलीफ की तुलना में एक दिन की तकलीफ तो कोई मायने नहीं रखती। शरद पवार कहते हैं कि फसल अच्छी आएगी तो महंगाई कम हो जाएगी। मतलब साफ है कि भोगो महंगाई को और परमात्मा से ही प्रार्थना करो कि वह अच्छी फसल का अवसर दे। जिससे महंगाई से निजात मिले।
- विष्णु सिन्हा
दिनांक 14.02.2010
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बंद को मिलने वाली सफलता से स्थानीय कांग्रेसियों को स्वाभाविक रुप से कष्ट होता है। वे टोकन रुप से राज्य सरकार और महंगाई का पुतला जला कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहते हैं कि वे भी महंगाई के विरुद्ध हैं और महंगाई उनकी केंद्र सरकार के कारण नहीं बल्कि राज्य सरकार के कारण है। यह बात जनता को हजम नहीं होती। प्रधानमंत्री द्वारा आयोजित मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में जब छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह कहते हैं कि वायदा कारोबार खाद्यान्न का बंद किया जाए, तब केंद्र सरकार इस पर ध्यान देने को तैयार नहीं। खाद्यान्न पर जब तक खुले आम सट्ट होगा तब तक बाजार में भाव सटोरियों के अनुसार चलेंगे। जिनका न तो फसल पैदा करने में कोई हाथ है और खरीदी बिक्री में। वे ही जब भाव के उतार चढ़ाव में करोड़ों नहीं अरबों का खेल खेलते हैं तब भाव उनके नियंत्रण में चले जाते हैं। सट्टï शब्द ही समाज की दृष्टि में अच्छा नहीं है। एक संवेदनशील सरकार किस तरह से खाद्यान्न पर सट्टï करने का कानूनी अधिकार देती हैं? पेट के आग से बड़ी आग तो कोई नहीं होती। गरीबों को सस्ते दर पर खाद्यान्न देने का कार्यक्रम यदि सरकार बंद कर दे तब क्या हो सकता है, कुछ कहा नहीं जा सकता
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने प्रधानमंत्री से यह भी कहा कि थोक और चिल्हर में लाभ का प्रतिशत तय कर दिया जाए तो मूल्य पर नियंत्रण किया जा सकता है। या तो केंद्र सरकार इसके लिए कानून बनाए या राज्य सरकार को इसका अधिकार दे। जिससे भाव तो बाजार में इस तरह से छलांग न लगाएं लेकिन केंद्र सरकार इसके लिए भी तैयार नहीं है। विकासशील देश को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए कृतसंकल्पित मनमोहन सिंह बहुत बड़े अर्थशास्त्री हैं लेकिन पेट की भूख किसी शास्त्र के अनुसार नहीं चलती। 115 करोड़ जनसंख्या का देश मांग और पूर्ति के अनुसार कीमत बाजार में निर्धारित कर लोगों को राहत नहीं दे सकता। राज्य की डॉ. रमन सिंह सरकार तो इतनी संवेदनशील है कि उसने महंगाई की मार का पहले ही आकलन कर लिया था। इसीलिए अपनी आधी जनसंख्या की वह 2 रु. किलो एवं 1 रुपए किलो में चांवल दे रही है। इसके लिए बजट का बड़ा हिस्सा जो विकास कार्य में लगना चाहिए, उसे इस काम में लगाया जा रहा है। डॉ. रमन सिंह कहते हैं कि उनके राज्य में कोई भूखा रहे, यह उन्हें बर्दाश्त नहीं।
