यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं

शनिवार, 10 जुलाई 2010

अमर्यादित शब्द क्रोध के इजहार का एक ढंग है जब भावनाएं बेकाबू हो जाती है

नीतिन गडकरी का अफजल गुरु को फांसी न दिए जाने के संबंध में दिया बयान,
कांग्रेस को चुभ रहा है तो चुभना ही चाहिए। अफजल गुरु को यदि नीतिन गडकरी
कांग्रेस का दामाद है, पूछेंगे तो कांग्रेस बिफरेगी ही। कांग्रेस
प्रवक्ता ने तो भाजपा को सलाह दी है कि वह अपने महामहिम अध्यक्ष की जांच
किसी मनोचिकित्सक से कराएं। भारत में कांग्रेस के समकक्ष कोई दूसरी
राजनैतिक पार्टी है तो वह भाजपा ही है। उसके राष्टरीय अध्यक्ष से तो कम
से कम मर्यादा की उम्मीद की जाती है। व्यंग्य तो कांग्रेस पर अटल बिहारी
वाजपेयी भी करते थे लेकिन उनकी भाषा शोभनीय रहती थी और इसी कारण उनका मान
सम्मान भी सभी राजनैतिक पार्टियों सहित जनता में था। छुटभैय्या नेता इस
तरह की बात करे तो एक बार उसकी उपेक्षा भी की जा सकती है लेकिन चर्चित
होने के लिए असभ्य व्यंग्य नीतिन गडकरी के द्वारा करना न तो भारतीय
संस्कृति के अनुरुप है और न ही भाजपा जैसी राष्टरीय पार्टी के अध्यक्ष
के अनुरुप।

नीतिन गडकरी भले ही कहें कि उनके राष्टरीय अध्यक्ष बनने में राष्टरीय
स्वयं सेवक संघ की भूमिका नहीं है लेकिन जनता के द्वारा ग्राह्य सत्य तो
यही है कि उनकी नियुक्ति के पीछे संघ का ही पूरा हाथ है। एक तरह से वे
संघ का ही भाजपा में प्रतिनिधित्व करते हैं। क्या संघ की शिक्षा दीक्षा
इसी तरह के वक्तव्य देने की इजाजत देते हैं। वे अपने साथ बहुतों की
प्रतिष्ठï को दांव पर लगा रहे हैं। वस्तुत: उनसे बड़ी प्रतिष्ठा तो उन
संस्थाओं की है जिनका प्रतिनिधित्व वे करते हैं। जनता को देखकर जोश में
होश खोकर वक्तव्य देने से वे तालियां भले ही पिटवा लें लेकिन प्रतिष्ठित
नहीं होते। यह सत्य है कि अफजल गुरु को फांसी का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने
दिया तो क्षमा प्रार्थना की अपील को सरकारों को लटका कर नहीं रखना चाहिए।
जो सरकार वर्षों यह निर्णय ही न कर सके कि फांसी देना या माफ करना, वह
सरकार अनिर्णय की स्थिति में है तो उससे जनता क्या उम्मीद कर सकती है?
कहा जाता है कि कांग्रेस सरकार डरती है कि अफजल गुरु को फांसी दी गई तो
काश्मीर में मामला बिगड़ जाएगा। काश्मीर के लोग नाराज हो जाएंगे। आज ही
काश्मीर की स्थिति कैसी है? जबकि वहां कांग्रेस ही सरकार का समर्थन कर
रही है और केंद्र सरकार में भी नेशनल कांफ्रेंस के फारुख अब्दुल्ला
मंत्री हैं। अलगाववादी नेताओं के फोन से पता चलता है कि काश्मीरी युवकों
को मरवा कर वे हालात को बेकाबू बनाना चाहते हैं। यह गृह मंत्रालय का ही
कथन है। सरकार की नीति ढुलमुल रहेगी तो उसका परिणाम यही होगा। काश्मीर
के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला सर्वदलीय बैठक बुलाते हैं तो पीडीपी
सम्मिलित होने से इंकार कर देती है। जबकि इसी पीडीपी के साथ मिलकर
कांग्रेस काश्मीर में 5 वर्ष तक शासन चला चुकी है। काश्मीरी युवक सशस्त्र
बलों पर पत्थरबाजी करें, इसके लिए उन्हें पाकिस्तान के आतंकवादी धन देते
हैं। जिस दूरभाष के आधार पर यह बात पता चली है, उसमें स्पष्ट कहा गया है
कि तुम लोग मुफ्त में पैसा ले रहे हो। काश्मीर के अधिकांश क्षेत्रों में
कफ्र्यू लगा है।

अफजल गुरु को फांसी देने से ऐसा क्या हो जाएगा जो आज नहीं हो रहा है।
अफजल गुरु तो मांग कर रहा है कि उसे काश्मीर की जेल में स्थानांतरित कर
दिया जाए। जो व्यक्ति भारत की संसद पर हमले का दोषी हो और नागरिक
प्रक्रिया पूरी कर जिसे फांसी की सजा का अंतिम फैसला हो चुका हो, उसे
माफी की अपील के बहाने जिंदा रखने का क्या औचित्य है? इसी से तो इस तरह
की मानसिकता को बल मिलता है। यदि नीतिन गडकरी के दामाद जैसे शब्द को
विलोपित कर दिया जाए तो गडकरी गलत क्या कह रहे हैं? 4 वर्ष तक दिल्ली की
प्रदेश सरकार ने माफीनामे की फाइल दबा रखी और अब जाकर उसने माफी देने से
इंकार कर दिया तब केंद्र सरकार राष्टपति को अपनी सिफारिश क्यों नहीं
भेजती? कांग्रेस सरकार यदि अफजल गुरु को फांसी नहीं देना चाहती तो हिम्मत
करें, वैसा निर्णय लेने की। यदि वह अफजल गुरु को फांसी देना उचित नहीं
समझती तो दे माफी। कौन उसे रोक रहा है?

