यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं

सोमवार, 2 अगस्त 2010

3 छात्रों की मौत के बाद पुलिस को और कड़ा रुख वाहन चालकों के प्रति अपनाना चाहिए

---हर वह परिवार सहमा हुआ है। जिसके बच्चे स्कूलों में पढ़ते हैं। कल हुआ
हादसा। जिसमें तीन छात्रों की जीवन लीला समाप्त हो गयी और 5 छात्र
अस्पताल में जिंदा रहने के लिए उपचार करा रहे हैं। जिनके बच्चों के साथ
यह हादसा हुआ, उनके दुख को, पीड़ा को सभी माता पिता महसूस कर रहे हैं।
सुबह घर से निकला बच्चा सकुशल घर लौट आए तभी अब दिल को सुकून मिल सकता
है। सिर्फ हादसा कह कर इस घटना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हादसे के
कारण तो स्पष्ट दिखायी दे रहे हैं। सड़कों को जनता की ही सुविधा के लिए
फोरलेन किया जा रहा है लेकिन जिस लापरवाही से काम हो रहा है, उसका गवाह
तो पूरा इलाका है। फिर मिनीडोर जैसे वाहन को डम्पर टक्कर मारे तो मिनीडोर
में बैठे लोगों की जान चली जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। फिर वे
छोटे-छोटे बच्चे हों तो आसानी से महसूस किया जा सकता है कि हादसा कितना
दर्दनाक होगा।

सड़क, वाहन सभी तो मानव निर्मित व्यवस्था है और मनुष्य की सुख सुविधा के
लिए ही हैं लेकिन अब ये मनुष्य की सुविधा के साथ उसकी मौत का कारण भी बन
रहे हैं। डम्पर के ड्रायवर ने टक्कर तो मार दी लेकिन स्वयं भाग खड़ा हुआ।
कहा जा रहा है कि डम्पर नगर निगम की सेवा में था और कचरा उठाने के लिए
उपयोग किया जाता था। हादसे के कारण लोगों में दुख था तो आक्रोश भी कम
नहीं था। ड्रायवर लोगों के हाथ लग जाता तो लोग उसका क्या हाल करते?
ड्रायवर भाग भले ही गया हो लेकिन पकड़ में भी आ जाएगा। कितने ही घरों का
चिराग बुझाने वाले ड्रायवर के लिए कानूनी सजा का प्रावधान ही कितना है?
महज 2 वर्ष की सजा। गैर इरादतन हत्या का मामला। कानून कितना कमजोर है कि
पीडितों को न्याय भी नहीं दे सकता।

जब हजारों लोगों की जान लेने वाले भोपाल गैस हादसे के दोषियों को कानून
23 वर्ष बाद 2 वर्ष की सजा सुनाता है तो न्यायाधीश का इसमें कोई दोष नहीं
हैं। कानून ही ऐसा है। दुर्घटना गैर इरादतन हत्या है। मतलब ऐसी हत्या
जिसमें हत्यारे की मंशा किसी की जान लेने की नहीं थी। न ही जिनकी जान गई,
उनसे हत्यारे की कोई निजी दुश्मनी थी। फिर भी जान तो गयी। किसी की
लापरवाही से ही जान गयी। समय से पहले जान गयी। किसी के जिंदा रहने के
अधिकार को छीन लिया गया। वर्षों न्यायालय में लंबी कानूनी लड़ाई, लड़ाई
के दौरान जमानत पर आजादी और सब कुछ फूल प्रूफ हुआ तो अधिक से अधिक 2 वर्ष
की कैद। ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब सड़कों पर हादसे का शिकार होकर लोग
अपनी जान नहीं गंवाते। आंकड़े तो अब यह कहने लगे हैं कि द्वितीय विश्व
युद्ध में जितने लोग नहीं मारे गए उससे ज्यादा सड़क हादसे में मारे गए
हैं।

मरने वाला तो मर जाता है लेकिन मरने वाले के परिवार पर क्या बीतती है?
उसके दुख दर्द की तो इंतहा नहीं होती। किसी भी तरह का आर्थिक हर्जाना
मृतक की जगह नहीं ले सकता। सड़क दुर्घटना में मारे गए लोगों के परिवारों
को बीमा कंपनियां हर्जाना दे देती है। गैस कांड में मरे और पीडि़त लोगों
को हर्जाना दिया गया। अब केंद्र सरकार अपने बजट में से हर्जाना दे रही
है। जो पीड़ा गैस पीडि़त आज भी भोग रहे हैं। उसके दोषियों को 2 वर्ष की
कैद और वे भी उच्च न्यायालय में अपील के लिए जमानत पर बाहर। असली मालिक
एंडरसन आराम से अपनी जिंदगी के दिन अमेरिका में व्यतीत कर रहा है। उसका
प्रत्यर्पण भारत में किया जाए या नहीं, इस पर ही सरकार सोच विचार ही कर
रही है।