डॉ. सिंह ने तो दाल भी केंद्र से मांगा हैं। जिससे गरीब आदमी भात के साथ दाल तो खा सके। कभी कहा जाता था कि दाल रोटी खाओ प्रभु के गुन गाओ। आज स्थिति ऐसी है कि रोटी या भात के साथ दाल नसीब में नहीं है, गरीब आदमी के। सबसे महंगा खाद्यान्न दाल ही हो गया है। जहां तक शक्कर का प्रश्र है तो वह अब हर किसी के बस की बात नहीं रही। जो खाते हैं उनका जायका भी मीठा नहीं। बाकी जिन्हें नहीं मिलता, उनके विषय में सोचने की फुरसत किसे है। ऊपर से शरद पवार केंद्रीय कृषि मंत्री का समाचार पत्र तो शक्कर न खाने के लाभ बता रहा है। कोई जल कुकड़ा मधुमेह रोगी शक्कर महंगी होने से भले ही खुश हो, क्योंकि उस पर तो शक्कर खाने क्या चखने का भी प्रतिबंध है लेकिन आम आदमी की जिंदगी में खुशी के पल दो पल शक्कर की मिठास ही ले आती है। जो अब प्राप्त करना कठिन हो गया है।
निम्र मध्यम श्रेणी वर्ग का व्यक्ति अपने परिवार का पालन पोषण किस तरह से करता है, यह बड़े-बड़े पदों पर बैठ विरले ही समझ सकते हैं। विकास के नाम पर भोजन इतना महंगा हो जाएगा, यह तो सोच के भी बाहर की बात है। कहते हैं मंदी से भारत उबर गया। भारतीय कृषि ने भारत को मंदी से उबारने में सबसे बड़ी भूमिका निभायी। देश में भोजन के लिए खाद्यान्न की पर्याप्त व्यवस्था होने के कारण देश को आयात का कम सहारा लेना पड़ा। हालांकि इसके बावजूद भारत ने खाद्यान्न का निर्यात भी किया। जब निर्यात पर कुछ जिन्सों में पाबंदी लगायी गई तब भी व्यापारियों ने बड़ा हल्ला मचाया कि निर्यात की इजाजत दी जाए। क्योंकि विश्व बाजार में अच्छी मांग है और अच्छे भाव पर बिकवाली हो सकती है। सरकार की दूरदर्शिता कहे या बेवकूफी कि उसने शक्कर सस्ते में विदेशों को बेची और फिर महंगी कीमत पर देश की आवश्यकता पूर्ति के लिए खरीदी।
भारत जैसे प्रजातांत्रिक मुल्क में 115 करोड़ देशवासियों को बाजार के हवाले करना सरकार की कितनी बड़ी दूरदर्शिता है, यह अब दिखायी देने लगा है। कृषि पर आधारित जीवन यापन करने वालों की संख्या ही इस समय 60 प्रतिशत से अधिक है। क्या बाजार में बढ़े मूल्यों का लाभ कृषकों को मिल रहा है तो कितना मिल रहा है? कोई भी किसान हर तरह की फसल तो नहीं उगाता। इसलिए बाकी के लिए उसे बाजार का शिकार होना ही पड़ता है। चावल, गेहूं तो सरकार समर्थन मूल्य पर खरीदती है। गन्ने का भी समर्थन मूल्य बढ़ाने के लिए पिछले दिनों किसानों ने दिल्ली में प्रदर्शन किया था लेकिन उत्पादक किसान भी तो बाजार से ही शक्कर खरीद कर उपयोग में लाता है।
60 प्रतिशत किसानों के बाद देश की जो 40 प्रतिशत आबादी है, वह निश्चित आय में ही गुजारा करती है। बहुतों को तो उसकी निश्चितता भी उपलब्ध नहीं है। बाजार में बढ़ती कीमत ने उसका बजट पूरी तरह से बिगाड़ दिया है। शासकीय कर्मचारियों का वेतन सरकार ने बढ़ा दिया लेकिन सबके वेतन तो उस अनुपात में नहीं बढ़े बल्कि कइयों को इस दौर में अपनी नौकरी गंवानी पड़ी। कोई शिकायत करे भी तो किससे? फिर शिकायत करने से महंगाई कम हो जाती तो जनता शिकायत भी कर लेती। इसीलिए जब भाजपा ने महंगाई के विरुद्ध बंद का आव्हान किया तो बंद को व्यापक सफलता मिली। यह सही है कि इससे रोज कमाने खाने वालों को तकलीफ हुई लेकिन रोज की तकलीफ की तुलना में एक दिन की तकलीफ तो कोई मायने नहीं रखती। शरद पवार कहते हैं कि फसल अच्छी आएगी तो महंगाई कम हो जाएगी। मतलब साफ है कि भोगो महंगाई को और परमात्मा से ही प्रार्थना करो कि वह अच्छी फसल का अवसर दे। जिससे महंगाई से निजात मिले।
- विष्णु सिन्हा
दिनांक 14.02.2010
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सोमवार, 15 फ़रवरी 2010
आतंकवादी हमला करते रहें और हम वार्ता, यह कितनी उचित नीति है?
केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदम्बरम का यह कहना कि खुफिया एजेंसियों की नाकामी के कारण जर्मन बेकरी में विस्फोट नहीं हुआ, से कुछ लोग भले ही असहमत हों लेकिन चिदंबरम सही कहते लगते हैं। क्योंकि जर्मन बेकरी में हुए विस्फोट से बचा जा सकता था। जर्मन बेकरी के स्टॉफ ने सतर्कता बरती होती और टेबल के नीचे रखे बैग को खोलने के बदले पुलिस को सूचना दी होती तो विस्फोट को रोका जा सकता था। दरअसल जर्मन बेकरी में बम का रखना आतंकवादियों की हताशा का प्रतीक है। अभी जो खबरें आ रही हैं, उसके अनुसार टारगेट तो ओशो आश्रम और यहुदियों का उपासना स्थल खबाद हाउस था। समय से पहले खबाद हाउस में प्रार्थना प्रारंभ हो गयी और सुरक्षा बढ़ गयी, इसलिए आतंकवादी उसे टारगेट नहीं बना सके। यही हाल ओशो आश्रम का भी हुआ। पहले खुले मैदान में कार्यक्रम होना था लेकिन भीड़ अधिक होने के कारण स्थान परिवर्तन कर दिया गया और सुरक्षा वहां भी बढ़ गयी। इसलिए आतंकवादी ओशो आश्रम को भी टारगेट नहीं बना सके। तब उन्होंने जर्मन बेकरी जैसे आसान निशाने को चुना। यहां भी वे असफल हो जाते, लेकिन बेकरी के स्टाफ की मूर्खता के कारण विस्फोट हो गया।
सुरक्षा एजेंसियों की कड़ी चौकसी के कारण ओशो आश्रम और खबाद हाउस तो बच गए लेकिन जर्मन बेकरी निशाना बन गया। कहा जा रहा है कि हेडली ने इस क्षेत्र के एक होटल में रुक कर रेकी की थी। हेडली इस समय अमेरिका की पुलिस के कब्जे में है लेकिन इसके साथ-साथ यह भी कहा जा रहा है कि पाकिस्तान के एक आतंकवादी संगठन के नेता ने पिछले दिनों पाकिस्तान में पुणे पर हमला करने की घोषणा की थी। इन तमाम बातों पर गौर करें तो यह बात स्पष्ट दिखायी देती है कि आतंकवादियों का यह हमला जिसमें 9 लोग 2 विदेशी नागरिकों सहित मारे गए और 50 लोग घायल हुए, पूरी तरह से कायराना हमला था। अभी तक किसी ने भी इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है लेकिन इंडियन मुजाहिदीन या पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन पर संदेह किया जा रहा है। नाम भले ही अलग-अलग हों लेकिन उद्देश्य तो उनका एक ही है। भारत को उकसाना कि वह पाकिस्तान से लड़े। जब भारत के हुक्मरान मुंबई हमले के बाद पाकिस्तान से लडऩे के लिए तैयार नहीं हुए, तब वे पुणे विस्फोट के बाद क्या पाकिस्तान से लड़ेंगे?
भारत के हुक्मरान तो 25 फरवरी को विदेश सचिव स्तर की पाकिस्तान से चर्चा करने के लिए तैयार हो गए हैं। दक्षेस सम्मेलन में गृहमंत्री स्तर की वार्ता भी होने की उम्मीद की जा रही है। वह सब बातें अब कोई मायने नहीं रखती जो मुंबई हमले के बाद कही गयी थी कि जब तक दोषियों के विरुद्ध पाकिस्तान कार्यवाही नहीं करता तब तक उससे कोई बातचीत नहीं की जाएगी। पाकिस्तान के हुक्मरान इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि भारत की इस तरह की बात का कोई विशेष औचित्य नहीं है। वे तो इन बातों को एक तरह की गीदड़ भभकी ही समझते हैं और मजाक उड़ाते हैं। 6 माह, साल भर व्यतीत होने दो भारत फिर बातचीत करेगा। यह पाकिस्तानी हुक्मरानों की सोच है और वे गलत भी नहीं सोचते, यह भारतीय हुक्मरान ही सिद्ध करते हैं ?
