यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं

शनिवार, 30 जनवरी 2010

सम्मान प्राप्त करने वाला व्यक्ति सम्मान प्राप्त कर स्वयं को अपमानित न महसूस करे

सैफ अली खान को पद्म सम्मान के लिए चुनकर भारत सरकार ने पद्म सम्मानों का मान बढ़ाया है या कम किया है। जिस व्यक्ति पर काले हिरण के  वध के आरोप हो और एक कलाकार वह भी फिल्मी होने के सिवाय और कोई सम्मानजनक काम जिसने न किया हो, उसे पद्म सम्मान के लिए चुनकर चयनकर्ताओ ने उन लोगों को चिंतन का विषय दे दिया है जिन्हें अभी तक पद्म सम्मान से नवाजा जा चुका है। पद्म सम्मान के  लिए यदि योग्यता का मापदंड सैफ  अली खान हैं तो जिन लोगो ने अभी तक सम्मान प्राप्त किया है, उनके लिए इससे बड़ा असम्मानजनक और कुछ हो सकता है, क्या ? ऐसा भी नहीं है कि फिल्मी क्षेत्र में ही सैफ  अली ने अभिनय की ही दृष्टि  से कोई मील के पत्थर गाड़े हैं। शर्मिला टैगोर और नवाब पटौदी के पुत्र होने से ही तो कोई पद्म सम्मान का हकदार नहीं बन जाता है। सैफ अली के  दर्जें के फिल्मी नायकों से तो फिल्मी दुनिया भरी पड़ी है और उन नायकों पर किसी न्यायालय में आपराधिक मामले भी दर्ज नहीं हैं।

सैफ अली की चर्चा का बड़ा कारण तो यही है कि राजकपूर की पोती करीना कपूर को उन्होंने उसके पूर्व प्रेमी शाहिद कपूर से छीन लिया। अपनी पहली पत्नी को उन्होंने तलाक दे दिया। यह सब ऐसी बातें नहीं हैं जिनके लिए किसी व्यक्ति को समाज सम्मान की दृष्टिï से देखें। जिन कृत्यों के लिए किसी व्यक्ति को समाज सम्मान की दृष्टिï से नहीं देखता, उन कृत्यों के लिए तो किसी को भी पद्म सम्मान से सम्मानित नहीं किया जा सकता। फिर ऐसा क्या देखा चयनकर्ताओं ने सैफ अली में कि उसे पद्म सम्मान के लिए चुन लिया। राजस्थान में सैफ अली को पद्म सम्मान देने के विरोध में प्रदर्शन किए जा रहे हैं। राजस्थान और दिल्ली दोनों जगह कांग्रेस की ही सरकार है। क्या सरकार को पूरे भारतवर्ष में सैफ अली खान के सिवाय और कोई ऐसा व्यक्ति नहीं दिखायी पड़ा जो वास्तव में सम्मान का अधिकारी है।


वैसे भी सम्मानों के विषय में तो यही प्रचलित है कि अंधा बांटे रेवड़ी अपने अपनों को दे। सम्मान भी राजनीति के  हथियार की तरह प्रयुक्त होते हैं। यह सब भारत में ही होता है, ऐसा नहीं है। महात्मा गांधी के मुकाबले का व्यक्ति बीसवीं सदी में पैदा नहीं हुआ। यह बात आज सारी दुनिया मानती है लेकिन नोबेल पुरस्कार वह भी शांति के लिए उन्हें नामांकित करने के बावजूद नहीं दिया गया। नेताजी सुभाषचंद्र बोस को भारत रत्न देने की मांग उठती रही है लेकिन नहीं दिया गया। नामों की कमी नहीं है जो वास्तव में सम्मान के अधिकारी थे और हैं लेकिन उन्हें सम्मानित नहीं किया जाता। वैसे भी एक स्वाभिमानी व्यक्ति अपने जीवन में जो कुछ करता है, उसके पीछे किसी तरह के सम्मान प्राप्त करने की भावना ही नहीं होती बल्कि उसे अच्छा करना अच्छा लगता है, इसलिए वह करता है।


महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी। उन्होंने विरोध का एक नया पथ तलाश किया। सत्य और अहिंसा से भी न्यायोचित वस्तु प्राप्त की जा सकती है, यह सिर्फ संदेश ही नहीं दिया दुनिया को बल्कि करके दिखाया। उन्होने जो कुछ किया, वह इसलिए नही किया था कि भारत उन्हें राष्ट्रपिता  के रूप में स्वीकार करे लेकिन भारत ने स्वीकार किया। भारत के अधिकांश लोगों ने स्वीकार किया। चंद लोगों को वे पसंद नहीं आए। उनका रास्ता पसंद नहीं आया तो उन्होंने अलग रास्ता चुना लेकिन उनके भी हृदय में  गांधी जी के लिए सम्मान कम नहीं था। कांग्रेस आज भी अपने को महात्मा गांधी की कांग्रेस कहकर गौरवान्वित होती है। आज ही के दिन उनके सीने में एक व्यक्ति ने तीन गोलियां उतार दी थी और हे राम कहते हुए गांधी जी ने अपना शरीर छोड़ दिया था।


