यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं

सोमवार, 17 मई 2010

और कितनों को मारोगे, मारना ही समस्या का हल होता तो समस्याएं हल न हो जाती

आज सबसे सस्ती चीज कोई हो गयी है तो वह आदमी की जान है। खासकर उन लोगों
के लिए जो माओवाद के नाम पर एक ही काम करना जानते हैं, जान से मारना।
किसी को फांसी पर लटकाकर मारते हैं तो किसी को पत्थरों से तो किसी को
गोलियों से। यह 21 वीं सदी का सच है। कोई प्राचीन आदिमयुगीन कहानी नहीं
है। आधुनिक मानव, विकसित भारत, जिसे अब जंगली जानवरों का डर नहीं है
बल्कि जानवर ही उससे भय खाते है लेकिन आदमी का सबसे बडा दुश्मन आदमी ही
बना हुआ है। सामंतवाद में भी सभी राजा इतने क्रूर नहीं थे जितने क्रूर ये
माओवादी दिखायी दे रहे हैं। जिन इंसानों की भलाई के लिए इंसानों को मारते
हैं, उससे कोई भी कैसे सहमत हो सकता है? भय, आतंक पैदा कर जो अपनी बात को
सही सिद्घ करना चाहते हैं, उनका वास्तव में धोखे से भी शासन हो गया तो
आदमी कल्पना भी नहीं कर सकता कि उसकी क्या हालत होगी?

स्वतंत्र भारत में आपातकाल को तो लोगों ने स्वीकार नहीं किया। जिसमें
अभिव्यक्ति की आजादी छीन ली गई थी। विरोधी विचारकों को जेल के सींखचों मे
कैद कर दिया गया था। जब उसके लिए लोगों ने इंदिरा गांधी को माफ नहीं किया
और उन्हें सत्ता के सिंहासन से उतार दिया तो माओवादियों को लोग कैसे
स्वीकार कर सकते हैं? इंसान की जान न हुई मिटटी का खिलौना हो गया कि जब
चाहे तोड़ डाला। जिन हथियारों का निर्माण दुर्जनों से निपटने के लिए
किया गया था, उन्हीं हथियारों का उपयोग दुर्जन सज्जनों को मारने के लिए
कर रहे हैं और मानवाधिकार की दुहाई देने वाले लापता हैं। उन्होंने अपनी
जबान हिलाना भी जरूरी नहीं समझा कि माओवादियों की हिंसा गलत है। कहां गए
वे गांधी की अनुयायी जो सत्य अहिंसा से अंग्रेजों से देश को आजाद कराने
में तो सफल हो गए लेकिन इन माओवादियों को समझाने के लिए उनके बीच जाने से
कतराते हैं। वे बुद्घिजीवी जो बढ़ चढ़कर माओवादियों का स्तुतगान करते
हैं। अंग्रेजी भाषा में अपनी बुद्घि का प्रदर्शन करते हैं और
अंतराष्ट्रीय पुरस्कारों के हकदार बनते हैं। निर्दोष नागरिकों की
हत्या की निंदा करना तो दूर की बात है, जो शोक प्रगट करने के लिए भी आगे
नही आते।

शायद ही कोई दिन जाता है जब कही न कहीं माओवादी किसी न किसी की हत्या न
करते हों। पिछले 1 माह में छत्तीसगढ़ में जवानों और निर्दोष नागरिकों के
कत्ल तो यही साबित करता है कि इन माओवादियों को इंसानी खून देखकर ही चैन
आता है। 100 लोग छत्तीसगढ़ में ही मार दिए गए। ग्रीन हंट बंद करो। हमारे
विरूद्घ पुलिस को कोई जानकारी देगा तो सजा मौत। सरकार है कि उच्चतम
न्यायालय के द्वारा फाँसी की सजा पाए लोगो को भी फाँसी पर चढ़ाने से
हिचकती है। राष्टपति को दया की अपील के सहारे अपराधी जेल में अपना
वक्त गुजारते हैं। यहां तक कि बर्बर, राष्ट्र विरोधी अपराधियों के साथ
भी कानून का सलूक निर्मम नहीं है। गवाही, सबूत न मिले तो अपराधी भी छूट
जाते हैं। फिर अदालतों की भी श्रेणियां हैं। निचली अदालत से ही सजा होने
में वर्षों लगता है और फिर उच्च न्यायालय, उच्चतम न्यायालय का सफर
निर्मम हत्यारों को भी जीने का पर्याप्त अवसर देता है।

