यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में कांग्रेस की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार व्यक्ति के आरोपों पर कौन विश्वास करेगा?

अटल बिहारी वाजपेयी ने भाजपा की जो छवि बनायी थी, उस छवि को नीतिन गडकरी
मटियामेट कर रहे हैं। फिर भी यह समझ में आने वाली बात है। क्योंकि एक
बड़ी कुर्सी पर एक छोटे नेता को बिठा दिया गया है। गडकरी महाराष्ट के
नेता हैं और उनकी राष्ट्रीय पहचान अभी बननी है और वे किस तरह से बना रहे
हैं, यह सबको दिखायी देता है। किसी को कांग्रेस का दामाद, औरंगजेब की
औलाद जैसे शब्द उच्चारित कर वे स्वयं बताने की कोशिश कर रहे हैं कि वे
भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष बनने की योग्यता नहीं रखते।
बिना मर्यादा का ध्यान रखे जो मुंह में आया बोल देना और पूरी पार्टी की
छवि को जनता की नजरों में धूमिल करना, किसी योग्य व्यक्ति की निशानी तो
नहीं है। पता नहीं उनमें ऐसी क्या योग्यता राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने
देखी और उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी पर आसीन कर दिया। भाजपा के
नेता भी संघ के सामने ऐसे नतमस्तक हैं कि वे चाह कर भी विरोध नहीं कर
सके।

किसी व्यवसाय को अच्छी तरह से संचालित करने वाला व्यक्ति किसी राष्ट्रीय
पार्टी को भी संचालित कर सकता है, यह सोच ही गलत थी लेकिन संघ का भाजपा
पर अपना वर्चस्व कायम रखने के तहत गडकरी की नियुक्ति अब गुल खिला रही है।
गडकरी ने ही कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह को मौका दे दिया कि वे
पूछें कि गडकरी किसकी औलाद हैं? दिग्विजय सिंह कहते हैं कि वे बलभद्र
सिंह की औलाद हैं लेकिन गडकरी ही बताएं कि वे राणाप्रताप की या छत्रपति
शिवाजी की औलाद हैं। राणाप्रताप और छत्रपति शिवाजी का भारतीय जनमानस पर
जो प्रभाव है, उससे परे राजनीति में आज उनके नाम से बयानबाजी कर ये इन दो
महानुभावों की छवि तो नहीं खराब कर सकते लेकिन अपनी कुंठित मानसिकता का
ही परिचय देते हैं।

गडकरी की गडकरी जानें या उनके नियुक्तिकर्ता संघ जाने लेकिन दिग्विजय
सिंह भी जिस तर्ज पर जवाब दे रहे हैं, उससे कांग्रेस की छवि कोई उज्जवल
हो रही है, ऐसा नहीं माना जा सकता। जब भी कांग्रेस का नाम आता है तब
महात्मा गांधी की छवि उभरती है । कांग्रेसी गर्व से कहते हैं कि उनकी
कांग्रेस 125 वर्ष पुरानी है। स्वतंत्रता संग्राम की पार्टी है। हमारे
बुजुर्गों ने देश की स्वतंत्रता के लिए प्राण न्यौछावर किए और जेल की हवा
खायी। तब तो भाजपा का कोई नामोनिशान नहीं था बल्कि आज जो स्थिति है और
कांग्रेस के महासचिव जिस तर्ज पर बात करते हैं, उससे तो नहीं लगता कि यह
वही कांग्रेस है।

छत्तीसगढ़ में भाजपा की नक्सलियों से मिलीभगत का वे आरोप लगाते हैं तो
तर्क देते हैं कि सीआरपीएफ के जवान ही क्यों नक्सलियों की हिंसा के शिकार
हो रहे हैं? छत्तीसगढ़ पुलिस के जवान क्यों नहीं शहीद हो रहे हैं?
राजनांदगांव में ही छत्तीसगढ़ पुलिस के एसपी सहित 26 जवान नक्सलियों की
गोलियों से मारे गए। सीआरपीएफ के साथ छत्तीसगढ़ पुलिस के जवान और एसपीओ
भी मारे गए। डॉ. रमन सिंह का नक्सलियों के साथ कोई समझौता होता तो डॉ.
रमन सिंह नक्सलियों के विरुद्ध मोर्चा ही क्यों खोलते? बार-बार केंद्र
सरकार को नक्सली समस्या से निपटने के लिए एकीकृत अभियान के लिए क्यों
मनाते? सीआरपीएफ की और बटालियन क्यों मांगते? गोरिल्ला युद्ध की ट्रेनिंग
देने के लिए प्रशिक्षण स्कूल ही क्यों खोलते?

