यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं

बुधवार, 7 अप्रैल 2010

नक्सलियों के सबसे बड़े हमले का मतलब होता है कि नक्सली घबरा गए हैं

कल की सुबह सीआरपीएफ के 76 जवानों के लिए नक्सली मौत का पैगाम लेकर आए । 3 घंटे तक चली मुठभेड़ में नक्सलियों ने मौत का खेल खेला लेकिन क्या वे सफल हो गए ? 76 जवानों के शहीद होने और 5 जवानों के घायल होने के बावजूद क्या सरकार अपनी मुहिम बंद कर देगी? ग्रीन हंट को जब नक्सलियों ने रेड हंट बना दिया तो सरकारों के लिए और चुनौती खड़ी कर दी। अभी तक तो सरकार भी हिंसा के मामले में नम्र थी और हिंसा बंद कर बातचीत के लिए प्रोत्साहित भी करती थी लेकिन अब शायद यह आसान नहीं होगा। नक्सलियों की हिंसा से सशस्त्र बल का मनोबल गिर गया है, ऐसा नक्सली समझते हैं तो यह उनकी गलतफहमी है बल्कि अपने साथियों के मारे जाने का गुस्सा और बढ़ गया है और ट्रीगर पर ऊंगली दबाते हुए यह गुस्सा अब रहम करना शायद न जाने।

हर तरफ से नक्सली हिंसा की निंदा ही हो रही है। केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम हों या छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह दोनों ने ही नक्सली हिंसा को कायरतापूर्ण करार दिया है। प्रधानमंत्री ने भी सुरक्षा सलाहकारों के साथ बैठक कर ठोस कार्यवाही की सिफारिश की है। अभी भी नक्सलियों के विरूद्घ फौज की कार्यवाही से इंकार किया गया है लेकिन भविष्य में भी ऐसा ही होगा, यह नहीं कहा जा सकता। केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम और मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने भरोसा दिलाया है कि 3 वर्ष में नक्सल समस्या समाप्त कर देंगे। नक्सली भी समझ तो रहे हैं कि अब केंद्र और राज्य सरकार उनके मामले में गंभीर है लेकिन वे यह नहीं समझ रहे हैं कि इस तरह से जवानों की हत्या कर वे सरकार को पीछे हटने के लिए बाध्य नहीं कर सकते। इस बार जवान अधिक संख्या में मारे गए है लेकिन नक्सली सशस्त्र बलों के जवानों को टारगेट तो विभिन्न राज्यों में पहले से ही बना रहे हैं। इससे सरकार पीछे तो नहीं हटी बल्कि सरकार ने दबाव और बढ़ा दिया।

दंतेवाडा के चिंतलवार में हुई इस मुठभेड़ में पहली बार चीनी हथियारों का प्रयोग किया गया। अभी तक इस बात के प्रमाण नहीं मिले थे कि नक्सलियों के पास किसी अन्य देश के हथियार भी हैं। संदेह हालांकि पहले से ही व्यक्त किया जाता था कि नेपाल के माओवादियों के साथ भारतीय माओवादियों का गठजोड़ है लेकिन नेपाल के ही माओवादी इसका खंडन करते थे। अब यह बात तो स्पष्ट होती जा रही है कि पशुपति से तिरूपति तक लाल गलियारा की जो बात कही जाती थी, उसमें पर्याप्त सत्यता है। नहीं तो चीनी हेंडग्रेनेड चिंतलवार की मुठभेड़ में कहां से आए? गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने भी माना है कि इस समस्या को पिछले वर्षों में गंभीरता से नहीं लिया गया। पिछली सरकारों ने गंभीरता से लिया होता तो नक्सलियों की ताकत इतनी बढ़ी नहीं होती।
अब तो बाकायदा अच्छे वेतन के लालच में नक्सली भर्ती किए जा रहे हैं। करीब चौदह सौ करोड़ रूपयों की वार्षिक उगाही नक्सली कर रहे हैं। मतलब नीति सिद्घांत एक तरफ है और धंधा बड़ा है। जब पेड वर्कर रखकर नक्सली नेता अपना संगठन चला रहे हैं तो उन्हे मालूम है कि यह सारा कारोबार भय पर आधारित है और आदमी की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि वह मौत से डरता है। जब सशस्त्र बलों के जवान को मारोगे तो सामान्य आदमी तो भय खाएगा ही। सामान्य आदमी जब तक नक्सलियों से भयभीत है तब तक ही नक्सलियों का कारोबार चल सकता है। इसीलिए जब सलवा जुडूम आंदोलन जोर पकड़ रहा था तब नक्सली घबरा गए थे और हर तरह से कोशिश कर रहे थे कि यह आंदोलन समाप्त हो। बड़े बड़े नेता, बुद्घिजीवी, मानवाधिकार संगठन तक सलवा जुडूम के विरूद्घ दिखायी पड़ रहे थे।

