यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं

मंगलवार, 18 मई 2010

फौज भी लगाना जरुरी हो तो लगाने से चूकना नहीं चाहिए

नक्सलियों ने हिसा और आतंक का एक और काला अध्याय लिख दिया। यात्री बस को
बारुदी सुरंग से उड़ा कर निर्दोष नागरिकों के खून से होली खेल ली। हिंसक
जानवर का भी हिंसा से संबंध सिर्र्फ अपनी क्षुधा शांति तक ही रहता है।
जानवर तक पेट में भूख न हो तो किसी को मारना पसंद नहीं करते। इन इंसानों
को जो निर्दोष लोगों की हत्या करते है, नृशंस हिंसक जानवर भी नहीं कहा जा
सकता। गरीब निरीह जनता को शोषण से मुक्ति दिलाने के नाम पर उन्हीं की
हत्या के लिए तो भाषा को नया शब्द ही गढऩा पड़ेगा। कल तक जो नक्सलियों के
हिमायती बनते थे, आज उनकी जबान भी नक्सलियों के द्वारा की गई हत्या को
उचित ठहराने के लिए खुल नहीं रही है। यह सही है कि इस हत्याकांड से
छत्तीसगढ़ से लेकर दिल्ली तक हिल गयी है। आज प्रधानमंत्री सुरक्षा
संबंधी मामले की मंत्रिमंडलीय बैठक कर रहे हैं। यह तो सोचा ही नहीं जा
सकता कि इन हिंसक नक्सलियों के आगे कोई भी सरकार घुटने टेक देगी। सरकार
की मंशा अवश्य रही है कि अनावश्यक हिंसा के बिना भी मामला सुलझ जाए लेकिन
जब सामने वाला ताकत के बल पर निर्णय करना चाहता है तो सरकार की भी मजबूरी
है कि वह ताकत का जवाब ताकत से दे।

छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने पिछले दिनों कहा था कि नक्सलियों
के विरुद्ध लड़ाई को फौज के हवाले कर देना चाहिए। इसके पहले केंद्रीय गृह
मंत्री पी. चिदंबरम ने भी कहा था कि आवश्यकतानुसार वायुसेना का उपयोग
किया जाना चाहिए। आज जो स्थिति निर्मित हो गयी है, इसमें तो लगता है कि
दोनों गृहमंत्रियों की राय से केंद्र सरकार इत्तफाक करे तभी कारगर कदम
उठाए जा सकते हैं। यह सिर्फ अब पुलिस के बस की ही बात नहीं रह गयी।
अद्र्धसैनिक बलों के बस की भी बात नहीं दिखायी पड़ती। जिस तरह से नक्सली
आधुनिक युद्ध कला के विषय में सब कुछ समझते हैं तो उनसे मुकाबला भी उनसे
अधिक जानकारी रखने वाले ही कर सकते हैं। फौज के सिवाय तो और कोई दिखायी
नहीं देता जो नक्सलियों से मुकाबला कर सके। जहां तक प्रशिक्षण की बात है
तो उसके लिए समय चाहिए और मुकाबला करने की आज जरुरत है। समय और मिलेगा तो
नक्सली और मजबूत होंगे।

यह भी संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि लश्कर से भी नक्सलियों के संबंध
है। युद्ध कला का प्रशिक्षण लिट्टे से नक्सलियों को मिला है। अब केंद्र
सरकार भी यह बात मानने के लिए बाध्य हो गयी है कि नक्सली आतंकवादी हैं।
विस्फोट के बाद घायलों के पास जिस तरह से 3 घंटे तक कोई मदद नहीं पहुंच
सकी और घायल पानी के लिए तड़पते रहे, उससे यह भी समझ में आता है कि
दुर्गम स्थानों पर नक्सलियों से लडऩा आसान काम नहीं हैं। नक्सलियों का भय
इतना है कि आसपास के लोग मदद के लिए आगे नहीं आते। क्योंकि ये मदद करने
गए तो नक्सली इनकी जान के भी दुश्मन बन जाएंगे। सुरक्षा बलों के पक्ष में
स्थिति किसी भी कोण से नहीं दिखायी देती। लड़ाई में वह तो भारी पड़ेगा
ही जिसका सारा क्षेत्र अच्छी तरह से देखाभाला है। यह सही है कि जो
निर्देश दिए गए हैं उनका पालन न होना भी घटनाओं के लिए जिम्मेदार है।
कड़ी चेतावनी के बावजूद यात्री बसों में यात्रा भी मौत का कारण बनी।
लेकिन नक्सलियों के नेटवर्क का भी इसी से पता चलता है। यात्री बस के
छूटने के मात्र 45 मिनट बाद घटना को अंजाम देने का तो यही अर्थ है।
नक्सलियों का आतंक इतना है कि पुलिस के लिए मुखबिरी करना प्राण संकट में
डालना है। जरा सा भी भान होने पर कि फलां व्यक्ति पुलिस का मुखबिर है। वह
हो न हो। जान से हाथ गंवाना पड़ता है। स्वाभाविक रुप से भय पैदा होता है
और भय पैदा करना ही तो आतंक है। और आतंक कहते किसे हैं? झारखंड में तो
नक्सलियों ने फरमान जारी कर दिया है कि कि कांग्रेस छोड़ दो। कल ही एक
कांग्रेसी को पहले गोली मारी गई और फिर उसे जिंदा जला दिया गया। गोली
मारना, जिंदा जला देना, सामान्य आदमी के मन में भय का ही संचार करता है।
आज दुनिया भर में आतंक एक कारोबार के रुप में पनप रहा है। रुप उसका कैसा
भी हो, नाम उसका कुछ भी हो, आतंक ने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले
लिया है। इन आतंकवादियों में आपसी संबंध भी स्थापित हो जाते है। फिर
बारुद और हथियार का कारोबार करने वाले है। उनका तो हित इसी में है कि
अधिक से अधिक आतंकवादी फैलें तो उसका कारोबार फले फूले।

