यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं

रविवार, 25 जुलाई 2010

छत्तीसगढ़ के हित के प्रति डॉ. रमन सिंह की सोच की स्पष्टता ही लोकप्रियता का कारण है

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में आयोजित राष्ट्रीय विकास
परिषद की बैठक में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कहा कि छत्तीसगढ़ के 13
जिले नक्सलवाद से प्रभावित हैं। वैसे 13 जिले ही क्यों, नक्सलवाद से तो
पूरा छत्तीसगढ़ प्रभावित है। जब सरकार की पर्याप्त ऊर्जा नक्सल प्रभाव से
मुक्ति के लिए प्रयासरत है तो असर तो पूरे छत्तीसगढ़ पर पड़ता है। कभी
छत्तीसगढ़ को शांति का टापू कहा जाता था लेकिन नक्सल प्रभाव के कारण अब
यह हिंसा का टापू बन गया है। यह बात तो केंद्र सरकार और बुद्धिजीवी मानते
हैं कि नक्सलवाद का जवाब गोली नहीं विकास है। नक्सल प्रभावित क्षेत्र
विकसित हो गए तो नक्सलवाद का स्वयं खात्मा हो जाएगा। भारतवर्ष के मध्य
में बसा बस्तर आज भी आदिम संस्कृति को जीवित रखे हुए है। अधिकांश समय
कांग्रेस का शासन इस क्षेत्र में रहा। विकास के लिए धन भी कम खर्च नहीं
किया गया बल्कि एक समय तो मध्यप्रदेश सरकार का एक तिहाई बजट आदिवासी
क्षेत्रों के लिए हुआ करता था। फिर भी विकास की किरण बस्तर के सुदूर
इलाकों तक नहीं पहुंच पायी तो दोषी कौन है?

जब आदिवासियों की जेब तक पैसा नहीं पहुंचा तो निश्चित रुप से खर्च किया
गया पैसा किसी न किसी की जेब में तो गया होगा। बस्तर ही क्यों पूरा का
पूरा छत्तीसगढ़ देश के गरीब राज्यों में से एक है। यह बात तो
अंतर्राष्टरीय संस्थाएं अपने सर्वेक्षण के आधार पर कहती हैं। यह बात तो
कांग्रेस के ही पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी भी बार-बार कह चुके कि
छत्तीसगढ़ की अमीर धरती पर गरीब लोग रहते हैं। खनिज संपदा और प्राकृतिक
संपदा के मान से देश के कितने क्षेत्र हैं जो बस्तर का मुकाबला कर सकें।
मिट्टी के मोल लौह अयस्क खोद कर जापान तक को बेचा गया। जंगल कटते रहे और
कम से कम होते गए लेकिन बस्तर के आदिवासियों के हाथ में क्या आया? आज भी
गरीबी जितनी बस्तर के मूल निवासियों की है, वह उदाहरण है व्यवस्था और
सरकार के शोषण की।

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद पहली बार इन आदिवासियों की किसी ने सुधि ली
तो वे डॉ. रमन सिंह ही है। उन्होंने ही पहचाना कि आदिवासियों की व्यथा
कथा क्या है? कैसे नक्सल आतंकवाद से आदिवासी पीडि़त है? क्यों विकास की
किरण उन तक पहुंच नहीं रही है उन्होंने ही पहचाना कि जब तक नक्सलियों के
प्रभाव से बस्तर को मुक्त नहीं कराया जाता तब तक आदिवासियों को विकास की
मुख्यधारा में लाना कठिन काम है। यह डॉ. रमन सिंह के ही प्रयासों का
परिणाम है कि केंद्र सरकार नक्सलवाद की समस्या पर गंभीर चिंतन के लिए
बाध्य हुई और तब उसे समझ में आया कि नक्सलवाद को हल्के ढंग से लेना देश
की आंतरिक सुरक्षा के लिए कितना खतरनाक हैं। डॉ. रमन सिंह के ही प्रयासों
के कारण नक्सलियों के असली क्रियाकलाप उजागार हुए।

जब डॉ. रमन सिंह राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में कहते हैं कि 7 नहीं
13 जिले नक्सल प्रभावित हैं तो स्पष्ट इशारा करते हैं कि 7 जिलों की
नहीं 13 जिलों के विकास की चिंतना केंद्र सरकार करे। क्योंकि एकीकृत
विकास जब तक सभी जिलों का नहीं होगा तब तक नक्सलवाद 7 जिलों से हटा तो
अन्य जिलों में अपनी जड़ें जमाने की कोशिश करेगा। जड़ मूल से नक्सल
समस्या को समाप्त करना है तो उस माहौल और व्यवस्था को समाप्त करना जरुरी
है जो नक्सलवाद के लिए फलने-फूलने का अवसर उपलब्ध कराता है। प्रधानमंत्री
मनमोहन सिंह कहते हैं कि वे महंगाई और नक्सलवाद से निपट लेंगे। कैसे
निपटेंगे? महंगाई को तो सरकार में आने के बाद 100 दिन में कम करने का
वादा किया था लेकिन 1 वर्ष पूरा हो चुका और दिसंबर तक का समय और मांगा जा
रहा है। कहा जा रहा है कि वर्षा अच्छी हो रही है और दिसंबर तक जब नई फसल
आएगी तब महंगाई 6 प्रतिशत पर आ जाएगी। अत्यधिक वर्षा के कारण जो नुकसान
हो रहा है, उसका आंकलन कर लिया गया है, क्या? वर्षा समयानुकूल अच्छी हो
गयी तो महंगाई कम हो जाएगी लेकिन नहीं हुई, तब?