कांग्रेस ने जिस तरह से राज्य का कबाड़ा किया था और नक्सलियों को
फलने-फूलने का मौका दिया था, उसके बाद जब जनता ने डॉ. रमन सिंह के हाथ
में शासन की बागडोर सौंपी तब पता चला कि सांठगांठ किसकी थी? क्यों
आदिवासियों ने कांग्रेस से मुंहमोड़ लिया? पहले तो अजीत जोगी ने आरोप
लगया था कि केंद्र में राजग की सरकार थी, इसलिए सशस्त्र बलों का उपयोग कर
भाजपा ने चुनाव जीता लेकिन पिछले चुनाव में तो ऐसी स्थिति नहीं थी। तब तो
क्रेंद्र में काग्रेस की सरकार थी और चुनाव आयोग ने केंद्रीय सुरक्षा
बल की निगरानी में चुनाव कराया था और बस्तर में बड़ी मुश्किल से कांग्रेस
को 12 में से 1 सीट मिली थी। दिग्विजय सिंह के आरोप में ऐसा कोई दम नहीं
है कि लोग उन पर विश्वास करें।

मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ पर वर्षों दिग्विजय सिंह ने मुख्यमंत्री के रुप
में शासन किया है। उनके शासनकाल में ही उनका ही एक मंत्री नक्सलियों की
गोलियों का शिकार हो गया था। नक्सलियों ने अपनी ताकत और प्रभाव का
विस्तार गुपचुप तरीके से भरपूर किया। नहीं तो क्या कारण है कि एकाएक
बस्तर का आदिवासी कांग्रेस के विरुद्ध हो गया? डॉ. रमन सिंह की सरकार
आने के बाद आदिवासियों ने नक्सलियों के विरुद्ध सलवा जुड़ूम जैसा अहिंसक
आंदोलन चलाया। जिसे कांग्रेस का पूरा समर्थन मिलना चाहिए था लेकिन समर्थन
की बात तो दूर कांग्रेस के एक वर्ग ने आंदोलन का विरोध किया। सलवा
जुड़ूम के बढ़ते प्रभाव से नक्सली भी घबरा गए थे। दिग्विजय सिंह आंध्र और
महाराष्ट से शिक्षा लेने की बात करते हैं। आंध्र की कांग्रेस सरकार ने
जिस तरह से नक्सलियों के विरुद्ध फोर्स तैयार की उस तरह की फोर्स आज तो
डॉ. रमन सिंह तैयार कर रहे हैं लेकिन उस तरह की फोर्स दिग्विजय सिंह ने
अपने शासनकाल में क्यों नहीं तैयार की?

कहीं भी ऐसा कोई रिकार्ड नहीं हैं कि दिग्विजय सिंह के शासनकाल में
आदिवासियों को नक्सलियों से मुक्त कराने की कोशिश की गई। छत्तीसगढ़ में
नक्सली आए कहां से? सबको पता है कि ये आंध्र से आए। नक्सली कोई बस्तर की
पैदावार नहीं हैं। आंध्रप्रदेश में जब नक्सलियों पर पुलिस का दबाव बढ़ा,
वे बस्तर आ जाते। क्योंकि बस्तर में उनके लिए कोई खतरा नहीं था। तब
दिग्विजय सिंह ने फोर्स बनाकर नक्सलियों को बस्तर में प्रवेश करने से
क्यों नहीं रोका? फिर बस्तर में आश्रय उन्हें क्यों मिला? क्योंकि बस्तर
में शासकीय जुल्म से बचाने वाला आदिवासियों को कोई नहीं था। अन्याय के
विरुद्ध प्रारंभ में आदिवासियों को नक्सली रहनुमा दिखायी पड़े और सरकार
ने तो पूरी तरह से शासकीय अधिकारियों और नक्सलियों के रहमोकरम पर
आदिवासियों को छोड़ दिया।

दिग्विजय सिंह के ही शासनकाल का परिणाम है कि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़
में कांग्रेस दो चुनावों में निरंतर हारती रही। डॉ. रमन सिंह के कार्यकाल
में छत्तीसगढ़ विकास की उस ऊंचाइयों की तरफ बढ़ रहा है जिसकी कल्पना कभी
कांग्रेसी शासनकाल में छत्तीसगढ़ में नहीं की गई थी। आज भी कांग्रेसी इसी
इंतजार में हैं कि डॉ. रमन सिंह से जनता नाराज हो तो उनके हाथ सत्ता
सिंहासन लगे लेकिन यह हाल फिलहाल तो संभव नहीं दिखायी पड़ता। वह भी
दिग्विजय सिंह जैसा व्यक्ति आरोप लगाए तो कौन उनकी बात पर विश्वास करेगा?
क्योंकि छत्तीसगढ़ के लोग दिग्विजय सिंह से अच्छी तरह से परिचित हैं।

- विष्णु सिन्हा
दिनांक : 16.07.2010
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