यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं

रविवार, 18 जुलाई 2010

पाकिस्तान से किसी भी तरह की चर्चा का कोई औचित्य तो दिखायी नहीं देता

पिछले 63 वर्षों का इतिहास तो कहीं से भी यह नहीं कहता कि पाकिस्तान की
नीयत भारत के साथ भाईचारे के साथ रहने की है। स्वतंत्रता के बाद ही जिस
तरह से काश्मीर के एक तिहाई हिस्से पर कबायलियों के द्वारा पाकिस्तान ने
कब्जा किया, उससे ही उसकी मंशा स्पष्ट हो गयी। फिर बार-बार युद्धों का
इतिहास तो सबके सामने है। ताशकंद समझौता, शिमला समझौता किसी पर भी तो खरा
उतरकर पाकिस्तान ने नहीं दिखाया। 63 वर्षों से भारत के हुक्मरान शांति
और अहिंसा की बात कर रहे हैं लेकिन पाकिस्तान के हुक्मरानों ने ऐसी मंशा
वास्तव में प्रगट नहीं की। कहते हैं कि दूध का जला छाछ को भी फूंक-फूंक
कर पीता है लेकिन पता नहीं भारत के हुक्मरान कोई सबक क्यों नहीं लेते?
पाकिस्तान भारत के साथ समझौते के लिए तभी तैयार हुआ जब उसे युद्ध में हार
का मुख देखना पड़ा। हो सकता है कि हार की कसक उसे पीडि़त करती हो लेकिन
इसका यह अर्थ तो नहीं होता कि हम बार-बार पाकिस्तान से चर्चा करने के लिए
उतावले हों।

अंतराष्ट्रीय राजनीति में सिर्फ आदर्शवाद ही काम नहीं आता। तब तो और
नहीं जब सामने वाले की मंशा में खोट हो। चीन के साथ भारत के प्रथम
प्रधानमंत्री ने पंचशील के सिद्धांत पर दोस्ती करनी और निभानी चाही लेकिन
वे भूल गए कि वे तथागत बुद्ध के अनुयायियों से दोस्ती नहीं कर रहे हैं
बल्कि दोस्त के रुप में खड़ा चीन माओवाद पर विश्वास करता है। माओवाद कोई
अध्यात्मवाद नहीं है। वरन माओवाद किसी भी तरह के अध्यात्मवाद पर विश्वास
नहीं करता। हिंदी चीनी भाई-भाई का नारा लगाते हुए चीन ने भारत को युद्ध
में न केवल शिकस्त दी बल्कि लाखों वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र पर कब्जा कर
लिया। आज भी उसकी कुदृष्टि अरुणांचल पर है। हम संबंध सुधारने के लिए हर
तरह की सुविधा चीन को दे रहे हैं। चीन के लिए तो हमने अपने बाजार को भी
खुला छोड़ दिया है।

यही चीन काश्मीर के एक हिस्से को तोहफे के तौर पर पाकिस्तान से प्राप्त
कर चुका है। पाकिस्तान को परमाणु शक्ति बनाने में भी चीन की अहम भूमिका
है। अब वह पाकिस्तान से भारत अमेरिका की तरह परमाणु संधि करने जा रहा है।
दो परमाणु विद्युत घर स्थापित करने जा रहा है। म्यांमार, बंगलादेश, नेपाल
और श्रीलंका में चीन अपने प्रभाव क्षेत्र को विकसित कर रहा है। सब कुछ
हुक्मरानों की नजरों के सामने हो रहा है। हम क्या कर रहे हैं? हम बातचीत
कर रहे हैं। हमारे विदेश मंत्री चर्चा करने पाकिस्तान जाते हैं और
पाकिस्तानी फौज जम्मू सेक्टर में फायरिंग करती है। हमारा एक मेजर और 8
जवान घायल होते हैं। सीज फायर का खुला उल्लंघन कर आतंकवादियों के भारत
प्रवेश के लिए पाकिस्तानी सेना फायरिंग कर ध्यान बंटाने का काम करती है।
काश्मीर में पथराव सशस्त्र बलों पर करने के लिए युवकों को धन देकर खरीदा
जाता है। काश्मीर में फिर से फौज भेजना पड़ता है। कितने ही शहरों में
कफ्र्यू लगाना पड़ता है और पाकिस्तान कहता है कि काश्मीर समस्या पर चर्चा
करो। काश्मीर से पाकिस्तान का क्या लेना-देना? यह बात भारतवासियों के मन
में एकदम साफ है कि काश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है। इस देश में ही नारे
लगते रहे हैं कि दूध मांगोगे तो खीर देंगे लेकिन काश्मीर मांगेगे तो चीर
देंगे। हमारी कमजोरियों के कारण ही काश्मीर को पाकिस्तान मुद्दा बनाए हुए
हैं। चीन तिब्बत को हजम कर गया। जो चाहे वह करता है। भारत ने भी मान्यता
दे दी कि तिब्बत चीन का हिस्सा है। जबकि दलाई लामा भारत में शरण लिए हुए
हैं। कैलाश मानसरोवर जिसका वर्णन हमारे पुराणों में हजारों वर्षों से
हैं, वह भारत में नहीं तिब्बत में है और तिब्बत चीन में है। हमारी तो
कहीं से कोई सुगबुगाहट भी नहीं दिखायी देती कि हम कह सकें कि कैलाश
मानसरोवर हमारा है।