अभी ही अनाज को रखने की समुचित व्यवस्था नहीं है और बहुत सा सरकारी अनाज
गोदामों की कमी के कारण खराब हो चुका है। जनता महंगाई की मार से पीडि़त
है और अनाज सड़ रहा है। यह कैसी व्यवस्था है? महंगाई कोई नक्सलियों के
कारण तो है, नहीं लेकिन आर्थिक लाभ अधिक से अधिक प्राप्त करने के लोभियों
के कारण अवश्य है। महंगाई इसी तरह से बढ़ती रही और आम आदमी महंगाई के
चक्कर में पिसता रहा तो नक्सलियों के प्रति सहानुभूति पीडि़तों की नहीं
बढ़ेगी, क्या? जब प्रजातांत्रिक ढंग से सरकार अपने नागरिकों की दैनंदिन
समस्या का निदान करने में अक्षम साबित होगी तब जनता का आक्रोश उनके प्रति
भी सहानुभूति में बदल सकता है जिन्हें जनता पसंद नहीं करती। कहावत है कि
मरता क्या न करता? यह सही है कि हिंसा का जवाब हिंसा नहीं है। हिंसा का
जवाब हिंसा से देना तो वक्ती मजबूरी है। तब और मजबूरी है जब कोई बातों से
हल निकलने की कोशिश करने के लिए ही तैयार न हो लेकिन आम जनता को बंदूक,
लाठी, गोली से नहीं हंकाला जा सकता।

आम जनता खुशहाल हो। दैनंदिन जीवन उसका सरल सहज हो। इसकी जिम्मेदारी
सीधे-सीधे सरकार पर हैं। जनता की बेसिक जरुरत की चीजें उचित मूल्य पर
जनता को सहज ही उपलब्ध हो यह कर्तव्य प्रजातंत्र में जनता के द्वारा चुनी
गई सरकारों का ही है। डॉ. रमन सिंह ने तो 2 रु. और 1 रु. किलो अनाज देकर
जनता को और खासकर गरीब जनता को बहुत बड़ी राहत दी है। यही कारण है कि
बस्तर का आदिवासी सरकार के पक्ष में हैं। जब डॉ. रमन सिंह कहते हैं कि 7
नहीं 13 जिले नक्सल प्रभावित हैं तो केंद्र सरकार को यह बात समझनी
चाहिए। जब डॉ. रमन सिंह कहते हैं कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सीमेंट
की सड़क बनाना चाहिए तब भी यह बात प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को समझ में
आना चाहिए। जब तक सुचारु रुप से आवागमन की व्यवस्था नहीं होगी तब तक
सशस्त्र बलों को नक्सलियों से निपटने में अड़चनों का सामना करना पड़ेगा
और समय भी बहुत लगेगा।

प्रधानमंत्री को अर्थशास्त्रियों पर नहीं यथार्थ में जो समस्याओं से
रुबरु हो रहे हैं, उनकी सोच पर विश्वास करना चाहिए। डॉ. रमन सिंह की सबसे
बड़ी विशेषता यही है कि वे समस्याओं को लेकर राजनीति नहीं करते बल्कि
समस्याओं को समाप्त करने पर विचार करते हैं। यही कारण है कि छत्तीसगढ़
में उनकी लोकप्रियता बढ़ती ही जा रही है। कांग्रेसियों का विरोध जनता को
प्रभावित करने में सक्षम सिद्ध नहीं हो रहा है। जो व्यक्ति बिना केंद्र
सरकार के समुचित सहयोग के बिना ही 2 रु. किलो में 35 किलो अनाज देने की
योजना चला सकता है, वह केंद्र सरकार मदद नहीं करेगी तब भी करेगा। यह बात
दूसरी है कि तब जो काम आज हो सकता है उसमें समय लगेगा लेकिन इसका यह अर्थ
नहीं कि इसका लाभ कांग्रेस की राजनीति को मिलेगा बल्कि कांग्रेस और
नुकसान में ही जाएगी।

- विष्णु सिन्हा
दिनांक : 25.07.2010

1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही सार्थक प्रस्तुती व सार्थक विचार,ईमानदारी से अगर विकाश असल जरूरतमंद लोगों तक पहुंचा दिया जाय तो नक्सलवाद ही नहीं बल्कि सभी मानवीय समस्याओं का समाधान हो जायेगा | साधन की हमारे देश में कमी नहीं है लेकिन हमारे देश के प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति 10 %लोगों के द्वारा उसे लूटने से रोक पाने में असफल हैं |

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