यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं

शनिवार, 6 फ़रवरी 2010

मुंबई जाकर शिवसेना को जो जवाब राहुल ने दिया उससे उनकी विश्वसनीयता बढ़ी


राहुल गांधी की जितनी तारीफ की जाए, कम है। मुंबई की लोकल ट्रेन  में सफर कर जिस तरह से उन्होंने ठाकरों के विरोध प्रदर्शन की हवा निकाल दी, वह लाजवाब है। अभी तक तो मुंबई से बाहर रह कर बड़े-बड़े राजनेता सिर्फ बातें करते रहे लेकिन राहुल ने शिवसेना के काले झंडे दिखाने और विरोध प्रदर्शन की परवाह नहीं करते हुए, मुंबई की लोकल ट्रेन से स्वयं टिकट खरीद कर सफर किया और सहयात्रियों से चर्चा की और उनके मुंह से कहलवा दिया कि मुंबई सबकी है, यह पूरी तरह से ठाकरों की दहाड़ का जवाब था। राहुल से हाथ मिलाने, ऑटोग्राफ लेने के लिए जैसे लोग उतावले हो रहे थे और अपने बीच राहुल गांधी को देख कर लोग उत्साहित हो रहे थे, वह नजारा वास्तव में बेमिसाल है। टीवी के माध्यम से सारे देश ने इस नजारे को देखा और महसूस किया कि युवा नेता किसी से भी दमखम में कमजोर नहीं है। शिवसेना ने तो चुनौती दी थी कि राहुल गांधी मुंबई आकर देखें। हो गया उल्टा। राहुल गांधी मुंबई आए और उन्होंने मुंबईकरों को देखा लेकिन शिवसेना देखते ही रह गयी और कुछ कर नहीं पायी।

जैसी व्यवस्था राहुल गांधी की सुरक्षा के लिए की गयी थी, वैसी ही व्यवस्था सुरक्षा आम आदमियों के लिए की जाए तो कोई हिम्मत नहीं कर सकता, कानून को हाथ में लेकर मनमानी करने की। काश जब राज ठाकरे के सैनिक मुंबई की सड़कों पर रेहड़ी वालों को, टैक्सी वालों को, प्रतियोगी परीक्षा में सम्मिलित होने आए युवकों को मार रहे थे, तब पुलिस ने सख्ती दिखायी होती तो इनके दिमाग सातवें आसमान पर नहीं चढ़े होते। बाल ठाकरे सामना में भले ही लिखें कि वे हताश नहीं है लेकिन उनकी हताशा तो इसी से प्रगट होती है कि वे राहुल गांधी को इटैलयिन राजपुत्र की संज्ञा देते हैं। एक तो प्रजातंत्र में कोई राजपुत्र नहीं होता लेकिन फिर भी मान लें कि राहुल गांधी राजपुत्र हैं तो वे नेहरु गांधी परिवार के राजपुत्र हैं। उनकी माता के  इटली से होने से वे कैसे इटैलियन राजपुत्र हो गए। वैसे भी सोनिया गांधी इटली के किसी राजपरिवार की सदस्य तो हैं, नहीं। 


प्रजातंत्र में तो राजा वही है जिसे जनता का समर्थन मिले। हर 5 वर्ष में जनता के पास समर्थन के लिए जाना पड़ता है। आज दिल्ली की केंद्र सरकार में कांग्रेस है तो वह जनता के समर्थन के कारण है। यदि राहुल गांधी राजपुत्र हैं तो भारतीय जनता के समर्थन के कारण। महाराष्ट्र  में भी उन्हीं की पार्टी सबसे बड़ी है। सबसे ज्यादा समर्थन महाराष्ट्र में उनके पास ही है। मराठी मानुष के मन में संकीर्णता का हर तरह का विष भरने की कोशिश कर भी ठाकरे परिवार जनता के पूरे समर्थन का क्या, आधे समर्थन का भी हकदार नहीं बन सका। शिवसेना के प्रति मुंबईकरों का ऐसा ही समर्थन होता तो पूरी मुंबई बाल ठाकरे के आव्हान पर काले झंडे दिखाने के लिए सड़क पर उतर जाती। ऐसा कुछ नहीं है कि मराठियों का समर्थन शिवसेना या मनसे के साथ है। 


मुंबई के पुलिस कमिश्नर ने शाहरुख खान की फिल्म के प्रदर्शन के दौरान थिएटरों में हर तरह की सुरक्षा का आश्वासन दिया है। कुछ शिवसैनिक शाहरुख के निवास स्थान पर प्रदर्शन भी कर आए। अब बाल ठाकरे ने भी कह दिया है कि शिव सेना शाहरुख की फिल्म का विरोध नहीं करेगी। शाहरुख के समर्थन में तो सलमान खान भी उतर आए है। अभिषेक बच्चन ने भी समर्थन किया है। बाल ठाकरे को समझ में आ गया है कि फिज़ा बदल रही है। राहुल गांधी की मुंबई यात्रा से माहौल पूरी तरह से बदल गया है। महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार को भी स्पष्ट निर्देश मिल गया है। सरकार ठाकरों के विरुद्ध कार्यवाही के लिए कानूनी सलाह ले रही है। आगे उम्मीद करना चाहिए कि अब राजनैतिक गुंडागर्दी नहीं चलेगी और कोई करने की कोशिश करेगा तो उसे मुंह की खानी पड़ेगी।


