यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं

गुरुवार, 6 मई 2010

शांति न्याय यात्रा नहीं नक्सलियों को समझा सकते हैं हिंसा छोडऩे के लिए

तो समझाएं प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी क्या सोच कर दिल्ली से रायपुर आए थे?
आपरेशन ग्रीनहंट रोकने के लिए रायपुर से दंतेवाड़ा तक शांति न्याय यात्रा
निकालेंगे तो लोग गर्मजोशी से उनका स्वागत करेंगे। हिंसा के विरुद्ध उनकी
सोच और यात्रा का परिणाम दोनों पक्ष पर अच्छा पड़ेगा। सरकार आपरेशन
ग्रीनहंट रोकेगी तो नक्सली हथियार छोड़कर मुख्य धारा में आएंगे लेकिन इन
बुद्धिजीवियों को राजनैतिक कार्यकर्ताओं ने नक्सली समर्थक समझा। भाजपा के
कार्यकर्ता ही नहीं कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने भी इनके विरोध में नारे
लगाए। टाउन हाल में होने वाली आमसभा विरोध प्रदर्शन के कारण नहीं हो
पायी। बुद्धिजीवी चिल्लाते रहे कि समस्या का समाधान गांधीवादी तरीके से
निकाला जाए लेकिन प्रदर्शनकारी सुनने के लिए तैयार नहीं हुए। इसी से समझ
में आ जाता है कि बुद्धिजीवियों के प्रति एक स्पष्ट सोच स्थापित हो गयी
है कि ये नक्सलियों के समर्थक हैं और इनकी सोच के कारण ही नक्सली फल-फूल
रहे हैं। कल आए प्रतिष्ठित बुद्धिजीवियों की राय भले ही नक्सलियों की
हिंसा के पक्ष में न हो लेकिन अभी तक आए बुद्धिजीवियों ने तो ऐसा ही
माहौल पैदा किया कि सरकार जो गोलियों का जवाब गोलियों से दे रही है, वह
गलत है।


सरकारी हिंसा ठीक नहीं है। तो सरकार क्या करे? नक्सलियों के हाथ पैर
जोड़े और कहें कि जो आपकी जो इच्छा हो करें। सरकार बीच में नहीं आएगी।
नक्सली जैसा चाहें वैसा निर्दोष नागरिकों के साथ व्यवहार करे। यह कहना कि
भारतीयों के विरुद्ध फौज का इस्तेमाल गलत है, कहां तक ठीक है। सरकार फौज
या सशस्त्र बल का उपयोग आतंक फैलाने के लिए नहीं करती बल्कि जो आतंक
फैलाते हैं, उनके विरुद्ध करती है। कानून का शासन हो इसलिए सरकार को गोली
का जवाब गोली से देने के लिए बाध्य होना पड़ता है। देश में संविधान से
परे जाकर कोई अपना कानून चलाने की कोशिश करे तो सरकार क्या हाथ पर हाथ रख
कर बैठी रहे? दया, मया, करुणा, अहिंसा सब अच्छे गुण हैं और इन गुणों का
पोषण भी होना चाहिए लेकिन यह एक तरफा मामला नहीं है। मुंबई हमले में
पकड़े गए आतंकी कसाब के विषय में हर पीडि़त पक्ष की यही राय है कि उसे
फांसी की सजा हो जानी चाहिए और वह भी जनता के सामने। कितने ही लोग हैं जो
नक्सलियों की गोली से मारे गए, उनके परिवार की भी यही इच्छा है कि जैसे
उनका रिश्तेदार मारा गया, उसी तरह से नक्सली भी मारे जाएं। सरकार तो एक
बार हथियार रखकर नक्सली बात करने के लिए तैयार हों तो उनके साथ
करुणापूर्वक बात करने के लिए भी तैयार है। सरकार तो उन्हें सजा देने के
बदले माफ भी कर सकती है लेकिन जो लोग मारे गए नक्सलियों के हाथ से उनके
साथ क्या अहिंसा, करुणा से इंसाफ होगा?

