यह ब्लॉग छत्तीसगढ़ के सबसे पुराने समाचार पत्र "अग्रदूत" में प्रकाशित कुछ लेखों को प्रकाशित करेगा . जिन्हे मेरे अग्रज, पत्र के प्रधान संपादक श्री विष्णु सिन्हा जी ने लिखा है .
ये लेख "सोच की लकीरें" के नाम से प्रकाशित होते हैं

शनिवार, 23 अक्तूबर 2010

नारायण सामी पर काली स्याही फेंकने को लेकर टिप्पणी की जा रही है कि पुरानी परंपरा है

नारायण सामी पर स्याही के काले छींटे क्या पड़े, लोग याद कर रहे हैं कि
छत्तीसगढ़ में ऐसा पहले भी कई बार हो चुका है। एक समाचार पत्र लिख रहा है
कि यह पुरानी परंपरा है। किस किस के साथ कब कांग्रेसियों ने अपमानजनक
व्यवहार किया, इससे समाचार पत्र रंगे हुए हैं। दूसरी तरफ कांग्रेसी नेता
इसके लिए भाजपा की सरकार को दोषी बता रहे हैं। उनका कहना है कि नारायण
सामी केंद्रीय मंत्री हैं तो उनकी सुरक्षा का पूरा ध्यान रखना राज्य
सरकार का काम है। कांग्रेसी नेता के साथ कांग्रेस भवन के सामने प्रदेश
प्रतिनिधियों की नियुक्ति को लेकर कोई पर्चे बांटे, काली स्याही फेंके तो
कांग्रेसियों की जिम्मेदारी कुछ नहीं है। कांग्रेसियों से कांग्रेसी नेता
की सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार की है। इस घटना से कांग्रेसी कितना
शर्मिंदा हैं, यह तो वे ही जाने लेकिन कांग्रेस के अंदर की राजनीति का
प्रभाव जनता पर क्या पड़ रहा है, इसकी चिंता किसी को नहीं है।
सोनिया गांधी जिंदाबाद, राहुल गांधी जिंदाबाद के नारे लगाना ही कांग्रेसी
होने के लिए पर्याप्त नहीं है। कांग्रेस की प्रतिष्ठï धूल धूसरित करने
का अधिकार जिंदाबाद के नारे लगाने से नहीं मिल जाता। कालिख पोतने की
संस्कृति, जूते पहनाने की संस्कृति, मार पिटायी करने की संस्कृति
कांग्रेस की छवि जिन्हें नहीं मालूम उन्हें भी बता रही है कि कांग्रेस
में किस किस तरह के लोग हैं। नारायण सामी आए। 45 मिनट की बैठक ली। प्रदेश
अध्यक्ष, जिला अध्यक्ष बनाने का अधिकार सोनिया गांधी को सौंपकर चले गए।
एक यही तो ऐसा मामला है जिसमें कांग्रेसी एक राय होने के लिए बाध्य हैं।
जिस तरह से प्रदेश कांग्रेस के प्रतिनिधियों का चुनाव हुआ और विवाद हुआ,
उसके बाद अभी पूरे के पूरे प्रदेश प्रतिनिधियों की नियुक्ति भी नहीं हुई
है। बचे हुए प्रदेश प्रतिनिधियों की नियुक्ति भी सोनिया गांधी ही करेंगी।
अध्यक्ष और उसकी कार्यकारिणी भी  सोनिया गांधी ही बनाएंगी। प्रदेश
प्रतिनिधियों का इतना ही काम है कि वे किसी को प्रदेश अध्यक्ष न चुनें
बल्कि यह चुनने का अधिकार सोनिया गांधी को दें।

पार्टी प्रजातांत्रिक ढंग से काम करती है, इसका प्रमाण देने के लिए यह सब
कार्यवाही आवश्यक है। इस तरह की कार्यवाही न की जाती तो नारायण सामी को
आने की जरूरत भी नहीं थी। न वे आते और न ही उन पर काली स्याही फेंकी
जाती। स्याही फेंकने वालों ने भी तो अपने पर्चे में यही छापा है कि ये
लोग कांग्रेस को नुकसान पहुंचा रहे हैं और गरीब कांग्रेसियों की कोई
सुनने वाला नहीं है। जब नहीं सुनोगे तो आक्रोश सही रास्ते से नहीं
निकलेगा तो गलत रास्ते से निकलेगा। प्रदेश कांग्रेस का प्रतिनिधि बिना
किसी बड़े नेता का समर्थक बने तो बना नहीं जा सकता। प्रदेश प्रतिनिधियों
के निर्वाचन को लेकर नाराजगी है, उसका कारण भी तो यही है कि नेता जिन्हें
प्रदेश प्रतिनिधि के रूप में देखना चाहते थे, उनका नाम सूची में नहीं था।
इसीलिए तो आस्कर फर्नांडीज के सामने शिकायतों का अंबार लग गया। शिकायत तो
यह की गई कि सफेदा लगाकर प्रदेश प्रतिनिधियों के नाम तक बदल दिए गए।
ऐसी परिस्थिति में किसका धैर्य कब जवाब दे दे, क्या कहा जा सकता है? किसी
ने तो धैर्य निश्चित रूप से खोया है। जब धैर्य चूक गया तो सही गलत का भेद
मस्तिष्क में समाप्त हो गया और क्रोध ने विवेक का साथ छोड़ दिया। परिणाम
सामने आया कि काली स्याही फेंककर आक्रोश का प्रगटीकरण। सीधे सीधे देखें
तो किसी पर भी कालिख फेंकना गलत लेकिन जब सुनवायी न हो तो क्या करे? पहले
भी ऐसी घटनाएं हुई लेकिन न तो कोई पकड़ा गया और न ही किसी को सजा हुई।
नहीं तो मुख्यमंत्री को पीटने के मामले में ही सजा होनी चाहिए थी।

