यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं

बुधवार, 28 जुलाई 2010

छत्तीसगढ़ को नक्सल समस्या से मुक्त कराना कोई ईमानदारी से चाहता हैं तो वे डॉ. रमन सिंह ही हैं

डॉ. रमन सिंह ने स्पष्ट कह दिया है कि वे इस्तीफा देने वाले नहीं हैं।
पिछले 7 वर्ष में कांग्रेस ने कई बार इस्तीफा मांगा। कांग्रेस का तो एक
सूत्रीय कार्यक्रम है कि डॉ. रमन सिंह इस्तीफा दें। खास कर पूर्व
मुख्यमंत्री अजीत जोगी का। अजीत जोगी आरोप लगाते हैं कि डॉ. रमन सिंह
नहीं चाहते कि नक्सल समस्या समाप्त हो। उनका आरोप है कि नक्सलियों के
सहयोग से ही डॉ. रमन सिंह ने भाजपा को बस्तर में जितवाया। यही आरोप
मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का भी है। इससे
हास्यास्पद कोई आरोप नहीं हो सकता। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की जरा सी
भी सहानुभूति नक्सलियों से होती तो वे जंगल वार प्रशिक्षण स्कूल ही नहीं
खोलते। केंद्र सरकार से बार-बार और सशस्त्र बल और संसाधनों की मांग ही
नहीं करते। आंध्र के समान ग्रेहाऊंड सशस्त्र बल तैयार करने की कोशिश ही
नहीं करते। फिर सबसे बड़ी बात केंद्रीय गृह मंत्रालय को तो यह जानकारी
सबसे पहले होती कि डॉ. रमन सिंह की सांठगांठ नक्सलियों के साथ है।

केंद्र में कांग्रेस की सरकार और राज्य में भाजपा की सरकार। इससे बढिय़ा
अवसर क्या होता डॉ. रमन सिंह की सरकार को अपदस्थ करने का । दरअसल नक्सल
समस्या के विषय में केंद्र सरकार का दरवाजा बार-बार खटखटाकर डॉ. रमन सिंह
ने ही नक्सल समस्या की गंभीरता को समझने के लिए केंद्र सरकार को बाध्य
किया। पहली बार डॉ. रमन सिंह ने ही नक्सल समस्या को समाप्त करने का बीड़ा
उठाया। किसी कांग्रेसी मुख्यमंत्री ने ऐसा किया हो मध्यप्रदेश या
छत्तीसगढ़ में ऐसा कम से कम जनता को तो नहीं मालूम। नक्सलियों को अपने
बिलों से निकलने के लिए डॉ. रमन सिंह ने ही मजबूर किया। तब असलियत सामने
आयी कि किस तरह से बस्तर को मुख्यालय बनाकर नक्सली कैसी तैयारी कर रहे
हैं? मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से इस्तीफा मांगना तो एक तरह से नक्सलियों
का ही मनोबल बढ़ाने का काम है।

नक्सलियों को दिखायी पड़ता है कि उनके नंबर एक दुश्मन डॉ. रमन सिंह से
इस्तीफा मांग कर सरकार को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश करने वाले सरकार
को कमजोर साबित कर एक तरह से उनका ही काम कर रहे हैं। सदन में सरकार के
विरुद्ध नारेबाजी, पोस्टर लहरा कर प्रतिपक्ष जनता और नक्सलियों को क्या
संदेश दे रहा है? नक्सली सशस्त्र बल के जवानों और निर्दोष आदिवासियों को
मार कर सरकार का मनोबल कमजोर करना चाहते हैं तो विपक्ष विधानसभा में भी
इसी तरह की कोशिश कर रहा है। कांग्रेस के नेता आलाकमान से शिकायत करते
हैं कि केंद्र के मंत्री राज्य में आकर राज्य सरकार की तारीफ करते हैं तो
वे कांग्रेसियों का मनोबल राज्य में कमजोर करते हैं। भाजपा विपक्ष की
पार्टी है, केंद्र में लेकिन गृह मंत्री पी.चिदंबरम के इस्तीफे की जब
स्वयं चिदंबरम ने पेशकश की थी तब भाजपा और रमन सिंह ने ही कहा था कि
उन्हें इस्तीफा नहीं देना चाहिए।

चिदंबरम यदि इस्तीफा देते और उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया जाता तो यह एक
तरह से नक्सलियों की ही बड़ी जीत माना जाता। डॉ. रमन सिंह भी आज इस्तीफा
दे देते हैं तो यह नक्सलियों की बड़ी जीत ही माना जाएगा। डॉ. रमन सिंह
नक्सलियों को यह खुशी तो किसी कीमत पर नहीं दे सकते। बीच लड़ाई से भाग
खड़ा होना उनकी फितरत में नहीं हैं। इसीलिए उन्होंने विधानसभा में
स्पष्ट कह दिया कि वे किसी भी हाल में इस्तीफा नहीं देंगे। अजीत जोगी तो
कह रहे थे कि डॉ. रमन सिंह राज्यपाल को न सही अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष
नीतिन गडकरी को ही इस्तीफा दे दें। डॉ. रमन सिंह अजीत जोगी के कहने से
किसी को भी इस्तीफा देने का नाटक क्यों करें? विपक्ष का अधिकार है,
इस्तीफा मांगना लेकिन कितने हैं जो विपक्ष की मांग पर इस्तीफा दे देते
हैं।

