यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं

सोमवार, 3 मई 2010

डॉ. रमन सिंह ने दिग्विजय सिंह को दिग्भ्रमित व्यक्ति कह कर चिकोटी तो जोर से काटी है

एक दिग्विजय सिंह है। एक डॉ. रमन सिंह। दिग्विजय सिंह पूर्व मुख्यमंत्री
हैं तो डॉ. रमन सिंह वर्तमान मुख्यमंत्री। दिग्विजय सिंह उस मध्यप्रदेश
के मुख्यमंत्री थे जिसका एक हिस्सा छत्तीसगढ़ भी था। यदि दिग्विजय सिंह
के शासनकाल में छत्तीसगढ़ की घोर उपेक्षा न हुई होती तो पृथक छत्तीसगढ़
राज्य का आंदोलन ही क्यों चलता? इस आंदोलन का भी नेतृत्व स्व. चंदू लाल
चंद्राकर ने किया था। जो कांग्रेस के ही दुर्ग से लोकसभा सदस्य थे लेकिन
उनकी मांग से केंद्रीय नेतृत्व कांग्रेस का सहमत नहीं हुआ और उसने पृथक
छत्तीसगढ़ राज्य की स्थापना में कोई रुचि नहीं ली लेकिन फिर भी
मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ राज्य अस्तित्व में आया। कांग्रेस ने
नहीं भाजपा ने छत्तीसगढ़वासियों की मांग पूरी की। आज छत्तीसगढ़ राज्य बने
9 वर्ष हो चुके और 10 वां वर्ष चल रहा है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद
प्रदेश में पहली बार विधानसभा का चुनाव हुआ तो छत्तीसगढ़ की जनता ने
सत्ता कांग्रेस के हाथ में नहीं सौंपी, भाजपा के हाथ में सौंपी।

उसके बाद एक चुनाव और हो चुका और सत्ता जनता ने फिर से भाजपा को ही
सौंपी। डॉ. रमन सिंह 6 वर्ष से अधिक समय हो गया छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री
हैं। छत्तीसगढ़ में उपेक्षा के कारण जो विकास नहीं हो रहा था, वह होने
लगा। डॉ. रमन सिंह की लोकप्रियता इतनी है जनमानस में कि आदिवासी
क्षेत्रों में तक भाजपा का परचम लहरा रहा है। कभी कांग्रेस के वोट बैंक
रहे आदिवासियों ने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया। लोग तो कहते हैं कि
कांग्रेस का आज जो छत्तीसगढ़ में हाल है, वही रहा तो तीसरी बार भी सत्ता
डॉ. रमन सिंह को ही छत्तीसगढ़ के लोग सौपेंगे। भाजपा की जीत के पीछे जहां
डॉ. रमन सिंह का योगदान है, वहीं दिग्विजय सिंह का भी कम योगदान नहीं है।
क्योंकि न वे छत्तीसगढ़ की घोर उपेक्षा करते और न ही जनता कांग्रेस से
निराश होती। छत्तीसगढ़ की बात एक बार छोड़ भी दें तो शेष मध्यप्रदेश का
भी जो हाल दिग्विजय सिंह ने किया, उसके कारण वहां भी कांग्रेस के हाथ से
सत्ता निकल गयी।

छत्तीसगढ़ में जितनी भी समस्याएं है वह सब कांग्रेस के 40 वर्ष से अधिक
के शासनकाल में दूर हो जानी चाहिए थी लेकिन समस्या हल होना तो दूर की बात
है, समस्याओं पर ध्यान देने की ही जरुरत महसूस नहीं की गयी। नक्सली
समस्या उनमें से प्रमुख है। आज उसी समस्या को लेकर दिग्विजय सिंह उचित
सलाहों के द्वारा स्वयं को हीरो बनाने की कोशिश में लगे हैं। वे पूछते है
कि उनके शासन काल में कितने जवान मरे, कितने आदिवासी मरे और आज भाजपा के
शासनकाल में कितने जवान मरे कितने आदिवासी। जब दिग्विजय सिंह की सरकार
लड़ ही नहीं रही थी तब भी जितने भी जवान मरे या आदिवासी मरे वे कम थे,
क्या? दिग्विजय सिंह का परिवहन मंत्री तक नक्सलियों के द्वारा मारा गया।
यह तब था जब नक्सलियों से उलझने की इच्छाशक्ति का सरकार में पूरी तरह
से अभाव था। दिग्विजय सिंह आंध्र और महाराष्ट का उदाहरण देते हैं तो
वे स्वयं मुख्यमंत्री रहते ऐसा क्यों नहीं कर सके?

