यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

माओवादियों की शर्त नामांजूर कर चिदंबरम ने सही कदम उठाया

यह पहली बार हो रहा है कि सरकार नक्सलियों के दबाव में नहीं हैं बल्कि नक्सली सशस्त्र बल की कार्यवाही से दबाव में आ गए हैं। नक्सली नेता ने गृहमंत्री पी. चिदंबरम को एक एसएमएस के द्वारा संदेश दिया कि सरकार सशस्त्र बलों की कार्यवाही रोके तो वे 72 दिन के लिए सीज फायर करने को तैयार है। गृहमंत्री ने स्पष्ट कर दिया है कि वे किसी तरह की शर्त के तहत नक्सलियों से बातचीत नहीं करेंगे बल्कि नक्सली हिंसा का रास्ता छोड़ें और बिना शर्त वार्ता के लिए आगे आएं तभी उनसे बातचीत की जाएगी। वार्ता  के लिए कितु, परंतु या कोई शर्त स्वीकार नहीं की जाएगी । दरअसल जब तक बातचीत खुले दिमाग से नहीं की जाएगी और इसे जीत हार के खेल की तरह से देखा जाएगा तब तक वार्ता का कोई निष्कर्ष नहीं निकलेगा लेकिन इससे भी बड़ा प्रश्र यह है कि नक्सली नेता किशनजी ने जो प्रस्ताव गृहमंत्री से किया है, उसके लिए वे अधिकृत हैं, क्या? 

नक्सलियों ने पोलित ब्यूरो में यह तय किया है क्या कि किशनजी जो चर्चा करेंगे सरकार से, उसे मानने के लिए समस्त नक्सली नेता तैयार होंगे? उड़ीसा के ही एक नेता नक्सली ने किशनजी से असहमति प्रगट की है। फिर इधर हिंसा रोकने का प्रस्ताव किशनजी करते हैं और दूसरी तरफ हिंसक हमले चालू हैं। तब सरकार उनकी बात पर कैसे विश्वास करे? इससे तो यही नजर आता है कि नक्सली नेता कुछ दिनों के लिए सशस्त्र बलों की कार्यवाही रोकना चाहते हैं। लगता है सशस्त्र बलों की कार्यवाही से नक्सली कैंपों में एक डर पैदा हो गया है। छत्तीसगढ़ में तो या तो नक्सली मारे जा रहे हैं या पकड़े जा रहे हैं या फिर आत्मसमर्पण भी कर रहे हैं। अभी सिर्फ तीन राज्यों में ही सशस्त्र बल की कार्यवाही चल रही है। धीरे-धीरे इसका विस्तार होगा तो नक्सली प्रभावित क्षेत्रों में नक्सली नेताओं की पकड़ कमजोर होगी। 


कल तक नक्सली ही पुलिस के जवानों को मारते थे। मुखबिरी के नाम पर निर्दोष ग्रामीणों की हत्या करते थे। तब नक्सलियों का मनोबल बढ़ा हुआ था। अब जब अपने लोगों के मारे, पकड़े जाने या आत्मसमर्पण की खबर आती है तो नक्सली बने लोग सोचने के लिए मजबूर तो हो ही रहे हैं कि वे भी एक दिन मारे जाएंगे। नक्सली नेता समझ रहे हैं कि वक्त रहते नक्सली कार्यकर्ताओं को मृत्यु भय से मुक्त नहीं किया गया तो वह दिन भी आ सकता है कि नेता ही रह जाएं और कार्यकर्ता या तो मृत्यु के भय से भाग खड़े हो या फिर आत्मसमर्पण कर दें। समर्पण करने वालों के लिए सरकार ने स्वाभिमानपूर्वक जीने के लिए आर्थिक पैकेज की भी घोषणा कर रखी है। ऐसे में नक्सली कार्यकर्ताओं को रोककर रखना अब नक्सली नेताओं के लिए कठिन काम होता जा रहा है। 


नक्सली नेता के सीज फायर के प्रस्ताव पर सरकार वैसे भी विश्वास नहीं कर सकती। आंध्रप्रदेश की सरकार ने नक्सलियों से वार्ता के लिए सीज फायर किया था लेकिन नक्सली अपनी जबान पर खरे साबित नहीं हुए। उन्होंने वार्ता के समाप्त होने और कोई निर्णय तक पहुंचने के पहले ही हिंसा प्रारंभ कर दिया था। प्रश्र यह भी है कि कल तक जो वार्ता के लिए किसी तरह भी तैयार नहीं हो रहे थे, वे अचानक इसके लिए तैयार कैसे हो गए? फिर वे तरह-तरह की बात करते हैं। बुद्धिजीवियों एवं मानवाधिकारियों को मध्यस्थ बनाकर वार्ता की बात कर रहे है। मतलब वे सीधे-सीधे वार्ता की मेज पर नहीं आना चाहते। कहीं न कहीं या तो डर छुपा हुआ है कि सरकार गिरफ्तार कर लेगी या फिर नीयत साफ नहीं है। दरअसल कोई मुद्दा हो तब न वे बात करें। पहला मुद्दा तो यही है कि हिंसा छोड़ें। गृहमंत्री ने कहा भी है कि हिंसा छोड़ें और बिना शर्त वार्ता करें। मध्यस्थ की क्या जरुरत है? सीधे-सीधे वार्ता से क्या डर है? यदि ईमानदार हैं और वास्तव में जनता की समस्या हल करने का इरादा रखते हैं तो मौका है। आत्मसमर्पण करें। क्योंकि उनके अभी तक के किए गए कृत्य तो पूरी तरह से गैरकानूनी रहे हैं। 