कसाब जैसे अपराधी को भी फाँसी की सजा तुरत फुरत नहीं दे दी जाती। जबकि
उसके गुनाहगार होने में किसी को कोई शक संदेह नहीं है। न तो सबूतों की
कमी है और न ही गवाहों की। फिर भी न्याय की एक प्रक्रिया है और उसका
पालन किया जाता है। इससे जनता कसाब जैसे मामलों में नाराज भी होती है।
क्योंकि जनता की इच्छा तो यही है कि उसे तुरंत फांसी पर खुलेआम लटका
दिया जाए। कसाब जैसे जघन्य अपराधी को भी माफ करने का भाव एक महिला ने
प्रगट किया है। जिसके पति और पुत्र की हत्या मुंबई हमले के समय की गई।
इंसानियत, मनुष्यता बहुत ही उच्च भाव है और मनुष्य से उम्मीद की जाती है
कि वह अपने जीवन में उच्च नैतिक मूल्यों को बढ़ावा दे। इसीलिए उच्च
मूल्यों का पालन करने वाले और उसकी शिक्षा मनुष्य को देने वाले तो अमर हो
जाते हैं लेकिन क्रूर हत्यारों को इतिहास याद भी नहीं रखना चाहता। याद भी
रखता है तो उन लोगों को जो महान आत्माओं के संसर्ग से अपने क्रूर जीवन को
त्यागकर इंसानियत के रास्ते पर चलने को तैयार होते हैं।

हिटलर, मुसोलिनी, स्टालिन जैसों की आज कोई मानवतावादी सम्मान नही करता।
इन पर करोड़ों मनुष्यों की हत्या का जुर्म है। ये ही कहां सफल हुए?
हिंसा से आदमी को भयभीत किया जा सकता है और उसके भय का शोषण किया जा सकता
है। माओवादी भी आदिवासियों को शोषण से बचाने के लिए उनके बीच आए थे
लेकिन आज वे ही सबसे बड़े शोषणकर्ता बन गए। आखिर 1500 करोड़ रूपये आते
कहाँ से हैं। छोटा कारोबार नहीं है। क्यों भ्रष्ट अधिकारियों, ठेकेदारों
को नक्सलियों से कोई भय नहीं है। कैसे तेंदूपत्ता ठेकेदारों की जीप
दनदनाती हुई घुमती है। साफ है कि ये माओवादियों को धन देते हैं और धन
देने वाला किसे खराब लगता है। आखिर इस धन के सहारे ही तो हथियार, गोला
बारूद, माओवादियों का वेतन निकलता है। माओवाद के नाम पर जो लड़ रहे हैं
वे कोई स्वयं सेवक तो हैं नहीं। आत्मसमर्पण करने वाली महिला माओवादियों
ने तो शारीरिक शोषण का भी आरोप लगाया है। जबरदस्ती विवाह के भी आरोप
हैं।

साफ मतलब है कि माओवादी पूरी तरह से तानाशाही पर विश्वास करते हैं।
दुनिया की आज जो स्थिति है, उसमें इक्का दुक्का जगह तानाशाही अवश्य है
लेकिन वह तानाशाही का कवच भी टूट रहा है। जो पीढ़ी आ रही है, वह
स्वतंत्रता का स्वाद चख चुकी है। भूख भी बर्दाश्त है लेकिन तानाशाही
नहीं। मौत डराती है, यह सच है लेकिन यह भी सच है कि एकमात्र निश्चित कोई
घटना मनुष्य के साथ घटित होती है तो वह मौत ही है। जो पैदा हुआ। चाहे वह
रंक हो या राजा, महात्मा हो या शैतान मृत्यु से बच नहीं पाया। बचपन,
जवानी, बुढ़ापा,रोग यह सब ऐसे समय के साथ घटित होने वाले परिवर्तन है कि
व्यक्ति अभी तक तो इससे बच नहीं सका। माओवादी भी जब बीमार पड़ते हैं तो
चिकित्सक की ही शरण में उन्हें जाना पड़ता है। असली बात मारना नहीं
जिलाना है और मार देना तो पल भर का काम है। जबकि एक बच्चे को पैदा करने
से लेकर बड़ा करना बहुत क्रियाशीलता और त्याग का काम है। आदमी का बच्चा
ही सबसे कमजोर होता है। यदि उसे जन्म देते ही मां छोड़ दे और कोई मनुष्य
उसे पालने के लिए न मिले तो उसका बचना असंभव है।

पृथ्वी में अपने को बचाने क लिए मनुष्य ने क्या नहीं किया ओर आज उसी का
परिणाम है कि मनुष्य ने विकास के नए आयाम छुए। आज मनुष्य सभी समस्याओं का
हल करने की स्थिति मे है। सभी सुविधाएं उसे उपलब्ध करायी जा सकती है।
मनुष्य आज अधिक शांति से रह सकता है लेकिन उसके लिए हिंसा से परहेज करने
की जरूरत है। हिंसा सिवाय नुकसान के और कुछ मनुष्य को नहीं दे सकती। वह
मिटा सकती है, निर्मित नहीं कर सकती। हर वह विचार जो हिंसा के लिए
प्रेरित करता है, वह विचार मनुष्य के विरूद्घ है। भले ही उस पर चाशनी
मनुष्य की भलाई की लगायी जाए। नक्सली इस बात को जितना जल्दी समझेंगे,
उतनी ही जल्दी लोगों का भला होगा

- विष्णु सिन्हा
17-04-2010
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1 टिप्पणी:

  1. जबतक सरकार मौन रहेगी और तमाशा बीन बनी देखती रहेगी तब तक ऐसी घटनाऐं होती ही रहेंगी ।

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