यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं

मंगलवार, 2 मार्च 2010

जाति, संप्रदाय, भाषा जो सत्ता सिंहासन पर बिठा दे वही सही

सरकार सुन न रही हो और मांग के प्रति सरकार का उपेक्षा का रुख हो तब तो रैली, प्रदर्शन, सभा की जरुरत समझ में भी आती है लेकिन सरकार कार्यवाही कर रही हो तब इन बातों का क्या औचित्य है? राज्य में आदिवासियों की आबादी 32 प्रतिशत है। यह पुराने आंकड़े है। इसी आधार पर विधानसभा सीटों का परिसीमन भी हुआ और आदिवासियों के लिए आरक्षित सीट कम हुई। भाजपा नेता नंद कुमार साय ने अजीत जोगी के साथ मिल कर सीटें कम न हो इसके लिए प्रयास भी किया लेकिन वे सफल नहीं हुए। क्योंकि उनकी मांग न्यायोचित नहीं थी। अब मामला आबादी के आधार पर शासकीय नौकरी में आदिवासियों को आरक्षण देने का है। सरकार ने इस विषय में एक समिति बना दी है, जो शीघ्र ही अपनी रिपोर्ट  पेश करेगी। डॉ. रमन सिंह की मंशा स्पष्ट है। वे न्यायोचित काम में अवरोधक नहीं बनते। यदि आदिवासियों का हक मारा जा रहा है तो डॉ. रमन सिंह पहले व्यक्ति हैं जो इस मामले में उचित कार्यवाही करेंगे। 

कांग्रेसियों को यह विश्वास भले ही उनकी राजनैतिक अभिलाषाओं के कारण न हो लेकिन भाजपाइयों को भी न हो तो यह आश्चर्य की बात है। फिर भाजपा के सामान्य कार्यकर्ता की भी बात नहीं है, राज्य शासन में मंत्री, सांसद जब इस तरह की रैली, सभा में मंचस्थ होकर अविश्वास को हवा देने का काम करें और डॉ. रमन सिंह के विरुद्ध सड़क पर नारेबाजी हो तो इसे क्या कहा जाए? मुख्यमंत्री न सही राज्यपाल ही आदिवासी बनाया जाए, इस तरह की बात का क्या औचित्य हैं? जहां तक मुख्यमंत्री चयन का प्रश्र है तो यह काम तो विधायक दल का है। बहुमत  का विधायक जिसे अपना नेता चुने, उसे ही मुख्यमंत्री का पद मिलता है। फिर भाजपा ने तो विधानसभा चुनाव के  पहले ही घोषणा कर दी थी कि भाजपा को जनता ने फिर से शासन चलाने का आदेश दिया तो मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह होंगे। जनता ने बहुमत भाजपा के पक्ष में दिया और इसमें बड़ी भूमिका आदिवासियों की ही थी। आदिवासी जनता ने तो एकतरफा समर्थन डॉ. रमन सिंह के पक्ष में घोषित किया।


आदिवासी क्षेत्रों की दो बड़ी समस्या है। नक्सली और विकास। डॉ. रमन  सिंह ऐसे पहले मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने नक्सली समस्या से निपटने के लिए खुली लड़ाई का जोखिम लिया। वे कितने सही है, यह इस बात से ही स्पष्ट होता है कि नक्सली आज छत्तीसगढ़ में बैकफुट में जाने के लिए बाध्य हुए। जहां तक विकास का प्रश्र है तो डॉ. रमन सिंह की पहली प्राथमिकता तो विकास ही है। उनकी सोच आदिवासियों का ही नहीं सर्वांगीण विकास का है। नक्सली आतंकवाद से लडऩा तो मजबूरी है। कोई शौक नहीं है। क्योंकि यह बात आइने की तरह साफ है कि जब तक आदिवासी क्षेत्रों को नक्सलियों से मुक्त नहीं किया जाएगा तब तक विकास के काम करना आसान नहीं है। सड़कें, स्कूल, पंचायत भवन सब के सब तो नक्सलियों द्वारा नष्ट किए जाते हैं। विद्युत के प्रकाश से आदिवासी क्षेत्र प्रकाशित न हो इसलिए टॉवर गिराए जाते हैं। खदानों में सुचारु रुप से काम न हो, इसलिए सब तरह के प्रयत्न किए जाते है। यहां तक कि इस्पात कारखानों का विरोध किया जाता है। क्योंकि ये प्रारंभ हो गए तो विकास की नई रौशनी क्षेत्र में फैल जाएगी। एक रुपए, दो रुपए किलो चांवल, मुफ्त में नमक जैसी योजना का लाभ आदिवासियों को भरपूर मिल रहा है और यह उनकी तात्कालिक जरुरत है। 


नौकरी में आरक्षण देने से भी डॉ. रमन सिंह चूकने वाले नहीं हैं लेकिन उससे भी जरुरी है कि आदिवासियों के लिए शिक्षा का प्रबंध किया जाए। उन आदिवासियों के बच्चे भी सरकारी नौकरी प्राप्त कर सकें जिनके परिवार को अभी तक यह प्राप्त नहीं हुआ। अभी भी आरक्षित सीटों पर उपयुक्त उम्मीदवार नहीं मिल पाते। रैली में ही आए कितने ही आदिवासियों को पता नहीं था कि वे किसलिए राजधानी आए है। यह शिक्षा के अभाव का परिचायक है। नौकरी में आरक्षण जरुरी है आबादी के अनुपात में तो उससे ज्यादा जरुरी है कि बच्चों की शिक्षा की पर्याप्त व्यवस्था की जाए। जो लोग आदिवासी समुदाय में पढ़-लिख गए हैं और सरकारी नौकरी भी प्राप्त कर लिए है, उनका तो सबसे बड़ा कर्तव्य यही है कि वे शिक्षा के  लिए समाज को तैयार करें। पढऩे लिखने पर जोर दें। समुदाय की एकता उन्नति का आधार होना चाहिए। सब तक सब कुछ पहुंचे, इसका प्रयास होना चाहिए। 


आदिवासी 32 प्रतिशत है। दलित 12 प्रतिशत हैं। पिछड़ा वर्ग 52 प्रतिशत है। ये सब मिलकर राज्य की आबादी का 96 प्रतिशत हो जाते हैं। आंकड़े तो यही कहते हैं। यदि यह आंकड़े सही हैं तो फिर 4 प्रतिशत में ही अल्पसंख्यक, सवर्ण सहित शेष लोग आते हैं। 2011 में जनगणना हो रही है और सुना जा रहा है कि पहली बार जातिगत आधार पर भी जनगणना होगी। हालांकि इसे उचित नहीं माना जाता लेकिन जब जाति, धर्म के आधार पर आरक्षण की बात हो तब इस तरह की जनगणना की जरुरत भी है। संविधान के उच्च मान भले ही समस्त भारतवासियों को एक समान मानते हैं लेकिन राजनीति ने तो इसे माना ऐसा परिलक्षित नहीं होता। जाति, धर्म को भी वोट बैंक के रुप में देखा जाता है। तब कम से कम किस धर्म को मानने वाले और किस जाति के कितने लोग हैं, इसका सही आंकलन भी जरुरी है। यह सही ढंग से की गई जनगणना से ही पता चल सकता है।


राजनैतिक पार्र्टियों में भी पद अब जाति आधार पर मांगे जा रहे है। आदिवासी कहते हैं कि सबसे ज्यादा है तो पिछड़ा वर्ग कहता है, वे सबसे ज्यादा है। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष का पद कांग्रेस की तरह पिछड़ी जाति वाले मांग रहे हैं। उनका कहना है कि सामान्य वर्ग से एक बार और आदिवासी वर्ग से 3 बार अध्यक्ष पार्टी का बन चुका। अब पिछड़े वर्ग को मौका दिया जाए। फिर कभी यह भी मांग उठेगी कि पिछड़े में बड़ी कौन सी जाति। ताराचंद साहू पिछड़े वर्ग से ही प्रदेश अध्यक्ष बने थे। आज वे पार्टी से बाहर हैं। शिवप्रताप सिंह आदिवासी वर्ग से अध्यक्ष बने थे। आज वे पार्टी से सस्पेंड हैं। आदिवासियों का सम्मेलन होता है और करीब-करीब सभी पार्टी के नेता मंचस्थ होते हैं लेकिन जिस व्यक्ति को आदिवासी होने के कारण कांग्रेस ने मुख्यमंत्री बनाया था, उसे सम्मेलन में बुलाया नहीं जाता। एक नेता से पूछा जाता है कि फलां नेता नहीं है तो वे कहते हैं कि आदिवासियों का सम्मेलन है, दूसरों को नहीं बुलाया गया। मतलब साफ है कि कांग्रेस आलाकमान जिसे आदिवासी मानता है, उसे बाकी आदिवासी नेता आदिवासी नहीं मानते। 