वह तो गनीमत है कि सरकार सुधरने का अवसर देना चाहती है। नहीं तो कानून के हिसाब से तो वे माफी के भी हकदार नहीं है। जिन्होंने सशस्त्र बल के जवानों की हत्या की, आम नागरिक की हत्या की वे किस दृष्टि से माफी के योग्य हैं। आज भी सरकार ने सशस्त्र बलों का दबाव नहीं बढ़ाया होता तो क्या वार्ता के लिए राजी होने का नाटक करते। नक्सली अपने आपको इतना अक्लमंद समझते हैं कि वे अपनी रणनीति के तहत सरकार को ही धोखा दे दें तो यह संभव नहीं। सरकार तो इंसानियत के कारण दरियादिली दिखा रही है, उनके साथ जिनमें इंसानियत कहीं से भी दिखायी नहीं देती। वह व्यक्ति जो अपने निहित विचारों की आड़ में सीधे सादे लोगों को बरगलाए और उन्हें हथियारों का प्रशिक्षण दे, सुरक्षा कर्मियों की हत्या करवाए, वह तो सिर्फ सजा का ही हकदार है। करोड़ों लोगों के जीवन को जो खतरे में डाले और निरंतर बंदूक की गोली से डरा कर अपने अनुसार चलने के लिए बाध्य करे, उसके प्रति कैसी दया दृष्टि?


जो विकास का घोर विरोधी हो। सड़क न बनने दे, स्कूल के भवनों को बम से उड़ा दे, पंचायत भवनों का नाश कर, घर-घर से एक सदस्य मरने के लिए देने के लिए दबाव डाले और नाबालिग बच्चों के हाथ में हथियार पकड़ा दे और इसे क्रांति की संज्ञा दे। ऐसे लोगों से वार्ता करना ही उचित नहीं। वैसे भी कोई सरकार हाथ पैर नहीं जोड़ रही है कि भैया हथियार रख दो और वार्ता करो। सरकार जो हिंसा के विरुद्ध कार्यवाही कर रही है, वही उचित है। जब सब तरह से समझाने के बावजूद श्रीलंका सरकार ने देख लिया कि तमिल टाइगर्स नहीं मान रहे हैं तो उसने हिंसा का जवाब हिंसा से दिया। आज वह समस्या से मुक्त हो गया। सरकार को तो सीधे-सीधे वार्निंग देना चाहिए कि समर्पण करो या फिर मरने के लिए तैयार रहो ।
चिदंबरम ने टका सा जवाब देकर कि कोई शर्त मंजूर नहीं, एकदम सटीक जवाब दिया है। भोले-भाले आदिवासी नक्सली कार्यकर्ता के साथ तो एक बार दया दृष्टि दिखायी भी जा सकती है। वास्तव में ये ही मुख्य धारा से भटक कर बहकावे में आ गए हैं लेकिन चतुर चालाक नेताओं ने जिस तरह से इन्हें मोहरों की तरह इस्तेमाल किया है, वही असली दोषी है। पढ़े लिखे होने के बावजूद उन्होंने सैकड़ों लोगों का वैचारिक शोषण भी किया है। दो ढाई हजार मासिक देकर मारने के लिए किसी को तैयार करना, वह भी छोटे-छोटे नासमझ बच्चों को कम बड़ा अपराध नहीं है। देश का करोड़ों रुपया इनके पीछे जाया हो चुका है। अभी भी लग रहा है। जिससे बहुतों का कल्याण हो सकता था। प्रजातंत्र में कानून के विरुद्ध काम करने वालों को हर तरह से हतोत्साहित करने की जरुरत है। चिदंबरम के इस निर्णय के लिए साधुवाद कि कोई शर्त वार्ता के लिए मंजूर नहीं है।


- विष्णु सिन्हा
दिनांक 24.02.2010

1 टिप्पणी:

  1. यही सही दिशा है। माओवादियों की शर्ते मानना सरकार का इनके आगे झुक जाने जैसा है। ऑपरेशन ग्रीन हंट सफल हो रहा है और यही समय है लाल-आतंक से इस देश के मुक्त हो जाने का।

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