अपमानित करने वालों को पार्टी स्तर पर ही सजा मिलनी चाहिए थी लेकिन जब
किसी का कुछ नही  हुआ तो इस बार भी क्या होगा? यही सोच शायद इस घटना की
जनक बनी लेकिन दुर्भाग्य से इस घटना को अंजाम देने वाले पकड़ में आ गए।
अब यह बात तो छुपने वाली नहीं है कि किसने इस घटना को क्रियान्वित करने
में प्रमुख भूमिका निभायी लेकिन ऐसा कोई बड़ा अपराध तो है नहीं, जिस पर
कड़ी सजा सुनायी जा सके। अधिक से अधिक कानून की सामान्य धाराएं लगेंगी और
वह भी न्यायालय में मुकदमा चलेगा तो छोटी मोटी कोई सजा अंतत: हो जाए तो
हो जाए।

लेकिन कांग्रेस की छत्तीसगढ़ में कैसी स्थिति है? इस घटना से यह स्पष्ट
होता है। आंतरिक कलह से जूझ रही कांग्रेस को एकता के सूत्र में बांधने के
लिए किसी योग्य नेतृत्व की जरूरत है। जो गुटबाजी के ताने बाने को तोड़कर
सबको एक साथ लेकर चल सके। यह काम किसी गुटबाज नेता के बस का नहीं है।
सबको संतुष्ट करने के चक्कर में कोई भी  संतुष्ट नहीं होता। यह बात
अच्छी है कि सोनिया गांधी के द्वारा नियुक्त व्यक्ति की सीधे आलोचना तो
कोई नहीं करता लेकिन कांग्रेस उसके नेतृत्व में जनता में लोकप्रिय होने
की कोशिश करती है तो टांग खींचने का काम प्रारंभ हो जाता है। छत्तीसगढ़
कांग्रेस की तो आर्थिक हालत ही ऐसी है कि केंद्र धन न दे तो पार्टी का
दैनंदिन काम ही न चले। करोड़पति नेताओं की कमी नहीं हैं लेकिन पार्टी को
धन देकर चलाने में कितनों की रूचि है? पार्टी से तो कांग्रेसी सब कुछ
चाहते हैं लेकिन पार्टी को देने के मामले में रूचि किसी की हो तो हो,
सबकी नहीं है। एक अदद प्रदेश कांग्रेस का कार्यालय तो कांग्रेसी बना नहीं
सकें। जबकि जमीन उन्हें आबंटित हो चुकी है। भाजपा अपना प्रदेश कार्यालय
बनाने की योजना पर काम कर रही है। भाजपाइयों ने तय किया है कि वे अपने
सदस्यों से चंदा प्राप्त कर भवन का निर्माण कराएंगे लेकिन कोंग्रेस उसी
पुराने कांग्रेस भवन से काम चला रही है।

जब कांग्रेस की छत्तीसगढ़ में सरकार थी तब प्रदेश कार्यालय के लिए एक
कांग्रेसी ने अपना भवन दिया भी था लेकिन सरकार गयी और प्रदेश कार्यालय
जिला कार्यालय के दफतर में आ गया। कांग्रेस के सभी प्रकोस्ठो के लिए
कांग्रेस भवन ही एक मात्र स्थान है। जबकि भाजपा ने जिला कार्यालय को
प्रदेश कार्यालय की तरह उपयोग किया और अब बड़ा प्रदेश कार्यालय बना रही
है, सर्वसुविधायुक्त। भाजपा में अभी भी कार्यकर्ताओं की सोच पार्टी के
लिए सब कुछ करने की है। जबकि कांग्रेस में कार्यकर्ताओं की सोच पार्टी
उन्हें क्या देती है, इस तक ही सीमित है। कभी कांग्रेसियों ने एक एक
मुट्ठी  अनाज इकट्ठा  कर कांग्रेस भवन बनाया था लेकिन अब वह बात नहीं है। अब
तो पद चाहिए, पार्टी का टिकट चाहिए और भी जो कुछ पार्टी के नाम पर मिल
जाए।

छत्तीसगढ़ में ही क्यों? कांग्रस में एक नई संस्कृति का उदय हुआ है।
महाराष्ट्र  में ही सोनिया गांधी की रैली के लिए प्रदेश अध्यक्ष तक दस
लाख मांगते स्टिंग आपरेशन में दिखाए गए हैं। अब रैली में सम्मिलित होने
के लिए लोग आते नहीं, उन्हें लाना पड़ता है और लाने के लिए खर्च करना
पड़ता है। कहां से चली थी कांग्रेस और कहां पहुंच गयी। तभी कालिख पोतने
के बाद हुई बैठक में कालिख पोतने की घटना का जिक्र तक नहीं हुआ। निश्चित
प्रस्ताव पारित हुए और नारायण सामी चलते बने। धीरे धीरे इस घटना को भुला
दिया जाएगा और पार्टी पुरानी रफतार पर चलने लगेगी। इसके सिवाय चारा भी
क्या है?

- विष्णु सिन्हा
20-10-2010