विनम्रता अच्छी बात है। गल्तियों को माफ करने की ताकत भी बड़ी बात है लेकिन यह उनके संबंध में उचित है जो गल्तियों को महसूस करते हैं लेकिन जो इस तरह की अच्छी भावनाओं को कायरता समझते हैं, उनके साथ भलमनसाहत का क्या अर्थ है? जो अपनी आदतों से बाज आने को तैयार नहीं। तीन-तीन बार युद्ध में हार जाने के बावजूद जिनकी अक्ल ठिकाने नहीं आयी, उनसे बातचीत से मामला निपटाया जा सकता है, यह सोच ही अव्यवहारिक है। एक तरफ आतंकवादियों से निपटने के नाम पर अमेरिका पाकिस्तान को अरबों रुपए की सहायता करता है और दूसरी तरफ हमें शांति का पाठ पढ़ाता है। पाकिस्तान तो खुल कर कह रहा है कि काश्मीर का मामला फिलीस्तीन की तरह का है। काश्मीर को आतंक की आग में झुलसाने का पाकिस्तान ने कम प्रयास नहीं किया और आज भी कर रहा है। घुसपैठ जारी है। युद्ध विराम के बावजूद पाकिस्तानी सीमा से भारतीय सीमा पर गोलीबारी होती ही रहती है। पाकिस्तान ने तो एक भी उदाहरण आज तक प्रस्तुत नहीं किया कि वह वास्तव में भारत के साथ मैत्री चाहता है। दुनिया को दिखाने के लिए वह इस तरह के ढोंग अवश्य करता है।
किसी भी तरह की बातचीत का तब तक क्या औचित्य है जब तक बातचीत में ईमानदारी न हो। शिमला समझौता भी तो भारत के साथ पाकिस्तान ने पूर्वी पाकिस्तान गंवाने के बाद किया था। यह भी तथ्य स्पष्ट है कि पाकिस्तानी आतंकवादी बंगला देश से भी भारत में घुसते ही नहीं है बल्कि वहां भी उन्होंने अपने ठिकाने बना रखे है। पाकिस्तान तो अमेरिका और चीन दोनों से दोस्ती का दम भरता है। वह अमेरिका और चीन दोनों से लाभ उठाता है और भारत को चुनौती देता है। यहां तक कि जब लंका की क्रिकेट टीम पर पाकिस्तान में हमला हुआ तब भी उसने तुरंत आरोप लगाया कि यह भारत ने किया है। ब्लूचिस्तान में भी वह भारत के हस्तक्षेप का राग अलापता है। अफगानिस्तान को भारत की मदद भी उसे फूटी आंख नहीं सुहाती। फिर उसकी राजनीति का मूल केंद्र भारत से दोस्ती नहीं, घृणा है। तब भारत कितनी भी दोस्ती की, शांति की बात करें, उसका परिणाम तो वह नहीं निकलता जो भारत चाहता है।
ऐसे में पाकिस्तान के साथ किसी भी स्तर की बातचीत करना सिवाय समय खराब करने के और क्या है? पाकिस्तान सरकार की नीयत और वहां से चलने वाली आतंकवादी गतिविधियों से सतर्क रहने और उसका मुंह तोड़ जवाब देने के सिवाय भारत के पास दूसरा चारा नहीं है। जो लोग समझते हैं कि वार्ता की कूटनीति से हमारी समस्याओं का हल हो जाएगा, उनके सामने उदाहरणों की कमी नहीं है कि वार्ता में हमने जीत तक को तो गंवाया है। चाहे वह ताशकंद समझौता हो या शिमला समझौता। हमें मिला क्या है? यहां तक कि पाकिस्तान के कब्जे में चला गया काश्मीर तक हम वापस प्राप्त नहीं कर सके। राजनीति का आदर्शवाद भारत के लिए चीन और पाकिस्तान के मामले में ही नहीं नेपाल तक के मामले में भी नुकसानप्रद ही साबित हुआ है। कभी इसकी भी समीक्षा करें, भारत के हुक्मरान।
