यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं

रविवार, 14 मार्च 2010

ग्राम सुराज अभियान के द्वारा अपनी योजनाओं के सही क्रियान्वयन के लिए दृढ़ संकल्पित डॉ. रमन सिंह

तापमान बढ़ रहा है। और एक माह व्यतीत होते होते गर्मी अपने पूरे तेज में होगी। अभी हीं पंखे, कूलर, ए.सी. पूरी रफ्तार से चल रहे हैं। 12 अप्रैल के बीच तो गर्मी और पराकाष्ठा पर होगी । स्वाभाविक है कि मंत्री, विधायक, राजनेता, नौकरशाह धूप में बाहर बिना वातानुकूलित कारों के निकलना पसंद नहीं करेंगे लेकिन डॉ. रमन सिंह न तो स्वयं धूप से बचने का प्रयास करेंगे और न ही अपने सहयोगियों, अधिकारियों को बचने का प्रयास करने देंगे। कोई गांव छूटने न पाए। कोशिश तो यही होगी कि हर गांव में दस्तक दी जाए। चौपालों में बैठा जाए और ग्रामीण जनता की समस्याओं से दो चार हुआ जाए। डॉ. रमन सिंह ने कल प्रदश के जिलाधीशों की कांफ्रेंस लेकर सबको स्पष्ट रुप से समझा दिया है कि ग्राम सुराज अभियान प्रारंभ हो रहा है। सतर्क हो जाएं। अब सिर्फ छोटे कर्मचारियों को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा, काम के प्रति लापरवाही के लिए बल्कि बड़े अधिकारी भी बख्शे नहीं जाएंगे । अगर छोटा कर्मचारी काम नहीं करता तो जिम्मेदार कलेक्टर भी होंगे।

यह यदि कोरी धमकी नहीं है और वास्तव में कड़ी कार्यवाही बड़े अधिकारियों पर की गई तो परिणाम भी आएंगे। मुख्यमंत्री यदि चाक चौबंद और सक्रिय हैं तो उसका मतलब ही होता है कि पूरा प्रशासन चाक चौबंद हो जाए। सजा देने की कार्यवाही किसी के प्रति व्यक्तिगत दुर्भावना से तो किया जाएगा, नहीं बल्कि कर्तव्य के मामले में कोताही को लेकर किया जाएगा। 6 वर्ष कम नहीं होते। डॉ. रमन सिंह को छत्तीसगढ़ में शासन करते हुए 6 वर्ष पूरे हो चुके हैं। वे भले आदमी हैं और सबके प्रति भलमनसाहत भी उन्होंने कम नहीं दिखायी लेकिन भलमनसाहत का कर्मचारी गलत अर्थ निकालते हैं तो वे स्वयं डॉ. रमन सिंह को अपने विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए बाध्य करते है। जितनी छूट डॉ. रमन सिंह ने अपने अधिकारियों, कर्मचारियों को दी, उतनी छूट शायद ही कोई मुख्यमंत्री देता। छूट ही नहीं दी बल्कि उनके वेतन, भत्ते, सुख सुविधा सबका ध्यान रखा, डॉ. रमन सिंह ने। छठवां वेतन आयोग लागू करने में भी किसी तरह की कंजूसी प्रदर्शित नहीं की। इसके बदले वे चाहते क्या हैं? इतना ही कि उनकी योजनाएं अंतिम आदमी तक ईमानदारी से पहुंचे तो यह उनका हक भी बनता है। 


प्रदेश की जनता ने उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री चुना तो कुछ सोच समझ कर ही चुना होगा। अब यह तो मुख्यमंत्री का कर्तव्य है कि वे जनता की आशाओं पर खरा साबित होकर दिखाएं। मुख्यमंत्री ने इसके लिए अपनी तरफ से पूरा प्रयास किया लेकिन क्रियान्वयन की जिम्मेदारी तो नौकरशाहों पर ही है। मुख्यमंत्री ठीक कहते हैं कि जनता की समस्याओं को वातानुकूलित कक्ष में बैठ कर नहीं समझा जा सकता। वहां जाकर महसूस  करना पड़ेगा, जहां जनता रहती है। भले ही आसमान से आग बरसती हो लेकिन यह समय है, जब ग्रामीण भी खाली है। खेती किसानी का समय अभी दूर है। उनसे सीधे साक्षात्कार का यही समय उचित है। सरकारी योजनाओं का क्या हाल है और आम जनता तक वह पहुंच भी रही है या बीच में ही सरकार के द्वारा दिया धन गायब हो रहा है। यह सब जानना जरुरी है और इसके लिए जनता सरकार तक चल कर आए कि सरकार ही उनके द्वार तक चल कर जाए, में से सरकार का ही जनता के द्वार तक जाना जरुरी है। 


