यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

नक्सली हिंसा की पूरी जिम्मेदारी स्वीकार कर पी. चिदंबरम ने सही नेतृत्व का परिचय दिया

केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम को सलाम। जीत का श्रेय लेने के लिए तो हर कोई लालायित रहता है लेकिन हार की जिम्मेदारी कोई स्वीकार नहीं करना चाहता लेकिन गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने प्रधानमंत्री के समक्ष नक्सलियों की गोली का शिकार हुए 76 जवानों की पूरी जिम्मेदारी स्वयं ली है। नैतिक मूल्यों का तकाजा भी यही कहता हैं लेकिन राजनीति में आज जो सबसे बिरली चीज हो गयी है, वह नैतिकता ही है। कांग्रेस के पास चिदंबरम जैसे नेता हैं, यही कांग्रेस की बड़ी उपलब्धि है। नहीं तो उनकी जगह कोई भी होता तो जिम्मेदारी स्वीकार करने की बात तो दूर जिम्मेदारी दूसरों पर मढ़कर अपनी जिम्मेदारी को नकार देता। हर बात को सिर्फ राजनीति के खुर्दबीन से ही नहीं देखा जाना चाहिए लेकिन शिक्षा दीक्षा ऐसी है, राजनीतिज्ञों की कि वे हर मौके को राजनीति के लाभ के लिए उपयोग करने से नहीं चूकते।

एक तरफ चिदंबरम सारी जिम्मेदारी अपने सिर पर ले रहे हैं तो छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी राज्य सरकार को दोषी ठहरा रहे हैं। वे मांग कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री राज्य शासन को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगा दें। एक तरफ नक्सली हिंसा से छत्तीसगढ़ राज्य की जनता ही आक्रोशित और दुखी नहीं है बल्कि पूरा देश आक्रोशित है और मांग उठ रही है कि अब किसी भी तरह का दयाभाव नक्सलियों के प्रति न दिखाते हुए, उन्हें समाप्त किया जाए तो छोटी सोच राज्य शासन पर दोषारोपण कर सत्ता का ख्वाब देख रही है। नक्सलवाद का उदय पश्चिम बंगाल में हुआ और उस समय के कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्घार्थ शंकर रे ने नक्सलियों के विरूद्घ बड़ी लड़ाई लड़ी थी। उसके बाद वाममोर्चे की सरकार ने जो पश्चिम बंगाल पर कब्जा किया तो आज तक कांग्रेस वापस नहीं आ सकी। इसी से सबक लेकर उस समय के कांग्रेसी हुक्मरानों ने फिर दोबारा नक्सलियों से उलझने की कोशिश नहीं की। इसी का परिणाम यह हुआ कि नक्सली चौतरफा फैल गए।

आज केंद्र सरकार और राज्य सरकारें मिलकर नक्सलियों से लड़ रही है। तब राज्य सरकार ही चूक के लिए अकेले जिम्मेदार कैसे हो गयी? थल सेना अध्यक्ष बी. के. सिंह कह रहे हैं कि सीआरपीएफ के जवानों को जंगलवार और गोरिल्ला युद्घ से निपटने का प्रशिक्षण नहीं मिला । उन्हें प्रशिक्षित किया जाना चाहिए और अब सेना के स्कूलों में उन्हें प्रशिक्षित करने की तैयारी की जा रही है। मरते मरते भी 8 नक्सलियों को तो मार ही गए, जवान। उनकी वीरता, शहादत की जितनी तारीफ की जाए कम है। कम से कम उनकी शहादत को तो राजनीति का हथियार नहीं बनाना चाहिए। पी. चिदंबरम यह भी कह रहे हैं कि जांच कमेटी बनायी जाएगी। बनानी भी चाहिए। जिससे पता चले कि किन कमजोरियों का लाभ नक्सलियों ने उठाया है। नक्सली सशस्त्र बलों का मनोबल तोडऩे में सफल नहीं हुए हैं और न ही सरकारों का। अभी भी नक्सलियों की तलाश जारी है और खबरें कह रही है कि वे उड़ीसा के मलकानगिरी की तरफ बढ़ते देखे गए हैं। हालांकि अब वे बिखर गए हैं और बंटकर चल रहे हैं लेकिन हमारी पुलिस सशस्त्र बल उनका पीछा छोडऩे वाले नहीं हैं।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी माना है कि बड़ी घटना हुई है लेकिन उन्होंने डा. रमन सिंह को आगे बढऩे की ही सलाह दी है। छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी कितनी भी मांग करें राज्य सरकार को बर्खास्त करने की लेकिन केंद्र सरकार में कोई सुनने वाला नहीं है। किस किस सरकार को बर्खास्त करेंगे? उड़ीसा में नवीन पटनायक की सरकार है तो झारखंड में शीबू सोरेन की, बिहार में नीतीश कुमार की तो पश्चिम बंगाल में बुद्घदेव भट्टाचार्य की। आंध्र में तो कांग्रेस की ही सरकार है। जहां भी नक्सली हत्याएं करेंगे, वहां की सरकार को केंद्र सरकार कांग्रेसियों के कहने पर बर्खास्त करने लगी तो नक्सल समस्या तो एक तरफ रह जाएगी और राजनीति का नया खेल प्रारंभ हो जाएगा। यही तो नक्सली चाहते है कि राजनीतिज्ञ आपस में लड़ते रहे और इससे उनका मार्ग आसान हो। उन्हें फलने का मौका मिले।