कल ही 76 जवान नक्सलियों के हाथों मारे गए लेकिन कांग्रेस के स्थानीय नेता छत्तीसगढ़ सरकार को बर्खास्त करने की मांग कर रहे हैं। जबकि नक्सलियों के विरूद्घ मुहिम केंद्र सरकार और राज्य सरकार मिलकर चला रही है। यह स्मरणीय तथ्य है कि नक्सली छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकारों के दौर में ही फले फूले। पहली बार किसी सरकार ने नक्सलियों के विरूद्घ कार्यवाही की है तो वह डा. रमन सिंह की सरकार है। डा. रमन सिंह को भी केंद्रीय गृहमंत्री को समझाने में वर्षों लगे कि नक्सली समस्या असल में क्या है? पहली बार किसी गृहमंत्री ने गंभीरता से समस्या को समझा तो वे कांग्रेस के ही गृहमंत्री पी. चिदंबरम हैं? चिदंबरम के गृहमंत्री बनने के बाद ही असल में सभी राज्यों में एक साथ नक्सलियों के विरूद्घ मुहिम प्रारंभ की गई। नक्सलियों के बड़े नेता पुलिस की पकड़ में आए और पता चला कि नेटवर्क तो दिल्ली तक फैला हुआ है। खुफिया विभाग की सूचनाओं को एक जगह इकट्ठा करना और सबको सूचित करने का काम भी प्रारंभ हुआ। राज्य की सीमाओं में सशस्त्र बल मिलकर नक्सलियों के विरूद्घ कार्यवाही करने लगे। नक्सली पकड़े जाने लगे या मारे जाने लगे। कल हुई घटना की भी सूचना आंध्र पुलिस ने दी थी कि नक्सली इकट्ठा हो रहे हैं लेकिन लापरवाही के कारण यह घटना घटी। यदि चूक नहीं होती तो इतनी संख्या में जवान नहीं मारे जाते।

एक हजार के करीब नक्सली हमला करने आए थे। 81 जवानों पर एक हजार नक्सली। जवान खुले में और नक्सली आड़ में। मतलब नक्सलियों ने बड़ी तैयारी से हमला किया। इनका कमांडर सुदर्शन उर्फ आनंद दूर बैठा हमले के लिए निर्देश दे रहा था। वह जमाना गया जब चंद नक्सली ही सशस्त्र बलों को अपना शिकार बना लेते थे। कल की घटना में हुई लापरवाही से यदि ऊपर से नीचे तक बैठे लोगों ने सबक लिया तो नक्सलियों को खदेडऩा कठिन काम नहीं है। सब मिलकर लड़ेंगे तो नक्सलियों के गढ़ों को उखाड़ फेंकना वक्त की बात है। सबसे जरूरी तो यही है कि नक्सलियों को स्पष्ट पता चले कि उनकी नृशंस हत्याओं के बावजूद सशस्त्र बलों का मनोबल ऊंचा है। सरकारें अपने कर्तव्य के प्रति दृढ़प्रतिज्ञ हैं। कांग्रेसियों की राज्य सरकार को बर्खास्त करने की मांग से केंद्र सरकार सहमत नहीं है। कांग्रेस आलाकमान अपने कार्यकर्ताओं को लताड़े कि हर बात को राजनीति न बनाया जाए। समस्याएं सत्ता प्राप्त करने का साधन न बने। नहीं तो इससे बल तो नक्सलियों को ही मिलता है।

जनता तो इस तरह के विरोध से सहमत होती नहीं। यहां तक कि आदिवासी नक्सल प्रभावित क्षेत्र के ही कांग्रेसियों की राय से सहमत नहीं हैं। वे सरकार के साथ खड़े हैं। यह उन्होंने विभिन्न चुनावों में मत देकर भी बता दिया है। प्रदेश से नक्सली हिंसा समाप्त हो जब यह बात केंद्र सरकार ने मान ली है तो कांग्रेसियों के विरोध का औचित्य क्या है? नक्सली हमले में शहीद हुए जवानों के प्रति श्रद्घांजलि तो सभी व्यक्त कर रहे हैं। देश के नागरिक शांति से रह सके और उनका हिंसक लोगों से छुटकारा हो, इसके लिए जिन्होंने अपने प्राणों का बलिदान दिया, उनके प्रति नमन में किसके हाथ नहीं उठेंगे।

- विष्णु सिन्हा
7.4.2010

6 टिप्‍पणियां:

  1. नक्सलियों के खिलाफ जारी मुहिम को और तेज करने की जरूरत है। सरकार को चाहिए कि वो नक्सलवाद के उन्मूलन की दिशा में गंभीरता से सोचे, सिर्फ बैठकें कर लेने और मीडिया के सामने बयानबाजी कर देने से इस समस्या का समाधान नहीं हो जाता। ठोस कार्रवाई करे। वक्त की मांग है।

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  2. naksalbad se koi samjhauta na karke .unhe samapt karna hi ek samadhan hai.
    shahido ke prati shraddhanjali.

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  3. Iski jimmedar Soniya Ghandhi hi hain. Itli se hatiyar Soniya ne hi mangwaya tha.

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  4. हर मामले में राजनिती!इसिलिये देश गड्ढे मे जा रहा है!

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  5. नीच मीडिया और जड़ों से कटी हुई मोमबत्ती ब्रिगेड, अभी IPL और सानिया की शादी में लगी है इसलिये बाद में बात करेंगे…। हे अरुंधती तुम्हें चिन्ता करने की जरूरत नहीं, तुम्हारे दबे-कुचले (लेकिन एके-47 रखने वाले) भाई सुरक्षित रहेंगे…

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