यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं

बुधवार, 3 मार्च 2010

एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के जाल में फंस गयी है आम जनता

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने स्पष्ट कर दिया है कि तेल की कीमतें कम नहीं होगी। शरद पवार ने पहले ही सरकार का समर्थन कर दिया है। तृणमूल कांग्रेस और डीएमके जो पहले तेल की बढ़ी कीमत पर नाराजगी प्रगट कर रहे थे, वे भी मनमोहन सिंह का रुख देखकर ठंडे पड़ रहे हैं। सरकार में सम्मिलित दल सरकार के विरोध में इतनी दूर तक जाने का इरादा नहीं रखते कि उन्हें सरकार से ही अलग होना पड़े। सत्ता का सुख होता ही ऐसा है। जो निष्ठुर और क्रूर बनाता है। तेल की बढी  कीमत से सरकार का आंकलन है कि महंगाई मात्र दशमलव चार तीन प्रतिशत ही बढ़ेगी। जबकि बाजार में तेल की ही कीमत सरकार के अनुमान से ज्यादा बढ़ गयी है। सीमेंट की कीमतों में भी 7-8 रुपए का इजाफा हो चुका। डीजल की कीमत बढऩे का क्या अर्थ होता है? यह समझने के लिए अर्थशास्त्री होने की जरुरत नहीं बल्कि सामान्यजन भी अनुभव से जानता है कि जब भी कीमतें बढ़ी तब बाजार में महंगाई ने ऊंची छलांग ली लेकिन जो समझ कर भी नहीं समझना चाहते, उनका कोई उपचार हाल फिलहाल तो नहीं है। क्योंकि चुनाव अभी बहुत दूर है। सत्ता के सिंहासन पर बैठे लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि वे जो चाहे करें और 4 वर्ष तक उनकी सत्ता सुरक्षित है।

उन्हें इसकी भी चिंता नहीं कि विपक्ष का राग सुर इस मामले में एक है। तेल की बढ़ी कीमत के विरुद्ध सांप्रदायिकता भी आड़े नहीं आती। भाजपा और राजग के दलों के विरुद्ध सदा से ताल ठोंकने वाले वाम दल, लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, मायावती सब के सब एक साथ खड़े दिखायी पड़ रहे हैं। इन्हीं लोगों ने पिछले कार्यकाल में कांग्रेस के नेतृत्व में संप्रग की सरकार बनवायी थी। डर था, कहीं भाजपा सत्ता में न आ जाए। एकमात्र मामले में राजनैतिक दलों में विभाजन था कि सांप्रदायिकता या धर्म निरपेक्षता। अमेरिका से परमाणु संधि के मामले में जब वामदलों ने समर्थन वापस लिया तो मुलायम सिंह और अमर सिंह कांग्रेस की सरकार बनाने के लिए आगे आए। उन्होंने सरकार भी बचा ली लेकिन हासिल क्या हुआ? मतलब निकल गया तो कांग्रेस ने समाजवादी मुलायम सिंह और अमर सिंह को पहचानने से इंकार कर दिया। उत्तरप्रदेश में नुकसान भी मुलायम सिंह को उठाना पड़ा और सीटें बटोर ली कांग्रेस ने। जब मुलायम सिंह कमजोर हुए तो अमरसिंह ने भी उनका साथ छोड़ दिया। 


पिछली संप्रग सरकार में कांग्रेस के खास समर्थक लालू प्रसाद यादव थे। वे तो तब भी समर्थक थे जब कांग्रेस के पास सत्ता नहीं थी। मुखर विरोधी भाजपा के वे ही माने जाते थे। जब बिहार में लालू प्रसाद की शक्ति क्षीण हुई तो कांग्रेस ने एक अदद केंद्रीय मंत्री का दर्जा भी उन्हें देना गंवारा नहीं किया। मुलायम सिंह को भी वे ही समझा बुझाकर कांग्रेस के समर्थन में लाए थे। वर्तमान में जो संप्रग सरकार द्वितीय है, उसे बिना शर्त लालू यादव, मुलायम यादव, मायावती ने समर्थन घोषित किया। बिना मांगे समर्थन मिले तो कोई भी फूल कर गुब्बारा हो सकता है और कांग्रेस हो गयी। दोनों यादव मन मसोस कर रह गए पर वक्त का तकाजा था और अपना ही बोया काटना था तो कर क्या सकते थे? फिर भी अवसर की तलाश तो थी और तेल की बढ़ी कीमत ने अवसर दे दिया। 


महंगाई की मार से बेचैन जनता पर डीजल पेट्रोल  की बढ़ी कीमत किसी कहर से कम नहीं है। यह बात सभी अच्छी तरह से समझते हैं। ऐसे में जनता का खोया हुआ विश्वास फिर से प्राप्त करना है, अवसर अच्छा है। सब एक हो गए हैं। पेट्रोल, डीजल की कीमत को लेकर सरकार के विरुद्ध खड़ी पार्टियां अपने-अपने राज्यों में धरना प्रदर्शन कर रही है। आंध्र, केरल, त्रिपुरा, उत्तरप्रदेश, दिल्ली सर्वत्र बंद प्रदर्शन हो रहा है। लोकसभा, राज्यसभा की कार्यवाही नहीं चलने दी जा रही है। तेल की बढ़ी कीमत के विरोध में बैलगाड़ी, साइकल प्रदर्शनों में सड़क पर उतर आयी है। लोकसभा के चुनाव में भले ही अभी 4 वर्ष का समय हो लेकिन राज्यों में तो चुनाव कहीं न कहीं होने वाले ही है। कांग्रेस की केंद्र सरकार के विरुद्ध माहौल खड़ा करने का इससे बेहतर मौका कौन सा हो सकता है? 