राष्ट्रीय  स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक कहते है कि जाति तोड़ो लेकिन भाजपा के नेता इसे नहीं मानते। कांग्रेस कहती रही कि न जात पर न पांत पर मुहर लगेगी हाथ पर लेकिन वहां भी टिकट से लेकर पदाधिकारियों की नियुक्ति पर जाति, संप्रदाय हावी है। असल में सत्ता की राजनीति वोट बैंक का खेल है और कैसे अपने पक्ष में वोट बढ़ें इसी की सारी रणनीति और मोलभाव है। 50 प्रतिशत से भी कम का समर्थन प्राप्त कर राजनैतिक पार्र्टियां सत्ता का सुख भोगती हैं तो सत्ता के बाहर बैठे लोग इस जुगाड़ में लगे रहते है कि कैसे 2-4 प्रतिशत मत उधर से इधर आ जाएं तो सत्ता का सुख हमें मिले। आज तो अपनी जाति, अपना संप्रदाय, अपना राज्य, अपनी भाषा यही राजनीति का आधार बने हुए हैं। फिर कौन किसे गलत कहे और किसे सही?


- विष्णु सिन्हा


दिनांक 02.03.2010

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

नानाजी देशमुख के परलोक गमन से भारतमाता ने अपना एक सपूत खो दिया


आज की राजनीति में ऐसे इंसान की तलाश करना कठिन काम है, जिसकी कथनी और करनी एक हो। नानाजी देशमुख ऐसे ही व्यक्ति थे। जनता पार्टी की जब सरकार बनी तब उन्होंने घोषणा की थी कि 60 वर्ष का हो जाने पर राजनीतिज्ञ को सत्ता की राजनीति से अवकाश प्राप्त कर लेना चाहिए। आने वाली नई युवा पीढ़ी को मौका देना चाहिए। किसी ने उनकी बात नहीं मानी लेकिन नानाजी देशमुख अपनी बात पर कायम रहे और 60 वर्ष का होते ही, उन्होंने सक्रिय राजनीति से अवकाश प्राप्त कर लिया। वे चित्रकूट में जा बसे और सामाजिक कार्यों के लिए अपना जीवन लगा दिया। दीनदयाल शोध संस्थान और ग्रामोदय विश्वविद्यालय के माध्यम से उन्होंने ग्रामीण भारत की सेवा का प्रकल्प अपने अवकाश प्राप्त करने के बाद चुना। काश उनके आदर्शों का अनुसरण उनके साथी राजनीतिज्ञ करते तो देश किसी और दिशा में आगे बढ़ता।
देश में बढ़ती महंगाई, भ्रष्टïचार, बेरोजगारी के विरुद्ध जब आंदोलन प्रारभ हुआ तब जयप्रकाश नारायण के कंधे से कंधा मिलाकर नानाजी देशमुख ने आंदोलन को गति देने में सक्रिय भूमिका निभायी। जब पुलिस ने लाठी चार्ज किया तो नानाजी देशमुख जयप्रकाश नारायण की सुरक्षा में उनके सामने चट्टïन की तरह खड़े हो गए। जब सभी विपक्षी दलों ने इंदिरा गांधी के तानाशाही शासन के विरुद्ध एकजुट होकर संघर्ष किया तो भारतीय जनसंघ को जनता पार्टी में एकाकार करने में नानाजी देशमुख की प्रमुख भूमिका थी। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के स्वयं सेवक और आजन्म प्रचारक की भूमिका जब उन्होंने चुनी तो उनका उद्देश्य देश प्रेम ही था। वे भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्य थे। वे चाहते तो बड़ा से बड़ा पद राजनीति में प्राप्त कर सकते थे लेकिन पद प्राप्त करना ही जिसका उद्देश्य न हो, वह इस बात की फिक्र नहीं करता कि कौन पद पर बैठता है? उसे तो मतलब होता है कि कोई भी पद पर बैठे लेकिन जनता की सेवा ईमानदारी से करें। 
इसलिए राजनीति में भी उन्होंने विचारों की उच्चता तो कायम रखी लेकिन उच्च पदों के अभिलाषी नहीं रहे। जिस तरह से जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में संपूर्ण क्रांति का पूरा आंदोलन चला लेकिन जब जनता ने जनादेश दे दिया जनता पार्टी को तब जयप्रकाश नारायण ने स्वयं प्रधानमंत्री बनने की कोशिश नहीं की। ठीक उसी तरह से जिस तरह से आजादी का आंदोलन चला तो महात्मा गांधी के नेतृत्व में लेकिन जब भारत स्वतंत्र हो गया तब महात्मा गांधी ने प्रधानमंत्री बनने की कोई इच्छा प्रगट नहीं की। हालांकि वे चाहते तो प्रधानमंत्री बनने से उन्हें कोई रोक नहीं सकता था। जयप्रकाश नारायण भी प्रधानमंत्री बनना चाहते तो किसकी ताकत थी जो उन्हें प्रधानमंत्री बनने से रोक सकता था। ये सब त्यागी पुरुष थे। नानाजी देशमुख भी इसी कड़ी के व्यक्ति थे। वे भी कुछ बनना चाहते सत्ता की राजनीति में तो उन्हें कौन रोक सकता था? लेकिन नानाजी देशमुख के लिए राजनीति सत्ता का नहीं सेवा का माध्यम था। 
यही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के स्वयं सेवक के रुप में उन्होंने सीखा था और इसी की दीक्षा उन्होंने प्राप्त की थी। पूरा जीवन बिना गृहस्थ आश्रम में प्रवेश किए देश की सेवा में लगाने वाले विरले ही होते हैं। कहां 80-85 वर्ष की उम्र में भी लोग सत्ता में बड़ा से बड़ा पद प्राप्त करने के लिए उस तरह के षडय़ंत्र करते हैं, पूरी बेशर्मी से जो किसी भी लिहाज से शोभनीय नहीं है। लोग धक्के मार रहे हैं कि हटो। कुर्सी खाली करो लेकिन कुछ बुजुर्ग है, जो समझने के लिए ही तैयार नहीं है। 1911 में जन्मे नानाजी देशमुख ने 2010 में शरीर त्यागा। मतलब 1 वर्ष वे और रह जाते तो 100 वर्ष पूरे कर लेते लेकिन उन्होंने 60 वर्ष की उम्र में ही अर्थात आज से करीब 39 वर्ष पूर्व ही सक्रिय राजनीति को अलविदा कर दिया था लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि वे घर में बैठ कर राम-राम जप रहे थे। जीवन से निराश हताश व्यक्ति नहीं थे नानाजी देशमुख बल्कि अपनी संपूर्ण शक्ति के साथ वे वास्तविक लोककल्याण के काम में लगे थे। 
किसी को महानता का बुखार चढ़ता है तो वह जोश में घोषणा कर देता है कि 60 वर्ष की उम्र के बाद वह अवकाश ग्रहण कर लेगा लेकिन 60 वर्ष पूरे भी हो जाते है और वह पद लिप्सा से ग्रस्त राजनीति को छोड़ नहीं पाता। तब नानाजी देशमुख की ही याद आती है कि देखो यह भी एक व्यक्ति है जो कहा कर के दिखाया। वे सक्रिय राजनीति में न जाते तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भी सर्वोच्च पद को सुशोभित कर सकते थे। कम संभावना नहीं थी कि वे राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ के सरसघ्चालक बन जाते लेकिन महत्वाकांक्षा और पदलिप्सा का ज्वर जिसे न हो उसकी सोच ही अलग होती है। भारतीय संस्कृति में आस्था के वे बड़े प्रतीक थे। हिंदुओं के उत्थान और एकता को उन्होंने अपने जीवन का एकमात्र उद्देश्य माना था। पूरा जीवन जिस उद्देय को लेकर उन्होंने होम किया, उसके पदचिन्ह तो सर्वत्र दिखायी पड़ते हैं। पद्मविभूषण जैसा सम्मान उन्हें अवश्य मिला लेकिन उनके जीवन का उद्देश्य कहीं से भी ऐसा सम्मान प्राप्त करने की लालसा वाला नहीं रहा।
बड़े-बड़े भवनों के नींव में जो पत्थर लगे रहते हैं और जिन पर ही भवन का पूरा भार होता है, ऐसे नींव में नानाजी देशमुख ही थे। भाजपा राष्ट्रीय  स्वयंसेवक का आज जो भवन खड़ा है, उसकी  नींव की खबर आज भले ही भवनों में बैठी नई पीढ़ी को नहीं लेकिन जब नानाजी देशमुख ने इन भवनों के निर्माण में अपनी अहम भूमिका निभायी तब किसी को पता नहीं था कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब संघ के मोहन भागवत यह कहने की ताकत रखेंगे कि राख से भी खड़े होने की ताकत भाजपा में है। यह सब नानाजी देशमुख जैसे किशोरावस्था में ही गृह त्यागी लोगों की कर्मठता का फल है। यह बात दूसरी है कि वृक्ष जब फल से लद गया तो नानाजी ने भावी पीढ़ी के लिए उन फलों को छोड़ दिया। मैंने बोया। मैं ही खाऊं की प्रवृत्ति न होकर सबका कल्याण जिनकी प्रवृत्ति थी,ऐसा व्यक्ति इहलोक छोड़ कर चला गया। अब भावी पीढ़ी का कर्तव्य है कि उनके त्याग तपस्या से शिक्षित होकर अपने जीवन को भी उनके ढंग में ढालें। नानाजी देशमुख को हार्दिक श्रद्धांजलि।
विष्णु सिन्हा 

