यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं

सोमवार, 2 अगस्त 2010

संस्कृति की आड़ में समाज को संकीर्ण नहीं बनाया जा सकता

संकीर्णता को संस्कृति का नाम देने की कोशिश की जा रही है। किसी भी सभ्य,
सुसंस्कृत स्वतंत्र समाज में युवक और युवती का खुलेआम घूमना, रेस्टोरेंट
में बैठना सार्वजनिक उद्यान में बैठकर बतियाना गैर संस्कृतिक नहीं है।
भारत में जो सबसे बड़ा गुण संस्कृति का है वह तो सहिष्णुता है। यहां किसी
के भी साथ जोर जबरदस्ती कर अपने विचारों को लादने की स्वतंत्रता किसी को
नहीं है। न तो इसकी इजाजत भारतीय कानून देता है और न ही समाज। किसी को
कोई व्यवहार ठीक नहीं लगता तो उसे पूरा अधिकार है कि वह उस तरह का
व्यवहार न करे लेकिन दूसरों को अपने व्यवहार के अनुसार चलने के लिए बाध्य
करने का अधिकार तो किसी को नहीं है। फिर यदि कोई गैर कानूनी काम कर रहा
है तो यह देखना पुलिस का काम है और आम आदमी को कोई अधिकार नहीं है कि वह
कानून को अपने हाथ में लेकर स्वयं न्यायाधीश बने।

कल फ्रेंडशिप डे था। यह ठीक है कि इस तरह के दिन को मनाने की परंपरा
पाश्चात्य देशों से आयी। इसे मनाने के लिए या न मनाने के लिए कोई किसी को
बाध्य नहीं कर सकता लेकिन इसे न मनाने वालों को यह अधिकार किसने दिया कि
वे धर्मसेना की आड़ में मनमानी करे। किसी को लात जूते से मारें, चेहरे पर
कालिख पोतें, भय पैदा करें। लड़के और लड़की में दोस्ती नहीं हो सकती, यह
किस संस्कृति और कानून में लिखा है। भारत का कानून तो वयस्क युवक
युवतियों को दोस्ती की ही नहीं, शादी की भी इजाजत देता है और इस मामले
में जाति, धर्म भी आड़े नहीं आते। हरियाणा में एक गोत्र में शादी के
विरूद्घ खाप पंचायतें हैं लेकिन कानून उनके पक्ष में नहीं है। फिर किसी
युवक युवती की दोस्ती किसी को नापसंद हो तो यह अधिकार उनके परिवार को भी
कानून नहीं देता कि वे अपनी नापसंदगी को कानून के विरूद्घ व्यवहार में
लाएं। जब माता पिता को ही अधिकार नहीं है तो दूसरे अंजान लोगों को तो इस
तरह का अधिकार होने का प्रश्र ही नहीं खड़ा होता।

कोई युवक किसी के साथ जबरदस्ती दोस्ती की कोशिश करे तो विरोध सही है। ऐसा
तो तब हो न जब कोई शिकायत करे। कोई शिकायत करे तो कानून को हस्तक्षेप का
पूरा अधिकार है। पिछले दिनों एक समाज की लड़की ने दूसरे समाज के लड़के से
विवाह कर लिया। धर्म परिवर्तन कर विवाह कर लिया। लड़की के समाज वालों ने
बहुत विरोध किया लेकिन जब न्यायालय में लड़के और लड़की को प्रस्तुत किया
गया तब दोनों के बयान को सुनकर कानून ने लड़के और लड़की का ही साथ दिया।
दोस्ती की स्वतंत्रता तो सदा से चली आयी है। जहां तक हिंदू समाज का
प्रश्र है तो यह खुला समाज रहा है। हमारे यहां तो विवाह के लिए स्वयंवर
तक की प्रथा रही है। लड़की जिसके गले में वरमाला डाल दे, वही उसका पति
बनने का अधिकारी होता था।

पूर्णावतार कृष्ण की रास लीला से पूरा समाज परिचित रहा है। हजारों
गोपियां राधा सहित कृष्ण की सहेलियां रही हैं। मीरा की कृष्ण भक्ति तो
बेमिसाल रही है। मीरा की कृष्ण भक्ति के लिए मीरा को कम प्रताडि़त नहीं
किया गया लेकिन आस्था किसी के डिगाए डिगती नहीं है। हीर रांझा, सोहनी
महिवाल की प्रेम कहानियां भी इस भारत भूमि में ही हुई। हमारी फिल्में,
साहित्य युवक युवतियों की प्रेम कथा से अटा पड़ा है। भक्त तो कहते हैं कि
प्रेम ही परमात्मा है। प्रेम की राह में अड़ंगा लगाने वालों को किसी
इतिहास ने नायक नहीं माना। सर्वत्र दोस्ती की ही बात होती है और दोस्ती
का सीधा संबंध प्रेम से है। समलिंगियों में दोस्ती सही है तो अब समलिंगी
विवाह की भी इजाजत मांग रहे हैं। हालांकि समाज इसे अभी प्राकृतिक नहीं
मानता लेकिन पुरूष पुरूष के बीच दोस्ती को तो आदिकाल से स्वीकार किया
जाता रहा है।