लेकिन इस विपक्ष की कार्यवाही से हटकर सरकार की सोच तो यही दिखायी पड़ रही है कि कब तक ये हल्ला-गुल्ला करेंगे। देर सबेर सब ठंडा पड़ जाएगा। तब सरकार उस अवसर की तलाश में है कि पेट्रोल डीजल  की दरों को नियंत्रण से मुक्त कर दे। जनता जाने और बाजार जाने। उसे तो अपने को मिलने वाले करों के रुप में धन से मतलब। उसका खजाना भरा पूरा रहे। जिससे वह अपने मनमाफिक खर्च कर सके। जनता को राहत के  रुप में सब्सिडी देना आर्थिक प्रगति को रोकने वाला है। आम जनता को नहीं, देश को आर्थिक प्रगति करना है तो आम जनता को उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। कौन मरता है और कौन लाभ उठाता है, इससे सरकार को कोई लेना देना नहीं। जिसमें दम हो, बुद्धि हो वह लाभ उठा ले। उसे चिंता है तो अपने वर्ग की या फिर अपने कर्मचारियों की। जिनके वेतन  वृद्धि के लिए छठवां वेतन आयोग की सिफारिश लागू करने में उसे कोई हिचक नहीं हुई। नेता और कर्मचारी फले-फूलें तो आम जनता के लिए सरकार का उपकार मनरेगा है, न। पहले नरेगा था। अब महात्मा गांधी का नाम जोड़कर योजना और महान हो गयी। 


प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी की स्पष्ट सोच है कि तेल मूल्य वृद्धि वापस लेने से जनकल्याणकारी कार्यक्रमों पर विपरीत असर पड़ेगा। यदि सरकार लोक लुभावन वित्तीय नीति अपनाती रही तो देश को कभी महंगाई से छुटकारा नहीं मिलेगा। मतलब साफ है कि सरकार की लोक लुभावन वित्तीय नीतियों के कारण महंगाई बढ़ रही है। जब ऐसा एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री कहता है तो यह भी बता दे कि पेट्रोल डीजल की कीमत बढ़ाने से या इन्हें खुले बाजार में सरकार के नियंत्रण से अलग कर महंगाई कैसे कम की जा सकती है या कैसे इस नीति के कारण महंगाई से छुटकारा मिलेगा? स्वतंत्र भारत के  63 वर्ष के इतिहास में आज तक तो कभी नहीं देखा गया कि महंगाई एक बार जो बढ़ जाती है, वह फिर से नीचे गिरती है। कुछ समय तक महंगाई स्थिर रहते तो देखा गया लेकिन फिर उसने जो छलांग लगायी तो वापस लौटने का नाम ही नहीं लेती।


अक्सर चुनावों के समय ही महंगाई कुछ नियंत्रित दिखती है। तब सरकार मतदाताओं को लुभाने के लिए तरह-तरह की छूट की घोषणा करती है लेकिन जैसे ही चुनाव हुआ, सरकार अपने रंग में लौट आती है। किसान कर्ज के तले दब कर आत्महत्या करता है, वह सरकार को दिखायी नहीं देता लेकिन चुनाव के पूर्व कर्ज माफ करने का क्या औचित्य है, यह क्या समझ में लोगों को नहीं आता? समाजवाद को लेकर चली कांग्रेस आज पूरी तरह से पूंजीवाद पर उतारु हो गयी है। कितने आराम से प्रधानमंत्री कहते हैं कि मूल्य वृद्धि से लोगों को तकलीफ अवश्य होगी लेकिन दीर्घकालीन हितों के लिए ऐसा करना जरुरी है। पेट में भूख की अग्रि आज प्रज्जवलित है तो क्या उस अग्रि को दीर्घकाल में शांत करेंगे। तब तक क्या होगा?


- विष्णु सिन्हा
दिनांक 03.03.2010
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2 टिप्‍पणियां:

  1. और सिर्फ एक नहीं, कहने को तथाकथित तीन-तीन अर्थ शास्त्री बैठे है, मेसर्स मनमोहन सिंह, मोंटेक सिंह, और एक अर्थशात्री जो इनकी पिछली पारी में ही देश के अर्थव्यवस्था की ऐसी-तैसी कर गए , मान्यवर चिदंबरम जी !

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  2. इनको अर्थशास्त्री नहीं, 'अनर्थशास्त्री' कहिये।

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