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

26 हजार करोड़ की छूट पर जो लोग ऐश करेंगे उसकी कीमत आम जनता 46 करोड़ चुकाएगी

बड़ी उम्मीद थी कि केंद्र सरकार का बजट महंगाई से पीडि़त आम जनता के लिए वरदान की तरह होगा लेकिन किसी को भी कल्पना नहीं थी कि प्रणव मुखर्जी इतने निष्ठुर निकलेंगे। बजट वरदान तो था नहीं लेकिन अभिशाप अवश्य दिखायी पड़ रहा है। जिनके एक साथ खड़े होने की कोई उम्मीद भी नहीं करता था, उन्हें बजट के विरुद्ध एक साथ खड़ा होने के लिए प्रणव मुखर्जी के बजट ने बाध्य कर दिया। बजट के बीच में ही विपक्ष के सांसद एक साथ बिना किसी भेदभाव के बर्हिगमन  के लिए बाध्य होते हैं तो इसी से समझा जा सकता है कि आम आदमी पर यह बजट कहर की तरह टूटेगा। सिर्फ डीजल की कीमत में ही इजाफा महंगाई को और बढ़ाने के सिवाय तो कुछ नहीं करेंगा। दैनंदिन के लिए उपयोगी हर चीज पर यह अपना प्रभाव दिखाएगा। मतलब जनता सोचने के लिए बाध्य होगी कि कांग्रेस को पुन: सरकार बनाने का अवसर देकर उसने अपने लिए जी का  जंजाल ही खड़ा किया। 

कभी कांग्रेस ने नारा  दिया था कि गरीबी हटाओ तो भारतीय मतदाताओं ने वोटों से उसकी झोली भर दी थी। आज 38 वर्ष बाद इस नारे के गरीबी तो मिटी नहीं अकल्पनीय महंगाई ने लोगों को अवश्य अपने कब्जे में कर लिया है। कभी कांग्रेस का नारा गरीबी हटाओ अवश्य था और उसमें वह सफल नहीं हुई लेकिन अब इस बजट को देखकर तो लगता है कि कांग्रेस का नारा है, महंगाई बढ़ाओ। जिस देश की 40 प्रतिशत जनता 20 रुपए से कम में प्रतिदिन गुजारा करती है, उस देश के हुक्मरान न जाने किस सोच की किस दुनिया में रहते हैं। न तो अंतर्राष्ट्रीय  बाजार में डीजल, पेट्रोल की कीमतों में कोई वृद्धि दर्ज की जा रही है और न ही तुरंत बढऩे के कोई आसार हैं लेकिन फिर भी कल बजट प्रस्तुत हुआ और उसमें वित्त मंत्री ने इजाफा करने का प्रस्ताव किया है और रात से ही कीमत बढ़ गई। संसद ने अभी वित्त मंत्री के प्रस्ताव को पारित नहीं किया है। माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता सीताराम येचुरी कह रहे हैं कि यह गलत है लेकिन सरकार के कान में जूं नहीं रेंग रही है।


यह सब प्रजातांत्रिक भारत में हो रहा है। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी कह रहे हैं कि प्रस्ताव वापस लेने का प्रश्न ही नहीं उठता। विपक्ष संसद से लेकर सड़क तक पर सरकार के विरुद्ध संघर्ष की बातें कर रहा है। बजट के दो दिन पहले ही महंगाई पर लोकसभा में बहस हो चुकी है। विपक्ष ने और खास कर प्रतिपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने महंगाई को लेकर सरकार को कठघरे में खड़ा करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। उम्मीद की जा रही थी कि इससे सरकार कुछ तो चेतेगी लेकिन सरकार तो लगता है कि पूरी तरह से मदांध हो गई है। शायद सरकार को लगता हो कि जनता ने उसे 5 वर्ष तक अपने ऊपर अन्याय करने का लाइसेंस दे दिया है। उसके पास बहुमत है और वह जब तक पुन: चुनाव नहीं होता तब तक जो चाहे कर सकती है। विपक्ष और जनता उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। 


ऐसा ही अहंकार एक बार इंदिरा गांधी को भी दो तिहाई बहुमत से चुनाव जीतने के बाद हुआ था। तब भी बेरोजगारी, महंगाई सब कुछ सरकार के नियंत्रण से बाहर हो गए थे और गुजरात से उठा आंदोलन जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में पूरे देश में फैल गया था। इतिहास दोहराया जाता है लेकिन इतनी जल्दी। उस समय तो दो तिहाई बहुमत था, इस समय तो गठबंधन की सरकार है। जनता महंगाई से त्राहि-त्राहि कर रही है। चंद लोग दोनों हाथों लूट रहे है और केंद्र सरकार राज्य सरकारों को दोषी ठहरा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर रही है। महंगाई के लिए कौन दोषी तो केंद्र सरकार का जवाब है कि राज्य सरकार। डीजल के भाव भी राज्य सरकार ने बढ़ाए हैं, क्या? जब डीजल के भाव बढ़े हैं तो परिवहन भाड़ा बढ़ेगा। परिवहन भाड़ा बढऩे का अर्थ हर वस्तु के भाव बढ़ेंगे। खेती में काम आने वाला ट्रैक्टर  भी डीजल से ही चलता है। अब खेतों में फसल उगाही का खर्च भी बढ़ेगा। यात्री बस का किराया भी बढ़ेगा। आज के इस युग में ऐसी कौन सी चीज है जो बिना डीजल के यहां से वहां ले जायी जा सके। यह छोटी सी बात जो हर किसी के समझ में आती है, सरकार की समझ में न आती हो, ऐसा तो नहीं है।


फिर भी सरकार राहत देने के बदले कीमतों में इजाफा हो ऐसा प्रस्ताव बजट में करती है तो कौन मानेगा कि वह दोषी नहीं हैं? आयकर में सरकार छूट देती है। 3 लाख तक आयकर में पुरानी स्थिति है। इससे ज्यादा जिनकी आय होती हैं उन्हें छूट का लाभ मिलेगा? 115 करोड़ के देश में 3 लाख तक आय प्राप्त करने वाले कितने व्यक्ति है? सरकार के इस छूट से 26 हजार करोड़ के आयकर की कमी होगी तो वह पेट्रोल डीजल से46 हजार करोड़ निकालेगी। मतलब चंद लोग छूट का लाभ उठाएंगे और भुगतान उसके बदले सबको करना पड़ेगा। अब जिन्हें आयकर के छूट का लाभ होगा, वे शेयर बाजार में रकम लगाएंगे तो शेयर सूचकांक ऊपर जाएगा। शेयर सूचकांक का ऊपर जाना ही तो सरकार की नजर में देश की आर्थिक तरक्की है। आयकर की छूट की रकम बाजार में आएगी। माल ज्यादा बिकेगा। मतलब व्यापारियों, उद्योगपतियों का पूरा ख्याल रखा है, सरकार ने। गरीब आदमी तो वैसे भी बाजार में खाद्यान्न के सिवाय खरीदता क्या है? खाने की पूर्ति ही नहीं कर सकता तो और क्या खरीदेगा?