चीन के मामले में पंचशील का सिद्धांत काम नहीं आया। चीनी हिन्दी भाई-भाई का अलाप लाखों वर्ग किलोमीटर जमीन गंवा बैठा और आज भी चीन की नजर हमारी भूमि पर लगी हुई है। हमारे हुक्मरान कहते हैं कि चीन हमारा दोस्त है और उससे कोई खतरा नहीं है। भारत के ही एक प्रदेश में भारत के प्रधानमंत्री के जाने पर जो चीन विरोध प्रदर्शित करता है, वह हमारा मित्र कैसे दिखायी पड़ता है? यदि दिखायी पड़ता है तो सिर्फ हमारी कमजोरी ही दिखायी पड़ती है। हम वार्ता करते रहते हैं और चीन हमारी भूमि पर कब्जा करता जाता है। चीन तो पाकिस्तान में फौजी केंद्र भी बनाने वाला है। वे हमारा मजाक उड़ाते हैं तो गलत क्या करते हैं? क्या हमारे कृत्य मजाक के योग्य नहीं है? शुतुरमुर्ग की तरह सोच होगी तो परिणाम भी शुतुरमुर्ग की तरह ही भोगना पड़ेगा।
- विष्णु सिन्हा
दिनांक 15.02.2010
सुरक्षा एजेंसियों की कड़ी चौकसी के कारण ओशो आश्रम और खबाद हाउस तो बच गए लेकिन जर्मन बेकरी निशाना बन गया। कहा जा रहा है कि हेडली ने इस क्षेत्र के एक होटल में रुक कर रेकी की थी। हेडली इस समय अमेरिका की पुलिस के कब्जे में है लेकिन इसके साथ-साथ यह भी कहा जा रहा है कि पाकिस्तान के एक आतंकवादी संगठन के नेता ने पिछले दिनों पाकिस्तान में पुणे पर हमला करने की घोषणा की थी। इन तमाम बातों पर गौर करें तो यह बात स्पष्ट दिखायी देती है कि आतंकवादियों का यह हमला जिसमें 9 लोग 2 विदेशी नागरिकों सहित मारे गए और 50 लोग घायल हुए, पूरी तरह से कायराना हमला था। अभी तक किसी ने भी इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है लेकिन इंडियन मुजाहिदीन या पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन पर संदेह किया जा रहा है। नाम भले ही अलग-अलग हों लेकिन उद्देश्य तो उनका एक ही है। भारत को उकसाना कि वह पाकिस्तान से लड़े। जब भारत के हुक्मरान मुंबई हमले के बाद पाकिस्तान से लडऩे के लिए तैयार नहीं हुए, तब वे पुणे विस्फोट के बाद क्या पाकिस्तान से लड़ेंगे?
भारत के हुक्मरान तो 25 फरवरी को विदेश सचिव स्तर की पाकिस्तान से चर्चा करने के लिए तैयार हो गए हैं। दक्षेस सम्मेलन में गृहमंत्री स्तर की वार्ता भी होने की उम्मीद की जा रही है। वह सब बातें अब कोई मायने नहीं रखती जो मुंबई हमले के बाद कही गयी थी कि जब तक दोषियों के विरुद्ध पाकिस्तान कार्यवाही नहीं करता तब तक उससे कोई बातचीत नहीं की जाएगी। पाकिस्तान के हुक्मरान इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि भारत की इस तरह की बात का कोई विशेष औचित्य नहीं है। वे तो इन बातों को एक तरह की गीदड़ भभकी ही समझते हैं और मजाक उड़ाते हैं। 6 माह, साल भर व्यतीत होने दो भारत फिर बातचीत करेगा। यह पाकिस्तानी हुक्मरानों की सोच है और वे गलत भी नहीं सोचते, यह भारतीय हुक्मरान ही सिद्ध करते हैं ?