सरकार की चुप्पी के कारण शिवसेना का ही नहीं राज ठाकरे का भी मनोबल बढ़ा हुआ था। वे तो धमकी दे रहे थे कि मराठियों के साथ न्याय नहीं हुआ तो महाराष्ट्र  में राष्ट्र से अलग होने की भावना भी जन्म ले सकती है। मतलब साफ था कि मेरी मानो, मेरे अनुसार चलो, नहीं तो पृथक होने का आंदोलन प्रारंभ हो जाएगा। इतना कहने की हिम्मत इसीलिए आयी क्योंकि उनके नाजायज कृत्य बेलगाम चल रहे थे। कोई रोकने वाला नहीं था। कानूनी कार्यवाही की भी गयी तो इतनी लचीली की कोर्ट से जमानत हो जाए। किसी को भी इतना शह मिलेगा तो उसके हौसले बढ़ेंगे ही। चुनावी लाभ उठाने के लिए हौसला बढ़ाने की जिम्मेदारी भी तो कांग्रेस सरकार पर ही है। नहीं तो राहुल गांधी को चुनौती देने की हिम्मत कहां से आयी। राहुल गांधी तो चुनौती का जवाब दे चुके। अब कांग्रेस सरकार का काम है कि वे ऐसे तत्वों पर निगरानी रखें। 



राहुल गांधी ने बिहार के मतदाताओं को भी बता दिया है कि उन्होंने बिहार में जो कहा, वह कर के दिखा दिया। मुंबई और महाराष्ट्र  सारे भारत का है। हो सकता है बिहार का युवा इससे प्रभावित हो और कांग्रेस को आने वाले चुनाव में इसका लाभ मिले। कहा जा रहा है कि देश का 50 प्रतिशत मतदाता युवा है और राहुल गांधी युवाओं, छात्रों को ही कांग्रेस के प्रति आकर्षित करने में लगे हैं। भारत में आज राष्ट्रीय स्तर पर सबसे युवा नेता राहुल गांधी ही हैं। जिस तरह से वे युवा पीढ़ी को आकर्षित कर रहे हैं, उससे कांग्रेस को लाभ ही होगा। वे युवक कांग्रेस के चुनाव करवा रहे हैं। जिससे युवा लोगों को आगे आने का मौका मिले। एनएसयूआई के भी पदाधिकारी चुनाव के द्वारा बनाए जा रहे हैं। फिर भी पुराने नेता अपने खेल से बाज नहीं आ रहे है। वे प्रत्यक्ष रुप से हस्तक्षेप कर अपने प्रत्याशी को पद पर बिठाने के लिए हर तरह का प्रयास कर रहे हैं। ये नेता यदि सफल होते है तो राहुल गांधी जो चाहते हैं, वह सफल नहीं होगा। युवा पीढ़ी साफ सुथरी राजनीति हो तब ही राजनीति में टिक सकती है। योग्य व्यक्ति जरुरी नहीं कि जोड़ तोड़ की राजनीति को पसंद करे। फिर पुराने नेताओं के मोहरे ही यदि पदारुढ़ हुए तो वह सब नहीं हो सकेगा जो राहुल गांधी चाहते हैं।

इसके लिए जरुरी है कि युवक कांग्रेस और एनएसयूआई के नए राज्यवार पदाधिकारियों को राहुल गांधी का सीधा संरक्षण मिले। जिससे ये सीधे-सीधे जनता से जुड़ें। जहां भी कांग्रेस का नया फ्रेश चेहरा दिखायी देता है लोग कांग्रेस का समर्थन करना चाहते हैं लेकिन जब देखते हैं कि उसके साथ वही पुराना कांग्रेसी है तो मन फिर जनता का बदल जाता है। ऐसे में राहुल गांधी जो भी कर रहे हैं, वह तो ठीक है लेकिन इसके साथ ही उन्हें कांग्रेस संगठन को पाक साफ कैसे किया जाए, इस पर भी ध्यान देना चाहिए। भारतीय युवा बड़ी आशा भरी नजरों से उनकी तरफ देख रहे हैं। ऐसा ही उन्होंने राजीव गांधी की तरफ भी देखा था। राजीव गांधी भारत को कम्प्यूटर युग में नहीं लाते तो देश में युवाओं के लिए रोजगार  के जो अवसर बढ़े और अमेरिका तक मानने लगा कि भविष्य भारत का है, वह स्थिति खड़ी नहीं होती। अब देश के सामने राहुल गांधी है और उन्होंने शिव सेना को मुंबई जाकर जो जवाब दिया है, उससे स्वाभाविक रुप से उनके प्रति विश्वास बढ़ा है।



- विष्णु सिन्हा

दिनांक 06.02.2010

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सही लिखा है आपने। कही राहुल गान्धी मे उमीद की किरन जरूर नज़र आती है। धन्यवाद शुभकामनायें

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