बीच में तो यह बात भी सुनने में आयी थी कि पाकिस्तान के कब्जे वाले
काश्मीर को पाकिस्तान का मानकर पाकिस्तान से समझौता कर लिया जाए लेकिन
बात बनी नहीं। पाकिस्तान आतंकवादियों को खुलेआम शह देता है। यह बात विश्व
बिरादरी भी जानती है। अमेरिका में पकड़े गए हेडली के बयान के बाद तो
स्थिति और स्पष्ट हो गयी है कि आईएसआई का पूरा सहयोग आतंकवादी संगठनों
को है। मुंबई हमले का मुख्य आरोपी खुलेआम भारत के विरुद्ध जेहाद की बात
करता है और खुल्ला घूम रहा है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री भारत के
गृहसचिव के बयान की उससे तुलना करते हैं। जबकि गृह सचिव ने जो कहा, वह
तथ्यों पर आधारित है और हेडली के बयान से संबंध रखता है। प्रेस कांफ्रेंस
में भारत और पाकिस्तान के विदेश मंत्री चर्चा उपरांत कहते हैं कि खुली और
ईमानदार चर्चा हुई। फिर आरोप प्रत्यारोप प्रारंभ हो जाता है। चर्चा का
परिणाम ढाक के तीन पात। हासिल आया शून्य। जब भारत के हुक्मरान पर्याप्त
शक्तिशाली थे और अपनी शक्ति के बल पर पाकिस्तान को समझौता करने के लिए
बाध्य कर चुके तब पाकिस्तान समझौते पर खरा नहीं उतरा तो अब उससे वार्ता
का क्या औचित्य है?

एक समाचार पत्र में खबर छपी है कि श्रीलंका के लिट्टे नक्सलियों के साथ
मिल गए हैं और उन्हें प्रशिक्षित कर रहे हैं। यदि यह समाचार सत्य है तो
इसकी गंभीरता को हल्के से नहीं लिया जा सकता। श्रीलंका तो लिट्टे की
समस्या से मुक्त हो गया लेकिन वहां से पलायन कर लिट्टे के बचे हुए लोग
नक्सलियों की शरण में हैं तो सशस्त्र बलों के बस की बात नहीं कि वे
नक्सलियों का मुकाबला कर सकें। आखिर लिट्टे से मुक्ति के लिए श्रीलंका को
अपनी पूरी फौजी ताकत झोंकनी पड़ी थी। नक्सलियों के हमले बढ़ रहे हैं। और
कितना नुकसान करने के बाद फौज के हवाले इस समस्या को किया जाएगा। काश्मीर
से फौज हटाने के बाद जब स्थिति सशस्त्र बलों से नहीं संभली तब फौज को फिर
बुलाना पड़ा।