भारत सरकार ने अमेरिका से परमाणु समझौता किया है। इसके बाद अन्य देशों से
भी कर रही है। परमाणु संयंत्र यदि दुर्घटना का शिकार हो गए तो हादसे के
शिकार लोगों को हर्जाना देने के मामले के संबंध में सरकार लोकसभा में एक
विधेयक पेश कर रही है। इसमें प्रावधान है कि परमाणु संयंत्र लगाने वाली
कंपनी सिर्फ 5 सौ करोड़ रुपए का हर्जाना देगी और इससे अधिक हर्जाना देना
पड़ा तो वह रकम भारत सरकार चुकाएगी। मतलब साफ है कि अब कोई एंडरसन तभी
भारत में संयंत्र लगाएगा जब भारत सरकार उसे पूरी सुरक्षा प्रदान करेगी।
ये परमाणु संयंत्र जनता को ऊर्जा की आपूर्ति पर्याप्त मात्रा में हो सके,
इसलिए लगाए जाएंगे लेकिन किसी भी मानवीय या यांत्रिक त्रुटि के कारण
हादसा हुआ तो भोपाल गैस कांड से भी बड़ा हादसा होगा। मतलब साफ है कि
सुविधा चाहिए तो कीमत मौत के रुप में भी चुकाना पड़ सकता है। यही विज्ञान
की देन है। विज्ञान मनुष्य के लिए एक तरफ वरदान दिखायी पड़ता है तो दूसरी
तरफ वह किसी अभिशाप से कम नहीं है।

चौड़ी-चौड़ी सड़कें और उस पर तीव्र से तीव्र गति से भागते वाहन। विज्ञान
की ही देन है। जरा सी लापरवाही जिंदगी के लाले पड़ जाते हैं। सड़कों के
किनारे सरकार बोर्ड लगाती है कि दुर्घटना से देर भली। सावधानी हटी
दुर्घटना घटी। जगह-जगह सड़कों पर स्पीड लिमिट भी लिखे रहते हैं। सड़क पर
चलने वाला और वाहन चलाने वाला दोनों अच्छी तरह से जानता है कि लापरवाही
का क्या हश्र निकल सकता है? गलत साइड से गाड़ी चलाने या मोडऩे का क्या
अर्थ होता है? सब कुछ जानते समझते हुए भी दुर्घटना होती हैं और लोग मारे
जाते हैं। सड़क ही असुरक्षित नहीं है। रेल की पटरियां जिस पर सिर्फ
रेलगाड़ी ही दौड़ती है, वही कहां सुरक्षित है। पिछले दिनों रेलवे स्टेशन
पर खड़ी ट्रेन से ही दूसरी यात्री ट्रेन पूरी स्पीड से टकरा गई। टक्कर
इतनी जबरदस्त थी कि बोगी ऐसी उछली कि ओव्हर ब्रिज पर जाकर गिरी। ट्रेन के
इंजन का कचूमर निकल गया। कल रायपुर में ही एक बड़ा ट्रेन हादसा होते होते
रह गया। चांवल से भरी बोगियां पटरी से उतर गयी। वह तो स्पीड कम थी। स्पीड
ज्यादा होती और बोगी पटरी से उतरती तो घनी आबादी के क्षेत्र में कितनों
की जान ले लेती, क्या कहा जा सकता है? अब वह जमाना तो रहा नहीं जब
मंत्रियों में लाज शर्म होती थी और ट्रेन दुर्घटना पर इस्तीफा दे दिया
करते थे। ममता बेनर्जी को रेल मंत्री बने अभी 1 वर्ष से कुछ ज्यादा ही
समय हुआ है लेकिन हर माह कहीं न कहीं ट्रेन दुर्घटनाएं होती ही हैं।
इंसान न सड़क पर सुरक्षित है और न ही रेल पर। हवा की क्या बात की जाए?
वह तो पूरी तरह से असुरक्षित यात्रा है। कहां सुरक्षित है, इंसान। इसलिए
घर से निकला परिवार का व्यक्ति जब तक सकुशल घर नहीं आ जाता, परिवार के
लोग चिंताग्रस्त ही रहते हैं। बच्चों के मामले में कल हुए हादसे ने
चिंता बढ़ायी ही है। बच्चों को स्कूल के लिए मिनीडोर, आटो, रिक्शा से
भेजने वाले माता पिता की पेशानी पर बल देखा जा सकता है। पुलिस ने कड़ा
रुख भी पिछले दिनों इन पर अपनाया है। जरुरी भी है। क्योंकि घर से निकलने
के बाद बच्चे इन्हीं के हवाले होते हैं। पुलिस की कार्यवाही सख्त होना भी
चाहिए। उम्मीद तो यही की जाती है कि अब किसी के घर का चिराग इस तरह से
नहीं बुझेगा।

- विष्णु सिन्हा
दिनांक : 31.07.2010
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1 टिप्पणी:

  1. मतलब साफ है कि अब कोई एंडरसन तभी
    भारत में संयंत्र लगाएगा जब भारत सरकार उसे पूरी सुरक्षा प्रदान करेगी. यही तो भाजपा का एजेण्डा है. जिसके कारण कांग्रेसी कोई संयत्र नहीं लगवा पा रहे हैं. :-)

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