उन्होंने ही अजीत जोगी को छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री बनाया था। वे ही आए
थे विधायकों को समझाने की अजीत जोगी को अपना नेता चुनो? कम विरोध नहीं
हुआ था लेकिन आलाकमान के हुक्म के नाम पर सबको चुप करा दिया गया था।
विद्याचरण शुक्ल के फार्म हाउस में उनका जिस तरह से कांग्रेसियों ने
स्वागत किया था, क्या वे भूल गए? तब से वे नवरात्रि में डोंगरगढ़ माता के
दर्शन करने के लिए ही छत्तीसगढ़ आते हैं। डॉ. रमन सिंह कहते हैं कि
दिग्विजय सिंह एक दिग्भ्रमित व्यक्ति हैं तो गलत नहीं कहते। वे क्या
छत्तीसगढ़ के लोगों को समझाएंगे। वे अपने अनुज लक्ष्मण सिंह को तो
कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाने से रोक नहीं सके। जिसकी बातों से छोटा
भाई सहमत नहीं, उससे दूसरे क्या सहमत होंगे? लफ्फाजी के खेल में माहिर
होना ही राजनीति नहीं है। जब सत्ता में बैठने का मौका मिले और तब भी कोई
परिणाम न दे सके तो उसकी योग्यता स्वयं सिद्ध हो जाती है।

डॉ. रमन सिंह और दिग्विजय सिंह में तुलना करें तो जनादेश यही बताता है कि
डॉ. रमन सिंह से जनता ज्यादा सहमत है। तभी तो बस्तर की 12 विधानसभा सीटों
में से 11 पर भाजपा प्रत्याशी जीत दर्ज कराते हैं और लोकसभा की दो सीटों
पर भी भाजपा का कब्जा होता है। ऐसा क्या हो गया कि लोकसभा की छत्तीसगढ़
की 11 में से 10 सीटों पर भाजपा प्रत्याशी चुनाव जीत जाते हैं? ऐसी क्या
नाराजगी कांग्रेस से छत्तीसगढ़ की जनता को हो गयी। पहले अजीत जोगी ही
काफी थे। अब दिग्विजय सिंह भी छत्तीसगढ़ में घुसने का अवसर तलाश रहे हैं।
कुछ कांग्रेसियों की तो राय है कि दिग्विजय सिंह को छत्तीसगढ़ का प्रभारी
महासचिव बना देना चाहिए। ये वे लोग है जो कभी दिग्विजय सिंह की कृपा से
सत्ता सुख भोगते रहे। दिग्विजय सिंह को भी शायद दिखायी देता हो कि
छत्तीसगढ़ की नेतृत्व विहीन और गुटों में बंटी कांग्रेस में उनके लिए
अच्छा अवसर है तो आश्चर्य की बात नहीं।

दिग्विजय सिंह ने कहा है कि नक्सलियों से सांठगांठ कर भाजपा ने बस्तर से
चुनाव जीता। इसके पूर्व जब अजीत जोगी मुख्यमंत्री थे और विधानसभा का
चुनाव हुआ था तब हारने पर अजीत जोगी ने आरोप लगाया था कि सशस्त्र बलों की
मदद से भाजपा के पक्ष में मतदान कराया गया। इस बार तो केंद्र में राजग की
नहीं कांग्रेस गठबंधन की सरकार थी तो आरोप लगाया नहीं जा सकता था।
क्योंकि सशस्त्र बल तो केंद्र सरकार के अधीन है लेकिन पहले की तुलना में
इस बार भाजपा ने कांग्रेस का तो बस्तर में करीब-करीब सूपड़ा साफ कर दिया।
कोई भी व्यक्ति यह बात मान नहीं सकता कि जिस पार्टी की सरकार नक्सलियों
के विरुद्ध अघोषित युद्ध ही छेड़े हुए हैं, उस पार्टी के प्रत्याशियों को
नक्सली चुनाव में जीतने में मदद करेंगे। दिग्विजय सिंह कहते है कि जो
ज्यादा देता है, नक्सली उसका समर्थन करते हैं तो इससे एक बात तो स्पष्ट
होती है कि दिग्विजय सिंह को इसका अच्छा खासा अनुभव है और पहले कांग्रेस
बस्तर में चुनाव नक्सलियों के समर्थन से जीतती रही है।

डॉ. रमन सिंह ने तो दिग्विजय सिंह को जहां चाहें वहां खुली बहस की चुनौती
दी है। अब दिग्विजय सिंह तय कर लें कि वे छत्तीसगढ़ में बहस करेंगे या
दिल्ली में। इसके पहले वे आलाकमान से अवश्य सलाह कर लें। क्योंकि यदि वे
खुली बहस में हार गए तो नुकसान कांग्रेस को होगा। वैसे भी वे केंद्र की
नीतियों को नुकसान तो पहुंचा रहे हैं और उन्हें पार्टी फोरम में अपने
विचार रखने के निर्देश भी मिल चुके हैं। चिदंबरम से तो वे पार पा नहीं
सके। अब डॉ. रमन सिंह से सोचते हैं कि पार पा लेंगे तो उनकी गलतफहमी दूर
हो जाना चाहिए। वैसे भी दिग्भ्रमित व्यक्ति कह कर डॉ. रमन सिंह ने
दिग्विजय सिंह के अहंकार को चिकोटी तो काटी है।

- विष्णु सिन्हा
दिनांक : 03.05.2010

2 टिप्‍पणियां:

  1. ये सब एक ही हैं ,बाकि जनता भ्रमित है /अच्छी प्रस्तुती के लिए आपका धन्यवाद /

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  2. राजनीति का यह वाक्युद्ध ही समाचार माध्यमों की रूचि होती है और इस रोचकता से ही आम आदमी राजनीति की एबीसी से परिचित होता है।

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