विनम्रता अच्छी बात है। गल्तियों को माफ करने की ताकत भी बड़ी बात है लेकिन यह उनके संबंध में उचित है जो गल्तियों को महसूस करते हैं लेकिन जो इस तरह की अच्छी भावनाओं को कायरता समझते हैं, उनके साथ भलमनसाहत का क्या अर्थ है? जो अपनी आदतों से बाज आने को तैयार नहीं। तीन-तीन बार युद्ध में हार जाने के बावजूद जिनकी अक्ल ठिकाने नहीं आयी, उनसे बातचीत से मामला निपटाया जा सकता है, यह सोच ही अव्यवहारिक है। एक तरफ आतंकवादियों से निपटने के नाम पर अमेरिका पाकिस्तान को अरबों रुपए की सहायता करता है और दूसरी तरफ हमें शांति का पाठ पढ़ाता है। पाकिस्तान तो खुल कर कह रहा है कि काश्मीर का मामला फिलीस्तीन की तरह का है। काश्मीर को आतंक की आग में झुलसाने का पाकिस्तान ने कम प्रयास नहीं किया और आज भी कर रहा है। घुसपैठ जारी है। युद्ध विराम के बावजूद पाकिस्तानी सीमा से भारतीय सीमा पर गोलीबारी होती ही रहती है। पाकिस्तान ने तो एक भी उदाहरण आज तक प्रस्तुत नहीं किया कि वह वास्तव में भारत के साथ मैत्री चाहता है। दुनिया को दिखाने के लिए वह इस तरह के ढोंग अवश्य करता है।
किसी भी तरह की बातचीत का तब तक क्या औचित्य है जब तक बातचीत में ईमानदारी न हो। शिमला समझौता भी तो भारत के साथ पाकिस्तान ने पूर्वी पाकिस्तान गंवाने के बाद किया था। यह भी तथ्य स्पष्ट है कि पाकिस्तानी आतंकवादी बंगला देश से भी भारत में घुसते ही नहीं है बल्कि वहां भी उन्होंने अपने ठिकाने बना रखे है। पाकिस्तान तो अमेरिका और चीन दोनों से दोस्ती का दम भरता है। वह अमेरिका और चीन दोनों से लाभ उठाता है और भारत को चुनौती देता है। यहां तक कि जब लंका की क्रिकेट टीम पर पाकिस्तान में हमला हुआ तब भी उसने तुरंत आरोप लगाया कि यह भारत ने किया है। ब्लूचिस्तान में भी वह भारत के हस्तक्षेप का राग अलापता है। अफगानिस्तान को भारत की मदद भी उसे फूटी आंख नहीं सुहाती। फिर उसकी राजनीति का मूल केंद्र भारत से दोस्ती नहीं, घृणा है। तब भारत कितनी भी दोस्ती की, शांति की बात करें, उसका परिणाम तो वह नहीं निकलता जो भारत चाहता है।
ऐसे में पाकिस्तान के साथ किसी भी स्तर की बातचीत करना सिवाय समय खराब करने के और क्या है? पाकिस्तान सरकार की नीयत और वहां से चलने वाली आतंकवादी गतिविधियों से सतर्क रहने और उसका मुंह तोड़ जवाब देने के सिवाय भारत के पास दूसरा चारा नहीं है। जो लोग समझते हैं कि वार्ता की कूटनीति से हमारी समस्याओं का हल हो जाएगा, उनके सामने उदाहरणों की कमी नहीं है कि वार्ता में हमने जीत तक को तो गंवाया है। चाहे वह ताशकंद समझौता हो या शिमला समझौता। हमें मिला क्या है? यहां तक कि पाकिस्तान के कब्जे में चला गया काश्मीर तक हम वापस प्राप्त नहीं कर सके। राजनीति का आदर्शवाद भारत के लिए चीन और पाकिस्तान के मामले में ही नहीं नेपाल तक के मामले में भी नुकसानप्रद ही साबित हुआ है। कभी इसकी भी समीक्षा करें, भारत के हुक्मरान।
चीन के मामले में पंचशील का सिद्धांत काम नहीं आया। चीनी हिन्दी भाई-भाई का अलाप लाखों वर्ग किलोमीटर जमीन गंवा बैठा और आज भी चीन की नजर हमारी भूमि पर लगी हुई है। हमारे हुक्मरान कहते हैं कि चीन हमारा दोस्त है और उससे कोई खतरा नहीं है। भारत के ही एक प्रदेश में भारत के प्रधानमंत्री के जाने पर जो चीन विरोध प्रदर्शित करता है, वह हमारा मित्र कैसे दिखायी पड़ता है? यदि दिखायी पड़ता है तो सिर्फ हमारी कमजोरी ही दिखायी पड़ती है। हम वार्ता करते रहते हैं और चीन हमारी भूमि पर कब्जा करता जाता है। चीन तो पाकिस्तान में फौजी केंद्र भी बनाने वाला है। वे हमारा मजाक उड़ाते हैं तो गलत क्या करते हैं? क्या हमारे कृत्य मजाक के योग्य नहीं है? शुतुरमुर्ग की तरह सोच होगी तो परिणाम भी शुतुरमुर्ग की तरह ही भोगना पड़ेगा।
- विष्णु सिन्हा
दिनांक 15.02.2010
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