यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

नानाजी देशमुख के परलोक गमन से भारतमाता ने अपना एक सपूत खो दिया


आज की राजनीति में ऐसे इंसान की तलाश करना कठिन काम है, जिसकी कथनी और करनी एक हो। नानाजी देशमुख ऐसे ही व्यक्ति थे। जनता पार्टी की जब सरकार बनी तब उन्होंने घोषणा की थी कि 60 वर्ष का हो जाने पर राजनीतिज्ञ को सत्ता की राजनीति से अवकाश प्राप्त कर लेना चाहिए। आने वाली नई युवा पीढ़ी को मौका देना चाहिए। किसी ने उनकी बात नहीं मानी लेकिन नानाजी देशमुख अपनी बात पर कायम रहे और 60 वर्ष का होते ही, उन्होंने सक्रिय राजनीति से अवकाश प्राप्त कर लिया। वे चित्रकूट में जा बसे और सामाजिक कार्यों के लिए अपना जीवन लगा दिया। दीनदयाल शोध संस्थान और ग्रामोदय विश्वविद्यालय के माध्यम से उन्होंने ग्रामीण भारत की सेवा का प्रकल्प अपने अवकाश प्राप्त करने के बाद चुना। काश उनके आदर्शों का अनुसरण उनके साथी राजनीतिज्ञ करते तो देश किसी और दिशा में आगे बढ़ता।
देश में बढ़ती महंगाई, भ्रष्टïचार, बेरोजगारी के विरुद्ध जब आंदोलन प्रारभ हुआ तब जयप्रकाश नारायण के कंधे से कंधा मिलाकर नानाजी देशमुख ने आंदोलन को गति देने में सक्रिय भूमिका निभायी। जब पुलिस ने लाठी चार्ज किया तो नानाजी देशमुख जयप्रकाश नारायण की सुरक्षा में उनके सामने चट्टïन की तरह खड़े हो गए। जब सभी विपक्षी दलों ने इंदिरा गांधी के तानाशाही शासन के विरुद्ध एकजुट होकर संघर्ष किया तो भारतीय जनसंघ को जनता पार्टी में एकाकार करने में नानाजी देशमुख की प्रमुख भूमिका थी। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के स्वयं सेवक और आजन्म प्रचारक की भूमिका जब उन्होंने चुनी तो उनका उद्देश्य देश प्रेम ही था। वे भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्य थे। वे चाहते तो बड़ा से बड़ा पद राजनीति में प्राप्त कर सकते थे लेकिन पद प्राप्त करना ही जिसका उद्देश्य न हो, वह इस बात की फिक्र नहीं करता कि कौन पद पर बैठता है? उसे तो मतलब होता है कि कोई भी पद पर बैठे लेकिन जनता की सेवा ईमानदारी से करें। 
इसलिए राजनीति में भी उन्होंने विचारों की उच्चता तो कायम रखी लेकिन उच्च पदों के अभिलाषी नहीं रहे। जिस तरह से जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में संपूर्ण क्रांति का पूरा आंदोलन चला लेकिन जब जनता ने जनादेश दे दिया जनता पार्टी को तब जयप्रकाश नारायण ने स्वयं प्रधानमंत्री बनने की कोशिश नहीं की। ठीक उसी तरह से जिस तरह से आजादी का आंदोलन चला तो महात्मा गांधी के नेतृत्व में लेकिन जब भारत स्वतंत्र हो गया तब महात्मा गांधी ने प्रधानमंत्री बनने की कोई इच्छा प्रगट नहीं की। हालांकि वे चाहते तो प्रधानमंत्री बनने से उन्हें कोई रोक नहीं सकता था। जयप्रकाश नारायण भी प्रधानमंत्री बनना चाहते तो किसकी ताकत थी जो उन्हें प्रधानमंत्री बनने से रोक सकता था। ये सब त्यागी पुरुष थे। नानाजी देशमुख भी इसी कड़ी के व्यक्ति थे। वे भी कुछ बनना चाहते सत्ता की राजनीति में तो उन्हें कौन रोक सकता था? लेकिन नानाजी देशमुख के लिए राजनीति सत्ता का नहीं सेवा का माध्यम था। 