यह बात तो एकदम साफ है कि पड़ोसियों की नीयत साफ है। वे भारत को
शांतिपूर्वक फलता-फूलता देखना पसंद नहीं करते। अंदर से और बाहर से दोनों
तरफ से कमजोर करना चाहते हैं और आंख खोलकर देखें तो स्पष्ट दिखायी
पड़ेगा कि स्थिति से निपटना अब एकदम जरुरी हो गया है। कठोर कदम उठाने के
लिए दृढ़ इच्छा शक्ति की जरुरत है। पाकिस्तान से चर्चा में समय बर्बाद
करने के बदले अपनी तैयारियों की जरुरत है। नेतृत्व को लाल बहादुर
शास्त्री और इंदिरा गांधी की तरह दिखायी देने की जरुरत है। महंगाई से
पीडि़त जनता को नेतृत्व की कमजोरी का आभास तो हो रहा है। क्योंकि महंगाई
के मुद्दे पर ही सरकार जनता को राहत देने की स्थिति में नहीं है।
नक्सलियों की हिंसा और पाकिस्तान जैसे देश का आंख तरेरना जनता को चिंतित
तो करता है। पाकिस्तान से किसी भी तरह की चर्चा का कोई औचित्य तो नहीं
दिखायी पड़ता।

- विष्णु सिन्हा
दिनांक : 17.07.2010

1 टिप्पणी:

  1. बात चीत रहेगी जारी , बात चीत रहेगी जारी

    चाहे हम हों कितने तगड़े , मुंह वो हमारा धूल में रगड़े,
    पटक पटक के हमको मारे , फाड़ दिए हैं कपड़े सारे ,
    माना की वो नीच बहुत है , माना वो है अत्याचारी ,
    लेकिन - बात चीत रहेगी जारी , बात चीत रहेगी जारी .

    जब भी उसके मन में आये , जबरन वो घर में घुस जाए ,
    बहू बेटियों की इज्ज़त लूटे, बच्चों को भी मार के जाए ,
    कोई न मौका उसने छोड़ा , चांस मिला तब लाज उतारी ,
    लेकिन - बात चीत रहेगी जारी , बात चीत रहेगी जारी .

    हम में से ही हैं कुछ पापी , जिनका लगता है वो बाप ,
    आग लगाते हुए वे जल मरें , तो भी उसपर हमें ही पश्चाताप ?
    दुश्मन का बुरा सोचा कैसे ??? हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी ???
    अब तो - बात चीत रहेगी जारी , बात चीत रहेगी जारी .

    बम यहाँ पे फोड़ा , वहां पे फोड़ा , किसी जगह को नहीं है छोड़ा ,
    मरे हजारों, अनाथ लाखों में , लेकिन गौरमेंट को लगता थोडा ,
    मर मरा गए तो फर्क पड़ा क्या ? आखिर है ही क्या औकात तुम्हारी ???
    इसलिए - बात चीत रहेगी जारी , बात चीत रहेगी जारी .

    लानत है ऐसे सालों पर , जूते खाते रहते हैं दोनों गालों पर ,
    कुछ देर बाद , कुछ देर बाद , रहे टालते बासठ सालों भर ,
    गौरमेंट करती रहती है नाटक , जग में कोई नहीं हिमायत ,
    पर कौन सुने ऐसे हाथी की , जो कोकरोच की करे शिकायत ???
    इलाज पता बच्चे बच्चे को , पर बहुत बड़ी मजबूरी है सरकारी ,
    इसीलिये - बात चीत रहेगी जारी , बात चीत रहेगी जारी .

    वैसे हैं बहुत होशियार हम , कर भी रक्खी सेना तैयार है ,
    सेना गयी मोर्चे पर तो - इन भ्रष्ट नेताओं का कौन चौकीदार है ???
    बंदूकों की बना के सब्जी , बमों का डालना अचार है ,
    मातम तो पब्लिक के घर है , पर गौरमेंट का डेली त्योंहार है
    ऐसे में वो युद्ध छेड़ कर , क्यों उजाड़े खुद की दुकानदारी ???
    इसीलिये - बात चीत रहेगी जारी , बात चीत रहेगी जारी .

    सपूत हिंद के बहुत जियाले , जो घूरे उसकी आँख निकालें ,
    राम कृष्ण के हम वंशज हैं , जिससे चाहें पानी भरवालें ,
    जब तक धर्म के साथ रहे हम , राज किया विश्व पर हमने ,
    कुछ पापी की बातों में आ कर , भूले स्वधर्म तो सब से हारे ,
    जाग गए अब, हुए सावधान हम , ना चलने देंगे इनकी मक्कारी ,
    पर तब तक - बात चीत रहेगी जारी , बात चीत रहेगी जारी .

    रचयिता : धर्मेश शर्मा
    मुंबई / दिनांक २०.०९.२००९
    संशोधन, संपादन : आनंद जी. शर्मा

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