किसी तरह के पुरस्कार की लालसा में गांधी जी ने अपना जीवन न्यौछावर नहीं किया था। गांधी जी का किसी भी तरह का सम्मान हम करते हैं तो सम्मान बड़ा नहीं होता बल्कि गांधी जी ही बड़े होते हैं। आज के नेताओं की तरह गांधी जी की कथनी और करनी में अंतर नहीं था। स्वतंत्रता संग्राम के साथ सामाजिक बुराइयों पर भी गांधी जी ने कार्य किया। दलित बस्ती में निवास कर उन्होंने सबको गले लगाया। परतंत्र भारत में उनके कृत्य उन्हें किसी राजसिंहासन पर नहीं बिठाते थे बल्कि जेल की हवा खिलाते थे। वे चाहते तो स्वयं जवाहरलाल नेहरू की जगह प्रधानमंत्री बन सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा किया नहीं और न ही ऐसा सोचा। इसीलिए तो वे भारत की कोटि कोटि जनता के दिलों में निवास करते थे और इससे बड़ा सम्मान किसी व्यक्ति का क्या हो सकता है?
पद्म सम्मान की ही बात नहीं है। जितने भी तरह के सम्मान आज दिए जाते हैं, सब में लोगों को खोट दिखायी देता है। भाई भतीजावाद, विचारधारा, चापलूसी हर चीज तो तौली जाती है, सम्मान के  मामले में। अभी  कुछ दिन पहले ही हरियाणा से अवकाश प्राप्त करने वाले पुलिस के उच्चाधिकारी को अदालत ने 6 माह की सजा एक नाबालिग लड़की को छेड़छाड़ के मामले में सुनायी। उन्हें पुलिस अधिकारी के रूप में राष्ट्रपति पदक से सम्मानित किया गया था। ऐसे और भी  अधिकारी हैं। अब उनसे पुलिस पदक वापस लेने की कार्यवाही की जा रही है। यह सम्मान देने वालों के लिए एक सबक होना चाहिए लेकिन कोई सबक लेने के लिए तैयार है, क्या?
आज सैफ अली खान को पद्म सम्मान से सम्मानित करने की तैयारी है। उनके  पिता नवाब पटौदी पर भी अवैध शिकार के मामले में न्यायालय में मुकदमा चल रहा है। यह तो माना जाता है कि जब तक न्यायालय में किसी का अपराध सिद्घ न हो जाए और उसे सजा न हो जाए तब तक वह निर्दोष है लेकिन सम्मान के इतने योग्य भारत सरकार को सैफ अली खान ही लग रहे हैं । पिछले दिनों ही चुनाव आयोग की हीरक जयंती के अवसर पर सोनिया गांधी ने कहा कि राजनीति से अपराधियों को दूर रखने के पुख्ता इंतजाम किए जाने चाहिए। 



संवैधानिक संस्थाओं में अपराधिक छवि के लोग न पहुंचें, इसकी मांग तो पुरानी है लेकिन अधिकांश दल चुनाव जीतने के लिए इनका न केवल उपयोग करते हैं बल्कि इन्हें भी टिकट से नवाजते रहे हैं। आज भी लोकसभा में 20 प्रतिशत इनकी संख्या मानी जाती है। सरकार चाहे तो कड़ा कानून इस संबंध में बना सकती है। जब संवैधानिक संस्थाओं से इन्हें दूर रखने की बात फिर से सोची जा रही है और यह सिर्फ जबानी जमा खर्च नहीं है बल्कि सोनिया गांधी गंभीर हैं, इस मामले में तो कानून बनाने में देर किस बात की है। इसी तरह से सम्मान के मामले में भी पुख्ता कानून बनाए जाएं। सम्मानों का इस तरह अवमूल्यन न हो कि सम्मान प्राप्त करने वाला व्यक्ति अपने को सम्मानित होने के बदले अपमानित महसूस करे।

- विष्णु सिन्हा


30-1-2010

3 टिप्‍पणियां:

  1. अंधा भी रेवड़ी बांटता तो भी इसके पल्ले ना पड़ती।
    पूरी तरह सहमत हूं आपसे।

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  2. बिलकुल सही ,,अब पद्म सामान से सम्मानित व्यक्ति पर काहे का मुकदमा

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