यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

चिदंबरम और रमन सिंह की नक्सल समस्या से मुक्ति के प्रयासों को सफल करना अधिकारियों का ही काम

चिदंबरम जब गृहमंत्री बने थे तब उन्होंने अपनी निजी सुरक्षा की आवश्यकता
महसूस नहीं की थी लेकिन अब वैसी स्थिति रही नहीं। आज नक्सलियों को वे
अपने सबसे बड़े दुश्मन नजर आ रहे हैं। प्रथम श्रेणी के नक्सली नेता
राजकुमार उर्फ आजाद के आंध्र में पुलिस के द्वारा मार गिराए जाने के बाद
नक्सलियों को चिदंबरम दुश्मन नं. एक दिखायी दे रहे हैं। समाचार पत्रों
में छपी खबरों के अनुसार पुलिस ने आजाद का एनकाउंटर चिदंबरम की जानकारी
में किया। कहा तो यह भी जाता है कि स्वामी अग्निमेश के साथ शांति वार्ता
की चर्चा आजाद ही कर रहे है। अग्निमेश का भी वक्तव्य आया है कि आजाद के
मारे जाने से शांति वार्ता को धक्का लगा है। नक्सली कह भी रहे हैं कि वे
आजाद की मौत का बदला लेकर रहेंगे। आजाद की मौत के बाद नक्सलियों की हिंसक
गतिविधियां बढ़ी हैं। फिर भी सशस्त्र बलों के सिपाहियों या निर्दोष
नागरिकों को मारने से तो आजाद की मौत का बदला पूरा नहीं होता। इसलिए
नक्सली किसी बड़े व्यक्ति की हत्या कर बदला भंजाना चाहते हैं।
खुफिया सूचना के अनुसार गृहमंत्रीचिदंबरम और गृह सचिव जी.के. पिल्लई
नक्सलियों की प्राथमिकता सूची में हैं तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं।
कभी भी किसी गृहमंत्री ने नक्सलियों के विरुद्ध ऐसा आक्रामक रुख नहीं
अपनाया जैसा रुख चिदंबरम ने अपनाया। दरअसल पहली बार किसी गृहमंत्री ने
समझा कि नक्सल समस्या देश के लिए कितनी खतरनाक है। जब गृहमंत्री ने
समस्या को समझा तो उनके कर्तव्य निर्वाह के लिए आवश्यक हो गया कि वे इस
समस्या से देश को मुक्त कराएं। कोई भी जिम्मेदार व्यक्ति समस्या को सामने
देखकर आंख तो मूंद नहीं सकता और चिदंबरम ने आंखें नहीं मूंदी बल्कि
राजनीति से परे हटकर राज्य की समस्या कह कर पल्लू झाडऩे का भी प्रयास
नहीं किया। नक्सल प्रभावित अधिकांश राज्यों में कांग्रेस का शासन नहीं
है। फिर भी हर राज्य सरकार को नक्सलियों से लडऩे के लिए पर्याप्त संसाधन
और सुझाव देने में चिदंबरम पीछे नहीं रहे। एक तरफ से चिदंबरम केंद्र
सरकार के बड़े और सक्रिय मंत्री के रुप में उभरे।

जब शिवराज पाटिल को हटा कर चिदंबरम को गृहमंत्री बनाया गया तब वे वित्त
मंत्री थे और अपने काम से पूरी तरह संतुष्ट थे। मुंबई में आतंकवादी हमले
के बाद जब केंद्र सरकार को लग गया कि संकट काल में शिवराज पाटिल एक अच्छे
गृहमंत्री साबित नहीं हुए तब तलाश की गयी कि गृहमंत्री का ओहदा किसे
सौंपा जाए? तब पूरे मंत्रिमंडल में इस पद के लिए चिंदबरम ही सबसे योग्य
व्यक्ति दिखायी दिए। अनमने से चिदंबरम ने गृहमंत्री पद को स्वीकार किया
लेकिन जब स्वीकार कर लिया तो फिर अपनी जिम्मेदारी के निर्वहन में किसी
तरह की कोताही नहीं की। उनके गृहमंत्री बनने के बाद आयातित आतंकवाद में
निश्चित ही भारी कमी आयी। छुटपुट घटनाओं को छोड़ दिया जाए तो आयातित
आतंकवाद जो देशभर में कहीं भी कभी भी कुछ भी घटित करने में सक्षम था, उस
पर लगाम तो निश्चित रुप से लगा।