प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी यदि वास्तव में सिर्फ प्रचार के लिए शांति न्याय
यात्रा नहीं कर रहे हैं तो उन्हें नक्सलियों से वार्ता करना चाहिए।
नक्सलियों को समझाना चाहिए कि उनका रास्ता ठीक नहीं है। हिंसा के रास्ते
से कुछ पाया नहीं जा सकता और न ही किसी का भला किया जा सकता है। सरकार को
समझाने की जरुरत नहीं है। सरकार तो समझी समझायी हुई है। चिदंबरम अभी भी
कह रहे हैं कि 72 घंटे तक हिंसा बंद करो और वार्ता करो। सरकार कहां
वार्ता से घबरा रही है लेकिन वास्तव में नक्सली वार्ता से कोई रास्ता
निकालना चाहें तो सरकार तो एक पैर पर खड़ी हैं। सरकार ने तो समर्पण करने
वाले नक्सलियों के लिए आर्थिक पैकेज की भी घोषणा कर रखी है। सरकार
ग्रीनहंट बंद करे तो नक्सली वार्ता के विषय में सोचेंगे, यह बात उचित
नहीं है। सरकार कहां हिंसा कर रही है। सरकार तो समर्पण का अवसर देती है।
पकड़ सकती है तो पकड़ती है। सीधे ही गोली नहीं मार देती लेकिन जब सशस्त्र
बल पर नक्सली गोलियां चलाएं तो सशस्त्र बल अहिंसा का मार्ग नहीं पकड़
सकते। क्योंकि वे अहिंसा का मार्ग पकड़ेंगे तो सिर्फ मारे जाएंगे। उनका
कर्तव्य है कि वे गोलियों का जवाब गोलियों से दें।

नक्सल समस्या कोई नई तो नहीं है। पहले बुद्धिजीवी कहां थे। जब तक सरकारों
ने नक्सलियों से नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को मुक्त कराने का प्रयास नहीं
किया था तब तक नक्सल प्रभावित क्षेत्र के लोग किस आतंक के साए में अपनी
जिंदगी गुजार रहे थे, इसका बोध बुद्धिजीवियों को नहीं था। बुद्धिजीवियों
को गलतफहमी है कि वे बातों से हर समस्या का हल निकाल सकते हैं। काश ऐसा
संभव होता तो दुनिया में कोई समस्या ही नहीं होती। क्योंकि बुद्धिजीवी
कोई आज ही पैदा हो गए, ऐसा तो नहीं है। मनुष्य को तो पशुओं से अलग बुद्धि
ही करती है। मनुष्य मात्र बुद्धिजीवी है। सारे वाद बुद्धि की ही तो देन
है। कोई किसी वाद को ठीक समझता है तो कोई किसी वाद को। नक्सली समझते हैं
कि क्रांति बंदूक की गोली से होती है। यह भी बुद्धि से ही पैदा हुआ विचार
है। माक्र्स और माओ जैसे बुद्धिजीवियों की देन है, यह विचार। सत्य और
अहिंसा भी इसी तरह का विचार है। भारत के मान से तो पुराना विचार है। जिसे
अंगेजों के विरुद्ध महात्मा गांधी ने उपयोग किया लेकिन उस समय भी बहुत से
लोग थे, इस देश में जो अहिंसा का मजाक उड़ाते थे और बिना हिंसा के आजादी
की कल्पना नहीं करते थे। उन्होंने भी अपनी तरह से कोशिश की। फांसी के
फंदे पर झूल गए। जो भी जिस विचार को मानता है, वह उसे ही सर्वोत्तम समझता
है। लड़ाई बंदूक से लड़ी जाए या सत्याग्रह से, लड़ाई मूलत: तो विचारों की
है और विचार पैदा होते है, बुद्धि से।