कल ही महंगाई के विरूद्घ माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने रायपुर की सड़कों पर रैली निकाली तो ममता बेनर्जी और नक्सलियों के संबंध को लेकर नारेबाजी कर रहे थे। वे मानते हैं कि पश्चिम बंगाल में माओवादी और ममता में पैक्ट है। ममता आज कांग्रेस की संप्रग सरकार का हिस्सा है और रेल मंत्री हैं। दोनों ने मिलकर लोकसभा का चुनाव लड़ा और आगे विधानसभा का चुनाव भी लडऩे वाली है। जब नक्सलियों के समर्थक से कांग्रेस का पैक्ट है तो फिर कांग्रेस स्वयं कठघरे में खड़ी हो जाती है। क्या संप्रग सरकार या कांग्रेस इस स्थिति में है कि वह ममता बेनर्जी से अपना संबंध विच्छेद कर ले? माक्र्सवादियों का यह आरोप कांग्रेस पर गंभीर है। यह बात तो कोई नहीं कह सकता कि भाजपा या डा. रमन सिंह का नक्सलियों से किसी तरह का संबंध है या कभी रहा है। कांग्रेस पर भी यह आरोप लगता रहा है, मध्यप्रदेश के जमाने से कि वह नक्सलियों से चुनाव के समय मदद लेती रही है। कांग्रेसियों के दिए बयान वैसे तो सीधे सीधे डा. रमन सिंह पर लगते हैं लेकिन फायदा तो उसका नक्सलियों को मिलता है। सलवा जुडूम के समय से ही डा. रमन सिंह को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश कांग्रेसी करते रहे लेकिन सफल नहीं हुए।

पहली बार जब भाजपा की सरकार छत्तीसगढ़ में बनी तब एक कांग्रेसी ने आरोप लगाया था कि केंद्रीय सशस्त्र बल के जवानों ने भाजपा के पक्ष में वोट डलवाया। फिर दूसरी बार भी भाजपा को ही बस्तर में समर्थन दिया तब सशस्त्र बल तो केंद्र सरकार याने कांग्रेस की थी। तब क्यों आदिवासियों ने भाजपा और डा. रमन सिंह को समर्थन दिया? जब ऑपरेशन ग्रीन हंट चलाया गया तब भी कांग्रेसियों ने ही हल्ला मचाया कि निर्दोष आदिवासी मारे जाएंगे। नक्सली भी यही मांग करते हैं कि ऑपरेशन बंद किया जाए और कांग्रेसी भी। क्या समानता है, दोनों में? अब जब सशस्त्र बल के जवान मारे जाते हैं तो भी दोषी राज्य सरकार। कैसे जनता इन पर विश्वास करे? छत्तीसगढ़ बंद को भी राज्य सरकार के विरूद्घ बताया गया कांग्रेसियों के द्वारा। जबकि यह नक्सलियों के विरूद्घ बंद था। शहीद हुए जवानों को श्रद्घांजलि देने के लिए बंद था।

कंग्रेस के गृहमंत्री पी. चिदंबरम पर तो देश गर्व कर सकता है। क्योंकि वे ईमानदारी से नक्सल समस्या से देश को मुक्त कराने के लिए प्रयत्नशील है। वे जिम्मेदारी स्वीकार करना भी जानते है और अपने कर्तव्य का निर्वाह करने के लिए अथक प्रयास भी कर रहे हैं। पूरी तरह से बिगड़ी हुई व्यवस्था को सुधारना कोई आसान काम तो है, नहीं लेकिन फिर भी अल्प समय में ही जो सुधार और प्रयत्न दिख रहा है, वह पी. चिदंबरम की ही कोशिशों का नतीजा है। कभी छत्तीसगढ़ की जनता कांग्रेस के प्रति कृतज्ञ महसूस करेगी तो वह चिदंबरम के कारण लेकिन राज्य सरकार को बर्खास्त करो जैसे नारे लगाने वालों के प्रति नहीं।

- विष्णु सिन्हा
9.04.2010

3 टिप्‍पणियां:

  1. " kis baat ka sahi netrutv kiya hai inhone ...jab jimmedar hai to bhugatana to padega hi vaise bhi naksaliyoane jab pichele kuch din purv hamala kiya tha to yahi chidambaram the jinhone shanti purvak baat karne ka bayan diya tha .."

    " aur bhi intezar karna hai kya ki kab ye naksalwadi " LTTE " jaisi badi organaization ban jayegi ..arey vikash ke naam per khun kharaba karke naksali hasil kya karenge "
    " desh ka home minister aisa hona chahiye jo desh ke khilaf aankh bhi utahaye to turant action le ..shanti ki baat unse ki jaati hai jo shaanti ki baat samjata ho ."

    " koi badhiya kaam nahi kiya hai chidambarum ne jo us per chattishgarh ki meri pyari janta garv kare ...haan karti garv unper magar jab vo naksaliyoan se ladne ki baat karte yu KAYAROAN KI TARAH BHAGNEWALOAN PER garv nahi kiya jata ."

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