आज भी आदिवासियों में घोटुल प्रथा है। युवक युवतियां एक साथ नृत्य करते
हैं। कोई बुरा नहीं मानता। संकीर्णता का सबक समाज को समझाने वालों को उन
पर भी दृष्टि डाल लेना चाहिए। आज शिक्षा का महत्व सर्वाधिक है और स्त्री
पुरूष के कंधे से कंधा मिलाकर शिक्षा के ही नहीं रोजी रोटी के लिए भी
संघर्षरत है। एक साथ पढ़ेंगे, लिखेंगे, काम करेंगे तो उनमें दोस्ती
स्वाभाविक है। हो सकता है दोस्ती कभी विवाह में भी बदल जाए बल्कि बदल भी
रही है। महानगरों में तो यह दोस्ती तेजी से पनप रही है। भारतीय समाज खुला
समाज है। कूपमंडूक नहीं है। आज दुनिया भर में भारतीयों का बोलबाला है। हर
क्षेत्र में भारतीय अपनी योग्यता साबित कर रहे हैं। इन्हें आगे बढऩे से
कौन रोक सकता है? आज ही समाचार पत्रों में आंकड़े प्रकाशित हुए हैं कि
अमीरों की संख्या देश में बढ़ रही है। गरीबों की संख्या कम हो रही है।
गरीब भी अमीर होने की राह पर हैं। उनके लड़के लड़कियां भी पढ़ लिख रहे
हैं, खेलकूद रहे हैं। दुनिया में आगे बढऩे की एक तरह से प्रतियोगिता ही
चल रही है।

तब चाक को उल्टा नहीं घुमाया जा सकता। संस्कृति अपने नए कलेवर में प्रगट
हो रही है। दुनिया छोटी हो रही है। आयात निर्यात सिर्फ सुविधाओं का ही
नहीं हो रहा है बल्कि उसके साथ सांस्कृतिक आदान प्रदान भी हो रहा है। ऐसा
नहीं हो सकता कि कोई चीज अकेले आए। वह अपने साथ वह सब भी लाती है जिसका
मार्केट बने। अब यह तो उपयोग करने वालों की इच्छा पर निर्भर करता है कि
वे उसका उपयोग करें या न करें। अंग्रेजी को ही रोकने की कितनी कोशिश की
गयी लेकिन आज अंग्रेजी स्कूल शहरों में ही नहीं गांवों में भी पहुंच गए।
भारत के युवक युवतियों की जो दुनिया भर में पूछ हो रही है, उसका एक बड़ा
कारण उनका अंग्रेजी ज्ञान भी है। इंग्लैंड ने तो कानून ही बना दिया है कि
जिसे अंग्रेजी नहीं आती उसका इंग्लैंड में कोई काम नहीं।

संस्कृति के नाम पर दबाव से यह सब रूकने वाला नहीं है। वह तो गनीमत है कि
ये पलटकर जवाब नहीं दे रहे हैं। क्योंकि ये अपनी ऊर्जा को बेकार के उलझाव
में खर्च नही करना चाहते लेकिन पलटकर इन्होंने जवाब देना प्रारंभ कर
दिया तो भागने की जगह नहीं मिलेगी। क्योंकि तब कानून भी तो इन्हीं के साथ
होगा। समाज का पूरा ढांचा बदल रहा है। रोजी रोटी ने संयुक्त परिवार के
ढांचे को कमजोर कर दिया। जात पात के बंधन भी पढ़े लिखे में कमजोर पड़ रहे
हैं। योग्यता, समान रूचि समाज में नई व्यवस्था गढ़ रहा है। जिसे जो अच्छा
लगेगा, वह वही करेगा। उसे आगे बढऩा है तो वह दकियानूसी परंपराओं के साथ
नहीं चल सकता। रोकने वाले रोकने की कोशिश करते हैं लेकिन रोक नहीं पाते।
आज जो लोग रोकने की कोशिश कर रहे हैं, इनकी भावी पीढ़ी ही इनके रोके नहीं
रूकेगी। कानून को अपना काम करना चाहिए। जिससे ऐसे लोगों को अपनी सफलता की
खुशफहमी न पैदा हो।

-विष्णु सिन्हा
2-7-2010

2 टिप्‍पणियां:

  1. bat to aap sahi kah rahne hai lekin ye nahi bhulni chahiye ki humari pahchan humare sanskriti se hai jise hume nahi bhulna chahiye...........

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  2. बिल्कुल मेरे मन की बात लिख दी आपने...

    संस्कृति की व्याख्या हर इंसान अपने हिसाब से करने के लिये स्वतंत्र है। जिन्हे डर है कि हमारे युवा संस्कृति भूलते जा रहे हैं, वो सिर्फ़ स्वयं संस्कृति याद रखने के लिये स्वतंत्र हैं, जोर जबरदस्ती से किसी और को इसे याद रखने वाले प्रयासों पर केवल हंसा जा सकता है।

    आप चिंता न करें, युवा वर्ग ने हर देश-काल में बहुत कुछ सहा है और ये गुंडे तो कुछ भी नहीं। हमें तो खुशी है कि जिस प्रकार ये गुंडई पर आने को मजबूर हुये हैं, उससे साबित होता है कि इनके पास तर्क नाम की कोई चीज नहीं बची है और ऐसे असहिष्णु लोग फ़्रस्टेशन में ऐसा काम कर रहे हैं। दूसरे शब्दों में, ये अब खुद अप्रासंगिक हो चुके हैं।

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