बीज, पानी, खाद की क्या व्यवस्था है? डॉ. रमन सिंह ने इसीलिए ग्राम सुराज अभियान का मुख्य केंद्र बिंदु कृषि को रखा है। कृषि ही हमारा आधार स्तंभ है। प्रदेश की अधिसंख्यक जनसंख्या का जीवन यापन इसी से होता है। पशुधन की चिंता भी आवश्यक है। डॉ. रमन सिंह की दूरदृष्टि से कुछ भी छुपा हुआ नहीं है। स्वास्थ्य भी ग्राम सुराज अभियान के केंद्र में है। ग्रामीण जनता के स्वास्थ्य की चिंता सरकार नहीं करेगी तो कौन करेगा? शिक्षा के लिए तो सरकार ने लाखों शिक्षाकर्मी भर्ती किए हैं और भर्ती करती जा रही है लेकिन यह भी जानना जरुरी है कि वास्तव में सरकार की योजना का लाभ ग्रामीण जनता को मिल रहा है या नहीं। डॉ. रमन सिंह की सोच है कि शत प्रतिशत बच्चों को शिक्षा मिले। वास्तव में छत्तीसगढ़ के बच्चे शत प्रतिशत शिक्षित हो गए तो प्रदेश का माहौल ही बदल जाएगा। तब शासकीय योजनाओं को प्रत्येक जन तक पहुंचने से रोकना संभव नहीं होगा। केरल जैसा राज्य शिक्षा के शत प्रतिशत होने के कारण ही शासकीय योजनाओं का भरपूर लाभ उठाता है और शासकीय कर्मचारी गोलमाल करने से बचते है। 


पिछले ग्राम सुराज अभियान के समय जो आवेदन समस्याओं के संबंध में मिले थे, उनका निराकरण हुआ या नहीं, इसकी समीक्षा का इरादा भी डॉ. रमन सिंह रखते हैं। अक्सर होता यही है कि इस तरह की योजना में आगे का पाठ तो पढ़ा जाता है लेकिन पिछला पाठ भूला दिया जाता है। कल को ग्राम सुराज अभियान के दौरान ग्रामीणों ने पूछा कि पिछले समय भी उहोंने समस्याएं बतायी थी, उनका निराकरण तो हुआ नहीं तो इस तरह से समस्याओं को सिर्फ जानने और सुनने से क्या लाभ? तो शासकीय अधिकारी जवाब देने के लिए तैयार रहें। जनता और अधिकारियों का सीधे-सीधे आमना-सामना होना चाहिए। पब्लिक सर्वेंट को भी पता चलना चाहिए कि मालिक के रुप में खड़ी जनता के प्रति जवाबदेही का कर्तव्य उसका है। 


राजस्व विभाग के सबसे छोटे और अहम कर्मचारी पटवारी की भी समीक्षा होना चाहिए। स्वयं राजस्व मंत्री अमर अग्रवाल ने एक बैठक में उनके विरुद्ध कड़ी टिप्पणी की थी। किसान भले ही अपनी जमीन के मालिक हैं लेकिन उनका सारा हिसाब किताब पटवारी के पास ही होता है। बिना धन लिए शायद ही कोई पटवारी नकल, ऋण पुस्तिका, प्रमाणीकरण जसे काम करता है। किसी की जमीन पर किसी दूसरे का नाम कब चढ़ा दें, कुछ पता नहीं चलता। फिर रिकॉर्ड सही करवाने के नाम पर, फौती उठाने के नाम पर और न जाने किस-किस कारण इन्हें भेंट पूजा चढ़ाना पड़े, कहा नहीं जा सकता। अक्सर तो पटवारी अपने पदस्थापना के स्थान पर रहता ही नहीं। निश्चित दिन और निश्चित समय पर ही इनके दर्शन होते है। पढ़ा लिखा आदमी ही भेंट पूजा चढ़ा कर अपना काम निकालना उचित समझता है तो अनपढ़ किसान की हालत तो आसानी से समझी जा सकती है। 


भ्रष्टाचार ऐसा विष वृक्ष है जिसने शासकीय योजनाओं के लिए आबंटित धन में सेंध लगा रखी है। सही ढंग से आबंटित धन खर्च हो तो प्रदेश का विकास द्रूत गति से हो सकता है। ग्राम सुराज अभियान में इस विषय में भी विचार किया जाना चाहिए और कोई ठोस कार्यवाही की जानी चाहिए। तभी ग्रामों में सुराज की कल्पना साकार हो सकेगी। वैसे डॉ. रमन सिंह कम प्रयास नहीं कर रहे है। नक्सल समस्या को हल करने के लिए जैसा उन्होंने संकल्प दिखाया, वैसा ही संकल्प वे भ्रष्टाचार के प्रति दिखाएं तो वे अविस्मरणीय काम कर सकेंगे। 


- विष्णु सिन्हा
दिनांक 14.03.2010

1 टिप्पणी:

  1. गर कोई नेता भ्रश्टाचार के लिये संकल्प दिखाये तो आधी समस्या तो अपने आप ही हल हो जायेगी। । अच्छा प्रयास है उनका। शुभकामनायें

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