खाद्यान्न की कीमतों में वृद्धि का लाभ भी आम आदमी, उत्पादक किसान नहीं प्राप्त करता। इसका लाभ व्यापारी या सटोरिए उठाते है। खाद्यान्न का सट्टï बाजार खुले आम चलता है। ये सटोरिए नित्य तरह-तरह के उपाय करते है कि भाव बढ़े और बढ़े भाव का लाभ बिना कुछ वास्तव में खरीदे बेचे ये उठाएं। गरीब को तो दाना चुगाया जाता है। जिससे वह न जी सके और न ही मर सके। सीमेंट, लोहा सब महंगा होगा। एक अदद मकान बनवाना भी अब आसान नहीं होगा। गरीबों के लिए सस्ता मकान बनाने और देने की भी सरकार की योजना है लेकिन सभी गरीब तो गरीबी रेखा के नीचे नहीं आते। मात्र 6 हजार रुपए वार्षिक सें जिसकी आय कम है वही तो गरीबी रेखा से नीचे है। छत्तीसगढ़ में ही कांग्रेसी नेता कहते है कि 17 लाख गरीब बढ़कर 36 लाख कैसे हो गए? जिसकी आय वार्षिक 6 हजार वह गरीब और जिसकी साढ़े सात हजार वह गरीब नहीं। महंगाई ने 25-30 हजार रुपए वार्षिक पाने वाले को भी गरीब बना दिया।
आयकर का लाभ राजनेताओं को, नौकरशाहों को, व्यापरियों को मिलेगा। इनकी खर्च करने की ताकत बढ़ेगी। साफ मतलब है कि इनकी संपन्नता और बढ़ेगी। इन्हीं के घरों पर छापे मारने से करोड़ों रुपए आयकर विभाग अघोषित के नाम पर पकड़ता है। गरीब के घर क्या मिलेगा? लेकिन छूट का हर्जाना तो प्रणव मुखर्जी ने इन गरीबों से ही वसूल करने की ठानी है। 26 हजार करोड़ रुपए से जो लोग ऐश करेंगे, उसकी कीमत आम जनता 46 हजार करोड़ रुपए के ही रुप में नहीं चुकाएगी बल्कि उसका भुगतान हर खरीदी पर करेगी। हम तो यही कह सकते हैं कि सरकार गरीब की हाय लेने के लिए कटिबद्ध दिखायी देती है।

                                                        
- विष्णु सिन्हा


दिनांक 27.02.2010

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

सचिन की उपलब्धि से पूरा राष्ट्र प्रसन्न होता है लेकिन ममता के रेल बजट से क्यों नहीं ?

एक तरफ सचिन तेंदुलकर का दोहरा शतक है तो दूसरी तरफ ममता का रेल बजट। जिंदगी के भी दो पहलू है एक भावनाओं का, एक यथार्थ का। भावनाओं का संबंध हृदय से होता है। क्रिकेट एक खेल है। इस खेल में दोहरा शतक लगाने से जिंदगी का यथार्थ नहीं बदलता लेकिन भावनाओं के संसार को यह उपलब्धि भरा पूरा कर देती है। सचिन तेंदुलकर वन डे क्रिकेट में दोहरा शतक लगाकर विश्व रिकार्र्ड बनाते हैं। दुनिया के वे ऐसे क्रिकेट खिलाड़ी बन जाते हैं जिसके मुकाबले कोई नहीं। इससे सचिन खुश हों, यह तो स्वाभाविक है लेकिन सारे भारतीयों को सचिन की उपलब्धि खुशी प्रदान करती है। कारण सचिन भारतीय हैं। उनका यह कथन भी याद आता है कि मुझे महाराष्ट्रीयन होने पर गर्व है लेकिन पहले मैं भारतीय हूं। बाल ठाकरे जैसे लोगों को सचिन का कथन नहीं सुहाता लेकिन सारा भारत उनके कथन से गर्व महसूस करता है। सारे भारतीयों को सचिन अपने लगते हैं और सारा देश उनकी उपलब्धि पर होली दीवाली एक साथ मनाता है। 

लोकसभा में बैठे पूरे भारत के सांसद टेबल ठोंक कर बधाई देते हैं, बिना किसी भेदभाव के। सचिन का जन्म भी महाराष्ट्र में हुआ और ठाकरों की कर्मभूमि भी महाराष्ट्र है लेकिन कितना फर्क है, दोनों की सोच में। पूर्व क्रिकेट के महान खिलाड़ी सुनील गावस्कर कहते है कि सचिन के चरण स्पर्श करने का मन करता है। सचिन से बहुत बड़े हैं उम्र में सुनील गावस्कर। जब बड़ों का मन छोटों के चरण स्पर्श का करें तो इसी से समझ में आता है कि सुनील ने कितना आत्मिक सुख दिया है। ममता का रेल बजट आज की प्रमुख खबर नहीं है बल्कि सचिन का दोहरा शतक प्रमुख खबर है। जबकि रेल बजट प्रमुख समाचार होना चाहिए। क्योंकि रेल बजट सीधे-सीधे लोगों को प्रभावित करेगा। ममता ने इतनी ममता तो दिखाई है कि किराए भाड़े में वृद्धि नहीं की है। कुछ छूट दे दी हैं लेकिन सुविधाओं और विकास का सुख जिस तरह से कोलकाता और अमेठी की तरफ कर रखा है, उससे कम से कम छत्तीसगढ़ के लोगों की तो उपेक्षा स्पष्ट दिखायी पड़ती है। सर्वाधिक राजस्व देने वाले बिलासपुर जोन की उपेक्षा की कथा नई नहीं है। 


सब तरह की लफ्फाजी है, बजट में। स्कूल, अस्पताल और न जाने क्या-क्या रेल के धन से ममता करने वाली हैं। छत्तीसगढ़ में मेडिकल कॉलेज खोलने का आश्वासन भी पुराना हैं लेकिन अभी तक उसका कुछ अता-पता नहीं है। धमतरी रेल लाईन को बड़ी लाईन में परिवर्तित करने के लिए सर्वेक्षण भी हो चुका लेकिन उसके विषय में भी बजट चुप है। एक सीधी सी बात है कि जो ज्यादा कमा कर दे उसे सबसे ज्यादा न सही राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में लेकिन न्यायोचित हक तो मिलना चाहिए। यह एक अलग तरह की परिपाटी बन गई है कि बिहार का रेल मंत्री बने तो सब कुछ बिहार ही ले जाने की सोचता है और बंगाल का बना तो बंगाल ले जाने की। संकीर्णता से ऊपर उठने की जो जरुरत केंद्रीय मंत्रियों में होना चाहिए, वह नहीं दिखायी पड़ती। यही कारण है कि ममता भी बंगाल से बाहर ज्यादा सोच नहीं पाती। बंगाल के ही माक्र्सवादी नेता कह रहे हैं कि यह चुनावी बजट है। ममता को पश्चिम बंगाल की सत्ता चाहिए। अगले वर्ष वहां चुनाव होने जा रहा है। यदि पश्चिम बंगाल की जनता ने तृणमूल  कांग्रेस को सत्ता सौंपी तो ममता पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनना ज्यादा पंसद करेंगी बनिस्बत की रेल मंत्री बने रहने के।