यही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के स्वयं सेवक के रुप में उन्होंने सीखा था और इसी की दीक्षा उन्होंने प्राप्त की थी। पूरा जीवन बिना गृहस्थ आश्रम में प्रवेश किए देश की सेवा में लगाने वाले विरले ही होते हैं। कहां 80-85 वर्ष की उम्र में भी लोग सत्ता में बड़ा से बड़ा पद प्राप्त करने के लिए उस तरह के षडय़ंत्र करते हैं, पूरी बेशर्मी से जो किसी भी लिहाज से शोभनीय नहीं है। लोग धक्के मार रहे हैं कि हटो। कुर्सी खाली करो लेकिन कुछ बुजुर्ग है, जो समझने के लिए ही तैयार नहीं है। 1911 में जन्मे नानाजी देशमुख ने 2010 में शरीर त्यागा। मतलब 1 वर्ष वे और रह जाते तो 100 वर्ष पूरे कर लेते लेकिन उन्होंने 60 वर्ष की उम्र में ही अर्थात आज से करीब 39 वर्ष पूर्व ही सक्रिय राजनीति को अलविदा कर दिया था लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि वे घर में बैठ कर राम-राम जप रहे थे। जीवन से निराश हताश व्यक्ति नहीं थे नानाजी देशमुख बल्कि अपनी संपूर्ण शक्ति के साथ वे वास्तविक लोककल्याण के काम में लगे थे। 
किसी को महानता का बुखार चढ़ता है तो वह जोश में घोषणा कर देता है कि 60 वर्ष की उम्र के बाद वह अवकाश ग्रहण कर लेगा लेकिन 60 वर्ष पूरे भी हो जाते है और वह पद लिप्सा से ग्रस्त राजनीति को छोड़ नहीं पाता। तब नानाजी देशमुख की ही याद आती है कि देखो यह भी एक व्यक्ति है जो कहा कर के दिखाया। वे सक्रिय राजनीति में न जाते तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भी सर्वोच्च पद को सुशोभित कर सकते थे। कम संभावना नहीं थी कि वे राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ के सरसघ्चालक बन जाते लेकिन महत्वाकांक्षा और पदलिप्सा का ज्वर जिसे न हो उसकी सोच ही अलग होती है। भारतीय संस्कृति में आस्था के वे बड़े प्रतीक थे। हिंदुओं के उत्थान और एकता को उन्होंने अपने जीवन का एकमात्र उद्देश्य माना था। पूरा जीवन जिस उद्देय को लेकर उन्होंने होम किया, उसके पदचिन्ह तो सर्वत्र दिखायी पड़ते हैं। पद्मविभूषण जैसा सम्मान उन्हें अवश्य मिला लेकिन उनके जीवन का उद्देश्य कहीं से भी ऐसा सम्मान प्राप्त करने की लालसा वाला नहीं रहा।
बड़े-बड़े भवनों के नींव में जो पत्थर लगे रहते हैं और जिन पर ही भवन का पूरा भार होता है, ऐसे नींव में नानाजी देशमुख ही थे। भाजपा राष्ट्रीय  स्वयंसेवक का आज जो भवन खड़ा है, उसकी  नींव की खबर आज भले ही भवनों में बैठी नई पीढ़ी को नहीं लेकिन जब नानाजी देशमुख ने इन भवनों के निर्माण में अपनी अहम भूमिका निभायी तब किसी को पता नहीं था कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब संघ के मोहन भागवत यह कहने की ताकत रखेंगे कि राख से भी खड़े होने की ताकत भाजपा में है। यह सब नानाजी देशमुख जैसे किशोरावस्था में ही गृह त्यागी लोगों की कर्मठता का फल है। यह बात दूसरी है कि वृक्ष जब फल से लद गया तो नानाजी ने भावी पीढ़ी के लिए उन फलों को छोड़ दिया। मैंने बोया। मैं ही खाऊं की प्रवृत्ति न होकर सबका कल्याण जिनकी प्रवृत्ति थी,ऐसा व्यक्ति इहलोक छोड़ कर चला गया। अब भावी पीढ़ी का कर्तव्य है कि उनके त्याग तपस्या से शिक्षित होकर अपने जीवन को भी उनके ढंग में ढालें। नानाजी देशमुख को हार्दिक श्रद्धांजलि।
विष्णु सिन्हा 

4 टिप्‍पणियां:

  1. शत् शत् नमन ऐसे वीर पुरुष को , आपको होली की बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकानायें ।

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  2. जब ऐसे लोगों की ज़रुरत शिद्दत से महसूस की जा रही हो..ऐसे समय देशमुख जी का चुपचाप चले जाना..अत्यंत दुखद है..

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  3. नानाजी नामक महापुरुष को मेरी बविनम्र श्रद्धांजलि। ऐसे महापुरुष भारत भूमि में समय-समय पर अवतरैत होते रहें, यही प्रार्थना है।

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  4. नानाजी जब तक जीवित थे, किसी ने उन्हें जानने ही नहीं दिया. जब चले गए तो उनके बारे में पढ़कर हतप्रभ रह गया कि ऐसे महापुरूष इस युग में भी थे.

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