प्रजातंत्र में सत्ता की जंग भी तो विचार की जंग है। किसकी विचारधारा से
कितने लोग प्रभावित होते हैं, इसी पर सत्ता का अंकगणित निर्भर करता है।
सत्ता प्राप्त करने के लिए विचारधारा भले ही एक आड़ की तरह काम करे लेकिन
जनता को अपने पक्ष में करने के लिए उपयोग तो उसी का किया जाता है।
कांग्रेस को ही देखें। महात्मा गांधी की कांग्रेस, स्वतंत्रता संग्राम की
कांग्रेस, 125 वर्ष पुरानी कांग्रेस। कांग्रेस क्या अपने जन्म के समय
जैसी थी, वैसी ही आज भी है। महात्मा गांधी के ही विचारों से कांग्रेस का
कितना लेना-देना हैं। जवाहर लाल नेहरु की कांग्रेस समाजवादी थी और आज
सोनिया गांधी की कांग्रेस पूंजीवादी है। एक अर्थशास्त्री देश का
प्रधानमंत्री है। इंदिरा गांधी की हत्या होने पर सिक्खों के साथ जो हिंसा
की गयी, वह भी कागंरेस का ही इतिहास है। अहिंसा पर चली कांग्रेस हिंसा
के आरोपों से आज तक बरी नहीं हो पायी।

यह सत्य है कि आम आदमी हिंसा को पसंद नहीं करता। क्योंकि हिंसा का अर्थ
होता है, आम आदमी का सीधा नुकसान। फिर भी समाज में हिंसा व्याप्त है।
व्यक्तिगत हिंसा भी हिंसा है लेकिन वह संगठित हिंसा की तरह खतरनाक नहीं
है। बड़े-बड़े संत, अवतार, महात्माओं ने जन्म लिया और उन्होंने हिंसा को
नहीं अहिंसा को, प्रेम को, करुणा को ही सर्वश्रेष्ठ मानवीय गुण कहा
लेकिन बढ़ती आबादी और बढ़ते हथियारों ने हिंसा का रुप ही बदल दिया।
हथियार पुलिस के पास हैं, फौज के पास हैं तो हथियार उनके पास भी हैं जो
मुकाबले में खड़े हैं। अवैध हथियारों का बड़ा बाजार है और उससे भी
बहुतेरों का हित निहित है। जब सबको अपने विचार ही ठीक लगते हों तो टकराव
तो होगा ही। बुद्धिजीवी प्रतिष्ठित समझते है कि नक्सलियों को वे अपने
विचारों से प्रभावित कर सकते हैं तो करें कोशिश। जाएं। उनके साथ रहें।
तभी तो दोनों एक दूसरे को समझ सकते हैं। सरकारें तो तैयार बैठे हैं कि
नक्सली हिंसा छोड़े तो वह सब करने के लिए तैयार है। जो भी उचित हैं।
लेकिन हथियार छोडऩे के लिए तैयार तो हों नक्सली।

- विष्णु सिन्हा
दिनांक : 06.05.2010
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2 टिप्‍पणियां:

  1. अक्षरक्ष: सत्य -

    नक्सल समस्या कोई नई तो नहीं है। पहले बुद्धिजीवी कहां थे। जब तक सरकारों ने नक्सलियों से नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को मुक्त कराने का प्रयास नहीं किया था तब तक नक्सल प्रभावित क्षेत्र के लोग किस आतंक के साए में अपनी जिंदगी गुजार रहे थे, इसका बोध बुद्धिजीवियों को नहीं था। बुद्धिजीवियों को गलतफहमी है कि वे बातों से हर समस्या का हल निकाल सकते हैं। काश ऐसा संभव होता तो दुनिया में कोई समस्या ही नहीं होती।

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  2. सहज ही समझ में आती है बात। शायद बुद्धिजीवी नहीं हैं हम, वर्ना बुद्धिजीवी भी समझ रहे होते।
    या फिर तथाकथित बुद्धिजीवी, अब कुछ आगे निकलने की कोशिश में - दुर्बुद्धिजीवी बनने चले हैं।
    बहुत अच्छा आलेख।

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