यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

महंगाई कम करना डॉ. रमन सिंह के हाथ में होता तो महंगाई बढ़ती ही क्यों ?

स्वाभाविक है, नौटंकी लगना। राज्य सरकार साइकिल पर सवार होकर महंगाई के  प्रति विरोध प्रदर्शित करती है तो कांग्रेस के पास इसके सिवाय कहने को और क्या है कि यह नौटंकी है। केंद्र सरकार मंत्रिमंडल की बैठक कर महंगाई पर चिंता प्रगट करती है और महंगाई कम करने के लिए कड़े कदम उठाने की बात करती है तो कृषि मंत्री शरद पवार महंगाई कम होने के लिए अगली फसल का इंतजार करने को कहते हैं। शक्कर की बढ़ती कीमत के लिए उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को दोषी बताते हैं। केद्र सरकार पूरी बेशर्मी से राज्य सरकारों को महंगाई के  लिए दोषी बताती है। इसका तो अर्थ होता है कि राज्यों में स्थित विभिन्न पार्टियों की सरकारों में महंगाई बढ़ाने को लेकर एकता है। क्या यह संभव है? साफ  पता चलता है कि केंद्र सरकार के  बस में नहीं है महंगाई कम करना तो स्वयं को दोषी भी तो वह नहीं मान सकती। इसलिए राज्य सरकारें दोषी हैं। राज्य सरकारें व्यापारियों पर डंडा चलाएं। उन्हें परेशान करें और अलोकप्रिय बनें।

डा. रमन सिंह सरकार के मंत्री साइकिल पर सवार होकर विधानसभा जाते हैं तो वे जनता को संदेश देते हैं कि महंगाई के  लिए वे नहीं, केंद्र सरकार दोषी है।केंद्र सरकार 17 रू. किलो में शक्कर विदेशों में बेचती है और फिर 34 रूपये किलो में शक्कर विदेशों से खरीदती है तो दोषी कौन है? अपनी शक्कर सस्ते में विदेशियों के लिए और विदेश की महंगी शक्कर अपने देशवासियों के लिए तो महंगाई कम होगी या बढ़ेगी ? छत्तीसगढ़ के बीपीएल परिवारों के लिए ही जब केंद्र सरकार शक्कर पूरा नहीं देती तो उसे गरीबों की कितनी चिंता है, यह आसानी से समझ में आ जाता है। बाकी निम्र मध्यम श्रेणी के लोगों  के लिए तो सोचने विचारने की जरूरत ही केंद्र सरकार नहीं समझती।


मनमोहन सिंह जैसे पूर्व नौकरशाह को प्रधानमंत्री बनाकर कांग्रेस ने तो पहले ही कांग्रेसियों को बता दिया है कि कोई भी पूरी तरह से राजनीतिज्ञ कांग्रेसी इस योग्य उसकी दृष्टि में नहीं है कि जिसे वह प्रधानमंत्री बना सके। सेवानिवृत्त होने के बाद करीब 5 दर्जन नौकरशाह मनमोहन सिंह की सरकार का कामकाज देख रहे हैं। इसका अर्थ भी स्पष्टï है कि पूर्व नौकरशाह प्रधानमंत्री के लिए नौकरशाहों से काम लेना ही सरल है। छत्तीसगढ़ राज्य बना तब भी एक पूर्व नौकरशाह अजीत जोगी को ही छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के लिए सोनिया गांधी ने चुना था। परिणाम क्या हुआ? कभी कांग्रेस का गढ़ रहा छत्तीसगढ़ कांग्रेस के हाथ से निकल गया। विद्याचरण शुक्ल, श्यामाचरण शुक्ल जैसे दिग्गज राजनीतिज्ञों के रहते नौकरशाह को तरजीह देकर कांग्रेस ने आम लोगों से अपने को काट लिया।


महंगाई के लिए जब कांग्रेस ने शरद पवार को टारगेट बनाया तब शरद पवार ने पूरी सरकार को इसके लिए जवाबदार बताया। क्योंकि निर्णय किसी का व्यक्तिगत न होकर सामूहिक रूप से मंत्रिमंडल का है। शरद पवार की एक ही घुड़की से कांग्रेस ने फिर दोबारा महंगाई के लिए शरद पवार को दोषी ठहराना बंद कर दिया । जिस सरकार का मुखिया पूर्व नौकरशाह हो और वह एक पूर्व दिग्गज राजनीतिज्ञ अर्जुनसिंह को मंत्रिमंडल में लेने से इसलिए इंकार कर दे, क्योंकि अर्जुनसिंह ने कभी राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनने के लिए योग्य बताया था और इसमें आलाकमान हस्तक्षेप न कर सके  तो इसी से समझ में आता है कि सरकार कौन और किस तरह से चला रहा है। नौकरशाहों पर पूरी तरह से आश्रित सरकार के निर्णयों पर नौकरशाहों का ही नियंत्रण है। यहां तक कि राज्यों में राज्यपाल के  रूप में भी अधिकांश नियुक्ति नौकरशाहों की ही की गई है। कल तक जो राजनीतिज्ञों को सर कहा करते थे, अब राजनीतिज्ञ उन्हें सर कहकर संबोधित कर रहे हैं। संवैधानिक प्रक्रिया ऐसी है कि दोषारोपण भी जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों पर होता है जो सरकार में है। नौकरशाहों को दोषी तो बताया नहीं जाता.