यह सही है कि आयातित आतंकवाद ने काश्मीर में फिर से सिर उठाया है लेकिन
इसके लिए गृह मंत्रालय को तो दोषी नहीं ठहराया जा सकता। राज्य में चुनी
हुई सरकार है और उसकी असफलता का ठीकरा चिदंबरम के सर फोडऩा नाइंसाफी
होगी। क्योंकि काश्मीर के विषय में अकेले निर्णय गृह मंत्रालय नहीं लेता
और वहां की राजनीति अपना खेल खेलती है। जहां तक नक्सली समस्या का प्रश्न
हैं तो इसके लिए बहुत कुछ किया है। 4 राज्यों की एकीकृत योजना को स्वीकृत
कराना भी उनकी बड़ी उपलब्धि है। अधिकारियों का अहम आपस में न टकराए और वे
भी चिदंबरम और डॉ. रमन सिंह की तरह नक्सल समस्या से मुक्त कराने के ही
टारगेट पर ध्यान केंद्रित करें तो समस्या से मुक्ति कठिन नहीं हैं।
सशस्त्र बलों को नक्सलियों से निपटने के लिए तैयार करने के लिए भले ही
समय की जरुरत हो लेकिन अधिकारियों का अहम टकराता रहा तो लाभ नक्सलियों को
ही होगा।

उच्च पदस्थ अधिकारी यदि बोलने से अपने को रोक सकें तो वे इस मुहिम में
लगे हजारों जवानों का भला ही करेंगे। यह मेरे जवान और वह तुम्हारे जवान
जैसा बंटवारा कम से कम अधिकारियों को तो शोभा नहीं देता। राजनीतिज्ञ इस
तरह का खेल खेलते हैं और समस्याओं को उलझाते हैं तो यह समझ में भी आने
वाली बात है। क्योंकि उनके मन में कहीं न कहीं कोई चोर छुपा रहता है।
दूसरों की सफलता उन्हें ईष्र्यालु बनाती है। तब तो और जब उनके शासनकाल
में समस्या को फलने-फूलने का मौका मिला। वे तो शांत जल में पत्थर फेंक
कर लहरें उठाने को ही राजनीति समझते हैं और इन उठी लहरों में ही अपने लिए
पद प्रतिष्ठा की जगह तलाश करते हैं। राजनीतिज्ञों और अधिकारियों में तो
अंतर होना चाहिए। दोनों की चयन प्रक्रिया और योग्यता भी अलग है।
ईमानदारी से देखा जाए तो राजनेताओं से ज्यादा जिम्मेदारी अधिकारियों की
हैं। जिस पद पर वे बैठते हैं, उसके अधिकार और कर्तव्य स्पष्ट हैं। सारा
शासन प्रशासन इनके ही हस्ताक्षरों से संचालित होता है। नेता तो आते हैं
और चले जाते हैं लेकिन अधिकारियों की कुर्सी भले ही बदले वे ज्यादा
स्थायी होते हैं। जनता ने जिसे चुनकर शासन करने का अधिकार सौंपा उसकी
नीतियों का ईमानदारी से क्रियान्वयन हो इसकी जिम्मेदारी अधिकारियों की है
लेकिन जब ये अधिकारी आपस में उलझ कर समस्या से मुक्त कराने के बदले खुद
उलझते हैं तो अपनी योग्यता पर ही प्रश्रचिन्ह लगाते हैं।

जब चिदंबरम जैसा गृहमंत्री हो और डॉ. रमन सिंह जैसा मुख्यमंत्री तब
अधिकारियों को आपस में उलझ कर समस्याओं को उलझाने का काम तो और नहीं करना
चाहिए। क्या उन्हें समझ में नहीं आता कि उनके अहम भले ही उन्हें लगे कि
संतुष्ट हो रहे हैं लेकिन फायदा तो उन्हें होता है जो असल में समस्या की
जड़ है। आज चिदंबरम और डॉ. रमन सिंह नक्सलियों की हिट लिस्ट में सबसे ऊपर
हैं। ये दोनों अच्छी तरह से जानते हैं कि नक्सलियों के विरुद्ध मुहिम चला
कर ये अपनी जान जोखिम में डाल रहे है। जब ऐसा नेतृत्व हो तो ऐसी कोई बात
नहीं होना चाहिए कि समस्या पैदा करने वालों का मनोबल बढ़े। इससे तो
अधिनस्थों का ही मनोबल कमजोर होता है। आपस में उलझते अपने अधिकारियों को
देख कर इनके मन में कैसे विचार उत्पन्न होते होंगे। तब और जब एक पद पर
बैठा व्यक्ति दूसरे पद पर भी कभी भी बिठाया जा सकता हो। चाहे वह केंद्रीय
बल हो या राज्य बल, हैं तो दोनों ही एक ही उद्देश्य के लिए। सब मिलकर और
शहीदों की कुर्बानी को याद करते हुए मिलकर समस्या से देश को मुक्त कराने
का प्रयास करेंगे तो असंभव कुछ भी नहीं है। सोचना इन पढ़े लिखे सज्जनों
को ही है।

- विष्णु सिन्हा
दिनांक : 20.07.2010
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1 टिप्पणी:

  1. देश में न्यायिक व्यवस्था का पूरी तरह खत्म हो जाना व सरकार का असम्बेदंशील रवैया ही इसके लिए जिम्मेवार है तथा कुछ स्वार्थी नेताओं का स्वार्थ भी ...निश्चय ही इमानदार पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी इस समस्या को हल करने में सहायक सिद्ध हो सकते है बशर्ते भ्रष्ट नेता व मंत्री उसमे टांग ना लगाये |

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