छत्तीसगढ़ से कभी कोई रेल मंत्री बनेगा तभी छत्तीसगढ़ में रेल के विकास के विषय में कुछ हो सकेगा लेकिन क्या कभी ऐसी स्थिति आएगी? उम्मीद तो नहीं है। इसलिए दो बड़े स्टेशनों के बीच में छत्तीसगढ़ का जितना हिस्सा आएगा, वहां से गुजरने वाली ट्रेनों में जितनी सीट मिल जाए, उसी पर छत्तीसगढ़ को संतोष करना पड़ेगा। यदि छत्तीसगढ़ में कुछ करने से बंगाल को फायदा होता है तब भी उम्मीद की जा सकती है। बरुवाडीह चिरमिरी लाईन पर काम करने की घोषणा तो रेल बजट में है। इससे कोलकाता और मुंबई की दूरी 400 किलोमीटर कम हो जाएगी। कोलकाता से रायपुर और पास आ जाएगा। स्पष्ट दिखायी देता है कि यह छत्तीसगढ़ की हित चिंता नहीं है बल्कि कोलकाता की हित चिंता है। रावघाट के लिए जो अत्यंत आवश्यक है, कोई चिंता नहीं की गई है। ममता को ही क्यों दोष दिया जाए? जब राजनीति में सोच का दायरा अपने पक्ष में वोट मात्र हो। 


यही तो फर्क है खेल और राजनीति का। राजनीति बांट कर देखती है और खेल जोड़ता है। सचिन पर हर भारतीय को गर्व होता है लेकिन ममता पर गर्व करने के लिए सब तैयार नहीं है। राजनीति में तो कोई भी ऐसा महापुरुष नहीं दिखायी देता जिस पर सब सहमत हों और एक स्वर से गर्व महसूस कर सकें लेकिन खेलों पर भी राजनीतिज्ञों ने अपना शिकंजा कस रखा है। कोई भी खेल संघ हो अध्यक्ष की कुर्सी पर कोई न कोई राजनीतिज्ञ या नौकरशाह बैठा दिखायी देता है। ईमानदारी से देखें तो राजनीतिज्ञों से जूझते हुए खिलाड़ी देश को गर्व करने का अवसर देते हैं तो यह किसी आश्चर्य से कम नहीं है। क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के ही अध्यक्ष भारत सरकार में कृषि मंत्री शरद पवार हैं। कृषि, नागरिक आपूर्ति मंत्री शरद पवार देश के लोगों को तो महंगाई की मार से नहीं बचा सके बल्कि हमेशा यही कहते पाए गए कि अभी शक्कर की कीमत और बढ़ेगी, दूध की कीमत बढ़ेगी। वे तो जब ऐसा कहते थे, तब लगता था, जैसे अपनी कोई बड़ी उपलब्धि गिना रहे हैं। 


इसीलिए तो क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष होने के बावजूद क्रिकेट टीम की जीत का श्रेय सचिन तेंदुलकर, महेन्द्र सिंह धोनी, वीरेन्द्र सहवाग को दिया जाता है, कोई शरद पवार को इसके लिए श्रेय देने के लिए तैयार नहीं है। यह बात दूसरी है कि पूरी बेशर्मी से जब भारत ट्वेन्टी ट्वेन्टी विश्व कप जीत कर आता है तो वे मंच पर मुख्य आसन में विराजमान हो जाते हैं। जनता उनका नहीं खिलाडिय़ों का स्वागत करना चाहती हैं और करती भी है। लोग कहने में नहीं हिचकते कि सचिन तेंदुलकर क्रिकेट का भगवान है लेकिन कोई यह नहीं कहता कि शरद पवार क्रिकेट के भगवान हैं। कभी भारतीय हॉकी विश्व की सबसे महान टीम थी लेकिन आज अपना मेहनताना पाने के लिए उसे हड़ताल करना पड़ता है। जहां-जहां राजनैतिक संतों के कदम पड़े तहां-तहां बंटाधार ही हुआ।


क्योंकि राजनीतिज्ञ अपने स्वभाव से बाज तो नहीं आते। जो राजनीति में करते हैं, वही खेल में भी करना चाहते हैं। इसके बावजूद कोई सचिन तेंदुलकर इस मकाम तक पहुंच जाता है तो यह उसके ही बस की बात है। खिलाड़ी राष्ट्रीय  होता है लेकिन नेता स्थानीय ही रह जाते है। खिलाड़ी की जीत सबकी जीत होती है लेकिन राजनेता की जीत सबकी जीत नहीं हो पाती। एक तोड़ता है तो दूसरा जोड़ता है। तब जोडऩे वाले के सम्मान में पूरा राष्ट्र नतमस्तक हो जाए तो यही होना चाहिए और इसी की देश को जरुरत है।


- विष्णु सिन्हा
दिनांक 25.02.2010

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

माओवादियों की शर्त नामांजूर कर चिदंबरम ने सही कदम उठाया

यह पहली बार हो रहा है कि सरकार नक्सलियों के दबाव में नहीं हैं बल्कि नक्सली सशस्त्र बल की कार्यवाही से दबाव में आ गए हैं। नक्सली नेता ने गृहमंत्री पी. चिदंबरम को एक एसएमएस के द्वारा संदेश दिया कि सरकार सशस्त्र बलों की कार्यवाही रोके तो वे 72 दिन के लिए सीज फायर करने को तैयार है। गृहमंत्री ने स्पष्ट कर दिया है कि वे किसी तरह की शर्त के तहत नक्सलियों से बातचीत नहीं करेंगे बल्कि नक्सली हिंसा का रास्ता छोड़ें और बिना शर्त वार्ता के लिए आगे आएं तभी उनसे बातचीत की जाएगी। वार्ता  के लिए कितु, परंतु या कोई शर्त स्वीकार नहीं की जाएगी । दरअसल जब तक बातचीत खुले दिमाग से नहीं की जाएगी और इसे जीत हार के खेल की तरह से देखा जाएगा तब तक वार्ता का कोई निष्कर्ष नहीं निकलेगा लेकिन इससे भी बड़ा प्रश्र यह है कि नक्सली नेता किशनजी ने जो प्रस्ताव गृहमंत्री से किया है, उसके लिए वे अधिकृत हैं, क्या? 

नक्सलियों ने पोलित ब्यूरो में यह तय किया है क्या कि किशनजी जो चर्चा करेंगे सरकार से, उसे मानने के लिए समस्त नक्सली नेता तैयार होंगे? उड़ीसा के ही एक नेता नक्सली ने किशनजी से असहमति प्रगट की है। फिर इधर हिंसा रोकने का प्रस्ताव किशनजी करते हैं और दूसरी तरफ हिंसक हमले चालू हैं। तब सरकार उनकी बात पर कैसे विश्वास करे? इससे तो यही नजर आता है कि नक्सली नेता कुछ दिनों के लिए सशस्त्र बलों की कार्यवाही रोकना चाहते हैं। लगता है सशस्त्र बलों की कार्यवाही से नक्सली कैंपों में एक डर पैदा हो गया है। छत्तीसगढ़ में तो या तो नक्सली मारे जा रहे हैं या पकड़े जा रहे हैं या फिर आत्मसमर्पण भी कर रहे हैं। अभी सिर्फ तीन राज्यों में ही सशस्त्र बल की कार्यवाही चल रही है। धीरे-धीरे इसका विस्तार होगा तो नक्सली प्रभावित क्षेत्रों में नक्सली नेताओं की पकड़ कमजोर होगी। 


कल तक नक्सली ही पुलिस के जवानों को मारते थे। मुखबिरी के नाम पर निर्दोष ग्रामीणों की हत्या करते थे। तब नक्सलियों का मनोबल बढ़ा हुआ था। अब जब अपने लोगों के मारे, पकड़े जाने या आत्मसमर्पण की खबर आती है तो नक्सली बने लोग सोचने के लिए मजबूर तो हो ही रहे हैं कि वे भी एक दिन मारे जाएंगे। नक्सली नेता समझ रहे हैं कि वक्त रहते नक्सली कार्यकर्ताओं को मृत्यु भय से मुक्त नहीं किया गया तो वह दिन भी आ सकता है कि नेता ही रह जाएं और कार्यकर्ता या तो मृत्यु के भय से भाग खड़े हो या फिर आत्मसमर्पण कर दें। समर्पण करने वालों के लिए सरकार ने स्वाभिमानपूर्वक जीने के लिए आर्थिक पैकेज की भी घोषणा कर रखी है। ऐसे में नक्सली कार्यकर्ताओं को रोककर रखना अब नक्सली नेताओं के लिए कठिन काम होता जा रहा है। 