अमेरिका के खुफिया रिकार्ड से ही स्पष्ट हो गया है कि पाकिस्तान
अफगानिस्तान में आतंकवादियों की मदद करता है। काबुल में भारतीय दूतावास
पर जो हमला हुआ था, वह आई एस आई ने ही करवाया और सारी जानकारी अमेरिका को
है। फिर भी अमेरिका हर तरह से मदद पाकिस्तान की कर रहा है। अमेरिका में
पकड़े गए आतंकवादी हेडली ने ही स्पष्ट कर दिया है कि मुंबई हमले में आई
एस आई का हाथ था। भारत में सीमा से आने वाला आतंकवाद पाकिस्तान की ही देन
है। फिर भी अमेरिका से दोस्ती करने और निभाने के लिए हमारी केंद्र सरकार
सब कुछ करने के लिए तैयार रहती है। कांग्रेसियों में दम है तो मांगें
केंद्र सरकार से इस्तीफा। संसद में महंगाई को लेकर भाजपा ने, सरकार को
कठघरे में खड़ा कर रखा है। केंद्र सरकार तो बहस कराने के लिए भी तैयार
नहीं हैं जबकि छत्तीसगढ़ में डॉ. रमन सिंह सरकार ने नक्सल समस्या पर 7
घंटे तक बहस करा ली। डॉ. रमन सिंह किसी बहस से पीछे नहीं हट रहे हैं तो
कांग्रेसी कहें मनमोहन सिंह से कि वे भी वोटिंग वाला बहस कराएं। जिससे
देश को पता तो चले कि महंगाई के पक्ष में कौन है और विरोध में कौन खड़ा
है?

अक्टूबर में दिल्ली में राष्टमंडल खेल होने जा रहे हैं। कांग्रेस के
पूर्व मंत्री और राज्यसभा सदस्य मणिशंकर अय्यर कह रहे हैं कि
राष्टमंडल खेलों का बेड़ा गर्क हो तो इसी में देश का लाभ है। कहा जा
रहा है कि इन खेलों पर सरकार चालीस हजार करोड़ रुपए खर्च कर रही है।
प्रारंभ और समापन पर ही तीन हजार करोड़ की आतिशबाजी की जाएगी। आखिर यह धन
आएगा, कहां से? पेट्रोलियम पदार्थों का घाटा सरकार उठाने में सक्षम नहीं
हैं और रोना रो रही है कि अभी भी 56 हजार करोड़ का घाटा है। जब जनता के
धन से जनता को ही राहत देने में सरकार सक्षम नहीं है तब वह चालीस हजार
करोड़ रुपए क्यों राष्टमंडल खेलों पर खर्च कर रही हैं? मणिशंकर अय्यर
की बात कड़वी लग सकती है लेकिन है तो सही।

सरकार के पास रखने के लिए अनाज गोदाम नहीं है और हजारों टन अनाज सड़ रहा
है। सुप्रीम कोर्ट ने ही सरकार से पूछा है कि अनाज को सड़ाने के बदलने
जनता को बांट क्यों नहीं दिया जाता? इस संबंध में जब कृषि मंत्री शरद
पवार से पूछा जाता है तो वे कहते हैं कि वे सिर्फ संसद के प्रति जवाबदेह
हैं। यह तो हाल है सरकार का और माक्र्सवादी कहते हैं कि तृणमूल कांग्रेस
की नक्सलियों से सांठगांठ है। तृणमूल कांग्रेस तो केंद्र सरकार का हिस्सा
है। कितने मणिशंकर अय्यर हैं कांग्रेस में जो अपनी ही सरकार को कठघरे में
खड़ा करें। छत्तीसगढ़ की सत्ता पर काबिज होने का ख्वाब देखने वाले डॉ.
रमन सिंह से भले ही इस्तीफा मांगें लेकिन असलियत यही है कि नक्सली समस्या
से छत्तीसगढ़ को ईमानदारी से कोई मुक्त कराना चाहता है तो वे डॉ. रमन
सिंह ही हैं।

- विष्णु सिन्हा
दिनांक : 28.07.2010
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4 टिप्‍पणियां:

  1. kangresiyon ka kya, chaplusi ke alava koi kala aati nahi...raman singh jee bahut achcha kar rahen hain. unko koti koti sadhuvaad

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  2. राजनीति में विवेकी लोग कम ही बचे हैं। वैसे,आपही के पोस्ट से पता चला कि अजीत जोगी अब भी राजनीति में हैं।

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  3. जैसे भी हो, बस मुक्ति मिल जाये इस समस्या से.

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