दरअसल वह देने और न देने दोनों के बीच के लाभ हानि से भयभीत है। मामला
राजनैतिक लाभ हानि का है। अफजल गुरु को फांसी देने से कहीं अल्पसंख्यक
मुसलमान नाराज न हो जाएं। न हो फांसी और माफीनामा कुबुल कर लिया तो
बहुसंख्यक जनता नाराज हो सकती है। सत्ता में बने रहना है तो उसे दोनों के
वोटों की दरकार है। यही असमंजस उसे निर्णय लेने से रोकता है। तब नीतिन
गडकरी का व्यंग्य कांग्रेस को चुभता है। अब वह फांसी देने का भी निर्णय
लेती है अर्थात माफी नामा कबूल नहीं करती तब भी जनता को संदेश तो चला
जाएगा कि नीतिन गडकरी के कारण निर्णय लिया जा रहा है। नीतिन गडकरी ने
अपना वक्तव्य वापस लेने से इंकार कर दिया है। वे किसी तरह की माफी मांगने
के भी मूड में नहीं दिखायी पड़ते। शायद उन्होंने जान बूझकर ऐसा वक्तव्य
दिया है जिससे कांग्रेस बिफर जाए और कांग्रेस बिफर भी गयी है।
सीधी सी बात है कि अफजल गुरु को फांसी देने से क्यों रोका जा रहा है?
कांग्रेस का इससे क्या लेना देना है? संसद पर हमले से भी बड़ा कोई अपराध
हो सकता है, क्या? सशस्त्र बलों के जवानों ने अपने प्राण न्यौछावर कर
संसद को बचाया। यदि संसद पर हमला सफल हो जाता और आतंकवादी सदन में पहुंच
कर गोलीबारी करने में सफल हो जाते तो क्या होता? संसद की कार्यवाही चल
रही थी। यह हमला तो सीधे-सीधे हमारी सार्वभौमिकता पर था। पूरा देश हिल
गया था। जिन शहीदों ने संसद की रक्षा की थी, उनके प्रति कृतज्ञता से देश
उऋण नहीं हो सकता। अब तो अमेरिका में पकड़े गए हेडली ने भी कह दिया है कि
पाकिस्तान की आईएसआई आतंकवादियों को पूरा सहयोग कर रही है। यह किसी जात
धर्म का मामला नहीं है बल्कि यह देश की सुरक्षा से जुड़ा मामला है।
न्यायिक प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और न्यायालय ने अफजल गुरु को दोषी
माना है। तब माफीनामा कानूनी प्रक्रिया का अंग भले ही हो लेकिन वर्षों
अनिर्णय की स्थिति देश हित में उचित है, क्या?

ऐसी स्थिति देश के लिए प्राण न्यौछावर करने वालों के प्रति श्रद्धांजलि
तो नहीं है। सत्ता में बैठे लोग जरा उनके विषय में भी सोचें। उनके परिवार
के विषय में भी सोचें। उन पर क्या बीत रही होगी। कैसे वे गर्व का भाव
अपने मन में रखेंगे। जब शहीदों की मृत्यु के लिए जिम्मेदार को सरकार
फांसी देने में ही सोच विचार ही करती रहेगी। नीतिन गडकरी के वक्तव्य से
जो बात चुभ रही है, उसे छोड़कर निर्णय करें कि अफजल गुरु का क्या हश्र
होना चाहिए? अनिर्णय से जनता का विश्वास डिगता है। तब जबान से निकलने
वाले शब्द अमर्यादित हो जाते हैं। यह सिर्फ क्रोध के इजहार का एक ढंग ही
है।

- विष्णु सिन्हा
दिनांक 10.07.2010

2 टिप्‍पणियां:

  1. मैं स्वयं अमर्यादित शब्दों के प्रयोग के नितान्त ख़िलाफ़ हूँ, यह कह कर आगे यह दर्ज करना चाहूँगा कि श्री नितिन गडकरी जी ने तथ्यात्मक भूल की है, तो उन्हें चुपचाप स्वीकार भी कर लेना चाहिए।
    हिजड़ों के बेटे-बेटी ही नहीं होते, फिर बहू-दामाद का सवाल कहाँ से आ गया?

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  2. aapne shi likha he lekin khaavt he ke asl se khtaaa nhin or km asl se vfaa nhin kai log apne aachrn mn gnde vichaar trksh men gnde alfaaz rkhte hen voh apne mul svbhaav ko bhulaa nhin skte vese aap gdkri ji se yeh to punch kr btaaye ke afzl guru ko in pristhiti men agr kongre or uske netaaon kaa daamaad maane to kyaa msud azhr shit khtrnaak aatnkvaadiyon ko srkaari havaai jhaaz men mhmaanon ki trh se qndhar lejaakr chodne pr unhen bhaajpaa or netaaon kaa daamaad to nhi isse bhi upr shaayd god faadr khenge vese to abhdr shbd men kyaa rishta khnaa chaaiye aap smjh gye honge ike pehle bhi bhaajpaa ki smrthit srkaar men mufti mohmmd said grh mntri ke putri ke aphrn kee baad aatnkvaadiyon ko chodne pr bhaajpaa ne sport kiyaa thaa to jnaab gdkri ji pehle apne girban men jhaank kr dekhen unhen daamaad se bhi behtr baap daadaa ke rishte mil jaayenge. akhtar khan akela kota rajsthan

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