नक्सली नेता के सीज फायर के प्रस्ताव पर सरकार वैसे भी विश्वास नहीं कर सकती। आंध्रप्रदेश की सरकार ने नक्सलियों से वार्ता के लिए सीज फायर किया था लेकिन नक्सली अपनी जबान पर खरे साबित नहीं हुए। उन्होंने वार्ता के समाप्त होने और कोई निर्णय तक पहुंचने के पहले ही हिंसा प्रारंभ कर दिया था। प्रश्र यह भी है कि कल तक जो वार्ता के लिए किसी तरह भी तैयार नहीं हो रहे थे, वे अचानक इसके लिए तैयार कैसे हो गए? फिर वे तरह-तरह की बात करते हैं। बुद्धिजीवियों एवं मानवाधिकारियों को मध्यस्थ बनाकर वार्ता की बात कर रहे है। मतलब वे सीधे-सीधे वार्ता की मेज पर नहीं आना चाहते। कहीं न कहीं या तो डर छुपा हुआ है कि सरकार गिरफ्तार कर लेगी या फिर नीयत साफ नहीं है। दरअसल कोई मुद्दा हो तब न वे बात करें। पहला मुद्दा तो यही है कि हिंसा छोड़ें। गृहमंत्री ने कहा भी है कि हिंसा छोड़ें और बिना शर्त वार्ता करें। मध्यस्थ की क्या जरुरत है? सीधे-सीधे वार्ता से क्या डर है? यदि ईमानदार हैं और वास्तव में जनता की समस्या हल करने का इरादा रखते हैं तो मौका है। आत्मसमर्पण करें। क्योंकि उनके अभी तक के किए गए कृत्य तो पूरी तरह से गैरकानूनी रहे हैं। 


वह तो गनीमत है कि सरकार सुधरने का अवसर देना चाहती है। नहीं तो कानून के हिसाब से तो वे माफी के भी हकदार नहीं है। जिन्होंने सशस्त्र बल के जवानों की हत्या की, आम नागरिक की हत्या की वे किस दृष्टि से माफी के योग्य हैं। आज भी सरकार ने सशस्त्र बलों का दबाव नहीं बढ़ाया होता तो क्या वार्ता के लिए राजी होने का नाटक करते। नक्सली अपने आपको इतना अक्लमंद समझते हैं कि वे अपनी रणनीति के तहत सरकार को ही धोखा दे दें तो यह संभव नहीं। सरकार तो इंसानियत के कारण दरियादिली दिखा रही है, उनके साथ जिनमें इंसानियत कहीं से भी दिखायी नहीं देती। वह व्यक्ति जो अपने निहित विचारों की आड़ में सीधे सादे लोगों को बरगलाए और उन्हें हथियारों का प्रशिक्षण दे, सुरक्षा कर्मियों की हत्या करवाए, वह तो सिर्फ सजा का ही हकदार है। करोड़ों लोगों के जीवन को जो खतरे में डाले और निरंतर बंदूक की गोली से डरा कर अपने अनुसार चलने के लिए बाध्य करे, उसके प्रति कैसी दया दृष्टि?


जो विकास का घोर विरोधी हो। सड़क न बनने दे, स्कूल के भवनों को बम से उड़ा दे, पंचायत भवनों का नाश कर, घर-घर से एक सदस्य मरने के लिए देने के लिए दबाव डाले और नाबालिग बच्चों के हाथ में हथियार पकड़ा दे और इसे क्रांति की संज्ञा दे। ऐसे लोगों से वार्ता करना ही उचित नहीं। वैसे भी कोई सरकार हाथ पैर नहीं जोड़ रही है कि भैया हथियार रख दो और वार्ता करो। सरकार जो हिंसा के विरुद्ध कार्यवाही कर रही है, वही उचित है। जब सब तरह से समझाने के बावजूद श्रीलंका सरकार ने देख लिया कि तमिल टाइगर्स नहीं मान रहे हैं तो उसने हिंसा का जवाब हिंसा से दिया। आज वह समस्या से मुक्त हो गया। सरकार को तो सीधे-सीधे वार्निंग देना चाहिए कि समर्पण करो या फिर मरने के लिए तैयार रहो ।
चिदंबरम ने टका सा जवाब देकर कि कोई शर्त मंजूर नहीं, एकदम सटीक जवाब दिया है। भोले-भाले आदिवासी नक्सली कार्यकर्ता के साथ तो एक बार दया दृष्टि दिखायी भी जा सकती है। वास्तव में ये ही मुख्य धारा से भटक कर बहकावे में आ गए हैं लेकिन चतुर चालाक नेताओं ने जिस तरह से इन्हें मोहरों की तरह इस्तेमाल किया है, वही असली दोषी है। पढ़े लिखे होने के बावजूद उन्होंने सैकड़ों लोगों का वैचारिक शोषण भी किया है। दो ढाई हजार मासिक देकर मारने के लिए किसी को तैयार करना, वह भी छोटे-छोटे नासमझ बच्चों को कम बड़ा अपराध नहीं है। देश का करोड़ों रुपया इनके पीछे जाया हो चुका है। अभी भी लग रहा है। जिससे बहुतों का कल्याण हो सकता था। प्रजातंत्र में कानून के विरुद्ध काम करने वालों को हर तरह से हतोत्साहित करने की जरुरत है। चिदंबरम के इस निर्णय के लिए साधुवाद कि कोई शर्त वार्ता के लिए मंजूर नहीं है।


- विष्णु सिन्हा
दिनांक 24.02.2010

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

डॉ. रमन सिंह की पग ध्वनि में सब कुछ बदल डालने की प्रतिध्वनि तो सुनायी पड़ रही है

बजट किसी भी सरकार का हो, उसमें कमियां देखना प्रतिपक्ष का काम है। इसलिए डॉ. रमन सिंह के बजट में प्रतिपक्ष के नेताओं को कमियां दिखायी देती है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। जहां तक बजट से लोगों की आकांक्षाओं का प्रश्र है तो आकांक्षाएं इतनी ज्यादा है कि सीमित साधनों से सभी की मनोकामना पूरा करना किसी भी सरकार के  बस की बात नहीं। संतोष की बात तो यही है कि डॉ. रमन सिंह ने बजट में ऐसे प्रावधान नहीं किए जिससे जनता पर करों का बोझ बढ़े। कर लगाया भी है तो धुम्रपान करने वालों पर और स्वाभाविक है कि धुम्रपान करने वाले  के साथ किसी की भी सहानुभूति नहीं है। जहां तक शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा का प्रश्र है, डॉ. रमन सिंह ने बजट का बड़ा हिस्सा इसके लिए रखा है गांव, गरीब और किसान बजट के केंद्र में है तो नक्सल उन्मूलन, अपराध से नागरिकों की सुरक्षा के लिए गृह मंत्रालय को भी पर्याप्त राशि दी गई है। 

खाद्य सुरक्षा मतलब गरीबों को 2 रु. किलो और 1 रु.  किलो चांवल देने के लिए सरकार ने एक हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया है। चुनाव के समय जो कहा जा रहा था, विरोधियों के द्वारा कि चुनाव के बाद गरीबों को सस्ता चांवल मिलना बंद हो जाएगा। उस संबंध में डॉ. रमन सिंह ने बजट में पर्याप्त प्रावधान कर करारा जवाब दिया है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि भाजपा की गुटीय राजनीति में लाभ देखने वालों को भी डॉ. रमन सिंह ने बजट के बहाने संदेश दे दिया है कि उनके मंत्रिमंडल में सम्मिलित सभी सदस्यों में पूर्ण एकता है। सबसे अधिक बजट आबंटन बृजमोहन अग्रवाल को दिया गया है। मुख्यमंत्री ने अपने से भी अधिक राशि बृजमोहन अग्रवाल के विभागों के लिए आबंटित की है। मतलब साफ है कि आपस में किसी तरह का कोई विवाद नहीं है। कोई किसी की रेखा छोटी नहीं कर रहा है बल्कि बड़ी करने का अवसर देने में भी कोई हिचक नहीं है। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गड़करी ने राष्ट्रीय अधिवेशन में जो संदेश दिया था, उसे छत्तीसगढ़ में देखा जा सकता है।