मधु कौड़ा 4 हजार करोड़ का भ्रष्टाचार करते हैं तो नौकरशाह भी इस जमात में शामिल हैं। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में ही अरबपति नौकरशाह पकड़ में आए हैं। कांग्रेसी कह रहे हैं कि यह राज्य सरकार का सबूत है कि कितना भ्रष्टïचार है। मधु कौड़ा की सरकार को तो कांग्रेस का समर्थन था। उस विषय में कांग्रेसी क्या कहेंगे ? दरअसल भ्रष्ट राजनीतिज्ञ और भ्रष्ट नौकरशाह के आपसी सामंजस्य के बिना भ्रष्टचार हो ही नहीं सकता। भ्रष्टाचार की बहती गंगा में थोड़ा बहुत प्रसाद तो संबंधित सभी लोगों को  मिल जाता है। जो गरीबी रेखा से नीचे जीने वालों का राशन चुराने में भी पीछे नहीं रहते, उनके विषय में तो सिर्फ यही कहा जा सकता है कि धन के सामने नैतिकता अब छोटी बात हो गयी है। जब भ्रष्टïचार की गटर गंगा में सभी डुबकी लगाने के लिए तैयार हैं तो फिर महंगाई  बढऩे ही वाली है। नहीं तो एक संवेदनशील मानवीय सरकार खाद्यान्न पर वायदा कारोबार की इजाजत दे कैसे सकती है? पेट की भूख को सट्टे के  हवाले कैसे कर सकती है?


कांग्रेस के प्रवक्ता जब कहते हैं कि सूखा और बाढ़ के लिए सरकार दोषी नहीं तो वे अर्धसत्य ही कहते हैं। क्योंकि सामान्य स्थिति में सरकार की कोई भूमिका न हो यह तो समझ में भी आता है लेकिन विपरीत परिस्थितियों में सरकार जनता के लिए प्रबंध करे, यही तो सरकार की उपयोगिता है। जब सब कुछ बाजार के हवाले होगा और सट्टा कानूनी होगा तो फिर जनता जो भोग रही है, उसके  बाद जनता के लिए सरकार का औचित्य ही क्या रह जाता है? एक संवेदनशील, मानवीय सरकार का तो यह पहला कर्तव्य है कि वह अपने नागरिकों को बताए कि महंगाई का कारण कौन है? सामान्य रूप से जनता तक संदेश पहुंचे न पहुंचे लेकिन जब सरकार विधानसभा साइकिल पर बैठकर जाती है और अपना पसीना बहाती है तो जनता को अच्छी तरह से समझ में आता है कि आज जो महंगाई की मार उस पर पड़ रही है, उसके लिए उसकी चुनी हुई राज्य सरकार दोषी नहीं है।


पिछले दिनों ताजमहल के शहर आगरा जाने का अवसर मिला। 4-5 घंटे बिजली का गायब रहना आगरा शहर में आम बात है। जगह जगह लोगों ने जनरेटर लगा रखे हैं। इनवर्टर तो आम बात है लेकिन आगरा जैसी स्थिति तो फिरोजाबाद में नही है। वहां दिन दिन भर बिजली गुल रहती है। कभी कभी तो गर्मी में दिन रात गोल रहती है। उस दृष्टि  से तो छत्तीसगढ़ में बिजली एक वरदान की तरह है। जब छत्तीसगढ़ राज्य बना था तब से बिजली की खपत छत्तीसगढ़ में दोगुनी हो चुकी है लेकिन फिर भी डा. रमन सिंह के प्रयासों से छत्तीसगढ़ के लोगों को भरपूर बिजली मिल रही है। यह उस स्थिति में है जब केद्र सरकार ने बिजली के कोटे में कटौती कर रखी है। खाद्यान्न के कोटे में कटौती की गई। फिर भी सरकार गरीबों को और करीब करीब आधे छत्तीसगढ़ को 2 रू. और 1 रू. किलो में चांवल दे रही है। कितने ही राज्यों की तुलना में छत्तीसगढ़ की स्थिति अच्छी है। महंगाई कम करना भी सरकार के बस में होता तो डा. रमन सिंह पीछे रहने वाले नहीं थे। साइकिल पर सवार होकर जनता को असलियत का परिचय देना तो उनका कर्तव्य है और इसे कोई नौटंकी कहे तो कहता रहे। जनता सब कुछ अच्छी तरह से समझती है


- विष्णु सिन्हा
16-2-2010

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