जान देने के लिए तैयार करने के लिए आस्था, शोषण, विचार की घुट्टी पिलायी
जाती है। यह तो बाद में पता चलता है कि जो हितैषी बनकर आए थे, वे ही अब
हर तरह के शोषक बन गए। इनके चंगुल से मुक्त होना भी आसान काम नहीं है।
लंका में ही लिट्टे से निपटने में सरकार को वर्षों लगे। किसी भी तरह की
नरमी काम नहीं आयी बल्कि सरकार नरमी बरतती थी तो लिट्टे और हिंसक हो
जाता था। अंतत: पूरी सेना को लंका सरकार को झोंकना पड़ा। हजारों लोग मारे
गए। निर्दोष लोग जो लिट्टे के द्वारा बंधक बनाकर सुरक्षा कवच के रुप में
रखे गए थे, वे मारे गए। तब कहीं जाफना पर लंका सरकार का कब्जा हुआ। पंजाब
में भी जब आतंकवाद चरम सीमा पर था तब के पी एस गिल को पूरी ताकत से उनसे
लडऩा पड़ा। पंजाब के आतंकवाद ने इंदिरा गांधी की जान ली तो लिट्टे ने
राजीव गांधी की।

कांग्रेस स्वयं आतंकवाद की भुक्तभोगी रही है। आज केंद्र में उसकी गठबंधन
की सरकार है। विपक्ष के दल भी नक्सलियों से लडऩे में सरकार को पूरा
समर्थन कर रहे हैं। यहां तक कि वामपंथी भी। लडऩे के मामले में जो
विरोधाभास है, वह कांग्रेस के अंदर ही है। गृहमंत्री चिदंबरम का विरोध
कोई करता है तो वे कांग्रेसी ही है। लडऩा तो सरकार को नक्सलियों से
पड़ेगा ही और वह लड़ भी रही है लेकिन प्रश्र यही है कि वह सुरक्षात्मक कब
तक नक्सलियों से लड़ेगी। इससे तो नक्सलियों का ही मनोबल बढ़ता है। वे
हिंसा के लिए और उत्साहित होते है। उनके द्वारा की गई हत्या से रायपुर से
लेकर दिल्ली तक हलचल मचती है तो इसे वे अपनी जीत के रुप में ही लेते
हैं। जिस तरह से काश्मीर में सीमापार आतंकवादियों से फौज ने लड़ाई लड़ी,
उसी तरह की लड़ाई की अब छत्तीसगढ़ में जरुरत है। छत्तीसगढ़ में ही नहीं
पूरे नक्सली बेल्ट में जरुरत है।

जो लोग हत्या पर राजनीति कर रहे हैं, उनसे भी निपटने की जिम्मेदारी
कांग्रेस की है। इस तरह की राजनीति का प्रभाव आम जनता पर अच्छा नहीं
पड़ता। सिर्र्फराज्य सरकार की जिम्मेदारी है, ऐसा कहने से भी काम नहीं
चलेगा। क्योंकि यह कोई छत्तीसगढ़ की समस्या नहीं है। यदि यह सिर्फ एक
राज्य का मामला होता तो सरकार निपट भी लेती। राज्यों में समन्वय हो और
केंद्र सरकार इसकी निगरानी करे, इसी की आवश्यकता है चिदंबरम रायपुर में
पुलिस महानिदेशकों की बैठक करने वाले है। यह अच्छा तरीका है। सब मिल
जुलकर समस्या से निपटेंगे तो समस्या का हल अवश्य निकलेगा लेकिन एक राज्य
तो पूरी ताकत से लड़े और दूसरे राज्य पर्याप्त सहयोग दें तो इसी का तो
फायदा नक्सली उठाते हैं। फिर छत्तीसगढ़ ऐसा राज्य है जो चारों तरफ से
नक्सल प्रभावित राज्यों से घिरा हुआ है। एक राज्य की भी लापरवाही
छत्तीसगढ़ को भारी पड़ती है। बस्तर कोई एक संभाग मात्र नहीं है बल्कि
केरल राज्य से बड़ा भू-भाग है। जंगल, पहाड़ों से भरा यह क्षेत्र
नक्सलियों को सुरक्षा देता है। आबादी कम है और पहुंच मार्ग न होने से
संपर्र्क करना कठिन होता है। इसलिए सारी परिस्थितियों को गौर करते हुए
विस्तारित रणनीति बनाने की जरुरत है। जिस भी सेना को लगाने की आवश्यकता
महसूस हो उसे लगाने से हिचकना नहीं चाहिए ।

- विष्णु सिन्हा
दिनांक 18.05.2010
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2 टिप्‍पणियां:

  1. फौज लगाने के लिए दिल में निष्पक्षता और इच्छा शक्ति भी तो होनी चाहिए सिन्हा साहब , जो फिलहाल नहीं दीखती ! ये सिर्फ बात करने का ड्रामा ही कर सकते है और कुछ नहीं !

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  2. सरकार दृढप्रतिज्ञ हो,तो इसकी ज़रूरत शायद ही पड़े।

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