डॉ. रमन सिंह की दृष्टि साफ है। वे योग्यता है तो सबको बढऩे का अवसर देने के लिए तैयार हैं। डॉ. रमन सिंह का अनुभव भी स्पष्ट है कि किसी भी काम को बृजमोहन को सौंप कर निश्चिंत हुआ जा सकता है। एक तरह से प्रतिपक्ष की इस उम्मीद पर विराम लग गया है कि भाजपा में आपसी द्वन्द कराकर लाभ उठाया जा सकता है। प्रतिपक्ष का रोना कायम है कि घोषणा पत्र की मांग को पूरा नहीं किया गया। पिछले चुनाव के समय मतदाताओं को गाय न मिलने के लिए भी कम उकसाने का प्रयास प्रतिपक्ष ने नहीं किया लेकिन डॉ. रमन सिंह के शासन से संतुष्ट जनता ने तो प्रतिपक्ष की बातों पर कान देना भी उचित नहीं समझा था। फिर घोषणा पत्र 5 वर्ष के लिए होता है। डॉ. रमन सिंह की नियत साफ है तो जनता का विश्वास भी उन पर कायम है और जनता का विश्वास उन पर कायम है तो वे किसी की क्यों परवाह करें लेकिन फिर भी वे विनम्रतापूर्वक आग्रह करने में पीछे नहीं हैं कि जहां तक प्रदेश के विकास का प्रश्र निहित है वहां प्रतिपक्ष सार्थक सहयोग देकर राज्य की प्रगति में सहयोगी बने। 


डॉ. रमन सिंह अपने बजट भाषण का समापन करते हुए कहते है-
मुमकिन है सफर हो आसां, अब साथ भी चल कर देखें ।
कुछ तुम भी बदल कर देखो, कुछ हम भी बेदल कर देखें॥


छत्तीसगढ़ का हित सर्वप्रथम जिसकी दृष्टि में हो, वह कुंद बुद्धि का व्यक्ति नहीं होता। वह हर उस तरह की सोच का स्वागत करता है जिससे 2 करोड़ से अधिक छत्तीसगढ़वासियों का हित हो। बदलती दुनिया में अब प्रतिपक्ष का काम सिर्फ विरोध के लिए विरोध नहीं होता। जहां जरुरत हो बदलने की वहां सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों को बदलने के लिए तैयार रहना चाहिए। जब जनता का कल्याण ही उद्देश्य हो और सत्ता में बैठा व्यक्ति उसे करने के लिए तैयार हो तो और क्या चाहिए? सरकार की कमियां सरकार को बदलने के लिए नहीं बल्कि कमियां दूर करने के लिए होना चाहिए। सरकारें तो बदल जाती हैं। जनता ने कितनी ही बार सरकारें बदली लेकिन कमियां कम होने के बदले बढ़ती ही गई। क्या इसका कारण सत्ता में बैठे लोगों का अहंकार और प्रतिपक्ष में बैठे नेताओं का सरकार को हटा कर स्वयं काबिज होने के अवसर की तलाश के सिवाय और कुछ रहा है। व्यक्ति बदले, नाम बदला, झंडा बदला लेकिन हासिल क्या हुआ? मतदाता को चुनावी शतरंज का मोहरा बना कर सिर्फ उपयोग किया गया। व्यवस्था की कमियां बदली जाए। भ्रष्टïचार समाप्त किया जाए। ईमानदारी को मान प्रतिष्ठï मिले। दलालों और सटोरियों के धंधे पर लगाम लगे और यह तभी हो सकता है जब सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष में एक स्वस्थ सोच हो।


दरअसल जब तक जनहित के कंधे पर बंदूक रखकर सत्ता पर काबिज होने का खेल चलता रहेगा तब तक बदलना कुछ भी आसान नहीं है। कहा भी जाता है कि चुनाव भ्रष्टाचार के केंद्र में है। तमाम तरह की आचार संहिताओं के बावजूद चुनाव में धन के खेल को रोका नहीं जा सका। जब बिना धन के कोई चुनाव नहीं जीत सकता तब जीत के बाद सत्ता धन उगाहने का साधन बन जाती है। कांग्रेस ने ही पिछले चुनाव में करीब 500 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। कांग्रेस के सिवाय तो अन्य पार्टियों ने चुनाव आयोग को हिसाब भी नहीं दिया है। व्यवस्था को बदलना है तो पहले स्वयं को बदलना होगा। सत्ता के ठाठ बदलने होंगे। किसी भी समस्या के निवारण के लिए यदि इच्छाशक्ति हो तो असंभव कुछ नहीं। आपरेशन ग्रीन हंट ने ही नक्सलियों को वार्ता के लिए बाध्य तो किया है। जो समस्या कल तक लाइलाज दिखायी देती है, उसका हल निश्चित रुप से दिखायी दे रहा है। 


यह एक व्यक्ति डॉ. रमन सिंह की निरंतरता और इच्छाशक्ति का ही कमाल है। जब सब तरफ से डॉ. रमन सिंह पर नक्सल समस्या के हल के तरीके को लेकर हमले हो रहे थे तब भी डॉ. रमन सिंह अपने प्रयासों से पीछे नहीं हटे । वह दिन भी आया जब केंद्र में गृहमंत्री चिदंबरम बने और उन्होंने डॉ. रमन सिंह की बात को अच्छी तरह से समझा और समस्या के हल के लिए तैयार हुए। आज परिणाम सामने है। छत्तीसगढ़ में नक्सली बैकफुट पर है। अब 72 दिन के लिए सीज फायर के लिए भी तैयार है। जो व्यक्ति इतनी बड़ी समस्या से जूझ सकता है, वह अपने प्रदेश के लोगों के लिए क्या नहीं कर सकता। गंदी, संकीर्ण राजनीति सत्ता को आड़े न आए तो मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह सब कुछ करने में सक्षम है। आदिवासी क्षेत्रों में विकास के काम तो होने दीजिए। छत्तीसगढ़ विकास के मान से पूरा बदला-बदला नजर आएगा। मुख्यमंत्री बजट के बहाने प्रतिपक्ष का आव्हान तो कर ही रहे हैं कि कुछ तुम बदलो, कुछ हम बदलें।


- विष्णु सिन्हा
दिनांक 23.02.2010

सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

जिला पंचायतों में जीत का डंका बजाकर डा. रमन सिंह ने फिर अपनी लोकप्रियता सिद्घ की

जिला पंचायतों के चुनाव ने फिर सिद्घ कर दिया कि डा. रमन सिंह के जादू से अभी भी मतदाता सम्मोहित हैं। इसे सम्मोहन न कहें तो क्या कहें कि जिला पंचायत के लिए चुने गए कांग्रेसी अध्यक्ष के लिए कांग्रेस प्रत्याशी को वोट देने के  बदले भाजपा प्रत्याशी को वोट देते हैं। कारण जो भी हो लेकिन मतदान तो यही साबित करता है कि कांग्रेसी भी चाहते हैं कि जिला पंचायतों पर भाजपा का कब्जा रहे। रायपुर जिला पंचायत के लिए चुने गए प्रतिनिधियों में कांग्रेस के प्रतिनिधियों की संख्या सर्वाधिक थी। स्वाभाविक रूप से कांग्रेस के प्रत्याशी को चुनाव में विजयी होना था लेकिन जब चुनाव परिणाम आए तो भाजपा प्रत्याशी भारी बहुमत से जीत गया। भाजपा प्रत्याशी को 25 मत मिले तो कांग्रेस प्रत्याशी को 10। स्पष्ट दिखायी देता है कि कांग्रेसी भी अब कांग्रेस के  साथ न होकर भाजपा के साथ रहना ज्यादा पसंद करते हैं। मतलब साफ है कि कांग्रेस के पदाधिकारियों पर कांग्रेसियों का विश्वास अब रह नहीं गया है।

