यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं

बुधवार, 14 जुलाई 2010

सरकारें विकास के काम तब ही तो कर सकती हैं जब नक्सली करने देंगे

राजनीतिज्ञों के एक वर्ग की सोच है कि जब तक नक्सल प्रभावित क्षेत्रों
का आर्थिक विकास नहीं होता तब तक नक्सल समस्या से मुक्ति संभव नहीं है।
यह सोच केंद्र सरकार के पास है कि ग्राम पंचायतों के माध्यम से
नक्सलियों को मुख्यधारा में जोड़ा जाए। यदि यह संभव हो तो यह अच्छी नीति
हो सकती है लेकिन क्या वास्तव में यह संभव है? केंद्र सरकार ग्राम
पंचायतों को धन दे सकती है। धन का सदुपयोग हो रहा है या नहीं, यह देखने
का काम कौन करेगा? फिर जो नक्सली स्कूल के भवन, पंचायतों के भवन ही बम के
द्वारा ढहा देते हों वे ग्राम पंचायतो को विकास के काम करने देंगे या
ग्राम पंचायतों को दिया गया धन भी नक्सलियों के पास ही पहुंच जाएगा। यदि
धन नक्सलियों के पास पहुंच गया तो नक्सलियों की ताकत में इजाफा ही होगा।
ऊपर ऊपर से देखने में यह योजना बड़ी अच्छी और आदर्शवादी दिखायी देती है
लेकिन जहां व्यवस्था इतनी लचर हो और सर्वत्र भ्रष्टाचार का बोलबाला हो,
वहां यह योजना भी असफल हो जाए तो आश्चर्य की बात नहीं।
इस सोच के पीछे यह सोच काम कर रही है कि आर्थिक विकास होने पर
नक्सलियों का प्रभाव कमजोर होगा लेकिन नक्सली आर्थिक विकास होने ही क्यों
देंगे? रेल की पटरियों को उखाडऩे वाले, विद्युत व्यवस्था को सुचारू रूप
से न चलने देने वाले, कारखानों के विरूद्घ जो लोग है, वे विकास होने ही
क्यों देंगे? छत्तीसगढ़ के ही आदिवासी अंचलों में सरकारों ने स्वतंत्रता
के बाद अरबों रूपये खर्च किए। आंकड़े तो कहते है कि यह रकम आदिवासियों
को बांट दी जाती तो प्रत्येक आदिवासी को 2 करोड़ रूपये से अधिक की रकम
मिलती। कहां गया, यह धन? समस्या की जड़ सिर्फ गरीबी नहीं है। ऐसा होता तो
सारे गरीबों को नक्सलवादी हो जाना चाहिए था लेकिन ऐसा हुआ तो नहीं।
नक्सलियों को कभी राजनैतिक मामला माना जाता था लेकिन आज वह स्थिति तो
नहीं है। पंद्रह सौ करोड़ रूपये की जिन नक्सलियों की वार्षिक आय है, वे
यह धन गरीबों के उत्थान के लिए तो खर्च नहीं कर रहे हैं। क्या नक्सली
नहीं समझते कि गरीबों का आर्थिक विकास उनके प्रभाव वाले क्षेत्र में हो
गया तो वे क्या करेंगे?

काश्मीर को ही भारत सरकार प्रति वर्ष कम धन देती है, क्या? वहां अलगाववाद
और आतंकवाद क्यों समाप्त नहीं हो रहा है? चुनाव होते हैं तो वहां का
मतदाता भी वोट देकर सरकार चुनता है तो फिर अलगाववाद की हवा क्यों? नक्सल
प्रभावित क्षेत्रों के मतदाता भी मतदान कर वोट देते है और अपना विधायक,
सांसद चुनते हैं ? पंचायतों के भी चुनाव होते हैं। इससे यह तो सोचा नहीं
जा सकता कि प्रभावित क्षेत्र की बहुसंख्यक जनता नक्सलियों के प्रभाव में
है। होती तो नक्सलियों के फरमान का पालन कर मतदान ही नहीं करती।
नक्सलियों के प्रभाव का मुख्य कारण भय है। आतंक है। जनता को सरकार आतंक
से मुक्ति दिलाए, तब स्पष्ट पता चल जाएगा कि नक्सलियों के कितने प्रभाव
में लोग हैं। आदिवासियों ने तो स्वयं नक्सलियों के विरूद्घ सलवा जुडूम
आंदोलन चलाया था। छत्तीसगढ़ की डा. रमन सिंह की सरकार ने अपनी तरफ से
पूरा सहयोग दिया। यहां तक कि कांग्रेस के नेता महेन्द्र कर्मा ने भी
उसका समर्थन किया। इस आंदोलन को उस समय केंद्र सरकार का भी भरपूर समर्थन
मिला होता तो आज नक्सल समस्या का कम से कम छत्तीसगढ़ में तो सफाया हो
जाता।

तब हर तरह का प्रयास किया गया कि सलवा जुडूम सफल न हो। अपरोक्ष रूप से
नक्सलियों का मनोबल सलवा जुडूम का विरोध कर बढ़ाया गया और सलवा जुडूम
आंदोलनकर्ताओं का मनोबल कमजोर किया गया। अबूझमाड़ को नक्सलियों का गढ़
किसने बनने दिया? अबूझमाड़ में तो आम आदमी के जाने पर पाबंदी थी?
सुरक्षित क्षेत्र मिला ओर नक्सलियों ने अपना गढ़ बना लिया। सिर्फ विकास
से आतंक का खात्मा नहीं किया जा सकता। जब तक आदिवासी अपने को नक्सलियों
से सुरक्षित नहीं महसूस करेंगे तब तक आर्थिक विकास ही आसान नहीं है। आम
आदिवासी तो स्वतंत्रता चाहता है। वह प्राकृतिक रूप से अपना जीवन जीना
चाहता है। बस्तर क्षेत्र में नक्सलवाद कोई बस्तरियों की देन नहीं है
बल्कि आंध्रप्रदेश से आकर नक्सलियों ने उसे अपना ठिकाना बनाया।

सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश टिप्पणी कर रहे हैं कि आधे छत्तीसगढ़ पर तो
सरकार का अधिकार नहीं है। ऐसी स्थिति कैसे निर्मित हुई? जबकि शासकीय
मशीनरी तो हर जगह मौजूद है। हर जिले में कलेक्टर, एस. पी. हैं, थाने हैं,
ग्राम पंचायत है। सरकार सड़क बनाती है तो नक्सली उड़ा देते हैं। सरकार
पुल बनाती है तो नक्सली उसे भी उड़ा देते हैं। यह सब विकास के ही रूप
हैं। नक्सली पसंद ही नहीं करते कि उनके प्रभावित क्षेत्रों में आवागमन के
साधन हो। जिस बस में सशस्त्र बल, पुलिस सवारी करेगी, उस बस की खैर नहीं।
अब सड़क नहीं, पुल नहीं तो विकास होगा कैसे? सीधी सी बात दिखायी पड़ती
है कि सड़क और पुल बनाने में जहां धन खर्च होता है, वहीं समय भी लगता है
लेकिन उन्हें बारूद से उड़ाने में कितना समय लगता है। विकास की बातें
अच्छी लगती है लेकिन विकास श्रमसाध्य और समय खाने वाला काम है। विध्वंस
तो पलक झपकते ही हो जाता है। जब तक विध्वंस को रोकने के सख्त उपाय नहीं
किए जाते तब तक विकास की सोच को अमलीजामा पहनाना संभव तो नहीं दिखायी
देता। इससे तो अच्छा है कि विकास के काम में लगने वाला धन आतंक को
समाप्त करने में खर्च किया जाए।

या फिर आदिवासियों को ही सीधे सीधे धन बांट दिया जाए। यह भी आसान नहीं
है क्योंकि राहुल गांधी स्वयं कहते हैं कि सरकार एक रूपया देती है तो
दस पैसा जनता तक पहुंचता है। विकास के काम करने वाले ठेकदार नक्सलियों
को उनका हिस्सा देते हैं। परिवहन का व्यवसाय करने वाले भी नक्सलियों को
हिस्सा देते हैं। जान बचानी है तो सरकारी अधिकारियों कर्मचारियों को भी
नक्सलियों को धन देना पड़ता है। जंगल ठेकेदारों, खदानों के ठेकेदारों को
भी नक्सलियों को टैक्स देना पड़ता है। पंदह सौ करोड़ रूपये नक्सलियों के
पास इसी माध्यम से आते हैं। अब केंद्र सरकार नक्सल प्रभावित क्षेत्रों
में विकास पर धन खर्च करेगी तो नक्सलियों के खजाने में धन और बढ़ेगा और
धन बढ़ेगा तो उनकी ताकत भी बढ़ेगी। फिर सरकार कराती रहे विकास के काम,
विकास के कामों को नेस्तानाबूद करना तो नक्सलियों के बाएं हाथ का खेल
है।

विकास के काम से आतंक समाप्त होने वाला नहीं। जब तक आतंक है तब तक
नक्सलियों का प्रभाव कायम रहेगा। विकास के बहाने नक्सलियों को कमजोर करने
का स्वप्न देखना आसान है लेकिन अभी ही नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में
रात्रिकालीन ट्रेनें ही सरकार नहीं चला पा रही है। जो हर हाल में लडऩे
के लिए तत्पर हो, उससे विकास के कामों के आधार पर जीतने की कोशिश सिवाय
दिवास्वप्न के और कुछ नहीं। सरकार तो मान ही रही है एक तरह से कि वह
बंदूक से नक्सलियों को पराजित नहीं कर सकती। सरकार को पुन: सोचना चाहिए
कि उसकी असफलता नागरिकों पर प्रभाव क्या डालेगी?

- विष्णु सिन्हा
13-7-2010

3 टिप्‍पणियां:

  1. नक्सली जो कर रहे हैं, वो तब ही तो कर पा रहे हैं जब सरकारें करने दे रही हैं?

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  2. नक्स्लवाद की जड़ में जाकर कारण ढ़ूंढ़ने की कोशिश करें तो आप सरकारों की बेईमानी को कथनी-करनी के अंतर को पायेंगे । दृढ़ इच्छा शक्ति की कमी , प्राथमिकताओं में इस समस्या को शुरूवाती दौर में क्यों नहीं रहा गया । सरकारें विकास में लगीं रहीं आदिवासी क्षेत्रों के नहीं अपने-अपनों के । आप बेहतर जानते- समझते हैं । लोग भी जानते हैं ।

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  3. यह कहना ठीक प्रतीत नहीं होता कि विकास के काम से आतंक समाप्त नहीं होगा। यहां यह स्पष्ट नहीं है कि विकास को किन-किन संदर्भों में देखा जा रहा है। सर्वांगीण और सर्वसमावेशी विकास के अतिरिक्त नक्सलवाद का कोई समाधान नहीं दिखता।

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