राष्ट्रीय स्तर पर भले ही कांग्रेस और भाजपा नदी के दो किनारे हों। जो कभी नहीं मिलते लेकिन नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा में तो भाजपा और कांग्रेस एक दिखायी पड़ते हैं। जहां जिला पंचायत के चुनाव में भारतीय कम्युनस्टि पार्टी के विरूद्घ दोनों एक हो गए और भाजपा का अध्यक्ष चुना गया तो कांग्रेस का उपाध्यक्ष। अब कांग्रेस आलाकमान और पदाधिकारी भले ही अपने सिर के बालो को नोचें लेकिन सत्य तो यही है कि कम्युनिस्ट पार्टी की तुलना में कांग्रेस और भाजपा ने समझौता करना ही बेहतर समझा। यह सब छत्तीसगढ़ में ही संभव है। क्या सही है और क्या गलत है, इसकी पहचान छत्तीसगढ़वासियों को अच्छी तरह है। वे अपना हित भी अच्छी तरह से पहचानते हैं। पार्टी से बढ़कर विश्वसनीयता उनके लिए ज्यादा अहमियत रखती है और यह बात तो दो चुनावों में छत्तीसगढ़ के मतदाताओं ने सिद्घ किया है कि उनकी विश्वसनीयता डा. रमन सिंह पर अधिक है।


डा. रमन सिंह की बढ़ती लोकप्रियता से किसी के  भी सीने पर सांप लोटे लेकिन तथ्य और सत्य को नकारा नहीं जा सकता। ठेठ छत्तीसगढिय़ा जिस तरह का सीधा सादा, भोला भाला होता है, उसका ही प्रतिनिधित्व डा. रमन सिंह करते हैं। खांटी छत्तीगढिय़ा नेता कौन तो डा. रमन सिंह। सिद्घांत भी साफ है कि कर्म किए जाओ फल की चिंता मत करो। विकास जिसका मूल मंत्र हो, वह किसी बात की फिक्र न करे तो इसमें आश्चर्य की क्या बात ? कभी छत्तीसगढ़ कांग्रेस का गढ़ कहा जाता था और मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने के मुख्य कारणों में से सबसे बड़ा कारण छत्तीसगढ़ का कांग्रेस के प्रति समर्थन था लेकिन वादा और वादा और सिर्फ वादा के  सिवाय छत्तीसगढ़ को कुछ नहीं मिला तो छत्तीसगढ़ को मध्यप्रदेश से अलग होने के सिवाय अन्य कोई चारा भी दिखायी नहीं दिया। अटलबिहारी वाजपेयी ने आश्वासन दिया कि छत्तीसगढ़ की 11 में से 11 लोकसभा सीट भाजपा को मिली तो वे छत्तीसगढ़ राज्य बनाएंगे लेकिन छत्तीसगढ़ से 8 ही सीटें भाजपा को मिली। इतने समर्थन को भी अटलबिहारी वाजपेयी ने पर्याप्त माना और  छत्तीसगढ़ को अलग राज्य बना दिया।


तब भी कांग्रेस को समझ में नहीं आया कि छत्तीगढ़वासियों का विश्वास उसने खो दिया है। प्रथम मौका सरकार बनाने का पुराने मध्यप्रदेश के लिए हुए चुनाव के आधार पर कांग्रेस को ही मिला तो जनप्रतिनिधियों की राय से इत्तफाक न करते हुए अजीत जोगी को मुख्यमंत्री के रूप में थोप दिया। इस व्यक्ति ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के रूप में ऐसे तेवर दिखाए कि आदिवासी जनता ने ही कांग्रेस का साथ छोड़ दिया। पहले चुनाव का अवसर मिलते ही कांग्रेस से सत्ता छीनकर जनता ने सत्ता भाजपा को सौंप दी। भाजपा ने भी डा. रमन सिंह के रूप में ऐसे मुख्यमंत्री का चयन किया जो जनता की कसौटी पर खरा साबित हुआ। कहते हैं कि विकास के अभाव के कारण नक्सल समस्या का जन्म हुआ। कांग्रेस सरकारों ने इफरात धन खर्च किया, अपने शासनकाल में आदिवासियों के लिए। स्वयं अजीत जोगी ने एक बार कहा  कि यह धन आदिवासियों को सीधे सीधे बांट दिया जाता तो हर आदिवासी के हिस्से में 2 करोड़ रूपये आते। किसी को भी आसानी से समझ में आता है कि आदिवासियों तक पहुंचने वाला धन किनकी जेबों में पहुंच गया। अवसर अच्छा था और नक्सलियों ने इसका भरपूर लाभ उठाया।


पहली बार डा. रमन सिंह ने आदिवासियों के दुख तकलीफ  को महसूस किया। सलवा जुडूम जब प्रारंभ हुआ तो तमाम तरह के बुद्घिजीवियों और आदिवासी हितैषी कांग्रेसियों के विरोध के बावजूद डा. रमन सिंह ने सलवा जुडूम का साथ दिया। आदिवासियों की नक्सलियों से रक्षा के लिए विशेष पुलिस बल तैयार किया। केंद्र सरकार के कानों में इतनी बार अपनी बात समझायी कि आज केंद्र सरकार भी मानने को तैयार है कि नक्सली समस्या देश के लिए खतरनाक है। आज संसद के दोनों सदनों को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने भी नक्सल समस्या की गंभीरता को स्वीकार किया। पार्टीगत राजनीति भले ही इसका श्रेय डा. रमन सिंह को देने में सकुचाए लेकिन छत्तीगसढ़ के  लोग तो अच्छी तरह से जानते हैं कि केंद्र सरकार को नक्सली समस्या की गंभीरता को समझने के लिए डा. रमन सिंह ने ही बाध्य किया।
अब डा. रमन सिंह ने ईमानदारी से काम किया तो उसके परिणाम भी आए। छत्तीसगढ़ में नक्सलियों को बैकफुट में धकेलने में सशस्त्र बल सफल रहे। जो लोग अपना उल्लू सीधा करने के लिए आदिवासी नेता ही आदिवासियों का विकास कर सकता है, नारा लगाते थे, उन्हें डा. रमन सिंह ने करारा जवाब दिया। जो काम कांग्रेस का तथाकथित आदिवासी मुख्यमंत्री नहीं कर सका, वह काम करके एक गैर आदिवासी मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने दिखाया। भाजपा के राष्ट्रीय  सम्मेलन में राष्ट्रीय  अध्यक्ष नितिन गडकरी ने न केवल नक्सलवाद से जूझने के लिए डा. रमन सिंह की तारीफ की बल्कि इसके साथ यह भी कहा कि पूरी पार्टी डा. रमन सिंह के  पीछे खड़ी है। 


पार्टी के साथ साथ छत्तीसगढ़ के  लोग भी डा. रमन सिंह  के पीछे खड़े हैं। यही कारण है कि जिला पंचायत के चुनाव में 18 में से 14 पर भाजपा को सफलता मिली। यह कम बड़ी बात नहीं है कि कांग्रेसी भी अपने नेताओं के बदले डा. रमन सिंह की तरफ ही आशा भरी नजरों से देखते हैं। इस जीत के बाद डा. रमन सिंह ने भी पूरी दरियादिली दिखाते हुए कहा हैं कि सरकार 18 जिला पंचायतों को विकास के काम में पूरी मदद करेगी। किसी भी जिला पंचायत से भेदभाव नहीं किया जाएगा। नक्सली समस्या से जूझना और उससे अपने नागरिकों को मुक्त कराना तो सरकार का दायित्व है लेकिन डा. रमन सिंह इतने से ही संतोष करने वाले नहीं है बल्कि उनका मुख्य मकसद विकास है। विकास की ऐसी गंगा में छत्तीसगढ़वासियों को गोता लगाते देखना चाहते हैं। जिसमें हर किसी की सुख समृद्घि विकसित हो।


- विष्णु सिन्हा
22-2-2010